दुष्यंत ने जाते जाते कहा था कि वह शकुंतला की अगवानी में अपनी चतुरंगी
सेना भेजेगा. किंतु उस के गये कोई दस वर्ष होने को आए और अभी तक उस ने कोई
संदेश भी नहीं भिजवाए थे, इस बीच शकुंतला ने एक अगाध शक्तिवान पुत्र को
जन्म दिया था जिस के अब छः वर्ष पूरे हो चुके थे. कण्व ऋषि समय समय पर उस
बालक के सभी शास्त्रोक्त संस्कार करते रहे थे.
उस बालक में अद्भुत
शक्ति थी. वह वन्य पशुओं के साथ ही खेलता था, कभी किसी पर सवारी करता कभी
किसी के पीछे कोई आखेटक बन कर दौड़ता. छः वर्ष की आयु में वह सिंह, बाघ और
हाथियों को पकड़ कर आश्रम के वृक्षों से बाँध देता था. सभी जंतुओं को अपने
अधीन कर सकने की उसकी क्षमता देख आश्रमवासियों ने उसका नाम सर्वदमन रख दिया
था. कण्व ने भी उसे सभी जंतुओं को दबाते देखा था और अब उन्हे लगने लगा कि
इस बालक के अपने पिता के उत्तराधिकारी रूप में घोषित किए जाने का समय आ गया
है.
एक दिन अपने कुछ शिष्यों को बुला कर कण्व ने उन्हें शकुंतला
और सर्वदमन को राजा दुष्यंत के पास, हस्तिनापुर, ले जाने के निर्देश दिए.
“शकुंतला को उस के पुत्र के साथ उसके पति के पास ले जाओ. स्त्रियों को अपने
माता-पिता के घरों में लंबे काल के लिए नहीं रहना चाहिए. ऐसा करने से उनकी
प्रतिष्ठा, उनका आचरण और उनका धर्म, तीनों की क्षति होती है.”
माँ
और पुत्र, दोनो पहली बार वन के बाहर जा रहे थे. शिष्यों के साथ वे
हस्तिनापुर पहुँचे. दुष्यंत से उनके परिचय करा कर कण्व के शिष्य वापस लौट
आए. अपने पुत्र के साथ शकुंतला आगे बढ़ी और राजा के यथोचित अभिवादन कर उस
ने अपने साथ आए, उदित होते हुए सूर्य के समान तेजस्वी और मनोहर बालक का
दुष्यंत के पुत्र के रूप में परिचय दिया. “राजन, यह तुम्हारा पुत्र है.
देवताओं के समान शक्तिमान, तुम्हारे इस पुत्र को मैने महात्मा कण्व के
आश्रम में जन्म दिया है. समय आ चला है जब तुम अपने वचन का पालन करो और
हमारे इस पुत्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित करो.”
“मुझे कुछ भी ऐसा
स्मरण नहीं है”, दुष्यंत ने कहा. “तुम कौन दुष्टा हो जो इस प्रकार तापसी
भेष में घूम रही हो? धर्म, अर्थ या काम संबंधित मेरे कोई संबंध कभी तुम से
नहीं रहे हैं. तुम्हारी जो इच्छा हो, करो; चाहो तो रहो या चाहो तो जाओ”
ऐसा
भी हो सकता है यह उस निर्दोष लड़की ने कभी सोचा भी नहीं था. राजा की बातें
सुन कर दुःख और लज्जा से वह किसी काष्ठ स्तंभ की भाँति जड़ हो गयी.
कुछ
क्षणों में जब उस की चेतना लौटी तो उस की आँखें अंगारे के समान लाल थीं,
उस के होंठ क्रोध से काँप रहे थे और ऐसा लग रहा था कि वह अपनी दृष्टि से
राजा को भस्म कर देगी. किसी तरह अपने क्रोध और तपस्या से अर्जित अपनी अग्नि
को शांत कर उस ने अपने आप को संयत किया. अपने विचारों को सॅंजो कर, दुःख
और रोष से भरे हृदय से उस ने कहा “सब कुछ जानते हुए भी राजन, कैसे किसी नीच
की तरह तुम कह सकते हो कि तुम कुछ नहीं जानते? तुम्हारा हृदय जानता है कि
मैं सत्य कह रही हूँ या असत्य. जो अपने वास्तविक रूप को छुपा कर कुछ और
दिखाता है वह अपनी चोरी स्वयं करता है. वह कोई भी नीच कर्म कर सकता है. तुम
सोच रहे कि बस तुम्ही जानते हो तुमने क्या किया था, पर राजन, तुम उस
सर्वज्ञ, अंतर्यामी को भूल रहे हो.
“जो पाप करता है वह अक्सर
सोचता है उसे कोई नहीं देख रहा है, किंतु उसे देवता देखते हैं और उसे
नारायण भी देखते हैं, जो सबों के हृदय में वास करते हैं. सूर्य, चंद्र,
वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल, हृदय, यम, दिन, रात्रि, संध्या और धर्म ये
सब मनुष्यों के प्रत्येक कर्म के साक्षी रहते हैं. किसी ऐसे कर्म को, जिस
से नारायण प्रसन्न रहते हैं, सूर्य पुत्र यम सदैव अनदेखा कर देता है किंतु
जिन कर्मों से नारायण अप्रसन्न रहते हैं, यम उन के यथोचित दंड देने से कभी
नहीं चूकता.
“मैं अपने पति के प्रति समर्पित पत्नी हूँ. यह सच है
कि यहाँ मैं अपनी इच्छा से आई हूँ, तुम ने मुझे बुलाया नहीं है. किंतु इस
के चलते तुम मेरा तिरस्कार नहीं कर सकते. मैं तुम्हारी पत्नी हूँ और तुम से
सम्मान पाना मेरा अधिकार है. मैं कोई साधारण स्त्री नहीं हूँ; तुम्हारी
पत्नी हूँ मैं, तुम्हारे पुत्र को जन्म दिया है मैने. और याद रखो, जो मैं
कहती हूँ वह तुम ने नहीं किया तो तुम्हारे मस्तक के सौ टुकड़े हो जाएँगे.
“पति
ही पत्नी के गर्भ में प्रवेश करता है और पति का ही रूप उस गर्भ से फिर
पुत्र बन कर निकलता है. पुत्र के जन्म के बाद वेदज्ञ पति अपनी पत्नी को
जाया (जिस ने उन्हे जन्म दिया) कहते हैं. और जो पुत्र इस तरह उत्पन्न होता
है वह अपने पूर्वजों की आत्माओं का उद्धार करता है. वह उन्हे “पुत” नामक
नरक से बचाता है इसी लिए स्वयम्भू ने उसे “पुत्र” (पुत से तारने वाला) कहा
है.
“भार्या वही है जो पुत्र जने, भार्या वही है जिसका हृदय सदैव उस
के स्वामी से अनुरक्त रहे और जो अपने पति को छोड़ किसी को नहीं जाने.
भार्या से बढ़ कर कोई मित्र नहीं होता. धर्म, अर्थ और काम के मूल में तो
भार्या है ही, साथ में मोक्ष के मूल में भी भार्या ही है. आनंद के समय
पत्नियाँ अन्यतम मित्र होतीं हैं, धार्मिक कृत्यों के समय वे पिता सदृश
होती हैं और रोग-कष्ट में वे माता के सदृश होती हैं.
“अनुरक्त
पत्नियाँ यमलोक में भी अपने पतियों का साथ देती हैं. पत्नी यदि वहाँ पहले
पहुँचती है तो वह अपने पति की प्रतीक्षा करती है; यदि पति पहले पहुँच जाता
है तो समर्पित पत्नी शीघ्र उस के पीछे पीछे चली आती है. विवाह का कारण यही
है. पति अपनी पत्नी का साहचर्य इस लोक और परलोक दोनो जगह पाता है.
"किसी
पुरुष को क्रोध में भी कभी ऐसा कुछ नही करना चाहिए जो उस की पत्नी को
अच्छा नहीं लगे; पुरुष के आनंद और धर्म पत्नी पर ही निर्भर करते हैं. पत्नी
ही वह पवित्र क्षेत्र हैं जहाँ से पति पुनः जन्म लेता है. ऋषि भी बिना
स्त्रियों के जीवन नही रच सकते. सब जानते हैं कि जब उस का धूलि-धूसरित
पुत्र उस के पैरों से लिपट जाए तो पिता को अतुलनीय सुख और आनंद मिलता है .
और तुम अपने इस पुत्र की ओर देख भी नहीं रहे हो; अपने पुत्र को, जो
तुम्हारे घुटनों पर चढ़ने के लिए लालायित है. चींटियाँ भी अपने अंडों का
नाश नहीं होने देतीं और तुम अपने को धार्मिक बताते हो पर अपने पुत्र का
पोषण करने से पीछे भाग रहे हो.
पुत्र के स्पर्श से बढ़ कर संसार में
कोई स्पर्श सुख नहीं है – न चंदन, ना कामिनी न ही शीतल जल. यह पुत्र मेरे
गर्भ में तीन वर्ष रहा है; इस के जन्म के समय आकाशवाणी हुई थी “यह सौ
अश्वमेध यज्ञ करेगा”. तुम्हारे सभी दुःखों का हरने के लिए मैं इसे यहाँ
लाई हूँ. याद करो राजन, पुत्र के जात कर्म संस्कार (1) में ब्राह्मणों
द्वारा उच्चारित मंत्रों के क्या अभप्राय होते हैं. “तुम ने पुत्र, मेरे
शरीर से जन्म लिया है. तुम मेरे हृदय से निकले हो. पुत्र के रूप में मैं ही
हूँ….”
"यह बालक तुम्हारे शरीर से निकला है. यह तुम्ही हो. इस
में तुम अपने आप को देखो जैसे किसी निर्मल जलाशय में देखते हो. जैसे यज्ञ
की अग्नि घर की अग्नि से जलाई जाती है वैसे ही यह तुम से निकला है. तुम्ही
ने अपने दो अंश किए हैं. मृग के आखेट के क्रम में तुम मेरे पिता के आश्रम
में मुझ से मिले थे. उर्वशी, पूर्वचत्ति, सहजन्या, मेनका, विश्वाची और
घृताची ये छः ही सब अप्सराओं में अग्रणी हैं. इन में भी ब्राह्मण-पुत्री
मेनका प्रथम है. उसी मेनका ने मुझे, विश्वामित्र की पुत्री को जन्म दिया
था. पता नहीं मैने कैसे पाप कर रखे हैं कि जन्म लेने पर माता ने मुझे त्याग
दिया और अब तुम मुझे नहीं स्वीकार रहे हो. मैं अपने पिता के पास जाने को
तैयार हूँ पर अपने पुत्र को तुम्हे अवश्य रखना चाहिए.
यह सुन कर
दुष्यंत ने कहा “मैं नही जानता कि कभी मैने तुम से यह पुत्र उत्पन्न किया
है. वैसे भी स्त्रियाँ मिथ्या वादन करती हैं. तुम्हारी बातें विश्वास के
योग्य नहीं हैं. तुम्ही कह रही हो कि ममता-हीन, आचार भ्रष्ट मेनका तुम्हारी
माता है जिस ने तुम्हे हिमवत पर वैसे ही फेंक दिया था जैसे लोग पूजा के
बाद पुष्पों को फेंक देते हैं. कामुक विश्वामित्र में, जो ब्राह्मण बन जाने
की लालसा रखता था, भी कोई संतान-स्नेह नहीं दिख रहा है. फिर भी यह तो सत्य
है कि मेनका अप्सराओं में और विश्वामित्र ऋषियों में अग्रणी है. उनकी
पुत्री हो कर तुम किसी चरित्रहीन स्त्री की तरह क्यों बातें कर रही हो?
ऐसी बातें करते तुम्हे तनिक भी लज्जा नहीं आई? और वह भी मेरे सामने? तुम
तपस्विनी के भेष में दुष्टा हो.
“कहाँ वे महान ऋषि और कहाँ मेनका!
और तुम; एक नीच स्त्री, तुम तापसी के भेष में क्यों हो? तुम्हारा यह पुत्र
भी तुम जितनी इसकी आयु बताती हो उस से बहुत बड़ा लगता है; तुम कहती हो यह
बालक है फिर यह किसी साल वृक्ष के कोंपल की तरह कैसे बढ़ गया है. तुम नीच
स्त्री हो और एक भ्रष्टा की तरह बातें करती हो. तुम जो कुछ कह रही हो वह
मेरी समझ के परे है. जहाँ जाना चाहो तुम चली जाओ”.
“दूसरों के तिल
के बराबर दोष भी तुम्हे दिख जाते हैं राजन”, शकुंतला ने यह सुन कर कहा
“किंतु बेल से बड़ा अपना दोष तुम्हे नहीं दिखता. मेनका देव लोक की है और इस
तरह मेरा जन्म, राजन, तुम्हारे जन्म से उच्चतर है. तुम धरती पर चलते हो
मैं वायु में उड़ सकती हूँ. हम दोनो में उतना ही अंतर है जितना मेरु पर्वत
और सरसों के एक दाने में. मैं चाहूं तो इंद्र, कुबेर, यम और वरुण के लोकों
में चली जाऊं. यह सब मैं बस उदाहरण के लिए कह रही हूँ, किसी दुर्भाव से
नहीं. तुम ने सुना इस के लिए मैं क्षमा चाहती हूँ.
“जिस तरह कोई
सूकर किसी उपवन में भी बस कीचड़ ही खोजता है वैसे ही दुष्ट किसी के कथन के
अशुभ अंशों को ही अपने ध्यान में रख पाते हैं. हंस की तरह नीर-क्षीर अलग कर
किसी की बात से शुभ को रख अशुभ को त्यागने की न उनमें क्षमता रहती हैं न
उनकी ऐसी प्रवृत्ति ही रहती है. जैसे धर्मनिष्ठ किसी की निंदा करना
कष्टदायक समझते हैं वैसे ही दुष्ट दूसरों की निंदा करने में आनंद पाते हैं.
और इस से बड़ी विडंबना क्या हो सकती है, राजन, कि दुष्ट ही सत्यनिष्ठों को
दुष्ट बताते चलें.
“जो अपने पुत्र को स्वीकार कर सम्मान नहीं देता
वह अपनी इच्छायें पूरी नहीं कर सकता, देव उसका भाग्य छीन लेते हैं. पितृ
कहते हैं कि पुत्र ही वंश चलाता है और वह सभी धार्मिक कृत्यों से बढ़ कर
है. मनु ने पाँच प्रकार के पुत्र बताए हैं: जो अपनी पत्नी से उत्पन्न किया
गया हो, जिसे किसी ने दे दिया हो, जिसे धन दे कर खरीदा गया हो, जिसे लाड़
से पाला गया हो और जिसे पत्नी को छोड़ अन्य किसी स्त्री से उत्पन्न किया
गया हो. पुत्र अपने पिता के धर्म और उन की उपलब्धियों को संबल देते हैं,
उनके आनंद को बढ़ाते हैं और पूर्वजों को नरक से बचाते हैं.
“राजन,
आप अपने आप को संजोइए और अपने पुत्र को संजोइए. एक जलाशय बनवाना सौ कुएँ
खुदवाने से अधिक पुण्य देता है. एक पुत्र किसी यज्ञ से बढ़ कर है और सत्य
सौ पुत्रों से भी बढ़ कर है. कभी सत्य और एक सौ अश्वमेध यज्ञों को तौला गया
था और सत्य गुरुतर पाया गया था. सत्य वेदों के अध्ययन से और समस्त तीर्थों
में स्नान के समतुल्य है. सत्य के बारबर कोई पुण्य नहीं है, सत्य से बढ़
कर कुछ भी नहीं है. सत्य ही ईश्वर है. इस लिए, राजन, अपने वचन को मत
झुठलाओ. अपने आप को सत्य से जोड़ो यदि तुम्हे मुझ पर विश्वास नहीं है तो
मैं अभी चली जाती हूँ, तुम्हारे साथ नही रहना ही अच्छा है. लेकिन राजन, याद
रखना तुम्हारे बाद हमारा यही लड़का पृथ्वी पर राज करेगा.”
दुष्यंत
को सब सुना कर शकुंतला उस की सभा से निकल पड़ी. पर उस के निकलते ही
आकाशवाणी हुई, “माँ के गर्भ से निकला पुत्र वास्तव में पिता का ही रूप है.
इस लिए दुष्यंत, अपने पुत्र को अपना प्यार दो और शकुंतला का तिरस्कार मत
करो. पुत्र ही यमलोक में पूर्वजों की रक्षा करता है. तुम्ही इस बालक के जनक
हो. शकुंतला ने सब कुछ सत्य कहा है. पिता ही अपने दो रूप कर अपनी पत्नी के
गर्भ से पुत्र रूप में निकलता है. अपने पुत्र को छोड़ने से बड़ा दुर्भाग्य
क्या हो सकता है? यह वाणी सुन कर तुम इसे सॅंजो कर रखोगे (संजोने योग्य या
उठाने योग्य: भरतव्यः) इस लिए आज से इसका नाम भरत रखो.”
आकाशवाणी
सुन दुष्यंत अति प्रसन्न हो उठा. अपने सभासदों से उस ने कहा “सुनी आपने वह
दिव्य वाणी? मैं जानता था यह मेरा पुत्र है किंतु यदि मैं उसे शकुंतला की
बात पर स्वीकार कर लेता तो तरह तरह की बातें उड़तीं और मेरे पुत्र की वैधता
पर भी प्रश्न चिह्न लगे रहते.”
वैशम्पायन ने कहा “आकाशवाणी से
पुत्र की शुद्धता स्थापित हो जाने के बाद दुष्यंत ने अपने पुत्र का सिर
सूंघ उसे अपने हृदय से लगा लिया. ब्राह्मणों ने आशीष दिए. राजा ने अपनी
पत्नी को शांत करने के प्रयास किए, “देवी, हमारा मिलन एकांत में हुआ था,
तुम्हारी शुद्धता भी मैं इस दिव्य वाणी से स्थापित कराना चाहता था. लोग कह
सकते थे कि मैं ने कामांध हो तुम से संबंध किए थे तुम्हे पत्नी बना कर
नहीं. और तुम ने जो कुछ मेरे बारे में कहा मैं ने क्षमा कर दिया है.” राजा
ने उसी दिन अपने पुत्र को भरत नाम दिया और उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित
किया
समय आने पर भरत चक्रवर्ती बना और सार्वभौम कहलाया. उस ने अनेक
यज्ञ किए और ब्राह्मणों को बहुत दान दिए. उस के अश्वमेध यज्ञ में कण्व
पुरोहित थे जिन्हे भरत ने एक सहस्त्र स्वर्ण मुद्रायें दी थीं.”
भरत वंश के कुमारों के जन्म और उनके कर्मों की कथा को व्यास ने भारत नाम से लिखा जो महाभारत के नाम से विख्यात है.
(1)
जात कर्म संस्कार हिंदुओं के सोलह संस्कारों में चौथा है जो शिशु के जन्म
के तुरंत बाद संपन्न किया जाता है. स्वर्ण पात्र में विषम मात्रा में गाय
का घी और शहद मिला कर शिशु को चटाया जाता है. उस समय जो मंत्र पढ़े जाते
हैं उन्ही का वर्णन यहाँ शकुंतला दे रही है. जात कर्म के बाद ही शिशु को
माता द्वारा स्तन पान कराए जाने का विधान है.
Sunday, 26 April 2015
आदि पर्व (14): शकुंतला उपाख्यान (1)
अंशों के अवतरण के वर्णन दे कर वैशम्पायन ने भरत वंश का वर्णन किया.
भरत वंश का प्रवर्तक दुष्यंत(1) एक बहुत
प्रतापी राजा था. पूरी पृथ्वी उस के अधीन थी, म्लेच्छ भी
उस की संप्रभुता स्वीकार करते थे. एक दिन अपने अनुचरों और अपनी चतुरंगी सेना के साथ दुष्यंत वन
में आखेट के लिए निकला हुआ था. बहुत सिंहों और बाघों को मारते हुए, एक
वन से निकल कर दूसरे वन और फिर तीसरे वन में जाने के क्रम में वह एक ऐसे वन में
पहुँच गया जहाँ सब वृक्ष
फूलों से लदे थे, नीचे घनी हरी
घास बिछी हुई थी, पक्षियों का मनोहर कलरव हो था, और हर
कुछ दूरी पर फल फूल से लदे कुंज थे. यह वन से अधिक उपवन लग रहा था, जहाँ पहुँच कर
किसी का मन हर्षित हो जाए.
यह वन सिद्धों, गंधर्वों और
अप्सराओं का क्रीड़ा स्थल था. यहाँ की हवा सदैव शीतल और सुगंधित रहती थी. इस मनोरम
वन में तपस्वियों का एक विस्तृत आश्रम था. राजा ने बाहर से ही पवित्र अग्नि का नमन किया. आश्रम के निकट
मालिनी नदी बह रही थी, जिस
की स्वच्छ धारा में चकवे खेल रहे थे. नदी के दोनो
तटों पर किन्नरों के आवास थे जिनके बीच अनेक मृग चर रहे थे. इसी नदी के तट पर कभी
कश्यप ऋषि का आश्रम हुआ करता था. अभी कश्यप के वंशज कण्व ऋषि वहाँ रहते थे. अपने
अनुचरों और अपनी सेना को उस शांत वन के बाहर रोक कर राजा दुष्यंत अपने मंत्री और
अपने पुरोहित के साथ कण्व ऋषि के उस पवित्र आश्रम के अंदर गया.
आश्रम ब्रह्म-क्षेत्र लग रहा था. कहीं मैने
अपना कलरव कर रहे थे और कहीं वैदिक ऋचाओं का सस्वर उच्चारण हो रहा था. आश्रम में
अनेक वेदज्ञ ब्राह्मण थे, उन्हे व्याकरण, न्याय, मीमांसा,
ज्योतिष्
आदि सभी शास्त्रों का पूरा ज्ञान था, और वे पशु पक्षियों की बोली भी समझ
सकते थे. राजा ने आगे बढ़ने पर व्रती ब्राह्मणों को चारो वेदों को पढ़ते देखा /
सुना. और आगे बढ़ने पर राजा ने ब्राह्मणों को जप और होम करते भी पाया. ब्राह्मणों
ने भी राजा को देखा और उसे बैठने के लिए एक उत्तम आसन दिया. पर राजा जितना भी उस
आश्रम को देखता था उसे और अधिक देखने की इच्छा होती थी और अंत में वह अपने मंत्री
और पुरोहित के साथ कश्यप ऋषि की पुरानी कुटिया को देखने के लिए आश्रम के अंदर बने
ऋषियों के कुटियों के बीच विचरण करने लगा.
कुछ और आगे बढ़ने पर उस ने अपने मंत्री और
पुरोहित को भी छोड़ दिया. मंत्र-मुग्ध सा वह आश्रम के अंदर बिना किसी उद्देश्य के
घूमता रहा. कण्व की कुटिया के पास जब उसे ऋषि नहीं दिखे तो उस ने कुछ ऊँचे स्वर
में पूछा “कोई हैं यहाँ?” पर उसे कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला, उस
का प्रश्न उस शांत आश्रम में गूँजता रह गया.
कुछ समय बाद किसी तपस्वी की बेटी के भेष में श्री सदृश रूप लिए एक युवती
निकली. उस ने दुष्यंत को पैर धोने के लिए जल दिया, बैठने के लिए
आसन दिया और उस के कुशल क्षेम पूछे. राजा ने अपने आने का उद्देश्य बताया “मैं
महात्मा कण्व के दर्शन और उनके पूजन के लिए आया हूँ, कहाँ हैं वे?”
“फल लाने के लिए वे आश्रम से बाहर निकले हुए हैं”
उस
ने कहा.
राजा उस के अद्भुत सौंदर्य को निहार रहा था.
उसकी स्मित मुस्कान, उसकी अनिन्द्य मुखाक्रिति, उस
का तापसी सा तेज किंतु साथ में अप्सराओं से उस के अंग सौष्ठव, उस
की विनम्रता, और उसका शील; यह सब देख राजा
उसके बारे में जानने को बहुत उत्सुक हो गया. “तुम कौन हो?
किस
की पुत्री हो तुम और वन में क्यों आई हो?” राजा से नहीं रहा गया और उस ने स्पष्ट
कह दिया “पहली दृष्टि से ही मेरा हृदय तुम पर आ गया है. मैं तुम्हारे बारे में
सब कुछ जानना चाहता हूँ”.
“राजन, मैं महात्मा कण्व की पुत्री हूँ”
“यह कैसे हो सकता है?” राजा ने कहा “महात्मा
कण्व ऊर्ध्वरेतस हैं. धर्मराज अपने पथ से च्युत हो सकते हैं किंतु कण्व नही. तुम
कैसे उनकी पुत्री हो सकती हो? मेरे इस संशय को दूर करो”.
“सुनिए, राजन, मैं अपने जन्म
के विषय में जो कुछ जानती हूँ आप को सुनाती हूँ” उस ने कहा “कभी
कोई ऋषि यहाँ आए थे जिन्होने मेरे जन्म के विषय में पूछा था. उस समय महात्मा कण्व
ने जो कहा था और जो मैने सुना था वह मैं आप को सुनाने जा रही हूँ.
“कभी विश्वामित्र की कठोर तपस्या से इंद्र
चिंतित हो उठा था कि कहीं ये ऋषि अपने तपोबल से मुझे स्वर्ग से नीचे नहीं गिरा
दें. यह सब सोच उनकी तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने मेनका को भेजना चाहा. मेनका नहीं जाना चाहती थी. वह
जानती थी क़ि ऋषि को क्रोध आने में देर नहीं लगती और वह उनके तपोबल को भी जानती
थी. उस ने इंद्र को याद दिलाया क़ि विश्वामित्र ने कभी रुष्ट हो वशिष्ट को अपने
पुत्रों के असामयिक मृत्यु के कष्ट भोगने पर बाध्य कर दिया था, वह
जन्म से क्षत्रिय था किंतु तप से वह ब्राह्मण बन सका था, अपने स्नानदि के लिए उस ने इतनी गहरी
नदी कौशीकी बना दी है जिसे पार करना भी आसान नहीं होता.
“मेनका ने देवेन्द्र को मातंग मुनि की भी याद
दिलाई. जब विश्वामित्र को एक शाप वश व्याध बन कर रहना पड़ा था तब मातंग ने ही
विश्वामित्र की पत्नी का भरण पोषण किया था. शाप की अवधि पूरी होने पर विश्वामित्र
ने पुरोहित बन कर मातंग के लिए यज्ञ कराया था जिस में, मेनका ने जोर
दिया, इंद्र को ना चाहते हुए भी ऋषि के भय से सोम पान करने जाना पड़ा था.
और तो और विश्वामित्र ने अपने रोष में दूसरी सृष्टि करने की भी ठान ली थी. नये
ग्रह बना दिए थे और त्रिशंकु को भूमि पर गिरने से भी रोक रखा था. उस के पदाघात से
पृथ्वी भी काँप जाती है. यह सब कहते हुए मेनका ने मना कर दिया.
“तब इंद्र ने किसी भाँति मेनका को वायु के साथ
जाने के लिए तैयार किया. वायु के साथ जब मेनका ऋषि के आश्रम में पहुँची तो उस ने
ऋषि को आँखें बंद कर ध्यान मग्न पाया. दोनो रुके रहे और जब ऋषि ने आँखें खोलीं तो
मेनका ने ऋषि के सामने अपने नृत्य आदि का प्रदर्शन किया. इसी समय वायु ने उसके
वस्त्र उड़ा दिए. मेनका लज्जित हो अपने वस्त्रों के पीछे भागने का नाटक करने लगी
पर वायु उन्हे ले कर अदृश्य हो गया. अब ऋषि निर्वसना मेनका को देख रहे थे.
“उसके रूप-गुण देख ऋषि काम के वशीभूत हो गये और
संकेतों में बता दिया कि वे उसका सान्निध्य चाहते हैं. मेनका सफल हुई; और ऋषि और अप्सरा एक दूसरे के साथ
आनंद विनोद करते एक लंबा काल ऐसे बिता दिया जैसे वह बस एक दिन रहा हो. मेनका ने
गर्भ धारण किया और समय आने पर इसी मालिनी के तट पर वह अपनी नवजात पुत्री को छोड़
चली. वन में उस शिशु को अकेली देख,
कहीं
कोई हिंस्र जन्तु या कोई राक्षस उसे हानि ना पहुँचा दे, ऐसा सोच गिद्धों
ने उस शिशु को घेर रखा था. कण्व जब मालिनी में स्नान करने गये थे तो पक्षियों से
घिरी उस बालिका को वे उठा कर अपने आश्रम लेते आए. पक्षियों (शकुंत) ने उस की रक्षा
की थी इस लिए कण्व ने उस का नाम शकुंतला रखा. कण्व ने उस आगंतुक ऋषि को अपने को
शकुंतला का पिता बताया था क्योंकि शास्त्र कहते हैं की पिता तीन हो सकते हैं – जन्म देने वाला, रक्षा करने वाला या पालन पोषण करने
वाला.
“मैं
ही कण्व की पुत्री शकुंतला हूँ राजन”.
शकुंतला के जन्म का वृतांत सुन दुष्यंत ने बिना
समय गँवाए उसे अपनी पत्नी बनने को कहा; प्रति दिन स्वर्णहार, वस्त्र,
कर्णफूल,
मोतियों
की माला, भाँति भाँति के रत्न आदि देने की बात कही; और तो और अपना
राज्य उसे देने लगा और तत्काल गंधर्व विवाह का प्रस्ताव रख दिया, यह
कहते हुए कि सभी प्रकार के विवाहों में गंधर्व विवाह सबसे प्रथम आता है.
शकुंतला ने राजा को कुछ देर रुकने को कहा जिस
से कण्व आ कर उसके हाथ राजा को सौंप सकें. पर दुष्यंत को तनिक भी विलंब नही सुहा
रहा था. कोई भी व्यक्ति अपना मित्र तो होता ही है और अपने ऊपर निर्भर रह ही स्कता
है. “इस लिए तुम अपने आप को विवाह में निश्चित ही अर्पित कर सकती हो”
दुष्यंत
ने कहा. यह कह कर उस ने शास्त्रोक्त विवाह संस्कार का विस्तृत वर्णन किया.
शास्त्रों में आठ प्रकार(2) के
विवाहों का वर्णन है: ब्रह्म, दैव,
अर्ष,
प्रजपात्य,
असुर,
गंधर्व,
राक्षस,
और
पैशाच. ब्रह्मा के पुत्र मनु ने वर्ण के क्रम से इनकी उपयुक्तता बताई है. पहले चार
प्रकार के विवाह ब्राह्मणों के लिए उपयुक्त हैं, पहले छः
क्षत्रियों के लिए; राजाओं के लिए
राक्षस विवाह भी मान्य है, असुर विवाह वैश्यों और शूद्रों के लिए
मान्य है. पैशाच और असुर विवाह नहीं करने चाहिए, यही धर्म है.
गंधर्व और राक्षस विवाह क्षत्रियों के लिए अनुकूल कहे गये हैं.
“इस लिए शकुंतले”, राजा ने कहा “तुम कोई आशंका
मन में मत रखो. हमारा गंधर्व या राक्षस विवाह या दोनो का मिला जुला रूप निस्संदेह
संभव है और शास्त्र-सम्मत भी”. (3)
यह सुन शकुंतला तैयार हो गयी पर उसने शर्त रखी
कि उस का पुत्र ही दुष्यंत का उत्तराधिकारी बनेगा.
राजा तैयार था. बिना सोचे उस ने कहा ऐसा ही
होगा. और उसे अपनी राजधानी ले जाने का विश्वास दिलाते दिलाते दोनो एक दूसरे को
पति-पत्नी के रूप में जान गये. चलते चलते दुष्यंत ने कहा था “मैं
तुम्हारे लिए अंग रक्षक भेजता हूँ, अपनी चतुरंगी सेना के साथ मैं तुम्हे
अपनी राजधानी ले चलता हूँ”.
राजा के जाने के कुछ ही देर बाद कण्व वहाँ आए.
लज्जा वश शकुंतला उनके स्वागत में बाहर नहीं निकली किंतु कण्व अपनी दिव्य दृष्टि
से सब कुछ जान गये थे. उन्होने इस की स्वीकृति भी दी. “मेरी प्रतीक्षा
किए बिना जो तुमने आज किया शकुंतले, उस से तुम्हारे धर्म की कोई क्षति नहीं
हुई है. इच्छुक युगलों में बिना किसी हवन-मंत्र के किया गया गंधर्व विवाह सर्वथा
शास्त्र सम्मत है. और दुष्यंत एक धार्मिक राजा है. उस अपना पति मान कर तुम ने बहुत
अच्छा किया. तुम्हारा पुत्र बहुत पराक्रमी होगा और संपूर्ण विश्व पर राज करेगा”
तब शकुंतला आगे बढ़ पाई और उस ने अपने क्लांत
पिता के पैर धोए और दुष्यंत पर उनकी कृपादृष्टि माँगी.
"मैं तुम्हारे चलते उसे बहुत मानने लगा
हूँ", कण्व ने कहा "किंतु फिर भी तुम जो चाहो
मुझ से माँग लो".
“पौरव राजाओं को” शकुंतला ने
माँगा “कभी अपना राज्य नहीं खोना पड़े”.
(1) राजा का नाम महाभारत के भिन्न पाठों में दुष्मंत
और दुःषंत आया है. कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम में राजा का नाम दुष्यंत लिखा है
और उस के बाद यही नाम प्रचलित है.
(2) आठ प्रकार के विवाहों के ऊपर महाभारत
में मनुस्मृति का श्लोक 3.21 शब्दतः आया है:
ब्राह्मो
दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः
गांधार्वो
राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमः स्मृतः
(3) आठ प्रकार के विवाहों के
संक्षिप्त वर्णन:
ब्रह्म: वेदाध्ययन पूरा कर चुके लड़के के
माता-पिता जब किसी योग्य लड़की के माता-पिता से विवाह का निवेदन कर विवाह सम्पन
करते हैं तो वह ब्रह्म विवाह कहलाता है.
दैव: जब लड़की के माता-पिता किस वेदाध्ययन पूरा
कर चुके लड़के के माता-पिता से निवेदन कर विवाह सम्पन करते हैं तो वह दैव विवाह
होता है. (पहले में वर पक्ष ने पहल की है, दूसरे में वधू पक्ष ने)
अर्ष: अर्ष विवाह में वधू के माता-पिता को वर
के माता-पिता दो गायें या एक गाय, एक बछड़ा और एक जोड़ा बैल देते हैं;
इसे वधू पक्ष का सम्मान माना जाता है,
कन्या
का मोल नहीं.
प्रजापात्य: यह ब्रह्म विवाह के समान है किंतु
इस में लड़के के माता-पिता लड़के के वेदाध्ययन पूरा करने के पहले उस के लिए योग्य
लड़की खोजते हैं, इस में वर और वधू दोनो अल्प्वयस्क रहते हैं
असुर: इस विवाह में लड़की मोल ली जाती है,
स्पष्टतः
इस के पीछे लड़के की अनुपयुक्तता रहती है. बहुधा अपेक्षाकृत नीचे के वर्ण / वंश का लड़का या
उसके माता पिता लड़की के माता पिता को धन दे कर लड़की के हाथ लेते हैं
गंधर्व: इस विवाह में लड़का और लड़की आपसी
प्रेम से एक दूसरे के हो जाते हैं
राक्षस: इस
विवाह में लड़का अपने लिए लड़की का अपहरण करता है (च्यवन की माता पुलोमा का
एक राक्षस विवाह के लिए आपहरण कर रहा था जब च्यवन का जन्म हो गया था और उस का मुँह
देख कर वह राक्षस जल गया था)
पैशाच: जब लड़का किसी लड़की को निद्रा में या
बेसुधि में अपना बना लेता है तो यह पैशाच विवाह कहलाता है.
Friday, 24 April 2015
आदि पर्व (13): आदिवंशावतरण पर्व (2)
जनमेजय के अनुरोध पर वैशम्पायन ने महाभारत के सभी प्रमुख चरित्रों के जन्म,
पूर्व-जन्म, और उनके वंशवृक्ष बताए. जैसा स्वाभाविक है सभी वंशों का आरंभ
सृष्टिकर्ता पितामह ब्रह्मा से होता है. पितामह के छः मानस पुत्र थे
मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलत्स्य, पुलह और क्रतु. इनके अतिरिक्त एक
स्थाणु भी था. पितामह के वक्ष से भृगु निकला था. ब्रह्मा के दाहिने पैर के
अंगूठे से दक्ष और बाँये पैर के अंगूठे से दक्षपत्नी उदित हुई थी. सृष्टि
के समस्त जीव, जन्तुओं को ब्रह्मा ने इन्ही के द्वारा रचा है.
दक्ष और दक्षपत्नी के कोई पुत्र नहीं थे. उन्हे पच्चास रूपवती लड़कियाँ हुईं थीं. दक्ष ने उन्हे अपनी “पुत्रिका” बनाया था, जिस से उनके पुत्र उनके पतियों और दक्ष, दोनो के रहें.
मरीचि का पुत्र कश्यप था जिस ने दक्ष की तेरह पुत्रियों से विवाह किए थे. ये तेरह थे अदिति, दिति, दनु, काला, अनायु, सिन्हिका, मुनि, क्रोधा, प्रावा, अरिष्टा, विनता, कपिला और कद्रू. कश्यप की अनगिनत संतानें हुईं. प्रायः सभी प्रमुख सुर, असुर, गंधर्व, अप्सरायें और सर्प कश्यप की संतान हैं. (कश्यप की इतनी मानव संतान भी हैं कि किसी को यदि अपने गोत्र का नाम ज्ञात नहीं हो तो वह अपने को कश्यप गोत्र का बता सकता है.)
अदिति के पुत्र आदित्य कहलाए, दिति के पुत्र दैत्य और दनु के पुत्र दानव कहलाए. काला, अनायु, सिन्हिका, और क्रोधा के पुत्र, दैत्यों और दानवों के साथ मिल कर सामूहिक नाम असुर से जाने जाते हैं.
मुनि के पुत्र गंधर्व हुए, प्राधा (या प्रावा) ने गंधर्वों और अप्सराओं को जन्म दिए और कद्रू के पुत्र सर्प हुए; विनता के पुत्र सुरों के मित्र हैं. कपिला ने ब्राह्मणों और गौओं को जन्म दिए और कद्रू ने सर्पों को. (अरिष्टा की संतानों के नाम नहीं बताए गये हैं.)
अदिति से बारह आदित्य हुए, जो जगत के स्वामी हैं: धातृ, मित्र, अर्यमान, शक्र, वरुण, आंश, भग, विवस्वत, उषा, सविता, त्वष्टृ और विष्णु. इन में विष्णु जो कनिष्ठ हैं वही गुण और धर्म में सबों से श्रेष्ठ हैं.
दिति को एक पुत्र हुआ था हिरण्यकशिपु, जिस के पाँच पुत्र हुए थे प्रहलाद, संह्राद, अनुह्राद, शिबी और बाष्कल. ज्येष्ठ पुत्र प्रहलाद के तीन पुत्र हुए विरोचन, कुंभ और निकुम्भ. विरोचन का पुत्र महाप्रतापी बलि हुआ और बलि का पुत्र बाण नाम का महासुर हुआ. बाण रुद्र का भक्त था और वह महाकाल के नाम से भी जाना जाता है.
दनु के चालीस पुत्र हुए. उनमें ज्येष्ठ विप्रचित्ति था अन्य प्रमुख दानव थे नमुचि, पौलोम, आसिलोम, केशी, दुर्जय, अयःशिर, अश्वशिर, अयःशंकु, गगनमूर्धा, वेगवात, केटुमत, स्वरभानु, अश्व, अश्वपति, वृषपर्व, अजक, अश्वग्रीव, सूक्ष्म, टुहुण्ड, एकपाद, एकचक्र, विरूपाक्ष, महोदर, निचन्द्र, निकुम्भ, कुपथ, कपथ, शरभ, शलभ, सूर्य, चंद्रमा (सूर्य और चंद्रमा जो देव हैं वे दनु के पुत्र नहीं हैं), एकाक्ष, अमृतप, प्रलंब, नरक, वातापी, शत्रुतपन, शठ, गविश्ठ, वानायू, और दीर्घजिह्वा. (चालीस पुत्र बताने के बाद, बंगाल और बोरी दोनो पाठों में ये बयालीस पुत्रों के नाम गिनाए गये हैं.)
सिन्हिका के पुत्र हुए राहु (जो अभी भी सूर्य और चंद्रमा को सताता है), सुचन्द्र, चन्द्रहन्त्रि, और चन्द्रविमर्दन.
क्रूर (क्रोधा) को उसी के समान दुष्ट असंख्य संतान हुईं.
अनायु के चार महासुर पुत्र हुए विक्षर, बाल, वीर और वृत्र.
काल के यम के समान हुए अनेक पुत्रों में प्रमुख थे विनाशन, क्रोध, क्रोधहन्त्रि, और क्रोधशत्रु.
विनता के पुत्र थे तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, गरुड़, अरुण, आरुणी और वारुणी.
कद्रू के सहस्त्र पुत्रों में प्रमुख थे शेष या अनंत, वासुकी, तक्षक, कुमार, और कुलिका
दक्ष पुत्री मुनि के सोलह पुत्र हुए भीमसेन, उग्रसेन, सुपर्ण, वरुण, गोपति,धृतराष्ट्र, सूर्यावर्चस, सत्यवाचस, अर्कपर्ण, प्रयुत, भीम, चित्ररथ, कलिशिर, पर्जन्य, कली, और नारद. ये देव या गंधर्व हैं.
प्राधा की पुत्रियाँ थीं अनावद्या, मनुवशा, मनुनामप्रिया, अनुपा, सुभगा और भासी. उसके गंधर्व पुत्र थे सिद्ध, पूर्ण, बर्हिं, पूर्णाश, ब्रह्मचारी, रतिगुण, सुपर्ण, विश्ववसु, भानु, सुचंद्र, अतिवाहु, हहा, हुहू और तुंबुरू. प्राधा ने अनेक अप्सराओं को भी जन्म दिए थे: अलम्बुस, मिश्रकेशी, विद्युत्पर्णा, तुलानघा, अरुणा, रक्षिता, रंभा, मनोरमा, असिता, सुबाहु, सुव्रता, सुप्रिया और सुभुजा.
कपिला ने गौ, ब्राह्मण, गंधर्व और अप्सराओं को जन्म दिए थे.
स्थाणु के ग्यारह पुत्र हुए थे: मृगव्याध, सर्प (शर्व), निर्ऋति, अजैकपात, अहिर्बुन्ध्य, पिनाकी, दहन, ईश्वर, कपाली, स्थाणु, भार्ग (भव). ये रुद्र कहलाते हैं. (बंगाल और बोरी पाठों में कुछेक नाम भिन्न हैं, ऐसी स्थिति में कोष्ठ में बोरी पाठ के नाम हैं. ध्यातव्य है कि ग्यारह रुद्रों के नाम वाल्मीकि रामायण, भागवत, अग्नि पुराण आदि में भी दिए गये हैं जो महाभारत में दिए गये नामों से भिन्न हैं.)
ये तो हुए मरीचि-पुत्र कश्यप और स्थाणु की संतानें. अन्य ऋषियों (जो ब्रह्मा के मानस पुत्र थे) के पुत्रों के वर्णन इस प्रकार हैं:
अंगिरस के पुत्र हैं वृहस्पति, अथत्य, और सम्वर्त; अत्रि के अनेक पुत्र हुए जो सभी वेद वेदांगों में पारंगत थे. पुलस्त्य के पुत्र राक्षस, वानर, किन्नर(1) और यक्ष हैं. पुलह के पुत्र शलभ (पतंगे, उड़ने वाले कीड़े), सिंह, किम्पुरुष(2), बाघ, भालू और भेड़िए बताए गये हैं. (बोरी पाठ में शलभ, भालू और भेड़िए नहीं हैं पर मृगों को पुलह के पुत्र कहा गया है.) क्रतु के पवित्र पुत्र सूर्य के सहचर (वालिखिल्य ऋषि) हैं
दक्ष की दस पुत्रियाँ धर्म से व्याही गयीं थीं, सत्ताईस चंद्रमा से और जैसा कहा जा चुका है तेरह कश्यप से. धर्म की पत्नियाँ हैं: कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा और मति. सोम (चंद्रमा) की सत्ताईस पत्नियाँ काल-निर्णय में लगी हुईं हैं. वे नक्षत्र हैं और योगिनी भी; वे तीनो लोकों के पथ प्रशस्त करती हैं.
ब्रह्मा का एक पुत्र मनु भी था. मनु के पुत्र का नाम प्रजापति था, प्रजापति के आठ पुत्र देवलोक में वसु हैं. उनके नाम हैं धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास. इन में धर और ध्रुव की माता धूम्रा थी, चंद्रमा और अनिल की श्वसा, अह की माता रता थी, अनल की शाँडिल्या और प्रत्यूष एवं प्रभास की माता प्रभाता थी.
धर के दो पुत्र हैं, द्रविण और हुतहव्यवह. ध्रुव का पुत्र काल है त्रिलोक का नाशकर्ता. सोम का पुत्र वर्चस है. वर्चस और उसकी पुत्री मनोहरा के तीन पुत्र हैं, शिशिर, प्राण और रमण. अह के पुत्र हैं ज्योति, साम, शांत और मुनि. अग्नि का पुत्र कुमार है जो कार्तिकेय भी कहलाता है क्यों कि उसका पोषण कृत्तिका ने किया था. कुमार के बाद उसे तीन पुत्र और हुए, शाख, विशाख और नागमेश. अनिल की पत्नी शिवा है; शिवा और अनिल के दो पुत्र हैं पुरोजव और अविज्ञातगति. प्रत्यूष का पुत्र देवल नाम का ऋषि है जिस के दो पुत्र थे. वृहस्पति की बहन प्रभास की पत्नी थी. उसका पुत्र हुआ विश्वकर्मा, वास्तुविद् और महाशिल्पी, जिस ने सहस्त्रो आभूषण बनाए, दिव्य रथों का निर्माण किया और जिस की आज भी मनुष्य पूजा करते हैं.
धर्म का जन्म पितामह ब्रह्मा के दाहिने वक्ष से हुआ था. उस के तीन पुत्र हैं, साम, काम और हर्ष (शांति, इच्छा और आनंद). काम की पत्नी रति है, साम की प्राप्ति और हर्ष की नंदी. सवितुर की पत्नी त्वाष्ट्रि थी जिस ने वडवा (घोड़ी) के रूप में अश्विनी कुमारों को जन्म दिए.
भृगु का जन्म भी पितामह के वक्ष से हुआ था. भृगु के पुत्र शुक्र ने अपने तपोबल से अपने दो रूप किए थे. एक में वह ग्रह बन कर यात्रियों की रक्षा करता था और दूसरे में वह असुरों का गुरु था. उस के चार पुत्र भी असुरों के पुरोहित थे. उनमें दो प्रमुख थे तष्टधर और अत्रि. भृगु को एक और पुत्र हुआ च्यवन जिस के जन्म से उस की माँ एक राक्षस के हाथों से मुक्त हो सकी थी.
मनु पुत्री आरुषि च्यवन की एक पत्नी थी जिस का पुत्र और्व हुआ, और्व का पुत्र रिचिक और रिचिक का पुत्र जमदाग्नि हुआ. जमदाग्नि के चार पुत्रों में कनिष्ठ पुत्र राम सब से श्रेष्ठ निकला. वह शस्त्र-विद्या में पारंगत था और उस ने अनेक बार सृष्टि को क्षत्रिय विहीन कर दिए थे.
ब्रह्मा के दो और पुत्र थे धातृ और विधातृ जो मनु के साथ रहे. शुक्र की पुत्री दिवि वरुण की ज्येष्ठा भार्या बनी. उस का पुत्र बल था और पुत्री सुरा (मदिरा).
जब भोजन की कमी से जीव एक दूसरे का भक्षण करने लगे तो अधर्म का जन्म हुआ. अधर्म सब प्राणियों का नाश करता है. उसकी पत्नी निरिति है, उनके पुत्र राक्षस हैं जो नैर्ऋत कहलाते हैं. मुक्य नैर्ऋत हैं भय, महाभय और मृत्यु.
ताम्रा की पाँच पुत्रियों से काक, शुक, हंस, श्येन आदि सभी पक्षियों के जन्म हुए और क्रोधा की नौ पुत्रियों से सभी पशुओं के, और वृक्षो के जन्म हुए. क्रोधा की पुत्री श्येनि अरुण की पत्नी थी. उनके पुत्र थे संपाती और जटायु.
जनमेजय के पूछने पर वैशम्पायन ने देव, दानव, राक्षस आदि के मनुष्य रूप में जन्म लेने के विवरण दिए.
असुर विप्रचित्ति ने मगध के राजा जरासंध के रूप में जन्म लिया था, हिरण्यकशिपु ने शिशुपाल के रूप में और प्रहलाद के अनुज संहलाद ने शल्य के रूप में. राजा भगदत्त असुर विशाख का रूप था और केकेय वंश के राजाओं के रूप में पाँच महान असुरों ने जन्म लिए थे. राजा उग्रसेन (कन्स के पिता) के रूप में असुर स्वरभानु ने जन्म लिया था, वृषपर्व राजा दीर्घप्रज्ञा के रूप में और वृषपर्व का अनुज अजक ने शाल्व नरेश के रूप में जन्म लिए थे.
सूक्ष्म पृथ्वी पर राजा वृहदरथ बना, इशप राजा नग्नजित (सत्यभामा का पिता), शरभ ने राजर्षि पौरव के रूप में जन्म लिया, दिति-पुत्र चंद्र ने कांबोजों के राजा चंद्रवर्मा के रूप में और दुर्जय ने विदर्भ के राजा रुक्मि (रुक्मिणी का भाई) के रूप में जन्म लिए थे. असुर कालनेमि ने पृथ्वी पर कन्स के रूप में जन्म लिया था. (यह सूची बहुत लंबी है मैंने बस उन्ही के विषय में लिखा है जो अपने असुर या मनुष्य रूप में विख्यात रहे हैं.)
भरद्वाज पुत्र द्रोण में वृहस्पति का अंश था, और उसके पुत्र अश्वत्थामा में महादेव, काम, यम, और क्रोध के अंश थे. वशिष्ठ के शाप से आठो वसुओं ने गंगा और शांतनु के पुत्रों के रूप में जन्म लिए थे. उनमें कनिष्ठ भीष्म था जिस ने जमदाग्नि पुत्र राम से युद्ध किया था.
कृपा रुद्रों के अंश से उत्पन्न हुआ था. शकुनी के रूप में द्वापर (युग) आया था और दुर्योधन के रूप में कलि. दुर्योधन के भाई के रूप में राक्षस आए थे.
वृष्णि वीर सात्यकि, नारयणी सेना का सेनापति कृतवर्मा, पांचाल नरेश द्रुपद और मत्स्य राज विराट, इन चारो में मारुतों के अंश थे.
अरिष्टा के पुत्र ने, जो हंस के नाम से कभी गंधर्व राज भी बना था, धृतराष्ट्र के रूप में जन्म लिया था और विदुर में, जो धर्मराज था, अत्रि के अंश थे.
सोम के पुत्र वर्चस ने अभिमन्यु के रूप में जन्म लिया था. जब ब्रह्मा के आदेश पर देव गण पृथ्वी पर जन्म ले रहे थे सोम अपने पुत्र को नहीं जाने देना चाहता था. जब उस ने सुना कि नारायण का मित्र नर भी अर्जुन के रूप में पृथ्वी पर जा रहा है और कि नारायण स्वयं अवतार ले रहे हैं तो उस ने वर्चस को जाने दिया पर इस शर्त पर कि जितना शीघ्र हो वह वापस चला आए. और यह भी कि उस का पुत्र एक ऐसे युद्ध में अपना पराक्रम दिखाए जिस में नर और नारायण उस के साथ नहीं रहें.
दृष्टद्युम्न में अग्नि के अंश थे और शिखण्डिन के रूप में एक राक्षस ने जन्म लिया था. द्रौपदी के पाँचो पुत्र विश्वदेव थे.
सूर्य-पुत्र कर्ण के जन्म का वृतांत बता कर वैशम्पायन ने कहा कि बलदेव में शेषनाग के अंश थे और प्र्द्युम्न में सनत कुमार के. श्री कृष की सोलह सहस्त्र पत्नियों में अप्सराओं के अंश थे. नारायण को प्रसन्न रखने के लिए श्री के अंश रुक्मिणी में आए थे; इंद्राणी शची के अंश द्रौपदी में थे और सिद्धि और धृति पांडवों की माता कुंती और माद्री बन कर आईं थीं. सुबल-पुत्री गांधारी के रूप में मति आई थी.
यह सब सुना कर वैशम्पायन ने कहा “मैने राजन, सभी देव, गंधर्व, अप्सरा और राक्षासों के अंशों के अवतरण सुनायें हैं. अंशों के अवतरण की यह कथा धन, कीर्ति, संतान और दीर्घ जीवन देती है.”
(1) किन्नर का प्रयोग आज कल हिजड़ों के लिए किया जाता है. पुराणों में किन्नरों का वर्णन हय-ग्रीव (ऐसे मनुष्य जिनके गर्दन और मुँह घोड़े के हों) के रूप में किया गया है; महाभारत में किन्नरों को आधा मनुष्य और आधा अश्व बताया गया है. (पाश्चात्य मिथकों के सेन्टौर से तुलना की जा सकती है). पुराणों और महाभारत के अनुसार किन्नरों का देश हिमालय में था और भारत के समतली मैदानों के व्यक्तियों के लिए वे आश्चर्यजनक जीव थे. वन-पर्व में पांडवों के किन्नरों के देश में जाने का वर्णन आया है. वर्तमान हिमाचल प्रदेश के किन्नौर को किन्नरों के इस पुरा-ऐतिहासिक देश से बहुधा जोड़ा गया है.
(2) किम्पुरुषों को आधा मनुष्य आधा सिंह, जिनके मुख सिंह के हो, बताया गया है. ये हिमालय के किसी अगम्य क्षेत्र में रहते थे. किम्पुरुषों के अनेक सन्दर्भ महाभारत में आए हैं. राजसूय यज्ञ के पहले (महाभारत के सभा पर्व के दिग्विजय पर्व में) अर्जुन ने उत्तर के देशों को जीतने के क्रम में किम्पुरुषों के देश को भी जीता था और एक किम्पुरुष गुरु द्रुम ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भाग भी लिया था. इसी द्रुम को रुक्मिणी के भाई, विदर्भ के राजा रुक्मि का गुरु भी बताया गया है.
दक्ष और दक्षपत्नी के कोई पुत्र नहीं थे. उन्हे पच्चास रूपवती लड़कियाँ हुईं थीं. दक्ष ने उन्हे अपनी “पुत्रिका” बनाया था, जिस से उनके पुत्र उनके पतियों और दक्ष, दोनो के रहें.
मरीचि का पुत्र कश्यप था जिस ने दक्ष की तेरह पुत्रियों से विवाह किए थे. ये तेरह थे अदिति, दिति, दनु, काला, अनायु, सिन्हिका, मुनि, क्रोधा, प्रावा, अरिष्टा, विनता, कपिला और कद्रू. कश्यप की अनगिनत संतानें हुईं. प्रायः सभी प्रमुख सुर, असुर, गंधर्व, अप्सरायें और सर्प कश्यप की संतान हैं. (कश्यप की इतनी मानव संतान भी हैं कि किसी को यदि अपने गोत्र का नाम ज्ञात नहीं हो तो वह अपने को कश्यप गोत्र का बता सकता है.)
अदिति के पुत्र आदित्य कहलाए, दिति के पुत्र दैत्य और दनु के पुत्र दानव कहलाए. काला, अनायु, सिन्हिका, और क्रोधा के पुत्र, दैत्यों और दानवों के साथ मिल कर सामूहिक नाम असुर से जाने जाते हैं.
मुनि के पुत्र गंधर्व हुए, प्राधा (या प्रावा) ने गंधर्वों और अप्सराओं को जन्म दिए और कद्रू के पुत्र सर्प हुए; विनता के पुत्र सुरों के मित्र हैं. कपिला ने ब्राह्मणों और गौओं को जन्म दिए और कद्रू ने सर्पों को. (अरिष्टा की संतानों के नाम नहीं बताए गये हैं.)
अदिति से बारह आदित्य हुए, जो जगत के स्वामी हैं: धातृ, मित्र, अर्यमान, शक्र, वरुण, आंश, भग, विवस्वत, उषा, सविता, त्वष्टृ और विष्णु. इन में विष्णु जो कनिष्ठ हैं वही गुण और धर्म में सबों से श्रेष्ठ हैं.
दिति को एक पुत्र हुआ था हिरण्यकशिपु, जिस के पाँच पुत्र हुए थे प्रहलाद, संह्राद, अनुह्राद, शिबी और बाष्कल. ज्येष्ठ पुत्र प्रहलाद के तीन पुत्र हुए विरोचन, कुंभ और निकुम्भ. विरोचन का पुत्र महाप्रतापी बलि हुआ और बलि का पुत्र बाण नाम का महासुर हुआ. बाण रुद्र का भक्त था और वह महाकाल के नाम से भी जाना जाता है.
दनु के चालीस पुत्र हुए. उनमें ज्येष्ठ विप्रचित्ति था अन्य प्रमुख दानव थे नमुचि, पौलोम, आसिलोम, केशी, दुर्जय, अयःशिर, अश्वशिर, अयःशंकु, गगनमूर्धा, वेगवात, केटुमत, स्वरभानु, अश्व, अश्वपति, वृषपर्व, अजक, अश्वग्रीव, सूक्ष्म, टुहुण्ड, एकपाद, एकचक्र, विरूपाक्ष, महोदर, निचन्द्र, निकुम्भ, कुपथ, कपथ, शरभ, शलभ, सूर्य, चंद्रमा (सूर्य और चंद्रमा जो देव हैं वे दनु के पुत्र नहीं हैं), एकाक्ष, अमृतप, प्रलंब, नरक, वातापी, शत्रुतपन, शठ, गविश्ठ, वानायू, और दीर्घजिह्वा. (चालीस पुत्र बताने के बाद, बंगाल और बोरी दोनो पाठों में ये बयालीस पुत्रों के नाम गिनाए गये हैं.)
सिन्हिका के पुत्र हुए राहु (जो अभी भी सूर्य और चंद्रमा को सताता है), सुचन्द्र, चन्द्रहन्त्रि, और चन्द्रविमर्दन.
क्रूर (क्रोधा) को उसी के समान दुष्ट असंख्य संतान हुईं.
अनायु के चार महासुर पुत्र हुए विक्षर, बाल, वीर और वृत्र.
काल के यम के समान हुए अनेक पुत्रों में प्रमुख थे विनाशन, क्रोध, क्रोधहन्त्रि, और क्रोधशत्रु.
विनता के पुत्र थे तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, गरुड़, अरुण, आरुणी और वारुणी.
कद्रू के सहस्त्र पुत्रों में प्रमुख थे शेष या अनंत, वासुकी, तक्षक, कुमार, और कुलिका
दक्ष पुत्री मुनि के सोलह पुत्र हुए भीमसेन, उग्रसेन, सुपर्ण, वरुण, गोपति,धृतराष्ट्र, सूर्यावर्चस, सत्यवाचस, अर्कपर्ण, प्रयुत, भीम, चित्ररथ, कलिशिर, पर्जन्य, कली, और नारद. ये देव या गंधर्व हैं.
प्राधा की पुत्रियाँ थीं अनावद्या, मनुवशा, मनुनामप्रिया, अनुपा, सुभगा और भासी. उसके गंधर्व पुत्र थे सिद्ध, पूर्ण, बर्हिं, पूर्णाश, ब्रह्मचारी, रतिगुण, सुपर्ण, विश्ववसु, भानु, सुचंद्र, अतिवाहु, हहा, हुहू और तुंबुरू. प्राधा ने अनेक अप्सराओं को भी जन्म दिए थे: अलम्बुस, मिश्रकेशी, विद्युत्पर्णा, तुलानघा, अरुणा, रक्षिता, रंभा, मनोरमा, असिता, सुबाहु, सुव्रता, सुप्रिया और सुभुजा.
कपिला ने गौ, ब्राह्मण, गंधर्व और अप्सराओं को जन्म दिए थे.
स्थाणु के ग्यारह पुत्र हुए थे: मृगव्याध, सर्प (शर्व), निर्ऋति, अजैकपात, अहिर्बुन्ध्य, पिनाकी, दहन, ईश्वर, कपाली, स्थाणु, भार्ग (भव). ये रुद्र कहलाते हैं. (बंगाल और बोरी पाठों में कुछेक नाम भिन्न हैं, ऐसी स्थिति में कोष्ठ में बोरी पाठ के नाम हैं. ध्यातव्य है कि ग्यारह रुद्रों के नाम वाल्मीकि रामायण, भागवत, अग्नि पुराण आदि में भी दिए गये हैं जो महाभारत में दिए गये नामों से भिन्न हैं.)
ये तो हुए मरीचि-पुत्र कश्यप और स्थाणु की संतानें. अन्य ऋषियों (जो ब्रह्मा के मानस पुत्र थे) के पुत्रों के वर्णन इस प्रकार हैं:
अंगिरस के पुत्र हैं वृहस्पति, अथत्य, और सम्वर्त; अत्रि के अनेक पुत्र हुए जो सभी वेद वेदांगों में पारंगत थे. पुलस्त्य के पुत्र राक्षस, वानर, किन्नर(1) और यक्ष हैं. पुलह के पुत्र शलभ (पतंगे, उड़ने वाले कीड़े), सिंह, किम्पुरुष(2), बाघ, भालू और भेड़िए बताए गये हैं. (बोरी पाठ में शलभ, भालू और भेड़िए नहीं हैं पर मृगों को पुलह के पुत्र कहा गया है.) क्रतु के पवित्र पुत्र सूर्य के सहचर (वालिखिल्य ऋषि) हैं
दक्ष की दस पुत्रियाँ धर्म से व्याही गयीं थीं, सत्ताईस चंद्रमा से और जैसा कहा जा चुका है तेरह कश्यप से. धर्म की पत्नियाँ हैं: कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा और मति. सोम (चंद्रमा) की सत्ताईस पत्नियाँ काल-निर्णय में लगी हुईं हैं. वे नक्षत्र हैं और योगिनी भी; वे तीनो लोकों के पथ प्रशस्त करती हैं.
ब्रह्मा का एक पुत्र मनु भी था. मनु के पुत्र का नाम प्रजापति था, प्रजापति के आठ पुत्र देवलोक में वसु हैं. उनके नाम हैं धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास. इन में धर और ध्रुव की माता धूम्रा थी, चंद्रमा और अनिल की श्वसा, अह की माता रता थी, अनल की शाँडिल्या और प्रत्यूष एवं प्रभास की माता प्रभाता थी.
धर के दो पुत्र हैं, द्रविण और हुतहव्यवह. ध्रुव का पुत्र काल है त्रिलोक का नाशकर्ता. सोम का पुत्र वर्चस है. वर्चस और उसकी पुत्री मनोहरा के तीन पुत्र हैं, शिशिर, प्राण और रमण. अह के पुत्र हैं ज्योति, साम, शांत और मुनि. अग्नि का पुत्र कुमार है जो कार्तिकेय भी कहलाता है क्यों कि उसका पोषण कृत्तिका ने किया था. कुमार के बाद उसे तीन पुत्र और हुए, शाख, विशाख और नागमेश. अनिल की पत्नी शिवा है; शिवा और अनिल के दो पुत्र हैं पुरोजव और अविज्ञातगति. प्रत्यूष का पुत्र देवल नाम का ऋषि है जिस के दो पुत्र थे. वृहस्पति की बहन प्रभास की पत्नी थी. उसका पुत्र हुआ विश्वकर्मा, वास्तुविद् और महाशिल्पी, जिस ने सहस्त्रो आभूषण बनाए, दिव्य रथों का निर्माण किया और जिस की आज भी मनुष्य पूजा करते हैं.
धर्म का जन्म पितामह ब्रह्मा के दाहिने वक्ष से हुआ था. उस के तीन पुत्र हैं, साम, काम और हर्ष (शांति, इच्छा और आनंद). काम की पत्नी रति है, साम की प्राप्ति और हर्ष की नंदी. सवितुर की पत्नी त्वाष्ट्रि थी जिस ने वडवा (घोड़ी) के रूप में अश्विनी कुमारों को जन्म दिए.
भृगु का जन्म भी पितामह के वक्ष से हुआ था. भृगु के पुत्र शुक्र ने अपने तपोबल से अपने दो रूप किए थे. एक में वह ग्रह बन कर यात्रियों की रक्षा करता था और दूसरे में वह असुरों का गुरु था. उस के चार पुत्र भी असुरों के पुरोहित थे. उनमें दो प्रमुख थे तष्टधर और अत्रि. भृगु को एक और पुत्र हुआ च्यवन जिस के जन्म से उस की माँ एक राक्षस के हाथों से मुक्त हो सकी थी.
मनु पुत्री आरुषि च्यवन की एक पत्नी थी जिस का पुत्र और्व हुआ, और्व का पुत्र रिचिक और रिचिक का पुत्र जमदाग्नि हुआ. जमदाग्नि के चार पुत्रों में कनिष्ठ पुत्र राम सब से श्रेष्ठ निकला. वह शस्त्र-विद्या में पारंगत था और उस ने अनेक बार सृष्टि को क्षत्रिय विहीन कर दिए थे.
ब्रह्मा के दो और पुत्र थे धातृ और विधातृ जो मनु के साथ रहे. शुक्र की पुत्री दिवि वरुण की ज्येष्ठा भार्या बनी. उस का पुत्र बल था और पुत्री सुरा (मदिरा).
जब भोजन की कमी से जीव एक दूसरे का भक्षण करने लगे तो अधर्म का जन्म हुआ. अधर्म सब प्राणियों का नाश करता है. उसकी पत्नी निरिति है, उनके पुत्र राक्षस हैं जो नैर्ऋत कहलाते हैं. मुक्य नैर्ऋत हैं भय, महाभय और मृत्यु.
ताम्रा की पाँच पुत्रियों से काक, शुक, हंस, श्येन आदि सभी पक्षियों के जन्म हुए और क्रोधा की नौ पुत्रियों से सभी पशुओं के, और वृक्षो के जन्म हुए. क्रोधा की पुत्री श्येनि अरुण की पत्नी थी. उनके पुत्र थे संपाती और जटायु.
जनमेजय के पूछने पर वैशम्पायन ने देव, दानव, राक्षस आदि के मनुष्य रूप में जन्म लेने के विवरण दिए.
असुर विप्रचित्ति ने मगध के राजा जरासंध के रूप में जन्म लिया था, हिरण्यकशिपु ने शिशुपाल के रूप में और प्रहलाद के अनुज संहलाद ने शल्य के रूप में. राजा भगदत्त असुर विशाख का रूप था और केकेय वंश के राजाओं के रूप में पाँच महान असुरों ने जन्म लिए थे. राजा उग्रसेन (कन्स के पिता) के रूप में असुर स्वरभानु ने जन्म लिया था, वृषपर्व राजा दीर्घप्रज्ञा के रूप में और वृषपर्व का अनुज अजक ने शाल्व नरेश के रूप में जन्म लिए थे.
सूक्ष्म पृथ्वी पर राजा वृहदरथ बना, इशप राजा नग्नजित (सत्यभामा का पिता), शरभ ने राजर्षि पौरव के रूप में जन्म लिया, दिति-पुत्र चंद्र ने कांबोजों के राजा चंद्रवर्मा के रूप में और दुर्जय ने विदर्भ के राजा रुक्मि (रुक्मिणी का भाई) के रूप में जन्म लिए थे. असुर कालनेमि ने पृथ्वी पर कन्स के रूप में जन्म लिया था. (यह सूची बहुत लंबी है मैंने बस उन्ही के विषय में लिखा है जो अपने असुर या मनुष्य रूप में विख्यात रहे हैं.)
भरद्वाज पुत्र द्रोण में वृहस्पति का अंश था, और उसके पुत्र अश्वत्थामा में महादेव, काम, यम, और क्रोध के अंश थे. वशिष्ठ के शाप से आठो वसुओं ने गंगा और शांतनु के पुत्रों के रूप में जन्म लिए थे. उनमें कनिष्ठ भीष्म था जिस ने जमदाग्नि पुत्र राम से युद्ध किया था.
कृपा रुद्रों के अंश से उत्पन्न हुआ था. शकुनी के रूप में द्वापर (युग) आया था और दुर्योधन के रूप में कलि. दुर्योधन के भाई के रूप में राक्षस आए थे.
वृष्णि वीर सात्यकि, नारयणी सेना का सेनापति कृतवर्मा, पांचाल नरेश द्रुपद और मत्स्य राज विराट, इन चारो में मारुतों के अंश थे.
अरिष्टा के पुत्र ने, जो हंस के नाम से कभी गंधर्व राज भी बना था, धृतराष्ट्र के रूप में जन्म लिया था और विदुर में, जो धर्मराज था, अत्रि के अंश थे.
सोम के पुत्र वर्चस ने अभिमन्यु के रूप में जन्म लिया था. जब ब्रह्मा के आदेश पर देव गण पृथ्वी पर जन्म ले रहे थे सोम अपने पुत्र को नहीं जाने देना चाहता था. जब उस ने सुना कि नारायण का मित्र नर भी अर्जुन के रूप में पृथ्वी पर जा रहा है और कि नारायण स्वयं अवतार ले रहे हैं तो उस ने वर्चस को जाने दिया पर इस शर्त पर कि जितना शीघ्र हो वह वापस चला आए. और यह भी कि उस का पुत्र एक ऐसे युद्ध में अपना पराक्रम दिखाए जिस में नर और नारायण उस के साथ नहीं रहें.
दृष्टद्युम्न में अग्नि के अंश थे और शिखण्डिन के रूप में एक राक्षस ने जन्म लिया था. द्रौपदी के पाँचो पुत्र विश्वदेव थे.
सूर्य-पुत्र कर्ण के जन्म का वृतांत बता कर वैशम्पायन ने कहा कि बलदेव में शेषनाग के अंश थे और प्र्द्युम्न में सनत कुमार के. श्री कृष की सोलह सहस्त्र पत्नियों में अप्सराओं के अंश थे. नारायण को प्रसन्न रखने के लिए श्री के अंश रुक्मिणी में आए थे; इंद्राणी शची के अंश द्रौपदी में थे और सिद्धि और धृति पांडवों की माता कुंती और माद्री बन कर आईं थीं. सुबल-पुत्री गांधारी के रूप में मति आई थी.
यह सब सुना कर वैशम्पायन ने कहा “मैने राजन, सभी देव, गंधर्व, अप्सरा और राक्षासों के अंशों के अवतरण सुनायें हैं. अंशों के अवतरण की यह कथा धन, कीर्ति, संतान और दीर्घ जीवन देती है.”
(1) किन्नर का प्रयोग आज कल हिजड़ों के लिए किया जाता है. पुराणों में किन्नरों का वर्णन हय-ग्रीव (ऐसे मनुष्य जिनके गर्दन और मुँह घोड़े के हों) के रूप में किया गया है; महाभारत में किन्नरों को आधा मनुष्य और आधा अश्व बताया गया है. (पाश्चात्य मिथकों के सेन्टौर से तुलना की जा सकती है). पुराणों और महाभारत के अनुसार किन्नरों का देश हिमालय में था और भारत के समतली मैदानों के व्यक्तियों के लिए वे आश्चर्यजनक जीव थे. वन-पर्व में पांडवों के किन्नरों के देश में जाने का वर्णन आया है. वर्तमान हिमाचल प्रदेश के किन्नौर को किन्नरों के इस पुरा-ऐतिहासिक देश से बहुधा जोड़ा गया है.
(2) किम्पुरुषों को आधा मनुष्य आधा सिंह, जिनके मुख सिंह के हो, बताया गया है. ये हिमालय के किसी अगम्य क्षेत्र में रहते थे. किम्पुरुषों के अनेक सन्दर्भ महाभारत में आए हैं. राजसूय यज्ञ के पहले (महाभारत के सभा पर्व के दिग्विजय पर्व में) अर्जुन ने उत्तर के देशों को जीतने के क्रम में किम्पुरुषों के देश को भी जीता था और एक किम्पुरुष गुरु द्रुम ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भाग भी लिया था. इसी द्रुम को रुक्मिणी के भाई, विदर्भ के राजा रुक्मि का गुरु भी बताया गया है.
आदि पर्व (12): आदिवंशावतरण पर्व (1)
सौति कह रहा है:
जनमेजय के सर्प यज्ञ में भाग लेने कृष्ण द्वैपायन हस्तिनापुर आए. ऋषि को अपने शिष्यों के साथ आए देख राजा जनमेजय बहुत हर्षित हो कर आगे आया और सदस्यों की सहमति से उन्हे स्वर्ण पीठ पर बिठा कर उस ने उनकी विधिवत पूजा की. ऋषि को जल, अर्घ्य, गौ इत्यादि दे कर राजा और सदस्यों ने उनसे कौरवों और पांडवों का वृतांत सुनाने का अनुरोध किया. “आप ने उन्हे अपनी आँखों से देख रखा है, क्या कारण था उनके वैमनस्य का जिसमें पूरा विश्व झुलस गया था?” व्यास ने यह सुन अपने शिष्य वैशम्पायन को वह कथा सुनाने का निर्देश दिया.
अपने गुरु को साष्टांग प्रणाम कर वैशम्पायन ने यज्ञ सभा को संक्षेप में वह कथा सुना दी. इस संक्षिप्त पाठ से कोई संतुष्ट नहीं था. जनमेजय ने कहा “इसे सुन कर विस्तृत कथा सुनने के लिए मैं और भी अधिक उत्सुक हो उठा हूँ. धार्मिक पुरुषों ने उस युद्ध में अपने संबंधियों के वध किए हैं. किसी तुच्छ कारण से उन्होने वैसा नहीं किया होगा क्यूँकि आज भी उनकी प्रशंसा की जाती है. क्यों उन्हों ने अपने संबंधियों के वध किए? पांडव जैसे वीर कौरवों के अत्याचार क्यों सहते रहे? भीम, जिसे दस सहस्त्र हाथियों का बल था, कैसे अपने प्रति किए गये अन्याय को चुप चाप सह सका? सती कृष्णा ने दुःशासन को अपनी कोप दृष्टि से जला क्यों नहीं दिया? चारो भाई क्यों युधिष्ठिर के पीछे हमेशा चले जब कि उनके अग्रज को द्यूत की लत लगी हुई थी? और युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा को, जिसे सब कर्तव्यों का ज्ञान था यह लत कैसे लग सकी?
“हे ब्राह्मण, आप इतने विस्तार में इस कथा को सुनायें कि मैं अपने प्रश्नों के उत्तर पा सकूँ”
वैशम्पायन ने कहा “राजन, यह बहुत लंबी कथा है. इस में एक लाख श्लोक हैं, इस के सम्पूर्ण पाठ के लिए अलग से समय नियुक्त कीजिए. यह वेदों के समान पाप नाशक है. इसे को जय भी कहा जाता है और विजय के इच्छुक राजाओं को इसे अवश्य सुनना चाहिए. युवा राजा अपनी रानी के साथ इसे सुनें तो उन्हे पराक्रमी पुत्र प्राप्त होते हैं. इस में धर्म, अर्थ और मोक्ष के विज्ञान हैं. जो इसे सुनते हैं उनके पुत्र और अनुचर सदैव आज्ञाकारी रहते हैं. जो बिना छिद्रान्वेषण के भाव से इसे पढ़ता है उसे कोई व्याधि कभी नहीं सताती. कुरुओं की इस गाथा को जो भी पढ़ेगा उस के परिवार की वृद्धि होगी और समाज में वह सम्मान पाएगा.
“इस कृति में देवताओं और राजर्षियों की कथायें हैं, इस में निष्पाप केशव हैं, पवित्र द्विज हैं और महादेव भी हैं. इस में कार्तिकेय के जन्म का वर्णन है, इस में ब्राह्मण और गौ के महात्म्य हैं. भरत वंश के कुमारों के जन्म की इस कथा का नाम महाभारत है; जो इस व्युत्पत्ति को जनता है उस के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. व्यास ने इसे तीन वर्षों में पूरा किया था. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर जो कुछ इस में है वह कहीं और भी मिल सकता है किंतु जो इस में नहीं है वह और कहीं नहीं मिल सकता.”
यह सब बताने के बाद सौति राजा उपरिचर से अपनी कथा प्रारंभ करता है.
पौरव वंश के वसु नामक एक धार्मिक राजा की इंद्र से प्रगाढ़ मैत्री थी. इंद्र के निर्देश पर उस ने कभी चेदि राज्य जीता था. इंद्र ने उसे एक स्फटिक-विमान दिया जो कहीं भी जा सकता था. इस विमान में उड़ सकने के चलते उस का एक नाम उपरिचर भी पड़ा था. इंद्र ने उसे एक पुष्पमाला भी दी थी जिस के कमल पुष्प कभी नहीं कुम्हला सकते थे और जिसे पहनने वाले को युद्ध में कभी कोई चोट नहीं पहुँच सकती थी. यह सब देते हुए इंद्र ने उस से संपूर्ण पृथ्वी पर धर्म की रक्षा करने के लिए कहा था. वसु इंद्र की नियमित पूजा करता था और इंद्र उसका पूजन स्वीकार करने हंस के रूप में चेदि आता था. वसु देवेन्द्र की मित्रता, देवेन्द्र की कृपादृष्टि से पूरे विश्व का सम्राट बन राज कर रहा था. सम्राट वसु के पाँच पुत्र थे जिन्हे उस ने अपने साम्राज्य के विभिन्न प्रांतों के राजा बना दिए थे. ज्येष्ठ पुत्र वृहद्रथ मगध का शासक बना था. यही वृहद्रथ एक अन्य नाम महारथ से भी जाना जाता है. वसु के अन्य पुत्र थे प्रत्यग्रह, कुशाम्ब, मछिल्ल और यदु. कुशाम्ब का एक और नाम था मणिवाहन. वसु के पुत्रों ने अपने नामों पर राज्य और अपने राजवंश स्थापित किए, जिन वंशों ने बहुत दिनों तक पृथ्वी पर राज किए.
वसु की राजधानी के निकट एक नदी बहती थी शुक्तिमती. कभी कोलाहल नाम के एक सजीव पर्वत ने उस नदी का उल्लंघन कर उसे अपने पाश में बाँध लिया था. वसु ने अपने पदाघात से पर्वत में एक गहरा गड्ढा कर शुक्तिमती को मुक्त किया था. किंतु कोलाहल से मिलन के चलते शुक्तिमती को यमज संतानें, एक पुत्र और एक पुत्री हुईं. उस नदी ने अपनी संतानों को अपने तारक वसु को दे दिए. उस के बालक को बड़े होने पर वसु ने उसे अपना सेना नायक बनाया और उस की बालिका गिरिका के बड़ी होने पर वसु ने उस से विवाह कर लिया था. गिरिका अत्यंत रूपवती थी. एक दिन गिरिका के ऋतु काल में वसु उस के पास जाने ही वाला था जब उस के पितृ चेदि आ गये. पित्रियों ने उस से अपने भोजन (श्राद्ध) के लिए मृग के माँस की इच्छा व्यक्त की, और आखेट प्रेमी राजा मृग के संधान में वन निकल पड़ा.
आखेट में भी वसु गिरिका के रूप को याद करता रहा. वसंत ऋतु में वन बहुत रमणीय था और राजा का ध्यान रह रह कर गिरिका पर जा अटकता था. गिरिका की कामना में डूबा हुआ वसु फूलों से लदे एक अशोक वृक्ष के नीचे बैठे स्खलित हो गया. निकट के वृक्ष पर बैठे एक श्येन (बाज पक्षी) को उस ने अपने बीज दिए और उस से उन्हे गिरिका को दे आने के लिया कहा. रास्ते में एक दूसरे श्येन ने उस के चंगुल में माँस का टुकड़ा समझ कर उस से राजा के बीज छीनने चाहे. उनके मुठभेड़ में वसु के बीज नीचे बहती यमुना नदी में गिर पड़े. यमुना में उन दिनों अद्रिका नाम की एक अप्सरा किसी शाप वश मछली बन कर रह रही थी. जल में गिरते राजा के बीज को अद्रिका ने आगे बढ़ कर पी लिया. दस महीनों के बाद अद्रिका धीवरों के जाल में फँसी थी और जब उस का पेट चीरा गया था तो दो मानव शिशु मिले थे – एक बालक और एक बालिका. आश्चर्य चकित धीवर दोनो शिशुओं को ले कर अपने राजा उपरिचर के पास गये. उपरिचर ने बालक शिशु को अपने पास रख लिया. इसी बालक ने बड़े होने पर मत्स्य राजवंश की स्थापना की. अपरिचर ने बालिका को धीवरों को दे दिया "यह तुम्हारी बेटी है".
इस तरह वह अप्सरा पुत्री धीवरों के मुखिया के घर पलने लगी. उस के दत्तक पिता ने उस का नाम सत्यवती रखा था. बड़ी हो कर वह अप्सरा समान रूपसी हुई, पर मछली के पेट से जन्म लेने के चलते उस की देह से हमेशा मछली की गंध आती रही. सत्यवती यमुना पर नाव खे कर अपने पिता के हाथ बँटाती थी. एक बार पराशर ऋषि अपने भ्रमण के क्रम में यमुना पार कर रहे थे जब उन्होने उस रूपसी को देखा. सत्यवती का रूप कुछ ऐसा था कि उस साधु के हृदय में भी इच्छा के बीज उग गये.
पराशर ने सत्यवती को अपनी इच्छा बताई. नदी के दोनो किनारों पर खड़े ऋषियों को दिखाते हुए सत्यवती ने पूछा “इन के सामने मैं आप की इच्छा कैसे पूरी कर सकती हूँ?” यह सुन कर पराशर ने अपने तपोबल से वहाँ गहरा कुहासा ला दिया जिस में हाथ को हाथ नहीं दिखे. ऋषि की शक्ति से वह लड़की चकित हो गयी और सलज्ज स्वर में उस ने प्रार्थना की “मैं एक कुमारी हूँ, मुनिवर, विवाह के पहले अपना कौमार्य नष्ट कर मैं जी नहीं सकूँगी”.
“मेरी इच्छा पूरी करने के बाद भी”, ऋषि ने कहा “तुम्हारा कौमार्य भंग नहीं होगा. यही नहीं तुम जो चाहो वह मुझ से माँग सकती हो, मेरे वचन कभी विफल नहीं हुए हैं”
यह सुन सत्यवती ने माँगा कि उसकी देह से मछली की गंध नहीं बल्कि सदैव एक ललित, मधुर सुगंध निकले. ऋषि ने तत्काल ऐसा कर दिया. प्रसन्न हृदय से सत्यवती ने भी ऋषि की इच्छा पूरी की. पराशर अपने आश्रम चला गया और उस दिन से सत्यवती अपनी सुगंध के चलते गंधवती कहलाने लगी. उस की यह सुगंध एक योजन से मिलने लगती थी, जिस से उसका एक और नाम पड़ा योजनगंधा.
उसी दिन यमुना के एक द्वीप पर सत्यवती ने पराशर के पुत्र को जन्म दिया. कृष्ण वर्ण का वह बालक द्वीप पर जन्म लेने के चलते कृष्ण द्वैपायन कहलाया. जन्म के तुरंत बाद, अपनी माता से अनुमति ले कर, वह तपस्या के लिए निकल गया. जाते जाते उस ने अपनी माता से कहा था “जब भी तुम्हे मेरी आवश्यकता होगी, तुम मुझे याद करना मैं चला आऊंगा”. पुत्र जन्म के बाद सत्यवती का कौमार्य पुनर्स्थापित हो गया था(1).
अपनी माता का घर छोड़ द्वैपायन वेदाध्ययन में लग गया. हर युग के साथ धर्म गिरता है और धर्म के गिरने पर वेद ही रक्षा कर सकते हैं यह सब सोच उस ने वेद के सूक्तों का पुनर्संकलन कर वेद के चार भाग किए. इसे करने के बाद वह वेदव्यास के नाम से जाना गया. (व्यास का एक अर्थ संकलक होता है.) सुमंत, पैल, वैशम्पायन और शुक (जो उस का पुत्र था) व्यास के प्रमुख शिष्य थे. महाभारत रच कर अपने इन्हीं शिष्यों के द्वारा उस ने महाभारत को प्रसारित किया था.
वैशम्पायन ने तब कुछ प्रमुख चरित्रों के जन्मों के वृतांत दिए: शांतनु और गंगा के पुत्र के रूप में देवलोक के वसुओं के अंशों से भीष्म का जन्म हुआ. धर्मराज ने विदुर के रूप में हस्तिनापुर में जन्म लिया था. धर्म के जन्म की कथा भी वैशम्पायन ने सुनाई. कभी अणीमान्डव्य नाम का एक तेजस्वी वेदज्ञ ऋषि हुआ करता था. निर्दोष होते हुए भी चोरी के अभियोग में अणीमान्डव्य सूली पर मारा गया था. मृत्योपरांत उस ने धर्मराज से कहा “अपने बचपन में मैने एक टिड्डी को घास के तिनके से बीन्धा था; उस एक काम को छोड़ मैं ने अपने जीवन में कोई पाप कर्म नहीं किया है. मैं ने उस के सहस्त्रों गुणे तप किए होंगे. क्या मेरा तप मेरे उस पाप पर भारी नहीं पड़ता है? ब्रह्म-हत्या किसी भी अन्य जीव की हत्या से अधिक जघन्य पाप है, इस लिए, धर्म तुम पापी हो और तुम मर्त्य लोक में शूद्र वर्ण में जन्म लोगे.” उसी शाप के चलते धर्म को विदुर के रूप में जन्म लेना पड़ा था.
कुंती ने अपनी कौमार्यावस्था में सूर्य के पुत्र कर्ण को जन्म दिया था, जिस की देह पर जन्म से ही स्वर्ण कवच और स्वर्ण कुंडल सजे हुए थे. भगवान विष्णु स्वयं, जो सृष्टि के अदृश्य कारक हैं, जो अक्षय हैं और जो परमात्मा हैं, जिनमें तीनों गुण स्थिर हैं, जो अदृश्य रूप में सर्वत्र व्याप्त हैं, जो अनंत हैं और जो वेदों के ओम् हैं, वे देवकी और वसुदेव के पुत्र श्री कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे. यदुवंशी सरदार सत्यक और ह्रिदिक के घरों में भगवान के दो कर्मठ सहयोगी क्रमशः सात्यकी और कृतवर्मा के जन्म हुए.
पात्र में रखे ऋषि भरद्वाज के बीज के विकसित होने से द्रोण (काष्ठ पात्र) का जन्म हुआ. नर्कल के कुंज में गिरे गौतम ऋषि के बीज से अश्वत्थामा की माता कृपी और कृपी के भाई कृपा के जन्म हुए. द्रोण के नाश के लिए यज्ञ की अग्नि से धनुष साथ लिए दृष्टद्युम्न का जन्म हुआ. उसी यज्ञ की वेदी से अपूर्व सुंदरी कृष्णा ने जन्म लिया. कोसल नरेश नग्नजित और गांधार नरेश सुबल के जन्म हुए. सुबल को एक पुत्र हुआ शकुनी जो देवताओं के शाप वश धर्म का शत्रु बना. सुबल को एक पुत्री भी हुई गांधारी जो दुर्योधन की माता हुई. कृष्ण द्वैपायन से विचित्रवीर्य के क्षेत्र में धृतराष्ट्र और पांडु के जन्म हुए. द्वैपायन ने ही हस्तिनापुर राज प्रासाद की एक दासी से शूद्र किंतु ज्ञानी और निष्पाप विदुर को उत्पन्न किया था.
पांडु की दो पत्नियों से देवताओं के पाँच पुत्र हुए. ज्येष्ठ युधिष्ठिर धर्म का, भीम पवन का, अर्जुन इंद्र का और नकुल और सहदेव दोनो अश्विनी कुमारों के पुत्र थे. धृतराष्ट्र के एक सौ एक पुत्र हुए, एक सौ गांधारी से और एक पुत्र युयुत्सु एक वैश्य दासी से. वासुदेव की बहन सुभद्रा से अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने जन्म लिया. पांडवों के पाँच पुत्र उनकी सर्वनिष्ठ पत्नी पांचाली से भी हुए थे – युधिष्ठिर का पुत्र था प्रतिविन्ध्य, भीम का सुतसोम, अर्जुन का श्रुतकीर्ति, नकुल का शतानिक और सहदेव का श्रुतसेन. राक्षसी हिडिंबा से भीम का पुत्र घटोत्कच हुआ था. द्रुपद के एक पुत्री हुई थी शिखण्डिन जो बाद में स्थूण नाम के एक यक्ष की कृपा से पुरुष बन गया था.
“युद्ध में लड़ने वाले सभी योद्धाओं के नाम गिना पाना असंभव है”, वैशम्पायन ने कहा “किंतु सभी प्रमुख योद्धाओं के नाम मैने बता दिए हैं."
पर जनमेजय अभी भी संतुष्ट नहीं था. "मैं सबों के नाम सुनना चाहता हूँ”, उस ने कहा “और यह भी कि उनमें से कौन कौन महारथी थे”.
“जो तुम पूछ रहे हो राजन”, वैशम्पायन ने कहा “वह देवताओं के लिए भी रहस्य है. फिर भी, स्वयंभू का नमन कर मैं सुनाता हूँ. विश्व को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन करने के बाद जमदाग्नि के पुत्र महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले गये थे. जब कोई क्षत्रिय पुरुष नहीं बचा था तब क्षत्रिय स्त्रियों ने व्रती ब्राह्मणों से मिल कर पुत्र उत्पन्न किए थे. यह मेल बस पुत्र प्राप्ति के लिए था और इस में काम-भोग की लालसा कहीं नहीं थी. इस तरह सहस्त्रों क्षत्रिय शिशुओं के जन्म हुए और वह जाति विलुप्त होने से बची. समुद्र से घिरी इस विस्तृत पृथ्वी पर फिर से क्षत्रियों का शासन आया. धार्मिक राजाओं के प्रादुर्भाव से सभी वर्ण प्रसन्न रहते थे. राजा शुद्ध मन से, न्याय भाव से शासन करते थे. उनकी निष्ठा से प्रसन्न हो इंद्र समय पर समुचित वर्षा करता था, घर धन-धान्य से सम्पन रहते थे और मनुष्य दीर्घायु भोगते थे. क्षत्रियों ने अनेक यज्ञ किए और अतुल धन वितरित किए.
ब्राह्मण वेदों और उपनिषदों के अध्ययन में संलग्न रहने लगे. उस काल में किसी ब्राह्मण ने वेद का व्यापार नही किया, ना ही राजन, कभी शूद्र की उपस्थिति में किसी ने वेदोच्चारण ही किए. गौओं की संख्या बढ़ी क्यों कि कोई कभी बछड़े के हिस्से का दूध नहीं पीता था. सभी धर्म परायण थे और कुछ भी करते समय धर्म को ओझल नहीं होने देते थे.
इतने अच्छे समय में असुरों ने पृथ्वी पर जन्म लेने शुरू किए. सहस्त्रों असुरों ने मानवेतर योनियों में जन्म लिए – गाय, घोड़े, ऊँट, भैंस, हाथी, मृग, राक्षस आदि. अनेक ने मनुष्य योनि में, राज वंशों में जन्म लिए. असुर शक्तिवान थे उन्होने अपने शत्रुओं पर (क्षत्रिय राजाओं पर) विजय पाई और अपना आधिपत्य सुदृढ़ कर लिया. उनकी संख्या बढ़ती गयी और अपनी शक्ति के नशे में चूर रह कर वे चारो वर्णों पर तो अत्याचार करते ही थे, वेदज्ञ ऋषियों को भी सताते थे.
कुछ समय बाद असुरों के बढ़ते बोझ को झेलने में पृथ्वी भी असमर्थ हो गयी और पितामह ब्रह्मा से उस ने अपनी मुक्ति के उपाय खोजने को कहा. ब्रह्मा ने पृथ्वी को आश्वस्त किया “तुम्हारे बोझ को हल्का करने के लिए ( असुरों के नाश के लिए) मैं स्वर्ग से देवों को नियुक्त करूँगा”. पृथ्वी को विदा कर ब्रह्मा ने देवताओं को आदेश दिए कि वे मर्त्य लोक में अपनी शक्ति और अपने स्वाभाव के अनुकूल रूपों में जन्म ले कर असुरों से संघर्ष करें. ऐसे ही आदेश पितामह ने गंधर्वों और अप्सराओं को भी दिए.
पृथ्वी पर आने का निश्चय कर इंद्र के साथ सभी देवों ने नारायण से अवतरित होने की प्रार्थना की और उनकी प्रार्थना सुन हरि ने कहा “तथास्तु”.
(1) पुत्र जन्म के बाद कौमार्य के पुनर्स्थापन की बात महाभारत में अनेक बार आई है. तीन अन्य स्त्रियाँ जिन्हे ऐसा वर मिला था: कुंती, द्रौपदी, और ययाति की पुत्री माधवी.
जनमेजय के सर्प यज्ञ में भाग लेने कृष्ण द्वैपायन हस्तिनापुर आए. ऋषि को अपने शिष्यों के साथ आए देख राजा जनमेजय बहुत हर्षित हो कर आगे आया और सदस्यों की सहमति से उन्हे स्वर्ण पीठ पर बिठा कर उस ने उनकी विधिवत पूजा की. ऋषि को जल, अर्घ्य, गौ इत्यादि दे कर राजा और सदस्यों ने उनसे कौरवों और पांडवों का वृतांत सुनाने का अनुरोध किया. “आप ने उन्हे अपनी आँखों से देख रखा है, क्या कारण था उनके वैमनस्य का जिसमें पूरा विश्व झुलस गया था?” व्यास ने यह सुन अपने शिष्य वैशम्पायन को वह कथा सुनाने का निर्देश दिया.
अपने गुरु को साष्टांग प्रणाम कर वैशम्पायन ने यज्ञ सभा को संक्षेप में वह कथा सुना दी. इस संक्षिप्त पाठ से कोई संतुष्ट नहीं था. जनमेजय ने कहा “इसे सुन कर विस्तृत कथा सुनने के लिए मैं और भी अधिक उत्सुक हो उठा हूँ. धार्मिक पुरुषों ने उस युद्ध में अपने संबंधियों के वध किए हैं. किसी तुच्छ कारण से उन्होने वैसा नहीं किया होगा क्यूँकि आज भी उनकी प्रशंसा की जाती है. क्यों उन्हों ने अपने संबंधियों के वध किए? पांडव जैसे वीर कौरवों के अत्याचार क्यों सहते रहे? भीम, जिसे दस सहस्त्र हाथियों का बल था, कैसे अपने प्रति किए गये अन्याय को चुप चाप सह सका? सती कृष्णा ने दुःशासन को अपनी कोप दृष्टि से जला क्यों नहीं दिया? चारो भाई क्यों युधिष्ठिर के पीछे हमेशा चले जब कि उनके अग्रज को द्यूत की लत लगी हुई थी? और युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा को, जिसे सब कर्तव्यों का ज्ञान था यह लत कैसे लग सकी?
“हे ब्राह्मण, आप इतने विस्तार में इस कथा को सुनायें कि मैं अपने प्रश्नों के उत्तर पा सकूँ”
वैशम्पायन ने कहा “राजन, यह बहुत लंबी कथा है. इस में एक लाख श्लोक हैं, इस के सम्पूर्ण पाठ के लिए अलग से समय नियुक्त कीजिए. यह वेदों के समान पाप नाशक है. इसे को जय भी कहा जाता है और विजय के इच्छुक राजाओं को इसे अवश्य सुनना चाहिए. युवा राजा अपनी रानी के साथ इसे सुनें तो उन्हे पराक्रमी पुत्र प्राप्त होते हैं. इस में धर्म, अर्थ और मोक्ष के विज्ञान हैं. जो इसे सुनते हैं उनके पुत्र और अनुचर सदैव आज्ञाकारी रहते हैं. जो बिना छिद्रान्वेषण के भाव से इसे पढ़ता है उसे कोई व्याधि कभी नहीं सताती. कुरुओं की इस गाथा को जो भी पढ़ेगा उस के परिवार की वृद्धि होगी और समाज में वह सम्मान पाएगा.
“इस कृति में देवताओं और राजर्षियों की कथायें हैं, इस में निष्पाप केशव हैं, पवित्र द्विज हैं और महादेव भी हैं. इस में कार्तिकेय के जन्म का वर्णन है, इस में ब्राह्मण और गौ के महात्म्य हैं. भरत वंश के कुमारों के जन्म की इस कथा का नाम महाभारत है; जो इस व्युत्पत्ति को जनता है उस के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. व्यास ने इसे तीन वर्षों में पूरा किया था. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर जो कुछ इस में है वह कहीं और भी मिल सकता है किंतु जो इस में नहीं है वह और कहीं नहीं मिल सकता.”
यह सब बताने के बाद सौति राजा उपरिचर से अपनी कथा प्रारंभ करता है.
पौरव वंश के वसु नामक एक धार्मिक राजा की इंद्र से प्रगाढ़ मैत्री थी. इंद्र के निर्देश पर उस ने कभी चेदि राज्य जीता था. इंद्र ने उसे एक स्फटिक-विमान दिया जो कहीं भी जा सकता था. इस विमान में उड़ सकने के चलते उस का एक नाम उपरिचर भी पड़ा था. इंद्र ने उसे एक पुष्पमाला भी दी थी जिस के कमल पुष्प कभी नहीं कुम्हला सकते थे और जिसे पहनने वाले को युद्ध में कभी कोई चोट नहीं पहुँच सकती थी. यह सब देते हुए इंद्र ने उस से संपूर्ण पृथ्वी पर धर्म की रक्षा करने के लिए कहा था. वसु इंद्र की नियमित पूजा करता था और इंद्र उसका पूजन स्वीकार करने हंस के रूप में चेदि आता था. वसु देवेन्द्र की मित्रता, देवेन्द्र की कृपादृष्टि से पूरे विश्व का सम्राट बन राज कर रहा था. सम्राट वसु के पाँच पुत्र थे जिन्हे उस ने अपने साम्राज्य के विभिन्न प्रांतों के राजा बना दिए थे. ज्येष्ठ पुत्र वृहद्रथ मगध का शासक बना था. यही वृहद्रथ एक अन्य नाम महारथ से भी जाना जाता है. वसु के अन्य पुत्र थे प्रत्यग्रह, कुशाम्ब, मछिल्ल और यदु. कुशाम्ब का एक और नाम था मणिवाहन. वसु के पुत्रों ने अपने नामों पर राज्य और अपने राजवंश स्थापित किए, जिन वंशों ने बहुत दिनों तक पृथ्वी पर राज किए.
वसु की राजधानी के निकट एक नदी बहती थी शुक्तिमती. कभी कोलाहल नाम के एक सजीव पर्वत ने उस नदी का उल्लंघन कर उसे अपने पाश में बाँध लिया था. वसु ने अपने पदाघात से पर्वत में एक गहरा गड्ढा कर शुक्तिमती को मुक्त किया था. किंतु कोलाहल से मिलन के चलते शुक्तिमती को यमज संतानें, एक पुत्र और एक पुत्री हुईं. उस नदी ने अपनी संतानों को अपने तारक वसु को दे दिए. उस के बालक को बड़े होने पर वसु ने उसे अपना सेना नायक बनाया और उस की बालिका गिरिका के बड़ी होने पर वसु ने उस से विवाह कर लिया था. गिरिका अत्यंत रूपवती थी. एक दिन गिरिका के ऋतु काल में वसु उस के पास जाने ही वाला था जब उस के पितृ चेदि आ गये. पित्रियों ने उस से अपने भोजन (श्राद्ध) के लिए मृग के माँस की इच्छा व्यक्त की, और आखेट प्रेमी राजा मृग के संधान में वन निकल पड़ा.
आखेट में भी वसु गिरिका के रूप को याद करता रहा. वसंत ऋतु में वन बहुत रमणीय था और राजा का ध्यान रह रह कर गिरिका पर जा अटकता था. गिरिका की कामना में डूबा हुआ वसु फूलों से लदे एक अशोक वृक्ष के नीचे बैठे स्खलित हो गया. निकट के वृक्ष पर बैठे एक श्येन (बाज पक्षी) को उस ने अपने बीज दिए और उस से उन्हे गिरिका को दे आने के लिया कहा. रास्ते में एक दूसरे श्येन ने उस के चंगुल में माँस का टुकड़ा समझ कर उस से राजा के बीज छीनने चाहे. उनके मुठभेड़ में वसु के बीज नीचे बहती यमुना नदी में गिर पड़े. यमुना में उन दिनों अद्रिका नाम की एक अप्सरा किसी शाप वश मछली बन कर रह रही थी. जल में गिरते राजा के बीज को अद्रिका ने आगे बढ़ कर पी लिया. दस महीनों के बाद अद्रिका धीवरों के जाल में फँसी थी और जब उस का पेट चीरा गया था तो दो मानव शिशु मिले थे – एक बालक और एक बालिका. आश्चर्य चकित धीवर दोनो शिशुओं को ले कर अपने राजा उपरिचर के पास गये. उपरिचर ने बालक शिशु को अपने पास रख लिया. इसी बालक ने बड़े होने पर मत्स्य राजवंश की स्थापना की. अपरिचर ने बालिका को धीवरों को दे दिया "यह तुम्हारी बेटी है".
इस तरह वह अप्सरा पुत्री धीवरों के मुखिया के घर पलने लगी. उस के दत्तक पिता ने उस का नाम सत्यवती रखा था. बड़ी हो कर वह अप्सरा समान रूपसी हुई, पर मछली के पेट से जन्म लेने के चलते उस की देह से हमेशा मछली की गंध आती रही. सत्यवती यमुना पर नाव खे कर अपने पिता के हाथ बँटाती थी. एक बार पराशर ऋषि अपने भ्रमण के क्रम में यमुना पार कर रहे थे जब उन्होने उस रूपसी को देखा. सत्यवती का रूप कुछ ऐसा था कि उस साधु के हृदय में भी इच्छा के बीज उग गये.
पराशर ने सत्यवती को अपनी इच्छा बताई. नदी के दोनो किनारों पर खड़े ऋषियों को दिखाते हुए सत्यवती ने पूछा “इन के सामने मैं आप की इच्छा कैसे पूरी कर सकती हूँ?” यह सुन कर पराशर ने अपने तपोबल से वहाँ गहरा कुहासा ला दिया जिस में हाथ को हाथ नहीं दिखे. ऋषि की शक्ति से वह लड़की चकित हो गयी और सलज्ज स्वर में उस ने प्रार्थना की “मैं एक कुमारी हूँ, मुनिवर, विवाह के पहले अपना कौमार्य नष्ट कर मैं जी नहीं सकूँगी”.
“मेरी इच्छा पूरी करने के बाद भी”, ऋषि ने कहा “तुम्हारा कौमार्य भंग नहीं होगा. यही नहीं तुम जो चाहो वह मुझ से माँग सकती हो, मेरे वचन कभी विफल नहीं हुए हैं”
यह सुन सत्यवती ने माँगा कि उसकी देह से मछली की गंध नहीं बल्कि सदैव एक ललित, मधुर सुगंध निकले. ऋषि ने तत्काल ऐसा कर दिया. प्रसन्न हृदय से सत्यवती ने भी ऋषि की इच्छा पूरी की. पराशर अपने आश्रम चला गया और उस दिन से सत्यवती अपनी सुगंध के चलते गंधवती कहलाने लगी. उस की यह सुगंध एक योजन से मिलने लगती थी, जिस से उसका एक और नाम पड़ा योजनगंधा.
उसी दिन यमुना के एक द्वीप पर सत्यवती ने पराशर के पुत्र को जन्म दिया. कृष्ण वर्ण का वह बालक द्वीप पर जन्म लेने के चलते कृष्ण द्वैपायन कहलाया. जन्म के तुरंत बाद, अपनी माता से अनुमति ले कर, वह तपस्या के लिए निकल गया. जाते जाते उस ने अपनी माता से कहा था “जब भी तुम्हे मेरी आवश्यकता होगी, तुम मुझे याद करना मैं चला आऊंगा”. पुत्र जन्म के बाद सत्यवती का कौमार्य पुनर्स्थापित हो गया था(1).
अपनी माता का घर छोड़ द्वैपायन वेदाध्ययन में लग गया. हर युग के साथ धर्म गिरता है और धर्म के गिरने पर वेद ही रक्षा कर सकते हैं यह सब सोच उस ने वेद के सूक्तों का पुनर्संकलन कर वेद के चार भाग किए. इसे करने के बाद वह वेदव्यास के नाम से जाना गया. (व्यास का एक अर्थ संकलक होता है.) सुमंत, पैल, वैशम्पायन और शुक (जो उस का पुत्र था) व्यास के प्रमुख शिष्य थे. महाभारत रच कर अपने इन्हीं शिष्यों के द्वारा उस ने महाभारत को प्रसारित किया था.
वैशम्पायन ने तब कुछ प्रमुख चरित्रों के जन्मों के वृतांत दिए: शांतनु और गंगा के पुत्र के रूप में देवलोक के वसुओं के अंशों से भीष्म का जन्म हुआ. धर्मराज ने विदुर के रूप में हस्तिनापुर में जन्म लिया था. धर्म के जन्म की कथा भी वैशम्पायन ने सुनाई. कभी अणीमान्डव्य नाम का एक तेजस्वी वेदज्ञ ऋषि हुआ करता था. निर्दोष होते हुए भी चोरी के अभियोग में अणीमान्डव्य सूली पर मारा गया था. मृत्योपरांत उस ने धर्मराज से कहा “अपने बचपन में मैने एक टिड्डी को घास के तिनके से बीन्धा था; उस एक काम को छोड़ मैं ने अपने जीवन में कोई पाप कर्म नहीं किया है. मैं ने उस के सहस्त्रों गुणे तप किए होंगे. क्या मेरा तप मेरे उस पाप पर भारी नहीं पड़ता है? ब्रह्म-हत्या किसी भी अन्य जीव की हत्या से अधिक जघन्य पाप है, इस लिए, धर्म तुम पापी हो और तुम मर्त्य लोक में शूद्र वर्ण में जन्म लोगे.” उसी शाप के चलते धर्म को विदुर के रूप में जन्म लेना पड़ा था.
कुंती ने अपनी कौमार्यावस्था में सूर्य के पुत्र कर्ण को जन्म दिया था, जिस की देह पर जन्म से ही स्वर्ण कवच और स्वर्ण कुंडल सजे हुए थे. भगवान विष्णु स्वयं, जो सृष्टि के अदृश्य कारक हैं, जो अक्षय हैं और जो परमात्मा हैं, जिनमें तीनों गुण स्थिर हैं, जो अदृश्य रूप में सर्वत्र व्याप्त हैं, जो अनंत हैं और जो वेदों के ओम् हैं, वे देवकी और वसुदेव के पुत्र श्री कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे. यदुवंशी सरदार सत्यक और ह्रिदिक के घरों में भगवान के दो कर्मठ सहयोगी क्रमशः सात्यकी और कृतवर्मा के जन्म हुए.
पात्र में रखे ऋषि भरद्वाज के बीज के विकसित होने से द्रोण (काष्ठ पात्र) का जन्म हुआ. नर्कल के कुंज में गिरे गौतम ऋषि के बीज से अश्वत्थामा की माता कृपी और कृपी के भाई कृपा के जन्म हुए. द्रोण के नाश के लिए यज्ञ की अग्नि से धनुष साथ लिए दृष्टद्युम्न का जन्म हुआ. उसी यज्ञ की वेदी से अपूर्व सुंदरी कृष्णा ने जन्म लिया. कोसल नरेश नग्नजित और गांधार नरेश सुबल के जन्म हुए. सुबल को एक पुत्र हुआ शकुनी जो देवताओं के शाप वश धर्म का शत्रु बना. सुबल को एक पुत्री भी हुई गांधारी जो दुर्योधन की माता हुई. कृष्ण द्वैपायन से विचित्रवीर्य के क्षेत्र में धृतराष्ट्र और पांडु के जन्म हुए. द्वैपायन ने ही हस्तिनापुर राज प्रासाद की एक दासी से शूद्र किंतु ज्ञानी और निष्पाप विदुर को उत्पन्न किया था.
पांडु की दो पत्नियों से देवताओं के पाँच पुत्र हुए. ज्येष्ठ युधिष्ठिर धर्म का, भीम पवन का, अर्जुन इंद्र का और नकुल और सहदेव दोनो अश्विनी कुमारों के पुत्र थे. धृतराष्ट्र के एक सौ एक पुत्र हुए, एक सौ गांधारी से और एक पुत्र युयुत्सु एक वैश्य दासी से. वासुदेव की बहन सुभद्रा से अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने जन्म लिया. पांडवों के पाँच पुत्र उनकी सर्वनिष्ठ पत्नी पांचाली से भी हुए थे – युधिष्ठिर का पुत्र था प्रतिविन्ध्य, भीम का सुतसोम, अर्जुन का श्रुतकीर्ति, नकुल का शतानिक और सहदेव का श्रुतसेन. राक्षसी हिडिंबा से भीम का पुत्र घटोत्कच हुआ था. द्रुपद के एक पुत्री हुई थी शिखण्डिन जो बाद में स्थूण नाम के एक यक्ष की कृपा से पुरुष बन गया था.
“युद्ध में लड़ने वाले सभी योद्धाओं के नाम गिना पाना असंभव है”, वैशम्पायन ने कहा “किंतु सभी प्रमुख योद्धाओं के नाम मैने बता दिए हैं."
पर जनमेजय अभी भी संतुष्ट नहीं था. "मैं सबों के नाम सुनना चाहता हूँ”, उस ने कहा “और यह भी कि उनमें से कौन कौन महारथी थे”.
“जो तुम पूछ रहे हो राजन”, वैशम्पायन ने कहा “वह देवताओं के लिए भी रहस्य है. फिर भी, स्वयंभू का नमन कर मैं सुनाता हूँ. विश्व को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन करने के बाद जमदाग्नि के पुत्र महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले गये थे. जब कोई क्षत्रिय पुरुष नहीं बचा था तब क्षत्रिय स्त्रियों ने व्रती ब्राह्मणों से मिल कर पुत्र उत्पन्न किए थे. यह मेल बस पुत्र प्राप्ति के लिए था और इस में काम-भोग की लालसा कहीं नहीं थी. इस तरह सहस्त्रों क्षत्रिय शिशुओं के जन्म हुए और वह जाति विलुप्त होने से बची. समुद्र से घिरी इस विस्तृत पृथ्वी पर फिर से क्षत्रियों का शासन आया. धार्मिक राजाओं के प्रादुर्भाव से सभी वर्ण प्रसन्न रहते थे. राजा शुद्ध मन से, न्याय भाव से शासन करते थे. उनकी निष्ठा से प्रसन्न हो इंद्र समय पर समुचित वर्षा करता था, घर धन-धान्य से सम्पन रहते थे और मनुष्य दीर्घायु भोगते थे. क्षत्रियों ने अनेक यज्ञ किए और अतुल धन वितरित किए.
ब्राह्मण वेदों और उपनिषदों के अध्ययन में संलग्न रहने लगे. उस काल में किसी ब्राह्मण ने वेद का व्यापार नही किया, ना ही राजन, कभी शूद्र की उपस्थिति में किसी ने वेदोच्चारण ही किए. गौओं की संख्या बढ़ी क्यों कि कोई कभी बछड़े के हिस्से का दूध नहीं पीता था. सभी धर्म परायण थे और कुछ भी करते समय धर्म को ओझल नहीं होने देते थे.
इतने अच्छे समय में असुरों ने पृथ्वी पर जन्म लेने शुरू किए. सहस्त्रों असुरों ने मानवेतर योनियों में जन्म लिए – गाय, घोड़े, ऊँट, भैंस, हाथी, मृग, राक्षस आदि. अनेक ने मनुष्य योनि में, राज वंशों में जन्म लिए. असुर शक्तिवान थे उन्होने अपने शत्रुओं पर (क्षत्रिय राजाओं पर) विजय पाई और अपना आधिपत्य सुदृढ़ कर लिया. उनकी संख्या बढ़ती गयी और अपनी शक्ति के नशे में चूर रह कर वे चारो वर्णों पर तो अत्याचार करते ही थे, वेदज्ञ ऋषियों को भी सताते थे.
कुछ समय बाद असुरों के बढ़ते बोझ को झेलने में पृथ्वी भी असमर्थ हो गयी और पितामह ब्रह्मा से उस ने अपनी मुक्ति के उपाय खोजने को कहा. ब्रह्मा ने पृथ्वी को आश्वस्त किया “तुम्हारे बोझ को हल्का करने के लिए ( असुरों के नाश के लिए) मैं स्वर्ग से देवों को नियुक्त करूँगा”. पृथ्वी को विदा कर ब्रह्मा ने देवताओं को आदेश दिए कि वे मर्त्य लोक में अपनी शक्ति और अपने स्वाभाव के अनुकूल रूपों में जन्म ले कर असुरों से संघर्ष करें. ऐसे ही आदेश पितामह ने गंधर्वों और अप्सराओं को भी दिए.
पृथ्वी पर आने का निश्चय कर इंद्र के साथ सभी देवों ने नारायण से अवतरित होने की प्रार्थना की और उनकी प्रार्थना सुन हरि ने कहा “तथास्तु”.
(1) पुत्र जन्म के बाद कौमार्य के पुनर्स्थापन की बात महाभारत में अनेक बार आई है. तीन अन्य स्त्रियाँ जिन्हे ऐसा वर मिला था: कुंती, द्रौपदी, और ययाति की पुत्री माधवी.
Wednesday, 22 April 2015
आदि पर्व (11): सर्प यज्ञ
उत्तंक की बात सुन कर जनमेजय ने अपने पिता की मृत्यु का पूरा वृतांत
अपने सभासदों से सुना. सभासदों ने जनमेजय को परीक्षित का जीवन चित्र
सुनाया – जन्म से मृत्यु तक. अभिमन्यु पुत्र परीक्षित के जन्म के समय कुरु
वंश एक महा-परीक्षा (महाभारत) भोग रहा था इसीलिए उसका नाम परीक्षित पड़ा
था. उसकी मृत्यु की कथा सुन कर जनमेजय क्रुद्ध भी था और चकित भी. “उस
पीपल वृक्ष के जलने और फिर से कश्यप द्वारा उसे जीवित करने की बात आप कैसे
जानते हैं?” उस ने पूछा; “यह न तो कश्यप ने किसी से कहा होगा और न ही तक्षक
ने”
“एक ब्राह्मण का सेवक उस वृक्ष पर उस समय चढ़ कर यज्ञादि के लिए उस की सूखी टहनियाँ तोड़ रहा था. उस ने उनकी बातें सुनी थीं. तक्षक के विष से वृक्ष के साथ वह भी जल कर भस्म हो गया था और कश्यप के मंत्र से वृक्ष के साथ वह भी पुनर्जीवित हो गया था”; एक सभासद ने कहा.
सभासद की बात सुन कर राजा जनमेजय रो पड़ा. “राजा परीक्षित की मृत्यु उस ऋषि-पुत्र के शाप से अधिक उस दुष्ट तक्षक के चलते हुई. यदि तक्षक ने कश्यप को आने से नहीं रोका होता तो मेरे पिता जीवित रहते. और तक्षक ने उन्हे बस इस लिए रोका जिस से उसके विष के निरस्त होने की बात से उस की जगहंसाई नहीं हो. उस से प्रतिशोध ले कर मैं अपना, उस ब्राह्मण उत्तंक का और आप सबों का भी चित्त शांत करूँगा”
“तक्षक को दंड अब तुरंत मिलना चाहिए”, उस ने कहा “है कोई ऐसा उपाय आप की दृष्टि में जिस से तक्षक को उस के अपराध का उचित दंड दिया जा सके?”
मंत्री सहमत थे और राजा ने अपने पुरोहितों और रित्विकों(1) से तक्षक को अग्नि में भस्म करने के उपाय खोजने को कहा. मुख्य पुरोहित ने बताया कि पुराणों में इस के लिए सर्प यज्ञ का विधान है और कि जनमेजय ही इसे कर सकता था. राजा ने यज्ञ की तैयारी शुरू करवा दी.
सर्प यज्ञ के विधान को जानने वाले रित्विकों के निर्देश में शिल्पियों ने यज्ञ स्थल को चुना और यज्ञ वेदी बनाने के लिए उस पर शास्त्रोक्त रीति से यथोचित भूमि माप कर वेदी बनाने में हाथ लगा दिए. वेदी को धन-धान्य से सुसज्जित कर, राजा को यजमान के स्थल पर स्थापित कर रित्विक वेदी के चारो तरफ अपने नियत स्थानों पर बैठने लगे.
पर वेदी का निर्माण कार्य पूरा होने के पहले सूत जाति के एक शिल्पी ने, जिसे वेदी के निर्माण से संबंधित शास्त्रों के विधान के ज्ञान थे और जिसे भवनों के आधार की तैय्यारी का भी पूरा ज्ञान था, वेदी में दोष बताए थे. “यह भूमि उपयुक्त नहीं है, वह काल जब भूमि मापी जा रही थी उस कार्य के लिए उपयुक्त नहीं था और यह यज्ञ पूरा नहीं हो पाएगा”, उस ने कहा था और यह भी जोड़ दिया “यज्ञ किसी ब्राह्मण के हस्तक्षेप के चलते पूरा नहीं होगा”. यह सब सुन यज्ञ शुरू होने के पहले जनमेजय ने द्वारपालों को आदेश दे दिए थे कि वे बिना राजा की आज्ञा के किसी व्यक्ति को यज्ञ भूमि पर नहीं आने देंगे.
यथोचित विधियों से यज्ञ आरंभ हुआ. पुजारी श्याम वस्त्रों में थे, धुएं से उनकी आँखें लाल थीं और वे सर्पों के लिए यमराज बने हुए थे. मंत्रोच्चारण के साथ वे यज्ञ की अग्नि में घी के होम दे रहे थे. हर होम के साथ पूरे विश्व में सभी सर्पों के हृदय भय से और अधिक काँपने लगते थे.
पुरोहित और रित्विक सर्पों के नाम ले ले कर अग्नि में होम करते थे और वे सर्प चीत्कार करते हुए, दूर दूर से उड़ते हुए आ कर यज्ञ की अग्नि में गिर रहे थे. श्वेत, कृष्ण, नील सभी रंगों के बाल, युवा और वृद्ध सर्प यज्ञ की अग्नि में जैसे बरस रहे थे. कई सर्प योजनों लंबे थे, कई अश्वों के रूप में थे, कुछ हाथी की सूंढ़ की तरह थे… भयावह, शक्तिशाली और विषैले; सभी निरीह हो कर उस ज्वाला में अपने को अर्पित कर रहे थे.
शौनक के पूछने पर उग्रश्रवा ने सर्प यज्ञ के रित्विजों और सदस्यों के नाम बताए: च्यवन के वंश का चंडभार्गव उस यज्ञ का होता था, कुत्स उस यज्ञ का उद्गाता था जो वैदिक मंत्रों को पढ़ रहा था, जैमिनी यज्ञ का ब्राह्मण था और श्रणगर्व एवं पिंगल अध्वार्यू थे. अपने पुत्र और शिष्यों के साथ व्यास, उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु, पर्वत, अत्रेय आदि अनेक वेदज्ञ ब्राह्मण उस यज्ञ के सदस्य थे.
अग्नि में गिरते सर्पों के देह की वसा की नदियाँ बहने लगीं थीं. जलते सर्पों के दुर्गंध से वहाँ साँस लेना कठिन हो गया था. अग्नि में गिरते सर्पों के चीत्कार के आगे कुछ सुन पाना भी कठिन हो गया था.
यज्ञ के शुरू होने के पहले, तक्षक भाग कर अपने प्राण बचाने के लिए इंद्रलोक चला गया था. इंद्र को उस ने सब कुछ बताया, अपनी भूल भी स्वीकार की और देवेन्द्र से अपनी रक्षा करने की गुहार लगाई. इंद्र ने उसे आश्वस्त किया कि वहाँ (इंद्रलोक में) यज्ञ से उसे कोई डर नहीं है. यह सुन तक्षक आनंद से अपने दिन काट रहा था.
इधर पृथ्वी पर सर्पराज वासुकी चिंता में डूबा हुआ था. सर्प उस यज्ञ की ज्वाला में गिरते जा रहे थे; उस का परिवार छोटा होता जा रहा था. अपनी बहन जरत्कारु से उस ने कहा “मेरी भुजायें काँप रहीं हैं और मेरी चेतना लुप्त होती जा रही है. अचेत हो कर मैं भी अब कभी उस ज्वाला में जा गिरूँगा. समय आ गया है जब हमें आस्तीक को इस यज्ञ को रोकने के लिए कहना चाहिए.”
सर्पिणी जरत्कारु ने अपने पुत्र आस्तीक को कद्रू के शाप की बात बताई और यह भी कि पितामह ब्रह्मा ने कह रखा है कि यायावर जरत्कारु और सर्पिणी जरत्कारु का पुत्र आस्तीक ही सर्पों को उस यज्ञ से मुक्त कर पाएगा. सब कुछ बता कर उस ने आस्तीक से कहा कि जो भी वह उचित समझे वह करे.
सब सुन कर आस्तीक यज्ञ भूमि पर जाने के लिए तत्पर हुआ. जाने के पहले अपने मामा वासुकी से उस ने कहा “मैं हस्तिनापुर जा रहा हूँ, आप निश्चिंत हो जायें. मैं इस यज्ञ को अवश्य रुकवा दूँगा.” अपने मामा को आश्वस्त कर वह ब्राह्मण बालक जितना शीघ्र हो सके यज्ञ स्थल पर आया. द्वारपालों ने उसे रोका पर उन्हें अपने आशीष से प्रसन्न कर आस्तीक यज्ञ की वेदी की निकट तक पहुँच गया.
वहाँ पहुँच कर आस्तीक ने यज्ञ की प्रशंसा शुरू की “सोम, वरुण और प्रजापति ने भी कभी प्रयाग में यज्ञ किए थे पर आप का यज्ञ, भारत, किसी से कम नहीं है, सबों का कल्याण हो. शक्र ने भी एक सौ यज्ञ किए हैं किंतु आप का यह यज्ञ इंद्र के दस सहस्त्र यज्ञों के समतुल्य है. सबों का कल्याण हो. आप का यह यज्ञ, भारत, यम, हरिमेध या राजा रंतिदेव के यज्ञों के समान है. यह यज्ञ, माया या राजा शशविंदु या वैश्रवन के यज्ञ से कम नहीं है. आप का यज्ञ राजन, नृग, अजामिद या दशरथ नंदन के यज्ञों के समान है. सबों का कल्याण हो. यह यज्ञ देव-पुत्र राजा युधिष्ठिर के यज्ञ के समतुल्य है. आप का यह यज्ञ सत्यवती के पुत्र कृष्ण द्वैपायन के यज्ञ के समान है जिस में वे स्वयं आचार्य थे.”
यज्ञ की प्रशंसा करने के बाद आस्तीक रित्विकों की ओर उन्मुख हुआ. “ये रित्विक और सदस्य, जो आप के यज्ञ का सम्पादन कर रहे हैं वे तेज में इंद्र और सूर्य से कदाचित् कम नहीं हैं. उन्हें अब और कुछ जानने के लिए नहीं बचा है और उन्हे दान देने से आप अक्षय पुण्य के भागी बनेंगे. मेरा विश्वास है कि विश्व में कहीं कोई भी रित्विक आपके रित्विकों के तुल्य नहीं हैं. इन रित्विकों द्वारा अर्पित किए गये होम अग्नि के द्वारा सीधे देवताओं तक पहुँचते हैं.”
और रित्विकों की प्रशंसा के बाद वह सीधे राजा की प्रशंसा पर आया. “मर्त्य लोक का कोई राजा प्रजा के संरक्षण में आप के तुल्य नहीं है. आप का त्याग मुझे अचंभित कर देता है. निस्संदेह आप या तो वरुण हैं या धर्मराज. इस विश्व की रक्षा आप वैसे ही करते हैं जैसे वज्र धारण करने वाला इंद्र कर सकता है. राजाओं में आप नभग और दिलीप से कम नहीं हैं. पराक्रम में आप ययाति या मांधाता हैं, आप में वाल्मीकि या भीष्म सदृश शक्ति छिपि है. आप को अपने क्रोध पर वैसा ही नियन्त्रण है जैसा वशिष्ठ को हुआ करता था. आप की आभा नारायण के सदृश है और आप का न्याय यम के सदृश. श्री कृष्ण की तरह आप में सभी गुण भरे हुए हैं. आप का शस्त्र और शास्त्र ज्ञान जमदाग्नि पुत्र राम के समान है. भगीरथ की तरह आप बस अपनी एक दृष्टि से किसी को संत्रस्त कर सकते हैं.
इस तरह आस्तीक ने अपने वचन से जनमेजय, रित्विक और यज्ञ की अग्नि तीनो को प्रसन्न कर दिया. हर्षित हो राजा ने उसे कोई वर देना चाहा पर वह अभी यजमान था और उस ने सदस्यों से इस की अनुमति माँगी, “यह बालक बस देखने में बालक लगता है; ज्ञान और बुद्धि में यह किसी वयोवृद्ध से कम नही है. मैं इसे कोई वर देना चाहता हूँ, यदि आप ब्राह्मण गण मुझे ऐसा करने दें”
सदस्यों ने कहा “राजा को ब्राह्मणों को सम्मानित करना ही चाहिए, चाहे वे बालक ही क्यों न हों. इस बालक की इच्छापूर्ती अवश्य होनी चाहिए पर अभी उस का समय नहीं है. पहले तक्षक को अग्नि में गिर जाने दें”.
फिर भी राजा ने आस्तीक से पूछ लिया “आप क्या चाहते हैं, जो भी चाहते हो मांगिए”. इस पर यज्ञ का होता अप्रसन्न हुआ “तक्षक अभी तक नहीं आया है”. राजा का ध्यान भी यज्ञ पर आ गया “तक्षक को अग्नि में जलाने के लिए जो कुछ किया जा सकता है वह आप करें; तक्षक ही मेरा शत्रु है”. रित्विकों ने बताया क़ि अग्नि के अनुसार तक्षक अभी इंद्रलोक में छिपा हुआ है. राजा ने उस सूत लोहिताक्ष (शिल्पी, जिसे यज्ञ के विधान का पूरा ज्ञान था) से भी पूछा. उस ने भी वही कहा जो ब्राह्मण कह रहे थे “इंद्र ने उस से कहा है यहाँ तुम अग्नि से सुरक्षित रहोगे”.
राजा दुखी हुआ और उस ने रित्विकों से जो कुछ वे कर सकते थे करने के अनुरोध किए. रित्विक मंत्र पढ़ते हुए हवन करते रहे और कुछ देर में इंद्र यज्ञ स्थल पर दिखाई दिया. उस के साथ अनेक देव और अनेक अप्सरायें भी थीं. पर तक्षक कहीं नहीं दिख रहा था – वह इंद्र के वस्त्रों में छुपा हुआ था. राजा ने रित्विकों से कहा कि यदि तक्षक को इंद्र ने बचा रखा है तो वे इंद्र को भी हवन की अग्नि में गिराने के मंत्र पढ़ें. होताओं और रित्विकों ने वही किया. इंद्र डर कर तक्षक को अपने वस्त्र से निकाल फेंक यज्ञ स्थल से दूर भाग चला.
तक्षक को गिरते देख रित्विकों ने राजा को आस्तीक को वरदान देने की अनुमति दे दी “यज्ञ सुचारू रूप से चल रहा है, तक्षक भी अब दृष्टिगोचर हो गया है, अब आप चाहें तो इस ब्राह्मण बालक को वरदान दे सकते हैं”.
जनमेजय ने आस्तीक से कुछ भी माँगने को कहा. तक्षक उस समय आकाश से यज्ञ की अग्नि में गिरने ही वाला था जब आस्तीक ने राजा से यज्ञ रोक देने का अनुरोध किया. “यदि आप कुछ देना चाहते हैं तो इस यज्ञ को यहीं रोक दें जिस से और सर्पों की मृत्यु नहीं हो”.
जनमेजय सन्न रह गया. उस ने सोचा था ब्राह्मण बालक धन संपत्ति, भूमि, गौ आदि माँगेगा. उस की इस माँग पर उस से कुछ बोले नहीं बन रहा था. जब राजा के बार बार पूछने पर भी आस्तीक ने वही बात दुहाराई तो यज्ञ के सभी सदस्यों ने भी राजा को यज्ञ रोक कर ब्राह्मण को मुँह माँगे वर देने के अपने वचन सत्य रखने की सलाह दी.
और सर्प यज्ञ, जैसा उस सूत लोहिताक्ष ने कहा था, एक ब्राह्मण के हस्तक्षेप के चलते पूरा नहीं हो सका.
शौनक के पूछने पर सौति ने प्रमुख मृत सर्पों के नाम गिनाए और तक्षक के आकाश से तुरन्त नहीं गिर पड़ने का कारण भी बताया. जैसे ही इंद्र ने तक्षक को अपने वस्त्र से निकाल फेंका था, आस्तीक ने अपनी साधना और अपने तप के बल से उसे गिरने से रोक दिया था और तक्षक, जो भय से बेसुध हो गया था, वहीं रुका रहा जब तक यज्ञ का समापन नहीं हो गया.
शास्त्रोक्त विधान से यज्ञ का समापन किया गया. राजा जनमेजय ने सभी पुरोहितों, होताओं, रित्विकों और सदस्यों को प्रचुर दक्षिणा दी. लोहिताक्ष को भी राजा ने पर्याप्त धन दिया. आस्तीक भी अपने उद्देश्य की पूर्ति हो जाने से अत्यंत प्रसन्न हुआ. राजा अभी भी उस से प्रभावित था और उस ने उसे अपने होने वाले आश्वमेध यज्ञ में सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया. राजा का आमंत्रण स्वीकार कर आस्तीक अपनी माँ और अपने मामा के पास चला.
उनके हर्ष का पारावार नहीं था. सभी प्रमुख सर्प वासुकी के साथ बैठे थे. प्रसन्न चित्त से उन्होने भी आस्तीक को वर देने चाहे. आस्तीक ने कहा “जो व्यक्ति, प्रातः या संध्या काल में प्रसन्न चित्त और ध्यान से मेरी इस पवित्र कथा को पढ़ेगा उसे आप से (सर्पों से) कोई भय नहीं रहना चाहिए”. तक्षक तुरंत तैयार हो गया. “जो भी आस्तीक का स्मरण करेगा उसे सर्पों से कोई भय नहीं रहेगा”
सौति ने तब कहा “प्रमति जब रुरू को यह कथा सुना रहा था तो मैने भी सुनी थी और जितना मैं जानता हूँ वह सब मैने आप लोगों को सुना दिया है.”
(1) यज्ञ कराने वाला यजमान कहलाता है. यजमान विशेषज्ञ ब्राह्मणों की सहायता से यज्ञ करा पाता है. तीन विशेषज्ञों के नाम ऋग्वेद के पहले सूक्त के पहले मंत्र में आए हैं: पुरोहित (जो यज्ञ कर्म को आगे बढ़ाता है), रित्विज् (जो समयानुकूल यज्ञ का संपादन करता है) और होता (जो देवताओं का आह्वान करता है). बहुधा बड़े यज्ञों के संपादन के लिए विशेषज्ञों का एक दल नियुक्त किया जाता है जिसे "यज्ञ संसद" भी कहते हैं. इन विशेषज्ञों में से एक यज्ञ का आचार्य बनाया जाता है. आचार्य को यज्ञ विधि का ज्ञान तो होना ही चाहिए, उसका अपना जीवन भी बहुत पवित्र होना चाहिए. यज्ञ की उद्देश्यपूर्ति बहुधा उस के तपोबल पर निर्भर करती है. आचार्य का वयोवृद्ध होना आवश्यक नहीं है – दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ में महर्षि वशिष्ठ ने श्याश्रन्ग को आचार्य बनाया था. यज्ञ संसद के सदस्य यज्ञ के सदस्य कहलाते हैं.
यह भी कहा गया है कि जहाँ एक ही ब्राह्मण यज्ञ करा रहा है वह पुरोहित कहलाता है और जहाँ दो ब्राह्मण हों वहाँ एक रित्विक और एक पुरोहित कहलाता है. ध्यातव्य है कि रित्विक के साथ यजमान का कोई दीर्घ कालीन संबंध नहीं रहता – यह संबंध दक्षिणा के बदले यज्ञ संपादन तक सीमित रहता है.
“एक ब्राह्मण का सेवक उस वृक्ष पर उस समय चढ़ कर यज्ञादि के लिए उस की सूखी टहनियाँ तोड़ रहा था. उस ने उनकी बातें सुनी थीं. तक्षक के विष से वृक्ष के साथ वह भी जल कर भस्म हो गया था और कश्यप के मंत्र से वृक्ष के साथ वह भी पुनर्जीवित हो गया था”; एक सभासद ने कहा.
सभासद की बात सुन कर राजा जनमेजय रो पड़ा. “राजा परीक्षित की मृत्यु उस ऋषि-पुत्र के शाप से अधिक उस दुष्ट तक्षक के चलते हुई. यदि तक्षक ने कश्यप को आने से नहीं रोका होता तो मेरे पिता जीवित रहते. और तक्षक ने उन्हे बस इस लिए रोका जिस से उसके विष के निरस्त होने की बात से उस की जगहंसाई नहीं हो. उस से प्रतिशोध ले कर मैं अपना, उस ब्राह्मण उत्तंक का और आप सबों का भी चित्त शांत करूँगा”
“तक्षक को दंड अब तुरंत मिलना चाहिए”, उस ने कहा “है कोई ऐसा उपाय आप की दृष्टि में जिस से तक्षक को उस के अपराध का उचित दंड दिया जा सके?”
मंत्री सहमत थे और राजा ने अपने पुरोहितों और रित्विकों(1) से तक्षक को अग्नि में भस्म करने के उपाय खोजने को कहा. मुख्य पुरोहित ने बताया कि पुराणों में इस के लिए सर्प यज्ञ का विधान है और कि जनमेजय ही इसे कर सकता था. राजा ने यज्ञ की तैयारी शुरू करवा दी.
सर्प यज्ञ के विधान को जानने वाले रित्विकों के निर्देश में शिल्पियों ने यज्ञ स्थल को चुना और यज्ञ वेदी बनाने के लिए उस पर शास्त्रोक्त रीति से यथोचित भूमि माप कर वेदी बनाने में हाथ लगा दिए. वेदी को धन-धान्य से सुसज्जित कर, राजा को यजमान के स्थल पर स्थापित कर रित्विक वेदी के चारो तरफ अपने नियत स्थानों पर बैठने लगे.
पर वेदी का निर्माण कार्य पूरा होने के पहले सूत जाति के एक शिल्पी ने, जिसे वेदी के निर्माण से संबंधित शास्त्रों के विधान के ज्ञान थे और जिसे भवनों के आधार की तैय्यारी का भी पूरा ज्ञान था, वेदी में दोष बताए थे. “यह भूमि उपयुक्त नहीं है, वह काल जब भूमि मापी जा रही थी उस कार्य के लिए उपयुक्त नहीं था और यह यज्ञ पूरा नहीं हो पाएगा”, उस ने कहा था और यह भी जोड़ दिया “यज्ञ किसी ब्राह्मण के हस्तक्षेप के चलते पूरा नहीं होगा”. यह सब सुन यज्ञ शुरू होने के पहले जनमेजय ने द्वारपालों को आदेश दे दिए थे कि वे बिना राजा की आज्ञा के किसी व्यक्ति को यज्ञ भूमि पर नहीं आने देंगे.
यथोचित विधियों से यज्ञ आरंभ हुआ. पुजारी श्याम वस्त्रों में थे, धुएं से उनकी आँखें लाल थीं और वे सर्पों के लिए यमराज बने हुए थे. मंत्रोच्चारण के साथ वे यज्ञ की अग्नि में घी के होम दे रहे थे. हर होम के साथ पूरे विश्व में सभी सर्पों के हृदय भय से और अधिक काँपने लगते थे.
पुरोहित और रित्विक सर्पों के नाम ले ले कर अग्नि में होम करते थे और वे सर्प चीत्कार करते हुए, दूर दूर से उड़ते हुए आ कर यज्ञ की अग्नि में गिर रहे थे. श्वेत, कृष्ण, नील सभी रंगों के बाल, युवा और वृद्ध सर्प यज्ञ की अग्नि में जैसे बरस रहे थे. कई सर्प योजनों लंबे थे, कई अश्वों के रूप में थे, कुछ हाथी की सूंढ़ की तरह थे… भयावह, शक्तिशाली और विषैले; सभी निरीह हो कर उस ज्वाला में अपने को अर्पित कर रहे थे.
शौनक के पूछने पर उग्रश्रवा ने सर्प यज्ञ के रित्विजों और सदस्यों के नाम बताए: च्यवन के वंश का चंडभार्गव उस यज्ञ का होता था, कुत्स उस यज्ञ का उद्गाता था जो वैदिक मंत्रों को पढ़ रहा था, जैमिनी यज्ञ का ब्राह्मण था और श्रणगर्व एवं पिंगल अध्वार्यू थे. अपने पुत्र और शिष्यों के साथ व्यास, उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु, पर्वत, अत्रेय आदि अनेक वेदज्ञ ब्राह्मण उस यज्ञ के सदस्य थे.
अग्नि में गिरते सर्पों के देह की वसा की नदियाँ बहने लगीं थीं. जलते सर्पों के दुर्गंध से वहाँ साँस लेना कठिन हो गया था. अग्नि में गिरते सर्पों के चीत्कार के आगे कुछ सुन पाना भी कठिन हो गया था.
यज्ञ के शुरू होने के पहले, तक्षक भाग कर अपने प्राण बचाने के लिए इंद्रलोक चला गया था. इंद्र को उस ने सब कुछ बताया, अपनी भूल भी स्वीकार की और देवेन्द्र से अपनी रक्षा करने की गुहार लगाई. इंद्र ने उसे आश्वस्त किया कि वहाँ (इंद्रलोक में) यज्ञ से उसे कोई डर नहीं है. यह सुन तक्षक आनंद से अपने दिन काट रहा था.
इधर पृथ्वी पर सर्पराज वासुकी चिंता में डूबा हुआ था. सर्प उस यज्ञ की ज्वाला में गिरते जा रहे थे; उस का परिवार छोटा होता जा रहा था. अपनी बहन जरत्कारु से उस ने कहा “मेरी भुजायें काँप रहीं हैं और मेरी चेतना लुप्त होती जा रही है. अचेत हो कर मैं भी अब कभी उस ज्वाला में जा गिरूँगा. समय आ गया है जब हमें आस्तीक को इस यज्ञ को रोकने के लिए कहना चाहिए.”
सर्पिणी जरत्कारु ने अपने पुत्र आस्तीक को कद्रू के शाप की बात बताई और यह भी कि पितामह ब्रह्मा ने कह रखा है कि यायावर जरत्कारु और सर्पिणी जरत्कारु का पुत्र आस्तीक ही सर्पों को उस यज्ञ से मुक्त कर पाएगा. सब कुछ बता कर उस ने आस्तीक से कहा कि जो भी वह उचित समझे वह करे.
सब सुन कर आस्तीक यज्ञ भूमि पर जाने के लिए तत्पर हुआ. जाने के पहले अपने मामा वासुकी से उस ने कहा “मैं हस्तिनापुर जा रहा हूँ, आप निश्चिंत हो जायें. मैं इस यज्ञ को अवश्य रुकवा दूँगा.” अपने मामा को आश्वस्त कर वह ब्राह्मण बालक जितना शीघ्र हो सके यज्ञ स्थल पर आया. द्वारपालों ने उसे रोका पर उन्हें अपने आशीष से प्रसन्न कर आस्तीक यज्ञ की वेदी की निकट तक पहुँच गया.
वहाँ पहुँच कर आस्तीक ने यज्ञ की प्रशंसा शुरू की “सोम, वरुण और प्रजापति ने भी कभी प्रयाग में यज्ञ किए थे पर आप का यज्ञ, भारत, किसी से कम नहीं है, सबों का कल्याण हो. शक्र ने भी एक सौ यज्ञ किए हैं किंतु आप का यह यज्ञ इंद्र के दस सहस्त्र यज्ञों के समतुल्य है. सबों का कल्याण हो. आप का यह यज्ञ, भारत, यम, हरिमेध या राजा रंतिदेव के यज्ञों के समान है. यह यज्ञ, माया या राजा शशविंदु या वैश्रवन के यज्ञ से कम नहीं है. आप का यज्ञ राजन, नृग, अजामिद या दशरथ नंदन के यज्ञों के समान है. सबों का कल्याण हो. यह यज्ञ देव-पुत्र राजा युधिष्ठिर के यज्ञ के समतुल्य है. आप का यह यज्ञ सत्यवती के पुत्र कृष्ण द्वैपायन के यज्ञ के समान है जिस में वे स्वयं आचार्य थे.”
यज्ञ की प्रशंसा करने के बाद आस्तीक रित्विकों की ओर उन्मुख हुआ. “ये रित्विक और सदस्य, जो आप के यज्ञ का सम्पादन कर रहे हैं वे तेज में इंद्र और सूर्य से कदाचित् कम नहीं हैं. उन्हें अब और कुछ जानने के लिए नहीं बचा है और उन्हे दान देने से आप अक्षय पुण्य के भागी बनेंगे. मेरा विश्वास है कि विश्व में कहीं कोई भी रित्विक आपके रित्विकों के तुल्य नहीं हैं. इन रित्विकों द्वारा अर्पित किए गये होम अग्नि के द्वारा सीधे देवताओं तक पहुँचते हैं.”
और रित्विकों की प्रशंसा के बाद वह सीधे राजा की प्रशंसा पर आया. “मर्त्य लोक का कोई राजा प्रजा के संरक्षण में आप के तुल्य नहीं है. आप का त्याग मुझे अचंभित कर देता है. निस्संदेह आप या तो वरुण हैं या धर्मराज. इस विश्व की रक्षा आप वैसे ही करते हैं जैसे वज्र धारण करने वाला इंद्र कर सकता है. राजाओं में आप नभग और दिलीप से कम नहीं हैं. पराक्रम में आप ययाति या मांधाता हैं, आप में वाल्मीकि या भीष्म सदृश शक्ति छिपि है. आप को अपने क्रोध पर वैसा ही नियन्त्रण है जैसा वशिष्ठ को हुआ करता था. आप की आभा नारायण के सदृश है और आप का न्याय यम के सदृश. श्री कृष्ण की तरह आप में सभी गुण भरे हुए हैं. आप का शस्त्र और शास्त्र ज्ञान जमदाग्नि पुत्र राम के समान है. भगीरथ की तरह आप बस अपनी एक दृष्टि से किसी को संत्रस्त कर सकते हैं.
इस तरह आस्तीक ने अपने वचन से जनमेजय, रित्विक और यज्ञ की अग्नि तीनो को प्रसन्न कर दिया. हर्षित हो राजा ने उसे कोई वर देना चाहा पर वह अभी यजमान था और उस ने सदस्यों से इस की अनुमति माँगी, “यह बालक बस देखने में बालक लगता है; ज्ञान और बुद्धि में यह किसी वयोवृद्ध से कम नही है. मैं इसे कोई वर देना चाहता हूँ, यदि आप ब्राह्मण गण मुझे ऐसा करने दें”
सदस्यों ने कहा “राजा को ब्राह्मणों को सम्मानित करना ही चाहिए, चाहे वे बालक ही क्यों न हों. इस बालक की इच्छापूर्ती अवश्य होनी चाहिए पर अभी उस का समय नहीं है. पहले तक्षक को अग्नि में गिर जाने दें”.
फिर भी राजा ने आस्तीक से पूछ लिया “आप क्या चाहते हैं, जो भी चाहते हो मांगिए”. इस पर यज्ञ का होता अप्रसन्न हुआ “तक्षक अभी तक नहीं आया है”. राजा का ध्यान भी यज्ञ पर आ गया “तक्षक को अग्नि में जलाने के लिए जो कुछ किया जा सकता है वह आप करें; तक्षक ही मेरा शत्रु है”. रित्विकों ने बताया क़ि अग्नि के अनुसार तक्षक अभी इंद्रलोक में छिपा हुआ है. राजा ने उस सूत लोहिताक्ष (शिल्पी, जिसे यज्ञ के विधान का पूरा ज्ञान था) से भी पूछा. उस ने भी वही कहा जो ब्राह्मण कह रहे थे “इंद्र ने उस से कहा है यहाँ तुम अग्नि से सुरक्षित रहोगे”.
राजा दुखी हुआ और उस ने रित्विकों से जो कुछ वे कर सकते थे करने के अनुरोध किए. रित्विक मंत्र पढ़ते हुए हवन करते रहे और कुछ देर में इंद्र यज्ञ स्थल पर दिखाई दिया. उस के साथ अनेक देव और अनेक अप्सरायें भी थीं. पर तक्षक कहीं नहीं दिख रहा था – वह इंद्र के वस्त्रों में छुपा हुआ था. राजा ने रित्विकों से कहा कि यदि तक्षक को इंद्र ने बचा रखा है तो वे इंद्र को भी हवन की अग्नि में गिराने के मंत्र पढ़ें. होताओं और रित्विकों ने वही किया. इंद्र डर कर तक्षक को अपने वस्त्र से निकाल फेंक यज्ञ स्थल से दूर भाग चला.
तक्षक को गिरते देख रित्विकों ने राजा को आस्तीक को वरदान देने की अनुमति दे दी “यज्ञ सुचारू रूप से चल रहा है, तक्षक भी अब दृष्टिगोचर हो गया है, अब आप चाहें तो इस ब्राह्मण बालक को वरदान दे सकते हैं”.
जनमेजय ने आस्तीक से कुछ भी माँगने को कहा. तक्षक उस समय आकाश से यज्ञ की अग्नि में गिरने ही वाला था जब आस्तीक ने राजा से यज्ञ रोक देने का अनुरोध किया. “यदि आप कुछ देना चाहते हैं तो इस यज्ञ को यहीं रोक दें जिस से और सर्पों की मृत्यु नहीं हो”.
जनमेजय सन्न रह गया. उस ने सोचा था ब्राह्मण बालक धन संपत्ति, भूमि, गौ आदि माँगेगा. उस की इस माँग पर उस से कुछ बोले नहीं बन रहा था. जब राजा के बार बार पूछने पर भी आस्तीक ने वही बात दुहाराई तो यज्ञ के सभी सदस्यों ने भी राजा को यज्ञ रोक कर ब्राह्मण को मुँह माँगे वर देने के अपने वचन सत्य रखने की सलाह दी.
और सर्प यज्ञ, जैसा उस सूत लोहिताक्ष ने कहा था, एक ब्राह्मण के हस्तक्षेप के चलते पूरा नहीं हो सका.
शौनक के पूछने पर सौति ने प्रमुख मृत सर्पों के नाम गिनाए और तक्षक के आकाश से तुरन्त नहीं गिर पड़ने का कारण भी बताया. जैसे ही इंद्र ने तक्षक को अपने वस्त्र से निकाल फेंका था, आस्तीक ने अपनी साधना और अपने तप के बल से उसे गिरने से रोक दिया था और तक्षक, जो भय से बेसुध हो गया था, वहीं रुका रहा जब तक यज्ञ का समापन नहीं हो गया.
शास्त्रोक्त विधान से यज्ञ का समापन किया गया. राजा जनमेजय ने सभी पुरोहितों, होताओं, रित्विकों और सदस्यों को प्रचुर दक्षिणा दी. लोहिताक्ष को भी राजा ने पर्याप्त धन दिया. आस्तीक भी अपने उद्देश्य की पूर्ति हो जाने से अत्यंत प्रसन्न हुआ. राजा अभी भी उस से प्रभावित था और उस ने उसे अपने होने वाले आश्वमेध यज्ञ में सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया. राजा का आमंत्रण स्वीकार कर आस्तीक अपनी माँ और अपने मामा के पास चला.
उनके हर्ष का पारावार नहीं था. सभी प्रमुख सर्प वासुकी के साथ बैठे थे. प्रसन्न चित्त से उन्होने भी आस्तीक को वर देने चाहे. आस्तीक ने कहा “जो व्यक्ति, प्रातः या संध्या काल में प्रसन्न चित्त और ध्यान से मेरी इस पवित्र कथा को पढ़ेगा उसे आप से (सर्पों से) कोई भय नहीं रहना चाहिए”. तक्षक तुरंत तैयार हो गया. “जो भी आस्तीक का स्मरण करेगा उसे सर्पों से कोई भय नहीं रहेगा”
सौति ने तब कहा “प्रमति जब रुरू को यह कथा सुना रहा था तो मैने भी सुनी थी और जितना मैं जानता हूँ वह सब मैने आप लोगों को सुना दिया है.”
(1) यज्ञ कराने वाला यजमान कहलाता है. यजमान विशेषज्ञ ब्राह्मणों की सहायता से यज्ञ करा पाता है. तीन विशेषज्ञों के नाम ऋग्वेद के पहले सूक्त के पहले मंत्र में आए हैं: पुरोहित (जो यज्ञ कर्म को आगे बढ़ाता है), रित्विज् (जो समयानुकूल यज्ञ का संपादन करता है) और होता (जो देवताओं का आह्वान करता है). बहुधा बड़े यज्ञों के संपादन के लिए विशेषज्ञों का एक दल नियुक्त किया जाता है जिसे "यज्ञ संसद" भी कहते हैं. इन विशेषज्ञों में से एक यज्ञ का आचार्य बनाया जाता है. आचार्य को यज्ञ विधि का ज्ञान तो होना ही चाहिए, उसका अपना जीवन भी बहुत पवित्र होना चाहिए. यज्ञ की उद्देश्यपूर्ति बहुधा उस के तपोबल पर निर्भर करती है. आचार्य का वयोवृद्ध होना आवश्यक नहीं है – दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ में महर्षि वशिष्ठ ने श्याश्रन्ग को आचार्य बनाया था. यज्ञ संसद के सदस्य यज्ञ के सदस्य कहलाते हैं.
यह भी कहा गया है कि जहाँ एक ही ब्राह्मण यज्ञ करा रहा है वह पुरोहित कहलाता है और जहाँ दो ब्राह्मण हों वहाँ एक रित्विक और एक पुरोहित कहलाता है. ध्यातव्य है कि रित्विक के साथ यजमान का कोई दीर्घ कालीन संबंध नहीं रहता – यह संबंध दक्षिणा के बदले यज्ञ संपादन तक सीमित रहता है.
Monday, 20 April 2015
आदि पर्व (10): परीक्षित की मृत्यु
कुरु वंश का परीक्षित अपने प्रपितामह पांडु के समान महाबाहु था –
धनुर्धर, महान योद्धा और आखेट प्रेमी भी. एक दिन आखेट में एक मृग को अपने
तीर से घायल कर परीक्षित उस का पीछा कर रहा था जब वह मृग आँखों से ओझल हो
गया और उसके पीछे पीछे अपना घोड़ा दौड़ाते पांडु वन में रास्ता भूल कर एक
मुनि के आश्रम में पहुँच गया. आखेट से थके माँदे राजा ने मुनि को अपनी
गोशाला में पाया. राजा ने कुछ दंभ भरे स्वर में कहा “हे ब्राह्मण, मैं
अभिमन्यु का पुत्र राजा परीक्षित, एक बिंधे मृग का पीछा करते करते यहाँ आ
पहुँचा हूँ. क्या आप ने ऐसा कोई मृग अभी इधर कहीं देखा है?”
मुनि निश्शब्द रहा क्योंकि यह उस के मौन व्रत का दिन था. आखेट की गर्मी में परीक्षित को मुनि की चुप्पी साधे रहना असह्य धृष्टता लगी और उस ने निकट पड़े एक मृत सर्प को अपने धनुष के एक छोर से उठाया और मुनि के कंधों पर डाल दिया. मुनि ने उसे यह भी बिना किसी प्रतिवाद के करने दिया – और उस ने अभी भी एक शब्द नहीं कहा, न अच्छा न बुरा. मुनि की निर्विकार मुद्रा देख कुछ ही क्षणों में राजा का क्रोध भी शांत हो गया. उसे अपने किए का बहुत दुख भी हुआ. पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था और मन मसोस कर वह अपनी राजधानी लौट गया. क्षमाशील मुनि जानता था कि परीक्षित एक न्यायप्रिय राजा था जो अपने वर्ण के शास्त्रोक्त कर्तव्यों से कभी नहीं मुकरता था. अपमानित होने पर भी राजा को शाप देने का विचार उस दयालु के हृदय में कभी नहीं आया.
उस मुनि का एक तेजस्वी पुत्र था शृंगी. अल्प्वयस्क शृंगी पिता के आश्रम से दूर एक गुरुकुल में वेदाध्ययन करता था और अपनी तपश्चर्य्या से उसे बहुत शक्तियाँ मिली हुईं थीं. उस दिन गुरु की आज्ञा से वह अपने पिता से मिलने उनके आश्रम आ रहा था. रास्ते में उस के एक मित्र ने बताया कि राजा परीक्षित ने उसके पिता के कंधों पर आज एक मृत साँप रख दिया है. तरुण शृंगी अपनी प्रकृति से कुछ गर्म स्वभाव का था, पिता का यह अपमान सुन कर उस के क्रोध की सीमा नहीं रही.
उस ने अपने मित्र से पूरी घटना की जानकारी ली और यह निश्चित कर कि उसके पिता ने परीक्षित को उन्हे अपमानित करने का कोई कारण नहीं दिया था शृंगी ने जल स्पर्श कर कहा “उस ब्राह्मण निंदक, कुरु-कुल कलंक पापी राजा को, मेरी वाग्शक्ति से प्रेरित हो, आज से सात रातों के अंदर महा-सर्प तक्षक यम के लोक पहुँचा देगा.” इस तरह अपने पिता के पास पहुँचने के पहले ही शृंगी ने परीक्षित को शाप दे दिया था. आश्रम पहुँचने पर उस ने देखा कि उसका पिता अभी भी अपनी गोशाला में उसी मुद्रा में बैठा था और मृत साँप अभी भी उसके कंधों से लटक रहा था.
अपने पिता का यह रूप देख शृंगी रो पड़ा और उस ने उन्हे अपने शाप की बात बताई. “यह तुम ने अच्छा नहीं किया” मुनि ने सुन कर कहा “तपस्वियों को ऐसा व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए. हम उस राजा के राज्य में रहते हैं और वह हमें यथोचित संरक्षण देता है. हमारे जैसे व्यक्तियों को सदैव राजा को क्षमा करना चाहिए. यदि तुम धर्म का नाश करोगे तो धर्म निश्चय ही तुम्हारा नाश करेगा. यदि राजा अपने कर्तव्य नहीं निभाएगा तो हम अपने पूजन, तप आदि नहीं कर पाएँगे. तपस्वियों के पुण्य अर्जन कर पाने के पीछे धार्मिक राजाओं के हाथ रहते हैं.
"परीक्षित अपनी प्रजा की रक्षा वैसे ही करता है जैसे उसका प्रपितामह पांडु कभी करता था. याद रखो, राजा ही यज्ञों की रक्षा कर पता है, यज्ञों से ही वर्षा होती है और वर्षा से ही अन्न उत्पन्न होते हैं. मनु ने कहा है कि एक राजा दस वेदाध्यायी पुजारियों के समतुल्य होता है. वह धार्मिक राजा थका हुआ था, बुभुक्षित भी; उसे मेरे मौन व्रत का ज्ञान नहीं था और मैं कुछ बोल नहीं सकता था. यह बहुत अविवेकपूर्ण काम तुम ने किया है. तुम्हे परीक्षित को ऐसा शाप कभी नहीं देना चाहिए था."
“यह अविवेकपूर्ण हो या अनुचित या धर्म विरुद्ध ही हो”, शृंगी ने कहा “पर मैने इसे कर दिया है और मेरे शब्द कभी व्यर्थ नहीं जा सकते.”
शृंगी का पिता जानता था कि शृंगी ने कभी परिहास में भी मिथ्या वादन नहीं किया था और उसका शाप अब टल नहीं सकता था. मुनि स्वभाव से शांतिप्रिय था और भरसक प्रयास करता था कि सबों का कल्याण हो. अगले दिन उस ने अपने एक शिष्य को परीक्षित के पास भेजा. शिष्य ने राजा को, उसके मंत्रियों के सामने, शाप की बात बताई.
“राजन, तुम ने ऋषि शामिक के कंधों पर एक मृत साँप रख छोड़ा था. ऋषि ने तो तुम्हे क्षमा कर दिया था पर ऋषि-पुत्र इसे नहीं सह पाया और उस ने शाप दिया है कि सात रातों के अंदर तक्षक के दंश से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी. ऋषि ने तुम्हे बचाने की बहुत चेष्टा की पर उस के पुत्र के वचन कभी असत्य नहीं हो सकते. ऋषि ने तुम्हे बता देने के लिए मुझे यहाँ भेजा है.”
इस कठोर शाप की सुन परीक्षित काँप गया और अपने धर्म-हीन कृत्य को याद कर बहुत दुखी हो गया. उस अभागे दिन ऋषि का मौन व्रत था. उनकी विशाल-हृदयता, क्षमा-शीलता को देख राजा और भी अधिक दुखी हो गया. वह धार्मिक राजा अपनी मृत्यु की सुन उतना दुखी नहीं था जितना वह ऋषि के प्रति अपने अपमानजनक व्यवहार को याद कर के था.
ऋषि के शिष्य के चले जाने के बाद मंत्रियों के साथ मिल कर राजा इस संकट से निपटने के उपाय खोजने लगा. सब के विचार से आनन फानन में एक अकेले स्तंभ के ऊपर एक घर का निर्माण कराया गया. उसकी रक्षा के लिए सैनिक नियुक्त कर दिए गये और वहीं पर सर्प-दंश के उपचार / मन्त्रोपचार कर सकने वाले ब्राह्मणों के रहने की व्यवस्था कर दी गयी. और इस तरह स्तंभ के ऊपर बने उस घर में राजा शाप के अपने सात दिन काटने लगा.
सातवें दिन कश्यप राजा के आवास की दिशा में चला. उस ने तक्षक के दंश से राजा की मृत्यु के शाप की सुन ली थी और पितामह ब्रह्मा ने स्वयं उसे सर्प-दंश के उपचार के मंत्र सिखाए थे. “इस धार्मिक राजा के प्राण बचा पाने पर मैं बहुत धर्म और अर्थ, दोनो एक साथ अर्जित कर लूँगा” यही सोचते कश्यप हस्तिनापुर आ रहा था.
तक्षक ने परीक्षित का उपचार करने के उद्देश्य से कश्यप को हस्तिनापुर आते देख लिया. एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धर कर तक्षक भी उसके साथ चलने लगा और कुछ देर में उस ने कश्यप से पूछा “इतने तेज कदमों से आप कहाँ जा रहे हैं?”
"तक्षक आज अपने विष से कुरु कुल के परीक्षित को दघ्द करने वाला है”, कश्यप ने कहा “मैं वहीं जा रहा हूँ जिस से मैं उस धर्म परायण राजा का जीवन बचा सकूँ.”
तब तक्षक ने अपना परिचय दिया “मैं ही वह तक्षक हूँ जो आज उस राजा को यम के लोक भेजेगा. आप लौट जाइए क्यों कि मेरे काटे का कोई उपचार नहीं है”.
“मैं जानता हूँ”, कश्यप ने मुस्कुराते हुए कहा “मैं राजा को तुम्हारे काटने के बाद भी बचा लूँगा”
“यदि आप ऐसा कर सकते हैं", तक्षक ने कहा “यदि आप वास्तव में मेरे काटे को पुनर्जीवित कर सकते हैं, तो इस पीपल वृक्ष को बचाईए. मैं इसे जलाने जा रहा हूँ”. यह कहते कहते तक्षक ने अपने विष-दंत उस वृक्ष में गाड़ दिए और देखते देखते पीपल का वह हरा भरा विशाल वृक्ष जल उठा और क्षणों बाद वहाँ बस काठ की तरह सूखा तना और सूखी सूखी शाखायें बचीं थीं. और अगले क्षण वह भी नहीं रहे, बस रख का एक ढेर था वहाँ!
“देखो तक्षक”, कश्यप ने कहा “अब मेरे ज्ञान की शक्ति भी देख लो”. कश्यप ने अपने मंत्र पढ़ने शुरू किए. एकाध क्षण में राख के उस ढेर से एक कोंपल निकली, उस में दो पत्ते लगे, वह अंकुर बढ़ने लगा और पीपल के विशाल तने का रूप ले लिया, तना से शाखायें फूटने लगीं और वह पीपल का हरा भरा विशाल वृक्ष फिर उनके सामने खड़ा था.
“यह उचित नही है कि आप मेरे विष के प्रभाव को निरस्त करते चलें”, तक्षक ने कहा “आप ऋषि हैं, आप की संपदा तपोधन है; आप किस धन की आशा में राजा को बचाना चाहते हैं? जिस भी पारितोषिक की आपने आशा कर रखी होगी वह मैं आप को देता हूँ, आप हस्तिनापुर नहीं जायें”.
तक्षक ने फिर कहा “और यह भी स्मरण रहे कि राजा को मैं एक ब्राह्मण के शाप के चलते डसने जा रहा हूँ. आप के मंत्र को बस मेरे विष के विरुद्ध ही नहीं, एक सत्यवादी ब्राह्मण के वचन के विरुद्ध भी काम करना पड़ेगा.”
कश्यप तब थोड़ी देर ध्यान मग्न हो कर बैठा और उसने योग शक्ति से देख लिया कि परीक्षित का जीवन काल बस इतना ही था और वह तक्षक से स्वर्ण आदि ले कर वापस लौट गया.
कश्यप को वापस लौटा कर तक्षक हस्तिनापुर पहुँचा और राजा के नये आवास को देख कर उस ने अपनी योजना बनाई. कुछ सर्पों को उस ने राजा के पास तपस्वियों के रूप में फल, कुश और जल आदि के साथ भेजा. राजा ने उनके ये उपहार स्वीकार किए और उनके लौटने के बाद अपने मंत्रियों को, जो उस नये घर में उस के साथ बैठे थे, तपस्वियों के दिए फल खाने के लिए आमंत्रित किया. अपने भाग्य और ऋषि-पुत्र के शाप के वशीभूत राजा ने वही फल उठाया जिस में तक्षक छिपा हुआ था. एक ग्रास काटने पर उस फल से एक छोटा कृमि निकलता दिखाई दिया. सूर्यास्त हो रहा था और परीक्षित अपने को अब सुरक्षित समझने लगा था. उस कृमि को अपनी गर्दन पर रखते उस ने कहा “सूर्यास्त के बाद मेरा सर्प-दंश या सर्प-विष का संकट अब टल गया है. यह कृमि अब तक्षक बन कर मुझे काट ले जिस से मेरे पाप-पूर्ण कृत्य का प्रायश्चित हो और ऋषि-पुत्र के वचन भी मिथ्या नहीं हों”
पर राजा की गर्दन पर आते ही अपने विशाल रूप में आ कर तक्षक ने राजा को अपने व्याल में बाँध लिया. तक्षक के विशाल रूप को देखते ही मंत्री गण भाग खड़े हुए. भागते भागते उन्हों ने तक्षक को आकाश मार्ग से निकलते देखा. सांझ के आधे अंधेरे आकाश में रुपहला तक्षक किसी विवाहिता की माँग में भरे सिंदूर की भाँति चमक रहा था. राजा का नया घर तक्षक के विष से धधक उठा था और उस की निर्जीव देह स्तंभ पर बने उस घर से किसी वज्र से मारे की तरह नीचे गिरी पड़ी थी.
पुरोहितों ने राजा की अंत्येष्टि की और सभी नागरिकों ने परीक्षित के पुत्र जनमेजय को, जो अभी वयस्क नहीं हुआ था, हस्तिनापुर का नया राजा बनाया.
मुनि निश्शब्द रहा क्योंकि यह उस के मौन व्रत का दिन था. आखेट की गर्मी में परीक्षित को मुनि की चुप्पी साधे रहना असह्य धृष्टता लगी और उस ने निकट पड़े एक मृत सर्प को अपने धनुष के एक छोर से उठाया और मुनि के कंधों पर डाल दिया. मुनि ने उसे यह भी बिना किसी प्रतिवाद के करने दिया – और उस ने अभी भी एक शब्द नहीं कहा, न अच्छा न बुरा. मुनि की निर्विकार मुद्रा देख कुछ ही क्षणों में राजा का क्रोध भी शांत हो गया. उसे अपने किए का बहुत दुख भी हुआ. पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था और मन मसोस कर वह अपनी राजधानी लौट गया. क्षमाशील मुनि जानता था कि परीक्षित एक न्यायप्रिय राजा था जो अपने वर्ण के शास्त्रोक्त कर्तव्यों से कभी नहीं मुकरता था. अपमानित होने पर भी राजा को शाप देने का विचार उस दयालु के हृदय में कभी नहीं आया.
उस मुनि का एक तेजस्वी पुत्र था शृंगी. अल्प्वयस्क शृंगी पिता के आश्रम से दूर एक गुरुकुल में वेदाध्ययन करता था और अपनी तपश्चर्य्या से उसे बहुत शक्तियाँ मिली हुईं थीं. उस दिन गुरु की आज्ञा से वह अपने पिता से मिलने उनके आश्रम आ रहा था. रास्ते में उस के एक मित्र ने बताया कि राजा परीक्षित ने उसके पिता के कंधों पर आज एक मृत साँप रख दिया है. तरुण शृंगी अपनी प्रकृति से कुछ गर्म स्वभाव का था, पिता का यह अपमान सुन कर उस के क्रोध की सीमा नहीं रही.
उस ने अपने मित्र से पूरी घटना की जानकारी ली और यह निश्चित कर कि उसके पिता ने परीक्षित को उन्हे अपमानित करने का कोई कारण नहीं दिया था शृंगी ने जल स्पर्श कर कहा “उस ब्राह्मण निंदक, कुरु-कुल कलंक पापी राजा को, मेरी वाग्शक्ति से प्रेरित हो, आज से सात रातों के अंदर महा-सर्प तक्षक यम के लोक पहुँचा देगा.” इस तरह अपने पिता के पास पहुँचने के पहले ही शृंगी ने परीक्षित को शाप दे दिया था. आश्रम पहुँचने पर उस ने देखा कि उसका पिता अभी भी अपनी गोशाला में उसी मुद्रा में बैठा था और मृत साँप अभी भी उसके कंधों से लटक रहा था.
अपने पिता का यह रूप देख शृंगी रो पड़ा और उस ने उन्हे अपने शाप की बात बताई. “यह तुम ने अच्छा नहीं किया” मुनि ने सुन कर कहा “तपस्वियों को ऐसा व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए. हम उस राजा के राज्य में रहते हैं और वह हमें यथोचित संरक्षण देता है. हमारे जैसे व्यक्तियों को सदैव राजा को क्षमा करना चाहिए. यदि तुम धर्म का नाश करोगे तो धर्म निश्चय ही तुम्हारा नाश करेगा. यदि राजा अपने कर्तव्य नहीं निभाएगा तो हम अपने पूजन, तप आदि नहीं कर पाएँगे. तपस्वियों के पुण्य अर्जन कर पाने के पीछे धार्मिक राजाओं के हाथ रहते हैं.
"परीक्षित अपनी प्रजा की रक्षा वैसे ही करता है जैसे उसका प्रपितामह पांडु कभी करता था. याद रखो, राजा ही यज्ञों की रक्षा कर पता है, यज्ञों से ही वर्षा होती है और वर्षा से ही अन्न उत्पन्न होते हैं. मनु ने कहा है कि एक राजा दस वेदाध्यायी पुजारियों के समतुल्य होता है. वह धार्मिक राजा थका हुआ था, बुभुक्षित भी; उसे मेरे मौन व्रत का ज्ञान नहीं था और मैं कुछ बोल नहीं सकता था. यह बहुत अविवेकपूर्ण काम तुम ने किया है. तुम्हे परीक्षित को ऐसा शाप कभी नहीं देना चाहिए था."
“यह अविवेकपूर्ण हो या अनुचित या धर्म विरुद्ध ही हो”, शृंगी ने कहा “पर मैने इसे कर दिया है और मेरे शब्द कभी व्यर्थ नहीं जा सकते.”
शृंगी का पिता जानता था कि शृंगी ने कभी परिहास में भी मिथ्या वादन नहीं किया था और उसका शाप अब टल नहीं सकता था. मुनि स्वभाव से शांतिप्रिय था और भरसक प्रयास करता था कि सबों का कल्याण हो. अगले दिन उस ने अपने एक शिष्य को परीक्षित के पास भेजा. शिष्य ने राजा को, उसके मंत्रियों के सामने, शाप की बात बताई.
“राजन, तुम ने ऋषि शामिक के कंधों पर एक मृत साँप रख छोड़ा था. ऋषि ने तो तुम्हे क्षमा कर दिया था पर ऋषि-पुत्र इसे नहीं सह पाया और उस ने शाप दिया है कि सात रातों के अंदर तक्षक के दंश से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी. ऋषि ने तुम्हे बचाने की बहुत चेष्टा की पर उस के पुत्र के वचन कभी असत्य नहीं हो सकते. ऋषि ने तुम्हे बता देने के लिए मुझे यहाँ भेजा है.”
इस कठोर शाप की सुन परीक्षित काँप गया और अपने धर्म-हीन कृत्य को याद कर बहुत दुखी हो गया. उस अभागे दिन ऋषि का मौन व्रत था. उनकी विशाल-हृदयता, क्षमा-शीलता को देख राजा और भी अधिक दुखी हो गया. वह धार्मिक राजा अपनी मृत्यु की सुन उतना दुखी नहीं था जितना वह ऋषि के प्रति अपने अपमानजनक व्यवहार को याद कर के था.
ऋषि के शिष्य के चले जाने के बाद मंत्रियों के साथ मिल कर राजा इस संकट से निपटने के उपाय खोजने लगा. सब के विचार से आनन फानन में एक अकेले स्तंभ के ऊपर एक घर का निर्माण कराया गया. उसकी रक्षा के लिए सैनिक नियुक्त कर दिए गये और वहीं पर सर्प-दंश के उपचार / मन्त्रोपचार कर सकने वाले ब्राह्मणों के रहने की व्यवस्था कर दी गयी. और इस तरह स्तंभ के ऊपर बने उस घर में राजा शाप के अपने सात दिन काटने लगा.
सातवें दिन कश्यप राजा के आवास की दिशा में चला. उस ने तक्षक के दंश से राजा की मृत्यु के शाप की सुन ली थी और पितामह ब्रह्मा ने स्वयं उसे सर्प-दंश के उपचार के मंत्र सिखाए थे. “इस धार्मिक राजा के प्राण बचा पाने पर मैं बहुत धर्म और अर्थ, दोनो एक साथ अर्जित कर लूँगा” यही सोचते कश्यप हस्तिनापुर आ रहा था.
तक्षक ने परीक्षित का उपचार करने के उद्देश्य से कश्यप को हस्तिनापुर आते देख लिया. एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धर कर तक्षक भी उसके साथ चलने लगा और कुछ देर में उस ने कश्यप से पूछा “इतने तेज कदमों से आप कहाँ जा रहे हैं?”
"तक्षक आज अपने विष से कुरु कुल के परीक्षित को दघ्द करने वाला है”, कश्यप ने कहा “मैं वहीं जा रहा हूँ जिस से मैं उस धर्म परायण राजा का जीवन बचा सकूँ.”
तब तक्षक ने अपना परिचय दिया “मैं ही वह तक्षक हूँ जो आज उस राजा को यम के लोक भेजेगा. आप लौट जाइए क्यों कि मेरे काटे का कोई उपचार नहीं है”.
“मैं जानता हूँ”, कश्यप ने मुस्कुराते हुए कहा “मैं राजा को तुम्हारे काटने के बाद भी बचा लूँगा”
“यदि आप ऐसा कर सकते हैं", तक्षक ने कहा “यदि आप वास्तव में मेरे काटे को पुनर्जीवित कर सकते हैं, तो इस पीपल वृक्ष को बचाईए. मैं इसे जलाने जा रहा हूँ”. यह कहते कहते तक्षक ने अपने विष-दंत उस वृक्ष में गाड़ दिए और देखते देखते पीपल का वह हरा भरा विशाल वृक्ष जल उठा और क्षणों बाद वहाँ बस काठ की तरह सूखा तना और सूखी सूखी शाखायें बचीं थीं. और अगले क्षण वह भी नहीं रहे, बस रख का एक ढेर था वहाँ!
“देखो तक्षक”, कश्यप ने कहा “अब मेरे ज्ञान की शक्ति भी देख लो”. कश्यप ने अपने मंत्र पढ़ने शुरू किए. एकाध क्षण में राख के उस ढेर से एक कोंपल निकली, उस में दो पत्ते लगे, वह अंकुर बढ़ने लगा और पीपल के विशाल तने का रूप ले लिया, तना से शाखायें फूटने लगीं और वह पीपल का हरा भरा विशाल वृक्ष फिर उनके सामने खड़ा था.
“यह उचित नही है कि आप मेरे विष के प्रभाव को निरस्त करते चलें”, तक्षक ने कहा “आप ऋषि हैं, आप की संपदा तपोधन है; आप किस धन की आशा में राजा को बचाना चाहते हैं? जिस भी पारितोषिक की आपने आशा कर रखी होगी वह मैं आप को देता हूँ, आप हस्तिनापुर नहीं जायें”.
तक्षक ने फिर कहा “और यह भी स्मरण रहे कि राजा को मैं एक ब्राह्मण के शाप के चलते डसने जा रहा हूँ. आप के मंत्र को बस मेरे विष के विरुद्ध ही नहीं, एक सत्यवादी ब्राह्मण के वचन के विरुद्ध भी काम करना पड़ेगा.”
कश्यप तब थोड़ी देर ध्यान मग्न हो कर बैठा और उसने योग शक्ति से देख लिया कि परीक्षित का जीवन काल बस इतना ही था और वह तक्षक से स्वर्ण आदि ले कर वापस लौट गया.
कश्यप को वापस लौटा कर तक्षक हस्तिनापुर पहुँचा और राजा के नये आवास को देख कर उस ने अपनी योजना बनाई. कुछ सर्पों को उस ने राजा के पास तपस्वियों के रूप में फल, कुश और जल आदि के साथ भेजा. राजा ने उनके ये उपहार स्वीकार किए और उनके लौटने के बाद अपने मंत्रियों को, जो उस नये घर में उस के साथ बैठे थे, तपस्वियों के दिए फल खाने के लिए आमंत्रित किया. अपने भाग्य और ऋषि-पुत्र के शाप के वशीभूत राजा ने वही फल उठाया जिस में तक्षक छिपा हुआ था. एक ग्रास काटने पर उस फल से एक छोटा कृमि निकलता दिखाई दिया. सूर्यास्त हो रहा था और परीक्षित अपने को अब सुरक्षित समझने लगा था. उस कृमि को अपनी गर्दन पर रखते उस ने कहा “सूर्यास्त के बाद मेरा सर्प-दंश या सर्प-विष का संकट अब टल गया है. यह कृमि अब तक्षक बन कर मुझे काट ले जिस से मेरे पाप-पूर्ण कृत्य का प्रायश्चित हो और ऋषि-पुत्र के वचन भी मिथ्या नहीं हों”
पर राजा की गर्दन पर आते ही अपने विशाल रूप में आ कर तक्षक ने राजा को अपने व्याल में बाँध लिया. तक्षक के विशाल रूप को देखते ही मंत्री गण भाग खड़े हुए. भागते भागते उन्हों ने तक्षक को आकाश मार्ग से निकलते देखा. सांझ के आधे अंधेरे आकाश में रुपहला तक्षक किसी विवाहिता की माँग में भरे सिंदूर की भाँति चमक रहा था. राजा का नया घर तक्षक के विष से धधक उठा था और उस की निर्जीव देह स्तंभ पर बने उस घर से किसी वज्र से मारे की तरह नीचे गिरी पड़ी थी.
पुरोहितों ने राजा की अंत्येष्टि की और सभी नागरिकों ने परीक्षित के पुत्र जनमेजय को, जो अभी वयस्क नहीं हुआ था, हस्तिनापुर का नया राजा बनाया.
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