Friday, 10 April 2015
आदि पर्व (5): रुरू, प्रमद्वरा और सहस्त्रपात
उग्रश्रवा (सौति) कह रहा है:
महर्षि च्यवन और सुकन्या के पुत्र थे प्रमति जो अपने समय के प्रख्यात ऋषि रहे. प्रमति के पुत्र रुरु थे. रुरू और प्रमद्वरा के पुत्र थे शुनक. मैं रुरू की कहानी सुनाने जा रहा हूँ. रुरु भी बड़े ज्ञानी और ख्यातिमान तपस्वी थे पर उन्हें याद इस लिए किया जाता है क्यों कि वे अपनी मृत प्रेयसी को पुनर्जीवित करने में सफल हो पाये थे.
बहुत पहले गन्धर्व राज विश्ववसु और अप्सरा मेनका के बीच घनिष्ठ प्रेम प्रसंग चला. समय आने पर मेनका ने एक पुत्री को जन्म दिया और अप्सरा-सहज निर्दयता (और निर्लज्जता) के साथ उस ने अपनी नवजात कन्या को वन में एक नदी के किनारे छोड़ दिया. शिशु के भाग्य से स्थूलकेश नाम के एक तपस्वी ऋषि उस तरफ निकले हुए थे. ऋषि ने उसे देखा और उसे उठा अपने आश्रम ले आये. कन्या का पालन पोषण स्थूलकेश के आश्रम में हुआ. उस के मुख मंडल पर एक अद्भुत आभा थी और उसे देख हर किसी को लगता था कि यह लड़की मर्त्यलोक की नहीं हो सकती.
ऋषि स्थूलकेश के आश्रम के पवित्र वातावरण में खेलते, कूदते वह पली बढ़ी. ऋषिवर ने समय समय पर शास्त्र सम्मत सारे संस्कार किये और उसका नाम प्रमद्वरा रखा. एक बार च्यवन के पौत्र रुरु ने स्थूलकेश के आश्रम में प्रमद्वरा को देखा. एक दृष्टि पड़ते ही रुरु का ह्रदय मदन-बाण से बिंध गया. अपने संगी साथियों के माध्यम से रुरु ने अपने पिता प्रमति को प्रमद्वरा के प्रति अपना प्रेम जता दिया. प्रमति ने अविलम्ब स्थूलकेश से प्रमद्वरा के हाथ अपने पुत्र रुरु के लिए मांगे. स्थूलकेश सहर्ष तैयार हो गए और विवाह समारोह पूर्व-फाल्गुनी नक्षत्र में संपन्न करने का निर्णय लिया गया.
विवाह की नियत तिथि से कुछ दिन पहले, अपनी सहेलियों के साथ खेलते समय प्रमद्वरा का पैर घास में छिपे एक सांप के सर पर जा पड़ा. विधना के लिखे विधान का निमित्त वह सांप निकला और कुछ ही क्षणों में उसके कराल विष ने प्रमद्वरा के प्राण हर लिए. आश्रम में हाहाकार मच गया. उसे देख कर जितना आनंद आता था, उसकी मृत देह सबों को उतना ही कष्ट दे रही थी. उसका मुख शांत था, कष्ट के कोई चिह्न या कोई अन्य विकार नहीं दीख रहे थे. लगता था जैसे वह अभी उठ कर चलने लगेगी. निकट के आश्रमों से आये अनेक विख्यात ब्राह्मण - उद्दालक, कठ, श्वेत, भारद्वाज, गौतम, प्रमति आदि - उस की देह को घेरे शोक में डूबे बैठे हुए थे. रुरु भी वहाँ पहुंचा था पर उस से देखा नहीं गया और वह हट कर वन में कहीं दूर निकल गया.
वने के किसी निर्जन कोने में जा कर रुरु प्रमद्वरा को याद करते हुए जोर जोर से विलाप करने लगा: "यदि मेरे जप-तप सदैव शास्त्रोक्त नियमों के अनुकूल रहे हों, यदि मैंने सदैव गुरु जनों का सम्मान किया हो, यदि मैं आजन्म उदारमना रहा होऊं, यदि मैंने अपनी इच्छाओं पर आज तक नियंत्रण रखा हो, तो उन सब से अर्जित पुण्य के बदले, प्रभु, प्रमद्वरा जीवित हो जाए.”
रुरु के विलाप को सुन, स्वर्ग से एक दूत ने आ कर उसे समझाने की कोशिश की. "अपने दुःख में यह सब जो तुम कह रहे हो रुरु, उनका कोई प्रभाव नहीं पडेगा. मर्त्य लोक के वासी, जिनके दिन पूरे हो जाते हैं, कभी वापस नहीं लौटते. अप्सरा और गन्धर्व की पुत्री प्रमद्वरा के दिन पूरे हो गए थे. इस लिए रुरु अपने ह्रदय से शोक भाव निकाल फेंको" यह सब कहने के बाद, दूत ने यह भी कहा: "प्रमद्वरा के पुनर्जीवन के लिए भगवान ने एक उपाय बना रखा है. यदि तुम चाहो तो उस उपाय से परमद्वरा को वापस धरती पर ला सकते हो."
स्वर्ग से आये दूत की यह बात सुन तुरत चुप हो कर रुरु ने पूछा: "वह कौन सा विधान बनाया है प्रभु ने जिस से मैं प्रमद्वरा को पुनः धरती पर ला सकता हूँ? मुझे विस्तार से बताओ जिस से मैं उस का अनुपालन कर अपने दुःख से उबर सकूँ.”
"अपने जीवन का अर्धांश प्रमद्वरा को दे कर तुम उसे पुनर्जीवित कर सकते हो"
"यदि ऐसा है तो निश्चित रूप से तैयार हूँ, मैं अपने जीवन का आधा अंश दे कर उस का साथ पाना चाहता हूँ. मेरा जीवन कम कर दो और उसे तुरत जीवित कर दो.
यह सब सुन गंधर्वराज विश्ववसु जो प्रमद्वरा के पिता थे, और स्वर्ग से आया वह दूत दोनों ने धर्मराज से अनुरोध किया "हे धर्मराज, रुरु के जीवन के एक अंश को ले कर प्रमद्वरा को जीवित कर दें." धर्मराज मान गए और रुरु के जीवन का एक अंश प्रमद्वरा को मिल गया, जिस से वह जीवित हो बैठ गयी.
यथा निर्धारित, एक शुभ दिवस पर उनका परिणय समारोह संपन्न हुआ और वे सुख शान्ति से रहने लगे.
प्रमद्वरा के सर्प-दंश को रुरु कभी नहीं भूला. उस ने साँपों को मारने की ठान ली थी; कही कोई सर्प दिखने पर वह तत्काल उसे मारने का प्रयास करता था. एक दिन रुरू वन में था जब उस ने एक वृद्ध डुन्डुभ सर्प को भूमि पर पसरे देखा. साँप देखते ही रुरू को क्रोध आ जाता था. क्रुद्ध रुरू ने अपना दंड उठाया और उसे मारने चला. उसे काल-दंड ले कर आते देख उस वृद्ध साँप ने कहा “मैने तो तुम्हारा कभी कुछ नहीं बिगाड़ा है ब्राह्मण; क्यों तुम इतने क्रुद्ध हो मुझे मारने आ रहे हो?”
रुरू ने कहा “हे सर्प, मेरी पत्नी मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय लगती है. उसे एक दिन एक साँप ने काट खाया था. उसके बाद मैने यह कठोर प्रण लिया है कि मैं हर किसी साँप को देखते ही मार दूँगा”.
“पर जो साँप मनुष्य को काटते हैं वे दूसरे प्रकार के होते हैं” साँप ने कहा “तुम्हे डुन्डुभ साँपों को नहीं मारना चाहिए जो बस नाम के साँप होते हैं. वे अन्य साँपों की तरह समर्थ नहीं होते हैं.”
सर्प की बातें सुन और उसे भय से बेसुध होता देख रुरू रुक गया “तुम कौन हो सर्प?” रुरू ने पूछा “कैसे तुम इस रूप में आ गये हो?”
"मैं पहले सहस्त्रपात नाम का एक ऋषि था” साँप ने कहा “एक ब्राह्मण के शाप के चलते मुझे साँप बनना पड़ा”.
“किस कारण से तुम शापित हुए?” रुरू ने पूछा “और कितने दिन अभी तुम्हे इस रूप में रहना है?”
डुन्डुभ ने बताया “जब मैं सहस्त्रपात था तब मेरा एक मित्र होता था खगम. अपनी तपश्चर्य्या से खगम ने प्रचंड आध्यात्मिक शक्तियाँ अर्जित कर ली थीं पर इस के बाद भी अपने बात-व्यवहार में वह अभी भी कदाचित् अविवेकी था. एक दिन जब वह अपने आश्रम में अग्नि पूजा कर रहा था मैने परिहास में घास फूस से एक साँप बना कर उसके निकट फेंक दिया था. खगम उसे वास्तविक साँप समझ भय से मूर्छित हो गया. मूर्छा टूटने पर, और उस झूठे कृत्रिम साँप को देख वह तपस्वी क्रोध में बोल उठा “तुम ने मुझे एक शक्तिहीन झूठा साँप बना कर डराया है सहस्त्रपात, जाओ तुम भी एक विषहीन निरीह सर्प बन जाओ”
“मैं उस के प्रचंड तपोबल को जानता था. अत्यंत दुखी हो कर मैं ने उस से अपने शाप को निरस्त करने की प्रार्थना की “तुम्हारे विनोद के लिए मित्र मैने यह परिहास किया था, इस का इतना बड़ा दंड देना उचित नहीं है” पर खगम ने कहा कि जो कुछ उस ने कह दिया है वह तो अब हो कर ही रहेगा किंतु प्रमति के पुत्र रुरू से मिलने पर तुम सर्प रूप से मुक्ति पा लोगे. मैं जानता हूँ तुम्ही रुरू हो” यह कहते कहते साँप विलुप्त हो गया और उस की जगह वह सहस्त्रपात ब्राह्मण खड़ा था.
सहस्त्रपात ने रुरू को अहिंसा की महिमा बताई “सबसे बड़ा धर्म दूसरे जीवों की प्राण रक्षा है. ब्राह्मण कोमल हृदय के होते हैं. वेदों में भी कहा गया है कि दयाभाव ही उनका स्वभाव होना चाहिए. वेद और वेदांगों में महारत हो ब्राह्मणों का जीवन ऐसा होना चाहिए जिस से ईश्वर में सबों की आस्था जगे / बनी रहे. दंड देना क्षत्रिय कर्तव्य है. वह तुम्हे शोभा नहीं देता. जाओ और जनमेजय के सर्प यज्ञ में सर्पों के विनाश की कथा सुनो और यह भी सुनो कि किस तरह ब्राह्मण आस्तीक के चलते वह प्रजाति लुप्त होने से बच गयी.” यह कहते कहते सहस्त्रपात विलुप्त हो गया.
रुरू ने उसे खोजने के बहुत प्रयास किए पर सहस्त्रपात के कहीं नहीं मिलने पर अपने पिता प्रमति से जनमेजय के सर्प यज्ञ का इतिहास जानने का निश्चय कर वह अपने आश्रम की ओर लौट चला.
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