“वर्षों बाद पांडवों के वंश के एक राजा जनमेजय ने, सर्पों के विनाश के
लिए, सर्प-यज्ञ आयोजित किया था. आस्तीक ने अपने ममेरे भाई-बहनों और अपने
मातुलों को उस यज्ञ की अग्नि में जलने से बचाया था. “इसी आस्तीक और उस
सर्प-यज्ञ की कथा” उग्रश्रवा ने कहा “मैं सुनाने जा रहा हूँ. सर्प यज्ञ के
अनेक कारण थे, यथा जनमेजय के पिता का सर्प दंश से मरना, ब्राह्मण उत्तंक का
सर्प-राज तक्षक से वैमनस्य आदि. एक महत्वपूर्ण कारण था सर्पों की माता
कद्रू का अपने पुत्रों को शाप, वह प्रसंग कुछ इस प्रकार है:
“प्रजापति
की दो रूपवती पुत्रियाँ, कद्रू और विनता, कश्यप ऋषि की पत्नियाँ थीं. उनसे
प्रसन्न हो जब कश्यप ने उन्हे वर देना चाहा तो कद्रू ने पुत्र रूप में एक
सहस्त्र साँप माँगे और विनता ने बस दो पुत्र लेकिन ऐसे जो कद्रू के सहस्त्र
पुत्रों पर अकेले भारी पड़ें. कश्यप दोनो को तथास्तु कह तपस्या करने वन
चला गया और दोनो बहनें अपने अपने वरदान से प्रफुल्लित हो अपने पुत्रों की
प्रतीक्षा करने लगीं.
“बहुत दिनों बाद कद्रू ने एक सहस्त्र और
विनता ने दो अंडे दिए. उनकी दासियों ने अंडों को समशीतोष्ण पात्रों में
संभाल कर रख उनकी देख भाल करने लगीं. पाँच सौ वर्षों के बाद कद्रू के अंडों
को फोड़ कर सहस्त्र सर्प निकले पर विनता के अंडे जैसे थे वैसे ही रहे.
कद्रू की संतानों को बढ़ते देख विनता से रहा नहीं गया और उस ने एक अंडे को
फोड़ डाला. अंडे से एक अर्ध विकसित पक्षी निकला. वह अपनी माता की आकुलता से
बहुत दुखी और क्रुद्ध था. उसके शरीर के अधोभाग के किसी अंग का विकास नहीं
हुआ था. “यह तुम ने अच्छा नहीं किया माँ” उस ने कहा “दूसरे अंडे को भी इस
तरह मत फोड़ बैठना. तुम ने समय से पहले मेरे अंडे को फोड़ दिया था इस लिए
तुम्हे कुछ समय के लिए दासी बनना पड़ेगा. यदि तुम और पाँच सौ वर्ष धैर्य से
रहो तो दूसरे अंडे से जो तुम्हारा ख्याति-मान पुत्र निकलेगा वह तुम्हे
तुम्हारी दासता से मुक्त कराएगा.” वह पक्षी समय आने पर सूर्य के रथ का
सारथी बना. कहा जाता है कि प्रातः काल में, जब सूर्य का रूप प्रखर नहीं
रहता, उसे देखा जा सकता है.
“पाँच सौ वर्ष बीतने पर विनता के
दूसरे अंडे को फोड़ कर सर्प-भक्षी गरुड़ निकला. बाहर निकलते ही वह विनता
को छोड़ अपने लिए भोजन खोजने उड़ चला. उसी समय दोनो बहनों ने समुद्र मंथन
से निकले उस महान दिव्य अश्व उच्चैश्रवा को अपनी दिशा में आते देखा.
उच्चैश्रवा समुद्र मंथन से निकला था और उस अश्व-रत्न की देवता भी पूजा करते
थे”
यहाँ शौनक से नहीं रहा गया और वह पूछ बैठा “समुद्र मंथन क्यों
हुआ था? कैसे हुआ था? और वह दिव्य अश्व-रत्न उच्चैश्रवा उस मंथन से कैसे
निकला था?”
सौति ने कहा “उत्तर दिशा में मेरु नाम का एक गगनचुंबी
पर्वत है. उस के वक्ष पर भयानक जन्तु रहते हैं और बस निष्पाप मनुष्य ही उस
पर जाने की सोच सकते हैं. मनोरम नदियों, जलाशयों से भरा और भाँति भाँति की
जड़ी बूटियों से सुशोभित वह पर्वत देवताओं और गंधर्वों का क्रीड़ा स्थल रहा
है. एक बार उस पर्वत के शिखर पर देवताओं की एक सभा लगी थी. उन्होने अमरत्व
पाने के लिए कठोर तप किए थे और अब अमृत की खोज में थे. सभा को अमृत के लिए
चिंतित देख नारायण ने देवताओं को समुद्र मंथन कर अमृत निकालने को कहा.
“समुद्र
मंथन के लिए देवताओं ने मन्दार पर्वत को मथानी बनाने की सोची. मन्दार
ग्यारह योजन ऊँचा था और इतना ही मिट्टी के नीचे भी गया हुआ था. देवता उसे
उखाड़ नहीं पा रहे थे. वे विष्णु और ब्रह्मा की शरण में गये. विष्णु ने इस
काम के लिए महा शक्तिमान सर्प अनंत को नियुक्त किया. अनंत द्वारा मन्दार के
उखाड़ लिए जाने पर, सागर से मंथन की अनुमति ले कर, कूर्म-राज से मथानी का
आधार बनने का अनुरोध किया गया. कूर्म-राज भी तैयार हो गया.
और इस
तरह मन्दार को मथानी, कूर्म-राज को आधार और वासुकी को मथानी की रज्जु बना
कर समुद्र के मंथन की तैय्यारी पूरी हुई. सुर और असुर मिल कर मंथन करने जा
रहे थे. वासुकी को मुख की दिशा में असुरों ने और पूंछ की दिशा में सुरों ने
पकड़ा और वह भीषण मंथन शुरू हो गया.
मंथन शुरू होते ही समुद्र के
गर्भ से महाघोष के साथ प्रलयंकारी मेघ निकलने लगे. पर्वत के नीचे अनेक जलचर
मारे गये और पर्वत के ऊपर वृक्ष उखड़ने लगे. टूटे वृक्षों के घर्षण से रह
रह कर अग्नि प्रज्वलित हो जाती थी और वह पहाड़ तड़ित से चमकता कोई विशाल
मेघ समूह लगने लगा.
बहुत देर तक मंथन के बाद सागर से चंद्रमा
निकला, उसके पीछे श्वेत वसन में लक्ष्मी निकली, फिर सोम और उसके बाद श्वेत
वर्ण का वह अश्व, और कौस्तुभ मणि जो नारायण के वक्ष की शोभा बना है.
लक्ष्मी, सोम और अश्व देवताओं के पक्ष में आ गये थे. उनके बाद अमृत कलश लिए
हुए श्वेत वसन में धन्वंतरी निकला. उसे देख कर असुरों ने अपना दावा ठोंका
“यह हमारा है”. तब तक विशाल गजराज ऐरावत निकला जिस के दो जोड़े दाँत निकले
हुए थे. इंद्र ने उसे अपना वाहन बना लिया. मंथन अभी चल रहा था. ऐरावत के
बाद समुद्र के गर्भ से कराल कालकूट विष ऊपर आया. उस के उग्र, कटु गंध से
संसार के सभी जीव जड़ होने लगे. विश्व को उस के धुएँ और अग्नि-ज्वाला में
धधकते देख ब्रह्मा ने शिव से सृष्टि की रक्षा करने की प्रार्थना की. शिव
ने उसे घोंट कर अपने कंठ में रोक लिया, उसी कराल विष के प्रभाव से शिव का
कंठ श्याम वर्ण का हो गया और शिव उस दिन से नीलकंठ कहलाने लगे.
उधर
असुर चिंतित हो कर सुरों से लक्ष्मी और अमृत छीनने की योजना बनाने लगे.
नारायण ने सब समझ कर अपनी माया शक्ति से एक मोहिनी का रूप लिया और असुरों
से परिहास करने लगे. दानवों ने उस मोहिनी के रूप और नखड़े के आगे अब कुछ
भूल कर अमृत कलश उस के हाथों में रख दिया. नारायण ने मोहिनी रूप में ही
देवताओं को पंक्ति में बिठा कर उन्हे अमृत पिलाना शुरू कर दिया. अमृत पीने
की भागा दौड़ी में राहु नाम का एक दानव भी देव भेष धर कर देवताओं की पंक्ति
में अमृत पीने के लिए बैठ गया था. अमृत उस के गले से नीचे उतरा भी नहीं था
जब उसे सूर्य और चंद्रमा ने पहचान लिया और नारायण ने अपने चक्र से उस की
गर्दन काट दी. राहु का विशाल मस्तक चीत्कार करता आकाश में उड़ गया और उस
दिन से राहु के मस्तक की सूर्य और चद्रमा से भीषण शत्रुता चली आ रही है. आज
भी अवसर पा कर राहु का वह विशाल मुख सूर्य या चंद्रमा को ग्रस्त कर सूर्य
या चंद्र के ग्रहण की स्थिति कर देता है.
देवताओं को अमृत पिला
कर नारायण अपना मोहिनी रूप त्याग दानवों पर भयानक शस्त्रों से प्रहार करने
लगे और सागर तट पर देव-दानवों के बीच घोर युद्ध छिड़ गया. दोनो पक्षों से
तीरों और भालों की वर्षा की जाने लगी पर अमृत पीने के बाद देव भारी पड़ रहे
थे; साथ ही नारायण का सुदर्शन चक्र भी दानवों को सहस्त्रों की संख्या में
मार रहा था. अपनेआप को पूर्ण रूपेण नष्ट होते देख बचे खुचे दानव भाग कर
पाताल में चुप गये.
दानवों पर विजय प्राप्त करने के बाद देवताओं ने
मन्दार पर्वत की विधिवत पूजा कर उसे वापस उसके अपने आधार पर रख दिया और
अमृत कलश को सुरक्षित रखने के लिए नारायण को दे कर उत्साह से विजय घोष करते
हुए वे देव-लोक को चले गये.
सौति ने कहा “इस तरह वह अश्व उच्चैश्रवा समुद्र-मंथन से निकला था, जिसे कद्रू और विनता अपनी दिशा में आते देख रहीं थीं.
उसे
देख कद्रू ने विनता से उस अश्व की पूंछ का रंग पूछा था. विनता के श्वेत
कहने पर कद्रू ने पूंछ को कृष्ण वर्ण का बताया, और दोनो में शर्त लगी –
जिसके वचन असत्य सिद्ध होंगे उसे दूसरी की दासी बन कर रहना पड़ेगा. शर्त
लगा कर, अगले दिन सत्यापन करना तय कर वे अपने अपने घरों को चली गयीं.
शर्त
जीतने के लिए उस रात कद्रू ने अपने पुत्रों को (सहस्त्र सर्पों को) आदेश
दिया कि वे काले रोएँ का रूप बना कर उस घोड़े की पूंछ पर सट जायें जिस से
उसे विनता की दासी नहीं बनना पड़े. पर सर्पों ने ऐसा करने से मना कर दिया.
उनके मना करने पर क्रुद्ध कद्रू ने उन्हे जनमेजय के सर्प-यज्ञ में जल कर
भस्म हो जाने का शाप दे दिया. कद्रू के इस क्रूर शाप को पितामह ब्रह्मा ने
भी सुना और उस ने देवताओं से भी इस की चर्चा की. पर सबों का मत था क़ि
सर्पों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही थी और वे हर किसी
निर्दोष को डस लेते थे इस लिए इस शाप से विश्व का कल्याण ही होगा. ऐसा सोच
ब्रह्मा ने शाप को निरस्त नहीं किया.
ब्रह्मा तब कद्रू के पति कश्यप
से मिला, जो वन में तपस्या कर रहा था. “तुम्हारी पत्नी कद्रू ने तुम्हारे
पुत्रों को नष्ट हो जाने का शाप दे दिया है. तुम दुखी मत होना. उनका उस
यज्ञ में जलना बहुत पहले से लिखा हुआ था." कश्यप को सांत्वना दे कर और
सर्पदंश के विष को काटने का ज्ञान भी उसे दे कर ब्रह्मा अपने लोक चला
गया.
रात में कुछ नागों ने मिल कर अपनी माता को जिताने के लिए
काले रोएँ बन कर उस घोड़े की पूंछ पर चिपक जाने का निश्चय किया. उन्हे
चिंता थी कि शर्त हार जाने पर कद्रू सभी सर्पों के नष्ट हो जाने का शाप दे
सकती थी और यह भी आशा थी कि जीत जाने पर प्रसन्न हो शायद वह सबों को
शाप-मुक्त कर दे.
अगले दिन प्रातः काल दोनो बहनें उच्चैश्रवा
को निकट से देख कर अपनी अपनी बातों के सत्यापन करने चलीं. घोड़ा समुद्र के
पार था. दक्ष की दोनो पुत्रियाँ ने वायु मार्ग से समुद्र को उस के मनोहर,
और कभी कभी भयावह, दृश्यों को देखते हुए पार किया. उस पार पहुँच कर उन्होने
पाया कि उस अश्व-रत्न के अंग प्रत्यंग चाँदनी के समान शीतल श्वेत वर्ण के
थे किंतु उस की पूंछ काली थी. विनता शर्त हार गयी और दुखी मन से उसे कद्रू
की दासी बनना पड़ा.
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