शौनक के पूछने पर सौति ने कद्रू
के पुत्रों केनाम बताए. “सभी सर्पों का नाम गिनाना उबाऊ हो जाएगा”कहतेहुए
उस ने बस प्रमुख सर्पों के नाम गिनाए.
“सर्पों में ज्येष्ठ शेष (अन्य नाम अनंत) था, उसके बाद वासुकी. उनके बाद हुए ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालीय, मणि, पूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनिल, कल्माष, शबल, आर्यक, आदि, शलपोतक, सुमनमुख, दधिमुख, विमलपिंडक, आप्त, कोटनक, शंख, वालशिख, निष्ठ्यूनक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, वाहयकर्ण, हस्तिपद, मुदगरपिंडक, कंबल, अश्वतर, कालीयक
“वृत्त, सम्वर्तक, पद्मावती, श्रुति, शंखनक, स्फन्डक, क्षेमक, पिन्डारक, करवीर, पुष्पदन्ष्ट्र, बिल्वपान्डुक, मूषकाद, शंखशिर, पूर्णदन्ष्ट्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, वीरज, सुबाहु, शालिपिन्ड, हस्तिभद्र, पिठरक, कौरव, धृतराष्ट्र्, पुष्कर,शल्यक, कोणवासन, कुंजर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्रि, हालिक, कर्कर, अकर्कर, कुंदोदार, महोदर.
“ये प्रमुख सर्पों के नाम हैं”, सौति ने कहा, “सबों के नाम नहीं गिनाए जा सकते. इनके पुत्र, पौत्र अब असंख्य हो गये हैं.”
(शेष, वासुकी और तक्षक के नाम कई कथाओं में आते हैं. कर्कोटक नल-दमयंती की कथा में आया है – उसी के विष की जलन ने नल के शरीर से कलि को निकलने पर बाध्य किया था. यमुना तट पर कालीय का मर्दन कर श्री कृष्ण ने उसे अमर कर दिया है और युरोपियन मिथकों में वर्णित बसिलिस्क में कुछ को शायद वालशिख की झाँकी देखने को मिल सकती है.
सर्पों के नाम भिन्न भिन्न पाठों में अलग अलगहैं. ये नाम बोरी पाठ से लिए गये हैं.)
“तुम ने कहा था सौति, कि सर्प बहुत बलशाली होते थे” शौनक ने पूछा “कद्रू का शाप सुन कर उन्होने क्या किया?”
सौति ने कहा “ज्येष्ठ सर्प शेष ने अपनी माता को छोड़ कठोर तप करने शुरू किए. गंधमादन, बदरी, गोकर्ण, पुष्कर आदि पवित्र स्थलों पर जा कर, बस वायु पर जीवित रहते हुए उस ने अपना जीवन तपस्या में लगा दिया. उस की तपश्चर्या से प्रभावित हो पितामह ब्रह्मा ने उसे दर्शन दिया और पूछा “शेष, तुम अपने कठोर तप से सृष्टि के अन्य जीवों को भी अब कष्ट पहुँचा रहे हो. बताओ पुत्र, तुम चाहते क्या हो?”
“मेरे भाई बंधु दुष्ट प्रकृति के हैं. वे विनता को कष्ट देने में आनंद पाते हैं. विनता का पुत्र गरुड़ भी हमारा भाई ही है पर वे उस की शक्ति से जलते रहते हैं. मैं अपने भाइयों के साथ नहीं रहना चाहता. यदि आप प्रसन्न हैं प्रभु, तो मेरी यह इच्छा पूरी कर दीजिए”, शेष ने कहा, “तपस्या करने का मेरा एक मात्र उद्देश्य है इस जीवन को त्याग अपने भाइयों से दूर हो जाना”.
शेष की धार्मिक प्रवृत्ति से ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हुआ और उस ने उसे कोई वर देना चाहा. किंतु वर में शेष ने यही माँगा कि उसका हृदय सदैव धर्म और तपस्या में लगा रहे. उसके आत्म-त्याग और उसकी शांति-प्रियता से ब्रह्मा और अधिक प्रसन्न हुआ; और उस ने शेष को पृथ्वी का भार संभालने का दायित्व सौंप दिया. पृथ्वी ने शेष के जाने के लिए एक दरार दे दी और उस से चलते चलते नीचे जा कर शेष ने पृथ्वी को अपने फण पर उठा लिया. ब्रह्मा ने विनता के पुत्र सुपर्ण को भी शेष की सहायता में नियुक्त कर दिया.
ज्येष्ठ सर्प शेष के चले जाने पर वासुकी सर्पों का राजा बना. वासुकी को अपनी माता द्वारा दिए गये शाप की बहुत चिंता रहती थी और वहअन्य सर्पों के साथ मिल कर उस से बचने के उपाय खोजता रहता था. शाप को निरस्त करने के लिए उस ने ऐरावत और अन्य वरीय सर्पों की एक सभा बुलाई.
“तुम सब हमारे शाप के विषय को जानते हो”, वासुकी ने सभा को सम्बोधित किया. किसी भी तरह हमें इस शाप को निरस्त करना है. सभी शापोंसे बचने के उपचार होते हैं पर कहा जाता है कि अपनी माँ से मिले शाप का कोई प्रतिकार नहीं होता. यदि ऐसा है तो हमारा नाश अवश्यंभावी है. किंतु अंतिम क्षण तक हमें अपने बचाव की चेष्टा करनी है. तुम सभी बुद्धिमान और विवेकी प्राणी हो, आपस में सलाह कर हम अपनी मुक्ति का मार्ग उसी तरह खोज लेंगे जैसे देवताओं ने मिल कर कभी गुफा में छुपे अग्नि को खोज निकाला था”.
कद्रू के पुत्रों ने अपने अपने विचार सभा में रखे. कुछ के विचार से सर्पों को श्रेष्ठ ब्राह्मणों के रूप धारण कर यज्ञ को अनुचित बताते हुए इसे रुकवा देना चाहिए. कुछ का कहना था कि वरीय सर्प किसी तरह जनमेजय के प्रिय सलाहकार बन इस यज्ञ को नहीं होने दें. कुछ सर्प पुरोहित और रित्विजों को सर्प-दंश से मार कर उस यज्ञ को रोकना चाहते थे. कुछ का प्रस्ताव था कि उन सभी को डस कर मार दिया जाए जो सर्प-यज्ञ के विधान / कर्मकांड से भिज्ञ हों – ना रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी. पर ये प्रस्ताव धार्मिक सर्पों को स्वीकार्य नहीं थे क्यों कि इन में ब्राह्मणों को मारना पड़ता.
अब सभा कुछ उछ्रिंखल हो चली और एक से एक विलक्षण प्रस्ताव आने लगे – यज्ञ की खाद्य सामग्रियों को विष्ठा कर दूषित कर दिया जाए, रूप बदल कर राजा के रित्विज बन इतनी दक्षिणा माँगी जाए कि राजा दे ही नही सके और यज्ञ का आरंभ ही नहीं हो, इतने व्यक्तियों को डस कर मार दिया जाए कि संत्रस्त हो सब हमारी पूजा करने लगें, राजा जब भी जल क्रीड़ा के लिए जलाशय आदि में उतरे उसे पकड़ कर नागलोक में बंदी बना लिया जाए, राजा को डस कर यज्ञ की आशंका का समूल नाश कर दिया जाए...
यह सब बोल कर सभी सर्प उत्सुक दृष्टि से वासुकी को देखने लगे. किंतु वासुकी ने किसी प्रस्ताव को विचार करने योग्य नहीं समझा. “मुझे लगता है अपने पिता कश्यप की कृपा से ही अब हमारा उद्धार हो सकता है”, वासुकी ने कहा.
सब की बातें सुन कर एलापत्र ने अपनी बात कही “इस यज्ञ को रोकना संभव नहीं है. जनमेजय को उस के निश्चय से डिगाना भी संभव नहीं है. जो प्रारब्ध के मारे रहते हैं उनकी मुक्ति भी प्रारब्ध से ही आती है. जब वह शाप दिया जा रहा था उस समय मैं भय से अपनी माँ की गोद में दुबक गया था. और राजन (वासुकी), वहीं से मैं ने ब्रह्मा के वचन सुने थे. देवताओं के पूछने पर कि कद्रू के इस क्रूर शाप को उन्हों ने क्यों नहीं रोका, पितामह ने कहा था कि सर्पों की संख्या बहुत अधिक हो गयी है और वे अब निर्दोष को भी काटते चलते हैं. विश्व का कल्याण इसी में है कि सर्पों की संख्या घटे.
“ब्रह्मा ने यह भी कहा था कि जब समय आएगा तब जरत्कारु नाम के एक यायावर ऋषि का पुत्र इस यज्ञ को पूरा नहीं होने देगा. जरत्कारु का यह पुत्र उसी नाम की एक सर्पिणी से उत्पन्न होगा जो सर्प-राज वासुकी की बहन है”
उसी समय से वासुकी जरत्कारु की खोज में लग गया था. यायावर ऋषि से उसकी बहन के विवाह और उनके पुत्र आस्तीक के जन्म का विवरण आ चुका है. इस सभा के कुछ समय बाद समुद्र मंथन हुआ था जिस में वासुकी ने मथानी की रज्जु की भूमिका निभाई थी. मंथन के बाद उस ने देवताओं को अपने भय बताया था. देवताओं ने ब्रह्मा से उसे बचाने की प्रार्थना भी की थी. ब्रह्मा ने फिर वही कहा था "सर्पराज जानता है उसे क्या करना है, एलपात्र ने जो कुछ कहा है वह सत्य कहा है. यज्ञ में दुष्ट और नीच सर्पों का नाश होना है, श्रेष्ठ सर्प उस के प्रकोप से बच जाएँगे".
“सर्पों में ज्येष्ठ शेष (अन्य नाम अनंत) था, उसके बाद वासुकी. उनके बाद हुए ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालीय, मणि, पूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनिल, कल्माष, शबल, आर्यक, आदि, शलपोतक, सुमनमुख, दधिमुख, विमलपिंडक, आप्त, कोटनक, शंख, वालशिख, निष्ठ्यूनक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, वाहयकर्ण, हस्तिपद, मुदगरपिंडक, कंबल, अश्वतर, कालीयक
“वृत्त, सम्वर्तक, पद्मावती, श्रुति, शंखनक, स्फन्डक, क्षेमक, पिन्डारक, करवीर, पुष्पदन्ष्ट्र, बिल्वपान्डुक, मूषकाद, शंखशिर, पूर्णदन्ष्ट्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, वीरज, सुबाहु, शालिपिन्ड, हस्तिभद्र, पिठरक, कौरव, धृतराष्ट्र्, पुष्कर,शल्यक, कोणवासन, कुंजर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्रि, हालिक, कर्कर, अकर्कर, कुंदोदार, महोदर.
“ये प्रमुख सर्पों के नाम हैं”, सौति ने कहा, “सबों के नाम नहीं गिनाए जा सकते. इनके पुत्र, पौत्र अब असंख्य हो गये हैं.”
(शेष, वासुकी और तक्षक के नाम कई कथाओं में आते हैं. कर्कोटक नल-दमयंती की कथा में आया है – उसी के विष की जलन ने नल के शरीर से कलि को निकलने पर बाध्य किया था. यमुना तट पर कालीय का मर्दन कर श्री कृष्ण ने उसे अमर कर दिया है और युरोपियन मिथकों में वर्णित बसिलिस्क में कुछ को शायद वालशिख की झाँकी देखने को मिल सकती है.
सर्पों के नाम भिन्न भिन्न पाठों में अलग अलगहैं. ये नाम बोरी पाठ से लिए गये हैं.)
“तुम ने कहा था सौति, कि सर्प बहुत बलशाली होते थे” शौनक ने पूछा “कद्रू का शाप सुन कर उन्होने क्या किया?”
सौति ने कहा “ज्येष्ठ सर्प शेष ने अपनी माता को छोड़ कठोर तप करने शुरू किए. गंधमादन, बदरी, गोकर्ण, पुष्कर आदि पवित्र स्थलों पर जा कर, बस वायु पर जीवित रहते हुए उस ने अपना जीवन तपस्या में लगा दिया. उस की तपश्चर्या से प्रभावित हो पितामह ब्रह्मा ने उसे दर्शन दिया और पूछा “शेष, तुम अपने कठोर तप से सृष्टि के अन्य जीवों को भी अब कष्ट पहुँचा रहे हो. बताओ पुत्र, तुम चाहते क्या हो?”
“मेरे भाई बंधु दुष्ट प्रकृति के हैं. वे विनता को कष्ट देने में आनंद पाते हैं. विनता का पुत्र गरुड़ भी हमारा भाई ही है पर वे उस की शक्ति से जलते रहते हैं. मैं अपने भाइयों के साथ नहीं रहना चाहता. यदि आप प्रसन्न हैं प्रभु, तो मेरी यह इच्छा पूरी कर दीजिए”, शेष ने कहा, “तपस्या करने का मेरा एक मात्र उद्देश्य है इस जीवन को त्याग अपने भाइयों से दूर हो जाना”.
शेष की धार्मिक प्रवृत्ति से ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हुआ और उस ने उसे कोई वर देना चाहा. किंतु वर में शेष ने यही माँगा कि उसका हृदय सदैव धर्म और तपस्या में लगा रहे. उसके आत्म-त्याग और उसकी शांति-प्रियता से ब्रह्मा और अधिक प्रसन्न हुआ; और उस ने शेष को पृथ्वी का भार संभालने का दायित्व सौंप दिया. पृथ्वी ने शेष के जाने के लिए एक दरार दे दी और उस से चलते चलते नीचे जा कर शेष ने पृथ्वी को अपने फण पर उठा लिया. ब्रह्मा ने विनता के पुत्र सुपर्ण को भी शेष की सहायता में नियुक्त कर दिया.
ज्येष्ठ सर्प शेष के चले जाने पर वासुकी सर्पों का राजा बना. वासुकी को अपनी माता द्वारा दिए गये शाप की बहुत चिंता रहती थी और वहअन्य सर्पों के साथ मिल कर उस से बचने के उपाय खोजता रहता था. शाप को निरस्त करने के लिए उस ने ऐरावत और अन्य वरीय सर्पों की एक सभा बुलाई.
“तुम सब हमारे शाप के विषय को जानते हो”, वासुकी ने सभा को सम्बोधित किया. किसी भी तरह हमें इस शाप को निरस्त करना है. सभी शापोंसे बचने के उपचार होते हैं पर कहा जाता है कि अपनी माँ से मिले शाप का कोई प्रतिकार नहीं होता. यदि ऐसा है तो हमारा नाश अवश्यंभावी है. किंतु अंतिम क्षण तक हमें अपने बचाव की चेष्टा करनी है. तुम सभी बुद्धिमान और विवेकी प्राणी हो, आपस में सलाह कर हम अपनी मुक्ति का मार्ग उसी तरह खोज लेंगे जैसे देवताओं ने मिल कर कभी गुफा में छुपे अग्नि को खोज निकाला था”.
कद्रू के पुत्रों ने अपने अपने विचार सभा में रखे. कुछ के विचार से सर्पों को श्रेष्ठ ब्राह्मणों के रूप धारण कर यज्ञ को अनुचित बताते हुए इसे रुकवा देना चाहिए. कुछ का कहना था कि वरीय सर्प किसी तरह जनमेजय के प्रिय सलाहकार बन इस यज्ञ को नहीं होने दें. कुछ सर्प पुरोहित और रित्विजों को सर्प-दंश से मार कर उस यज्ञ को रोकना चाहते थे. कुछ का प्रस्ताव था कि उन सभी को डस कर मार दिया जाए जो सर्प-यज्ञ के विधान / कर्मकांड से भिज्ञ हों – ना रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी. पर ये प्रस्ताव धार्मिक सर्पों को स्वीकार्य नहीं थे क्यों कि इन में ब्राह्मणों को मारना पड़ता.
अब सभा कुछ उछ्रिंखल हो चली और एक से एक विलक्षण प्रस्ताव आने लगे – यज्ञ की खाद्य सामग्रियों को विष्ठा कर दूषित कर दिया जाए, रूप बदल कर राजा के रित्विज बन इतनी दक्षिणा माँगी जाए कि राजा दे ही नही सके और यज्ञ का आरंभ ही नहीं हो, इतने व्यक्तियों को डस कर मार दिया जाए कि संत्रस्त हो सब हमारी पूजा करने लगें, राजा जब भी जल क्रीड़ा के लिए जलाशय आदि में उतरे उसे पकड़ कर नागलोक में बंदी बना लिया जाए, राजा को डस कर यज्ञ की आशंका का समूल नाश कर दिया जाए...
यह सब बोल कर सभी सर्प उत्सुक दृष्टि से वासुकी को देखने लगे. किंतु वासुकी ने किसी प्रस्ताव को विचार करने योग्य नहीं समझा. “मुझे लगता है अपने पिता कश्यप की कृपा से ही अब हमारा उद्धार हो सकता है”, वासुकी ने कहा.
सब की बातें सुन कर एलापत्र ने अपनी बात कही “इस यज्ञ को रोकना संभव नहीं है. जनमेजय को उस के निश्चय से डिगाना भी संभव नहीं है. जो प्रारब्ध के मारे रहते हैं उनकी मुक्ति भी प्रारब्ध से ही आती है. जब वह शाप दिया जा रहा था उस समय मैं भय से अपनी माँ की गोद में दुबक गया था. और राजन (वासुकी), वहीं से मैं ने ब्रह्मा के वचन सुने थे. देवताओं के पूछने पर कि कद्रू के इस क्रूर शाप को उन्हों ने क्यों नहीं रोका, पितामह ने कहा था कि सर्पों की संख्या बहुत अधिक हो गयी है और वे अब निर्दोष को भी काटते चलते हैं. विश्व का कल्याण इसी में है कि सर्पों की संख्या घटे.
“ब्रह्मा ने यह भी कहा था कि जब समय आएगा तब जरत्कारु नाम के एक यायावर ऋषि का पुत्र इस यज्ञ को पूरा नहीं होने देगा. जरत्कारु का यह पुत्र उसी नाम की एक सर्पिणी से उत्पन्न होगा जो सर्प-राज वासुकी की बहन है”
उसी समय से वासुकी जरत्कारु की खोज में लग गया था. यायावर ऋषि से उसकी बहन के विवाह और उनके पुत्र आस्तीक के जन्म का विवरण आ चुका है. इस सभा के कुछ समय बाद समुद्र मंथन हुआ था जिस में वासुकी ने मथानी की रज्जु की भूमिका निभाई थी. मंथन के बाद उस ने देवताओं को अपने भय बताया था. देवताओं ने ब्रह्मा से उसे बचाने की प्रार्थना भी की थी. ब्रह्मा ने फिर वही कहा था "सर्पराज जानता है उसे क्या करना है, एलपात्र ने जो कुछ कहा है वह सत्य कहा है. यज्ञ में दुष्ट और नीच सर्पों का नाश होना है, श्रेष्ठ सर्प उस के प्रकोप से बच जाएँगे".
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