Sunday, 26 April 2015

आदि पर्व (14): शकुंतला उपाख्यान (1)

अंशों के अवतरण के वर्णन दे कर वैशम्पायन ने भरत वंश का वर्णन किया.

भरत वंश का प्रवर्तक दुष्यंत(1) एक बहुत प्रतापी राजा था. पूरी पृथ्वी उस के अधीन थी, म्लेच्छ भी उस की संप्रभुता स्वीकार करते थे. एक दिन अपने अनुचरों और अपनी चतुरंगी सेना के साथ दुष्यंत वन में आखेट के लिए निकला हुआ था. बहुत सिंहों और बाघों को मारते हुए, एक वन से निकल कर दूसरे वन और फिर तीसरे वन में जाने के क्रम में वह एक ऐसे वन में पहुँच गया जहाँ सब वृक्ष फूलों से लदे थे,  नीचे घनी हरी घास बिछी हुई थी, पक्षियों का मनोहर कलरव हो था, और हर कुछ दूरी पर फल फूल से लदे कुंज थे. यह वन से अधिक उपवन लग रहा था, जहाँ पहुँच कर किसी का मन हर्षित हो जाए.

यह वन सिद्धों, गंधर्वों और अप्सराओं का क्रीड़ा स्थल था. यहाँ की हवा सदैव शीतल और सुगंधित रहती थी. इस मनोरम वन में तपस्वियों का एक विस्तृत आश्रम था. राजा ने बाहर से ही पवित्र अग्नि का नमन किया. आश्रम के निकट मालिनी नदी बह रही थी, जिस की स्वच्छ धारा में चकवे खेल रहे थे.  नदी के दोनो तटों पर किन्नरों के आवास थे जिनके बीच अनेक मृग चर रहे थे. इसी नदी के तट पर कभी कश्यप ऋषि का आश्रम हुआ करता था. अभी कश्यप के वंशज कण्व ऋषि वहाँ रहते थे. अपने अनुचरों और अपनी सेना को उस शांत वन के बाहर रोक कर राजा दुष्यंत अपने मंत्री और अपने पुरोहित के साथ कण्व ऋषि के उस पवित्र आश्रम के अंदर गया.
  
आश्रम ब्रह्म-क्षेत्र लग रहा था. कहीं मैने अपना कलरव कर रहे थे और कहीं वैदिक ऋचाओं का सस्वर उच्चारण हो रहा था. आश्रम में अनेक वेदज्ञ ब्राह्मण थे, उन्हे व्याकरण, न्याय, मीमांसा, ज्योतिष् आदि सभी शास्त्रों का पूरा ज्ञान था, और वे पशु पक्षियों की बोली भी समझ सकते थे. राजा ने आगे बढ़ने पर व्रती ब्राह्मणों को चारो वेदों को पढ़ते देखा / सुना. और आगे बढ़ने पर राजा ने ब्राह्मणों को जप और होम करते भी पाया. ब्राह्मणों ने भी राजा को देखा और उसे बैठने के लिए एक उत्तम आसन दिया. पर राजा जितना भी उस आश्रम को देखता था उसे और अधिक देखने की इच्छा होती थी और अंत में वह अपने मंत्री और पुरोहित के साथ कश्यप ऋषि की पुरानी कुटिया को देखने के लिए आश्रम के अंदर बने ऋषियों के कुटियों के बीच विचरण करने लगा.

कुछ और आगे बढ़ने पर उस ने अपने मंत्री और पुरोहित को भी छोड़ दिया. मंत्र-मुग्ध सा वह आश्रम के अंदर बिना किसी उद्देश्य के घूमता रहा. कण्व की कुटिया के पास जब उसे ऋषि नहीं दिखे तो उस ने कुछ ऊँचे स्वर में पूछा कोई हैं यहाँ?” पर उसे कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला, उस का प्रश्न उस शांत आश्रम में गूँजता रह गया.  कुछ समय बाद किसी तपस्वी की बेटी के भेष में श्री सदृश रूप लिए एक युवती निकली. उस ने दुष्यंत को पैर धोने के लिए जल दिया, बैठने के लिए आसन दिया और उस के कुशल क्षेम पूछे. राजा ने अपने आने का उद्देश्य बताया मैं महात्मा कण्व के दर्शन और उनके पूजन के लिए आया हूँ, कहाँ हैं वे?”
फल लाने के लिए वे आश्रम से बाहर निकले हुए हैंउस ने कहा.

राजा उस के अद्भुत सौंदर्य को निहार रहा था. उसकी स्मित मुस्कान, उसकी अनिन्द्य मुखाक्रिति, उस का तापसी सा तेज किंतु साथ में अप्सराओं से उस के अंग सौष्ठव, उस की विनम्रता, और उसका शील; यह सब देख राजा उसके बारे में जानने को बहुत उत्सुक हो गया. तुम कौन हो? किस की पुत्री हो तुम और वन में क्यों आई हो?” राजा से नहीं रहा गया और उस ने स्पष्ट कह दिया पहली दृष्टि से ही मेरा हृदय तुम पर आ गया है. मैं तुम्हारे बारे में सब कुछ जानना चाहता हूँ”.
राजन, मैं महात्मा कण्व की पुत्री हूँ
यह कैसे हो सकता है?” राजा ने कहा महात्मा कण्व ऊर्ध्वरेतस हैं. धर्मराज अपने पथ से च्युत हो सकते हैं किंतु कण्व नही. तुम कैसे उनकी पुत्री हो सकती हो? मेरे इस संशय को दूर करो”.
सुनिए, राजन, मैं अपने जन्म के विषय में जो कुछ जानती हूँ आप को सुनाती हूँउस ने कहा कभी कोई ऋषि यहाँ आए थे जिन्होने मेरे जन्म के विषय में पूछा था. उस समय महात्मा कण्व ने जो कहा था और जो मैने सुना था वह मैं आप को सुनाने जा रही हूँ.
कभी विश्वामित्र की कठोर तपस्या से इंद्र चिंतित हो उठा था कि कहीं ये ऋषि अपने तपोबल से मुझे स्वर्ग से नीचे नहीं गिरा दें. यह सब सोच उनकी तपस्या भंग करने के लिए इंद्र ने मेनका को  भेजना चाहा. मेनका नहीं जाना चाहती थी. वह जानती थी क़ि ऋषि को क्रोध आने में देर नहीं लगती और वह उनके तपोबल को भी जानती थी. उस ने इंद्र को याद दिलाया क़ि विश्वामित्र ने कभी रुष्ट हो वशिष्ट को अपने पुत्रों के असामयिक मृत्यु के कष्ट भोगने पर बाध्य कर दिया था, वह जन्म से क्षत्रिय था किंतु तप से वह ब्राह्मण बन सका था,  अपने स्नानदि के लिए उस ने इतनी गहरी नदी कौशीकी बना दी है जिसे पार करना भी आसान नहीं होता.
  
मेनका ने देवेन्द्र को मातंग मुनि की भी याद दिलाई. जब विश्वामित्र को एक शाप वश व्याध बन कर रहना पड़ा था तब मातंग ने ही विश्वामित्र की पत्नी का भरण पोषण किया था. शाप की अवधि पूरी होने पर विश्वामित्र ने पुरोहित बन कर मातंग के लिए यज्ञ कराया था जिस में, मेनका ने जोर दिया, इंद्र को ना चाहते हुए भी ऋषि के भय से सोम पान करने जाना पड़ा था. और तो और विश्वामित्र ने अपने रोष में दूसरी सृष्टि करने की भी ठान ली थी. नये ग्रह बना दिए थे और त्रिशंकु को भूमि पर गिरने से भी रोक रखा था. उस के पदाघात से पृथ्वी भी काँप जाती है. यह सब कहते हुए मेनका ने मना कर दिया.

तब इंद्र ने किसी भाँति मेनका को वायु के साथ जाने के लिए तैयार किया. वायु के साथ जब मेनका ऋषि के आश्रम में पहुँची तो उस ने ऋषि को आँखें बंद कर ध्यान मग्न पाया. दोनो रुके रहे और जब ऋषि ने आँखें खोलीं तो मेनका ने ऋषि के सामने अपने नृत्य आदि का प्रदर्शन किया. इसी समय वायु ने उसके वस्त्र उड़ा दिए. मेनका लज्जित हो अपने वस्त्रों के पीछे भागने का नाटक करने लगी पर वायु उन्हे ले कर अदृश्य हो गया. अब ऋषि निर्वसना मेनका को देख रहे थे.

उसके रूप-गुण देख ऋषि काम के वशीभूत हो गये और संकेतों में बता दिया कि वे उसका सान्निध्य चाहते हैं. मेनका सफल हुई; और ऋषि और अप्सरा एक दूसरे के साथ आनंद विनोद करते एक लंबा काल ऐसे बिता दिया जैसे वह बस एक दिन रहा हो. मेनका ने गर्भ धारण किया और समय आने पर इसी मालिनी के तट पर वह अपनी नवजात पुत्री को छोड़ चली.  वन में उस शिशु को अकेली देख, कहीं कोई हिंस्र जन्तु या कोई राक्षस उसे हानि ना पहुँचा दे, ऐसा सोच गिद्धों ने उस शिशु को घेर रखा था. कण्व जब मालिनी में स्नान करने गये थे तो पक्षियों से घिरी उस बालिका को वे उठा कर अपने आश्रम लेते आए. पक्षियों (शकुंत) ने उस की रक्षा की थी इस लिए कण्व ने उस का नाम शकुंतला रखा. कण्व ने उस आगंतुक ऋषि को अपने को शकुंतला का पिता बताया था क्योंकि शास्त्र कहते हैं की पिता तीन हो सकते हैं जन्म देने वाला, रक्षा करने वाला या पालन पोषण करने वाला.
मैं ही कण्व की पुत्री शकुंतला हूँ राजन”.

शकुंतला के जन्म का वृतांत सुन दुष्यंत ने बिना समय गँवाए उसे अपनी पत्नी बनने को कहा; प्रति दिन स्वर्णहार, वस्त्र, कर्णफूल, मोतियों की माला, भाँति भाँति के रत्न आदि देने की बात कही; और तो और अपना राज्य उसे देने लगा और तत्काल गंधर्व विवाह का प्रस्ताव रख दिया, यह कहते हुए कि सभी प्रकार के विवाहों में गंधर्व विवाह सबसे प्रथम आता है.

शकुंतला ने राजा को कुछ देर रुकने को कहा जिस से कण्व आ कर उसके हाथ राजा को सौंप सकें. पर दुष्यंत को तनिक भी विलंब नही सुहा रहा था. कोई भी व्यक्ति अपना मित्र तो होता ही है और अपने ऊपर निर्भर रह ही स्कता है. इस लिए तुम अपने आप को विवाह में निश्चित ही अर्पित कर सकती होदुष्यंत ने कहा. यह कह कर उस ने शास्त्रोक्त विवाह संस्कार का विस्तृत वर्णन किया.
शास्त्रों में आठ प्रकार(2) के विवाहों का वर्णन है:  ब्रह्म, दैव, अर्ष, प्रजपात्य, असुर, गंधर्व, राक्षस, और पैशाच. ब्रह्मा के पुत्र मनु ने वर्ण के क्रम से इनकी उपयुक्तता बताई है. पहले चार प्रकार के विवाह ब्राह्मणों के लिए उपयुक्त हैं, पहले छः क्षत्रियों के लिए;  राजाओं के लिए राक्षस विवाह भी मान्य है, असुर विवाह वैश्यों और शूद्रों के लिए मान्य है. पैशाच और असुर विवाह नहीं करने चाहिए, यही धर्म है. गंधर्व और राक्षस विवाह क्षत्रियों के लिए अनुकूल कहे गये हैं.
इस लिए शकुंतले”,  राजा ने कहा तुम कोई आशंका मन में मत रखो. हमारा गंधर्व या राक्षस विवाह या दोनो का मिला जुला रूप निस्संदेह संभव है और शास्त्र-सम्मत भी”. (3)
यह सुन शकुंतला तैयार हो गयी पर उसने शर्त रखी कि उस का पुत्र ही दुष्यंत का उत्तराधिकारी बनेगा.
राजा तैयार था. बिना सोचे उस ने कहा ऐसा ही होगा. और उसे अपनी राजधानी ले जाने का विश्वास दिलाते दिलाते दोनो एक दूसरे को पति-पत्नी के रूप में जान गये. चलते चलते दुष्यंत ने कहा था मैं तुम्हारे लिए अंग रक्षक भेजता हूँ, अपनी चतुरंगी सेना के साथ मैं तुम्हे अपनी राजधानी ले चलता हूँ”.
राजा के जाने के कुछ ही देर बाद कण्व वहाँ आए. लज्जा वश शकुंतला उनके स्वागत में बाहर नहीं निकली किंतु कण्व अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ जान गये थे. उन्होने इस की स्वीकृति भी दी. मेरी प्रतीक्षा किए बिना जो तुमने आज किया शकुंतले, उस से तुम्हारे धर्म की कोई क्षति नहीं हुई है. इच्छुक युगलों में बिना किसी हवन-मंत्र के किया गया गंधर्व विवाह सर्वथा शास्त्र सम्मत है. और दुष्यंत एक धार्मिक राजा है. उस अपना पति मान कर तुम ने बहुत अच्छा किया. तुम्हारा पुत्र बहुत पराक्रमी होगा और संपूर्ण विश्व पर राज करेगा
तब शकुंतला आगे बढ़ पाई और उस ने अपने क्लांत पिता के पैर धोए और दुष्यंत पर उनकी कृपादृष्टि माँगी.
"मैं तुम्हारे चलते उसे बहुत मानने लगा हूँ", कण्व ने कहा "किंतु फिर भी तुम जो चाहो मुझ से माँग लो".
पौरव राजाओं कोशकुंतला ने माँगा कभी अपना राज्य नहीं खोना पड़े”.



(1) राजा का नाम महाभारत के भिन्न पाठों में दुष्मंत और दुःषंत आया है. कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम में राजा का नाम दुष्यंत लिखा है और उस के बाद यही नाम प्रचलित है.
(2) आठ प्रकार के विवाहों के ऊपर महाभारत में मनुस्मृति का श्लोक 3.21 शब्दतः आया है:
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः
गांधार्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमः स्मृतः

(3) आठ प्रकार के विवाहों  के संक्षिप्त वर्णन:
ब्रह्म: वेदाध्ययन पूरा कर चुके लड़के के माता-पिता जब किसी योग्य लड़की के माता-पिता से विवाह का निवेदन कर विवाह सम्पन करते हैं तो वह ब्रह्म विवाह कहलाता है.
दैव: जब लड़की के माता-पिता किस वेदाध्ययन पूरा कर चुके लड़के के माता-पिता से निवेदन कर विवाह सम्पन करते हैं तो वह दैव विवाह होता है. (पहले में वर पक्ष ने पहल की है, दूसरे में वधू पक्ष ने)
अर्ष: अर्ष विवाह में वधू के माता-पिता को वर के माता-पिता दो गायें या एक गाय, एक बछड़ा और एक जोड़ा बैल देते हैं;  इसे वधू पक्ष का सम्मान माना जाता है, कन्या का मोल नहीं.
प्रजापात्य: यह ब्रह्म विवाह के समान है किंतु इस में लड़के के माता-पिता लड़के के वेदाध्ययन पूरा करने के पहले उस के लिए योग्य लड़की खोजते हैं, इस में वर और वधू दोनो अल्प्वयस्क रहते हैं
असुर: इस विवाह में लड़की मोल ली जाती है, स्‍पष्टतः इस के पीछे लड़के की अनुपयुक्तता रहती है. बहुधा अपेक्षाकृत नीचे के वर्ण / वंश का लड़का या उसके माता पिता लड़की के माता पिता को धन दे कर लड़की के हाथ लेते हैं
गंधर्व: इस विवाह में लड़का और लड़की आपसी प्रेम से एक दूसरे के हो जाते हैं
राक्षस: इस  विवाह में लड़का अपने लिए लड़की का अपहरण करता है (च्यवन की माता पुलोमा का एक राक्षस विवाह के लिए आपहरण कर रहा था जब च्यवन का जन्म हो गया था और उस का मुँह देख कर वह राक्षस जल गया था)
पैशाच: जब लड़का किसी लड़की को निद्रा में या बेसुधि में अपना बना लेता है तो यह पैशाच विवाह कहलाता है.

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