Sunday, 26 April 2015

आदि पर्व (15): शकुंतला उपाख्यान (2)

दुष्यंत ने जाते जाते कहा था कि वह शकुंतला की अगवानी में अपनी चतुरंगी सेना भेजेगा. किंतु उस के गये कोई दस वर्ष होने को आए और अभी तक उस ने कोई संदेश भी नहीं भिजवाए थे, इस बीच शकुंतला ने एक अगाध शक्तिवान पुत्र को जन्म दिया था जिस के अब छः वर्ष पूरे हो चुके थे.  कण्व ऋषि समय समय पर उस बालक के सभी शास्त्रोक्त संस्कार करते रहे थे.

उस बालक में अद्भुत शक्ति थी. वह वन्य पशुओं के साथ ही खेलता था, कभी किसी पर सवारी करता कभी किसी के पीछे कोई आखेटक बन कर दौड़ता. छः वर्ष की आयु में वह सिंह, बाघ और हाथियों को पकड़ कर आश्रम के वृक्षों से बाँध देता था. सभी जंतुओं को अपने अधीन कर सकने की उसकी क्षमता देख आश्रमवासियों ने उसका नाम सर्वदमन रख दिया था. कण्व ने भी उसे सभी जंतुओं को दबाते देखा था और अब उन्हे लगने लगा कि इस बालक के अपने पिता के उत्तराधिकारी रूप में घोषित किए जाने का समय आ गया है.
  
एक दिन अपने कुछ शिष्यों को बुला कर कण्व ने उन्हें शकुंतला और सर्वदमन को राजा दुष्यंत के पास, हस्तिनापुर, ले जाने के निर्देश दिए. “शकुंतला को उस के पुत्र के साथ उसके पति के पास ले जाओ. स्त्रियों को अपने माता-पिता के घरों में लंबे काल के लिए नहीं रहना चाहिए. ऐसा करने से उनकी प्रतिष्ठा, उनका आचरण और उनका धर्म, तीनों की क्षति होती है.”

माँ और पुत्र, दोनो पहली बार वन के बाहर जा रहे थे. शिष्यों के साथ वे हस्तिनापुर पहुँचे. दुष्यंत से उनके परिचय करा कर कण्व के शिष्य वापस लौट आए. अपने पुत्र के साथ शकुंतला आगे बढ़ी और राजा के यथोचित अभिवादन कर उस ने अपने साथ आए, उदित होते हुए सूर्य के समान तेजस्वी और मनोहर बालक का दुष्यंत के पुत्र के रूप में परिचय दिया. “राजन, यह तुम्हारा पुत्र है. देवताओं के समान शक्तिमान, तुम्हारे इस पुत्र को मैने महात्मा कण्व के आश्रम में जन्म दिया है. समय आ चला है जब तुम अपने वचन का पालन करो और हमारे इस पुत्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित करो.”

“मुझे कुछ भी ऐसा स्मरण नहीं है”, दुष्यंत ने कहा. “तुम कौन दुष्टा हो जो इस प्रकार तापसी भेष में घूम रही हो? धर्म, अर्थ या काम संबंधित मेरे कोई संबंध कभी तुम से नहीं रहे हैं. तुम्हारी जो इच्छा हो, करो; चाहो तो रहो या चाहो तो जाओ” 

ऐसा भी हो सकता है यह उस निर्दोष लड़की ने कभी सोचा भी नहीं था. राजा की बातें सुन कर दुःख और लज्जा से वह किसी काष्ठ स्तंभ की भाँति जड़ हो गयी. 

कुछ क्षणों में जब उस की चेतना लौटी तो उस की आँखें अंगारे के समान लाल थीं, उस के होंठ क्रोध से काँप रहे थे और ऐसा लग रहा था कि वह अपनी दृष्टि से राजा को भस्म कर देगी. किसी तरह अपने क्रोध और तपस्या से अर्जित अपनी अग्नि को शांत कर उस ने अपने आप को संयत किया. अपने विचारों को सॅंजो कर, दुःख और रोष से भरे हृदय से उस ने कहा “सब कुछ जानते हुए भी राजन, कैसे किसी नीच की तरह तुम कह सकते हो कि तुम कुछ नहीं जानते? तुम्हारा हृदय जानता है कि मैं सत्य कह रही हूँ या असत्य. जो अपने वास्तविक रूप को छुपा कर कुछ और दिखाता है वह अपनी चोरी स्वयं करता है. वह कोई भी नीच कर्म कर सकता है. तुम सोच रहे कि बस तुम्ही जानते हो तुमने क्या किया था, पर राजन, तुम उस सर्वज्ञ, अंतर्यामी को भूल रहे हो.
 
“जो पाप करता है वह अक्सर सोचता है उसे कोई नहीं देख रहा है, किंतु उसे देवता देखते हैं और उसे नारायण भी देखते हैं, जो सबों के हृदय में वास करते हैं. सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल, हृदय, यम, दिन, रात्रि, संध्या और धर्म ये सब मनुष्यों के प्रत्येक कर्म के साक्षी रहते हैं. किसी ऐसे कर्म को, जिस से नारायण प्रसन्न रहते हैं, सूर्य पुत्र यम सदैव अनदेखा कर देता है किंतु जिन कर्मों से नारायण अप्रसन्न रहते हैं, यम उन के यथोचित दंड देने से कभी नहीं चूकता.

“मैं अपने पति के प्रति समर्पित पत्नी हूँ. यह सच है कि यहाँ मैं अपनी इच्छा से आई हूँ, तुम ने मुझे बुलाया नहीं है.  किंतु इस के चलते तुम मेरा तिरस्कार नहीं कर सकते. मैं तुम्हारी पत्नी हूँ और तुम से सम्मान पाना मेरा अधिकार है. मैं कोई साधारण स्त्री नहीं हूँ;  तुम्हारी पत्नी हूँ मैं, तुम्हारे पुत्र को जन्म दिया है मैने. और याद रखो, जो मैं कहती हूँ वह तुम ने नहीं किया तो तुम्हारे मस्तक के सौ टुकड़े हो जाएँगे.

“पति ही पत्नी के गर्भ में प्रवेश करता है और पति का ही रूप उस गर्भ से फिर पुत्र बन कर निकलता है. पुत्र के जन्म के बाद वेदज्ञ पति अपनी पत्नी को जाया (जिस ने उन्हे जन्म दिया) कहते हैं. और जो पुत्र इस तरह उत्पन्न होता है वह अपने पूर्वजों की आत्माओं का उद्धार करता है. वह उन्हे “पुत” नामक नरक से बचाता है इसी लिए स्वयम्भू ने उसे “पुत्र” (पुत से तारने वाला) कहा है.

“भार्या वही है जो पुत्र जने, भार्या वही है जिसका हृदय सदैव उस के स्वामी से अनुरक्त रहे और जो अपने पति को छोड़ किसी को नहीं जाने. भार्या से बढ़ कर कोई मित्र नहीं होता. धर्म, अर्थ और काम के मूल में तो भार्या है ही, साथ में मोक्ष के मूल में भी  भार्या ही है. आनंद के समय पत्नियाँ अन्यतम मित्र होतीं हैं, धार्मिक कृत्यों के समय वे पिता सदृश होती हैं और रोग-कष्ट में वे माता के सदृश होती हैं. 

“अनुरक्त पत्नियाँ यमलोक में भी अपने पतियों का साथ देती हैं. पत्नी यदि वहाँ पहले पहुँचती है तो वह अपने पति की प्रतीक्षा करती है; यदि पति पहले पहुँच जाता है तो समर्पित पत्नी शीघ्र उस के पीछे पीछे चली आती है.  विवाह का कारण यही है. पति अपनी पत्नी का साहचर्य इस लोक और परलोक दोनो जगह पाता है.

"किसी पुरुष को क्रोध में भी कभी ऐसा कुछ नही करना चाहिए जो उस की पत्नी को अच्छा नहीं लगे; पुरुष के आनंद और धर्म पत्नी पर ही निर्भर करते हैं. पत्नी ही वह पवित्र क्षेत्र हैं जहाँ से पति पुनः जन्म लेता है. ऋषि भी बिना स्त्रियों के जीवन नही रच सकते.  सब जानते हैं कि जब उस का धूलि-धूसरित पुत्र उस के पैरों से लिपट जाए तो पिता को अतुलनीय सुख और आनंद  मिलता है . और तुम अपने इस पुत्र की ओर देख भी नहीं रहे हो; अपने पुत्र को, जो तुम्हारे घुटनों पर चढ़ने के लिए लालायित है. चींटियाँ भी अपने अंडों का नाश नहीं होने देतीं और तुम अपने को धार्मिक बताते हो पर अपने पुत्र का पोषण करने से पीछे भाग रहे हो.

पुत्र के स्पर्श से बढ़ कर संसार में कोई स्पर्श सुख नहीं है – न चंदन, ना कामिनी न ही शीतल जल. यह पुत्र मेरे गर्भ में तीन वर्ष रहा है; इस के जन्म के समय आकाशवाणी हुई थी “यह सौ अश्वमेध यज्ञ करेगा”.  तुम्हारे सभी दुःखों का हरने के लिए मैं इसे यहाँ लाई हूँ. याद करो राजन, पुत्र के जात कर्म संस्कार (1) में ब्राह्मणों द्वारा उच्चारित मंत्रों के क्या अभप्राय होते हैं. “तुम ने पुत्र, मेरे शरीर से जन्म लिया है. तुम मेरे हृदय से निकले हो. पुत्र के रूप में मैं ही हूँ….”

"यह बालक  तुम्हारे शरीर से निकला है. यह तुम्ही हो. इस में तुम अपने आप को देखो जैसे किसी निर्मल जलाशय में देखते हो. जैसे यज्ञ की अग्नि घर की अग्नि से जलाई जाती है वैसे ही यह तुम से निकला है. तुम्ही ने अपने दो अंश किए हैं. मृग के आखेट के क्रम में तुम मेरे पिता के आश्रम में मुझ से मिले थे. उर्वशी, पूर्वचत्ति, सहजन्या, मेनका, विश्वाची और घृताची ये छः ही सब अप्सराओं में अग्रणी हैं. इन में भी ब्राह्मण-पुत्री मेनका प्रथम है. उसी मेनका ने मुझे, विश्वामित्र की पुत्री को जन्म दिया था. पता नहीं मैने कैसे पाप कर रखे हैं कि जन्म लेने पर माता ने मुझे त्याग दिया और अब तुम मुझे नहीं स्वीकार रहे हो.  मैं अपने पिता के पास जाने को तैयार हूँ पर अपने पुत्र को तुम्हे अवश्य रखना चाहिए.

यह सुन कर दुष्यंत ने कहा “मैं नही जानता कि कभी मैने तुम से यह पुत्र उत्पन्न किया है. वैसे भी स्त्रियाँ मिथ्या वादन करती हैं. तुम्हारी बातें विश्वास के योग्य नहीं हैं. तुम्ही कह रही हो कि ममता-हीन, आचार भ्रष्ट मेनका तुम्हारी माता है जिस ने तुम्हे हिमवत पर वैसे ही फेंक दिया था जैसे लोग पूजा के बाद पुष्पों को फेंक देते हैं. कामुक विश्वामित्र में, जो ब्राह्मण बन जाने की लालसा रखता था, भी कोई संतान-स्नेह नहीं दिख रहा है. फिर भी यह तो सत्य है कि मेनका अप्सराओं में और विश्वामित्र ऋषियों में अग्रणी है. उनकी पुत्री हो कर तुम किसी चरित्रहीन स्त्री की तरह क्यों बातें कर रही हो?  ऐसी बातें करते तुम्हे तनिक भी लज्जा नहीं आई? और वह भी मेरे सामने? तुम तपस्विनी के भेष में दुष्टा हो. 

“कहाँ वे महान ऋषि और कहाँ मेनका! और तुम; एक नीच स्त्री, तुम तापसी के भेष में क्यों हो? तुम्हारा यह पुत्र भी तुम जितनी इसकी आयु बताती हो उस से बहुत बड़ा लगता है; तुम कहती हो यह बालक है फिर यह किसी साल वृक्ष के कोंपल की तरह कैसे बढ़ गया है. तुम नीच स्त्री हो और एक भ्रष्टा की तरह बातें करती हो.  तुम जो कुछ कह रही हो वह मेरी समझ के परे है. जहाँ जाना चाहो तुम चली जाओ”.

“दूसरों के तिल के बराबर दोष भी तुम्हे दिख जाते हैं राजन”,  शकुंतला ने यह सुन कर कहा “किंतु बेल से बड़ा अपना दोष तुम्हे नहीं दिखता. मेनका देव लोक की है और इस तरह मेरा जन्म, राजन, तुम्हारे जन्म से उच्चतर है. तुम धरती पर चलते हो मैं वायु में उड़ सकती हूँ. हम दोनो में उतना ही अंतर है जितना मेरु पर्वत और सरसों के एक दाने में. मैं चाहूं तो इंद्र, कुबेर, यम और वरुण के लोकों में चली जाऊं. यह सब मैं बस उदाहरण के लिए कह रही हूँ, किसी दुर्भाव से नहीं. तुम ने सुना इस के लिए मैं क्षमा चाहती हूँ.

“जिस तरह कोई सूकर किसी उपवन में भी बस कीचड़ ही खोजता है वैसे ही दुष्ट किसी के कथन के अशुभ अंशों को ही अपने ध्यान में रख पाते हैं. हंस की तरह नीर-क्षीर अलग कर किसी की बात से शुभ को रख अशुभ को त्यागने की न उनमें क्षमता रहती हैं न उनकी ऐसी प्रवृत्ति ही रहती है.  जैसे धर्मनिष्ठ किसी की निंदा करना कष्टदायक समझते हैं वैसे ही दुष्ट दूसरों की निंदा करने में आनंद पाते हैं. और इस से बड़ी विडंबना क्या हो सकती है, राजन, कि दुष्ट ही सत्यनिष्ठों को दुष्ट बताते चलें.

“जो अपने पुत्र को स्वीकार कर सम्मान नहीं देता वह अपनी इच्छायें पूरी नहीं कर सकता, देव उसका भाग्य छीन लेते हैं. पितृ कहते हैं कि पुत्र ही वंश चलाता है और वह सभी धार्मिक कृत्यों से बढ़ कर है. मनु ने पाँच प्रकार के पुत्र बताए हैं: जो अपनी पत्नी से उत्पन्न किया गया हो, जिसे किसी ने दे दिया हो, जिसे धन दे कर खरीदा गया हो,  जिसे लाड़ से पाला गया हो और जिसे पत्नी को छोड़ अन्य किसी स्त्री से उत्पन्न किया गया हो. पुत्र अपने पिता के धर्म और उन की उपलब्धियों को संबल देते हैं, उनके आनंद को बढ़ाते हैं  और पूर्वजों को नरक से बचाते हैं. 

“राजन, आप अपने आप को संजोइए और अपने पुत्र को संजोइए. एक जलाशय बनवाना सौ कुएँ खुदवाने से अधिक पुण्य देता है. एक पुत्र किसी यज्ञ से बढ़ कर  है और सत्य सौ पुत्रों से भी बढ़ कर है. कभी सत्य और एक सौ अश्वमेध यज्ञों को तौला गया था और सत्य गुरुतर पाया गया था. सत्य वेदों के अध्ययन से और समस्त तीर्थों में स्नान के समतुल्य है. सत्य के बारबर कोई पुण्य नहीं है, सत्य से बढ़ कर कुछ भी नहीं है. सत्य ही ईश्वर है.  इस लिए, राजन, अपने वचन को मत झुठलाओ. अपने आप को सत्य से जोड़ो यदि तुम्हे मुझ पर विश्वास नहीं है तो मैं अभी चली जाती हूँ, तुम्हारे साथ नही रहना ही अच्छा है. लेकिन राजन, याद रखना तुम्हारे बाद हमारा यही लड़का पृथ्वी पर राज करेगा.”

दुष्यंत को सब सुना कर शकुंतला उस की सभा से निकल पड़ी. पर उस के निकलते ही आकाशवाणी हुई, “माँ के गर्भ से निकला पुत्र वास्तव में पिता का ही रूप है. इस लिए दुष्यंत, अपने पुत्र को अपना प्यार दो और शकुंतला का तिरस्कार मत करो. पुत्र ही यमलोक में पूर्वजों की रक्षा करता है. तुम्ही इस बालक के जनक हो. शकुंतला ने सब कुछ सत्य कहा है. पिता ही अपने दो रूप कर अपनी पत्नी के गर्भ से पुत्र रूप में निकलता है. अपने पुत्र को छोड़ने से बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है? यह वाणी सुन कर तुम इसे सॅंजो कर रखोगे (संजोने योग्य या उठाने योग्य: भरतव्यः) इस लिए आज से इसका नाम भरत रखो.”

आकाशवाणी सुन दुष्यंत अति प्रसन्न हो उठा. अपने सभासदों से उस ने कहा “सुनी आपने वह दिव्य वाणी? मैं जानता था यह मेरा पुत्र है किंतु यदि मैं उसे शकुंतला की बात पर स्वीकार कर लेता तो तरह तरह की बातें उड़तीं और मेरे पुत्र की वैधता पर भी प्रश्न चिह्न लगे रहते.”

वैशम्पायन ने कहा “आकाशवाणी से पुत्र की शुद्धता स्थापित हो जाने के बाद दुष्यंत ने अपने पुत्र का सिर सूंघ उसे अपने हृदय से लगा लिया. ब्राह्मणों ने आशीष दिए. राजा ने अपनी पत्नी को शांत करने के प्रयास किए, “देवी, हमारा मिलन एकांत में हुआ था, तुम्हारी शुद्धता भी मैं इस दिव्य वाणी से स्थापित कराना चाहता था. लोग कह सकते थे कि मैं ने कामांध हो तुम से संबंध किए थे तुम्हे पत्नी बना कर नहीं. और तुम ने जो कुछ मेरे बारे में कहा मैं ने क्षमा कर दिया है.”  राजा ने उसी दिन अपने पुत्र को भरत नाम दिया और उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया

समय आने पर भरत चक्रवर्ती बना और सार्वभौम कहलाया. उस ने अनेक यज्ञ किए और ब्राह्मणों को बहुत दान दिए.  उस के अश्वमेध यज्ञ में कण्व पुरोहित थे जिन्हे भरत ने एक सहस्त्र स्वर्ण मुद्रायें दी थीं.”

भरत वंश के कुमारों के जन्म और उनके कर्मों की कथा को व्यास ने भारत नाम से लिखा जो महाभारत के नाम से विख्यात है.



(1) जात कर्म संस्कार हिंदुओं के सोलह संस्कारों में चौथा है जो शिशु के जन्म के तुरंत बाद संपन्न किया जाता है. स्वर्ण पात्र में विषम मात्रा में गाय का घी और शहद मिला कर शिशु को चटाया जाता है. उस समय जो मंत्र पढ़े जाते हैं उन्ही का वर्णन यहाँ शकुंतला दे रही है. जात कर्म के बाद ही शिशु को माता द्वारा स्तन पान कराए जाने का विधान है. 

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