Saturday, 18 April 2015

आदि पर्व (8): गरुड़

नैमिषारण्य में सौति कथा सुना रहा है, शौनक और उस के यज्ञ में आए ब्राह्मण कथा सुन रहे हैं.

"विनता के दूसरे अंडे से गरुड़ का जन्म हुआ. गरुड़ जन्म से ही जैसा रूप चाहे वैसा रूप धर सकता था, जितना बड़ा या छोटा आकार चाहे वह प्राप्त कर सकता था और जहाँ भी उस का मन करे वहाँ जा पाने में समर्थ था. उस के पास शक्ति का अक्षय भंडार था. जब जैसी आवश्यकता हो तब वह उतना शक्तिमान बन सकता था. जन्म के तुरंत बाद उस ने एक अति विशाल रूप धारण किया और अपनी शक्ति से वह आकाश में एक विशाल अग्नि पुंज लगने लगा.

"उस के शरीर की ऊष्मा से देवता भी जलने लगे. उसे अग्नि का एक रूप समझ कर सभी देवों ने अग्नि से अपने रूप को तनिक सौम्य करने काआग्रह किया. अग्नि ने उन्हे गरुड़ के जन्म की बात बताई और यह भी कहा कि उस से भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं  है, कश्यप का यह सर्प-भक्षी पुत्र देवताओं का मित्र और दानवों का शत्रु है. अग्नि की बात सुन देवताओं ने गरुड़ की स्तुति कर उस से अपना रूप सौम्य रखने की प्रार्थना की. देवताओं की बातमान गरुड़ ने अपने आकार को छोटा और अपने तेज को मद्धिम कर दिया.

“सौम्य रूप में गरुड़ ने अपने भाई अरुण को अपने ऊपर रख समुद्र पार किया और पूर्व दिशा में अपनी माता के पास आया. सूर्योदय काल में गरुड़ ने अरुण को पूर्व दिशा में स्थापित कर दिया. उस दिन सूर्य ने पृथ्वी को जलाने की ठान रखी थी…”

शौनक ने फिर “सूर्य ने किस बात पर पृथ्वी को जला देने की ठान ली थी?”

सौति ने कहा “समुद्र मंथन के समय जब राहु को देवताओं की पंक्ति में बैठ अमृत पीने के प्रयास में सूर्य और चंद्रमा ने पहचान लिया था उस समय से राहु ने इन दोनो देवताओं से शत्रुता पाल रखी थी. जब भी उसे अवसर मिलता राहु सूर्य को ग्रस्त करने का प्रयास करता था. राहु के साथ होते रहते इस संघर्ष में सूर्य ने देखा अन्य देवता उस का साथ नहीं देते थे. “और मैने इस की पहचान देवताओं की रक्षा के लिए ही की थी” ऐसा सोच सूर्य देवताओं पर क्रुद्ध हो गया था और उस दिन उस ने सब कुछ जला देने का निश्चय कर लिया था.

“उस संध्या, सूर्य के अस्त होने के बाद, अस्ताचल से सूर्य का ताप संपूर्ण विश्व को तप्त करने लगा था. रात में भी ऐसी प्रचंड ऊष्णता से त्रस्त हो ऋषि गण देवताओं के पास गये. पर इसे दूर कर पाना देवताओं के वश में नहीं था और सभी पितामह ब्रह्मा के पास पहुँचे. “अभी तक सूर्य का उदय नहीं हुआ है फिर भी भीषण गर्मी है. सूर्योदय केबाद तीनो लोकों का आज जलना निश्चित लग रहा है; पितामह आप ही आज कुछ कर सकते  हैं" ऋषियों और देवताओं ने ब्रह्मा से कहा.

“सच है, सूर्य ने आज सब कुछ जला कर राख कर देने की ठान ली है” पितामह ने कहा “किंतु मैने उपाय कर रखा है. कश्यप का पुत्र अरुण आज से उस का सारथी बन उस के रथ पर उस के आगे बैठेगा और सूर्य के प्रचंड ताप को अपने शरीर से रोक पृथ्वी तक नहीं पहुँचने देगा.”और उस दिन से सूर्य का सारथी अरुण उसकी प्रखरता से विश्व की रक्षा करता आ रहा है. अस्तु; अब हम वापस अपनी कथा पर आते हैं" सौति ने कहा.

गरुड़ उड़ कर अपनी माँ के निकट पहुँचा जो अपनी बहन कद्रू की दासी बनी हुई थी. जिस दिन गरुड़ वहाँ पहुँचा उस दिन कद्रू ने विनता को आज्ञा दी थी कि वह कद्रू को उस के पुत्रों के साथ समुद्र के मध्य में बसे एक रमणीय द्वीप पर ले चले जहाँ नाग रहते थे. विनता ने कद्रू को अपनी पीठ पर बिठाया और गरुड़ से कहा कि वह भी कद्रू के पुत्रों को अपनी पीठ पर ले कर उस द्वीप की ओर चले.समुद्र के बीच बसा वह द्वीप पहले मकरों का नगरी थी अब वह नागों का देश था, वहाँ पहुँच कर कद्रू-पुत्र बहुत प्रसन्न हुए और वे गरुड़ को यह करो, वह करो आदि आज्ञा देने लगे. गरुड़ को यह सब कुछ विचित्र लगा और उस ने अपनी माँ से पूछा “ये सर्प मुझे किस अधिकार से आज्ञा देते हैं”. विनता से सब जानने के बाद गरुड़ ने सर्पों से पूछा कि कैसे वह अपनी माँ को उस के दसीत्व से मुक्त करा सकता है. सर्पों ने आपस में विचार कर उसे अमृत लाने को कहा "यदि तुम अमृत कलश ला दोगे तो तुम्हारी माता मुक्त हो जाएगी."

गरुड़ भूखा था, अमृत के लिए निकलने के पहले उस ने अपनी माँ से अपने लिए भोजन माँगा. उस की माँ ने उसे समुद्र के बीच बसे एक द्वीप के बारे में बताया जिस पर बस निषाद रहते थे. "वहाँ जा कर तुम जितने चाहो निषाद खा लो" विनता ने कहा "बस ध्यान रखना भूल से भी किसी ब्राह्मण को मत खा लेना. ब्राह्मणों की हत्या कभी नहीं करनी चाहिए, चाहे किसी ब्राह्मण में कितने भी दोष क्यों न भरे हों. क्रुद्ध ब्राह्मण सूर्य या अग्नि की तरह सब कुछ जला सकता है.”

"पर ब्राह्मण होते कैसे हैं?" गरुड़ ने पूछा "उनके आचार व्यवहार कैसे होते हैं? मैं उन्हे कैसे पहचान पाऊंगा?"

"जो तुम्हारे मुख में घुसने पर मछली के काँटे की तरह तुम्हे कष्ट दे या जो जलते हुए कोयले की तरह तुम्हे जलाए, समझना वही ब्राह्मण है", विनता ने कहा "क्रोध में भी तुम कभी किसी ब्राह्मण का वध नहीं करना"

माँ की बातें सुनकर गरुड़ ने अपने पंख फैलाए औरआकाश चूमने लगा. निषादों के द्वीप पर जा कर गरुड़ ने सैकड़ों निषादों को निगल लिया. अचानक पेट में आग समान जलन होने पर वह समझ गया कि शायद कोई ब्राह्मण आ गया है. उस ब्राह्मण को अपने पेट से निकल आने की गरुड़ ने प्रार्थना की, और वह ब्राह्मण अपनी निषाद पत्नी के साथ निकल आया. क्षुधा शांत कर गरुड़ अमृत लेने निकल पड़ा. फिर कुछ सोच कर वह अपने पिता कश्यप ऋषि के निकट गया.

कश्यप ने उसके हाल चाल पूछे. “हम सब - माता, अरुण और मैं – कुशल से हैं” गरुड़ ने कहा “बस मुझे हमेशा भूख लगी रहती है और समझ में नहीं आता मैं क्या खाऊँ और क्या नहीं खाऊँ. माँ नेमुझे निषादों को खाने की अनुमति दी थी और मैं ने सहस्त्रों निषाद निगल लिए हैं किंतु अभी भी मेरी क्षुधा पूरी शांत नहीं हुई है.”

कश्यप यह सुन कर थोड़ी देर शांत रहा फिर उस ने एक कथा सुनाई. यहीं बहुत पहले कभी विभावसु और सुप्रितीक नाम के दो ब्राह्मण बंधु रहते थे. पिता की मृत्यु पर अनुज सुप्रितीक ने पैत्रिक संपत्ति का बँटवारा करना चाहा. विभावसु ऐसा नहीं चाहता था. इस बात पर दोनो में अनबन हुई और दोनो ने एक दूसरो को शाप दिए. शाप वश विभावसु एक हाथी बन गया और सुप्रितीक एक कछुआ. निकट स्थित एक जलाशय को दिखाते हुए कश्यप ने बताया इसी में वह हाथी और वह कछुआ पूरे दिन लड़ते रहते हैं. दोनो विशालकाय हैं - योजनों लंबे, "उन्हे खा कर तुम्हारी क्षुधा अवश्य शांत होगी. अमृत लेने के लिए निकलने के पहले तुम उन्हे खा लो."

पिता की बात मान गरुड़ उस जलाशय के ऊपर उड़ा.जैसा कश्यप ने कहा था गरुड़ को एक विशालकाय हाथी और एक उतना ही बड़ा कछुआ आपस में लड़ते दिखे. गरुड़, विशाल रूप धर कर अपने एक चंगुल में हाथी और दूसरे में कछुए को उठा कर उड़ चला. बहुत ऊपर जा कर वह भोजन करने के लिए कोई उचित स्थान खोज रहा था जब एक विस्तृत पीपल वृक्ष ने उसे योजनों लंबी अपनी एक शाखा पर बैठ कर खाना खाने को आमंत्रित किया. किंतु गरुड़ उस डाल पर बैठा ही था कि उसके,हाथी के और कछुए के मिले जुले भार से वह शाखा चरमरा उठी. तभी गरुड़ ने यह भी देखा कि उस डाल से वालखिल्य ऋषि (1) उल्टे लटक कर अपने ध्यान-तप आदि में डूबे हुए हैं. शाखा गिरने से ये ब्राह्मण नहीं बचेंगे यह सोचते हुए गरुड़ ने पीपल की टूटती हुई उस डाल को अपनी चोंच से उठाया और फिर खाने के लिए जगह खोजने उड़ चला. उस के इस पराक्रम से चकित हो वालखिल्य ऋषियों ने ही उसे गरुड़ नाम दिया था जिस का अर्थ है जो बहुत अधिक भार को ढोते हुए उड़ सके. जब उसे बैठने के लिए कोई उपयुक्त स्थान नहीं मिला तो वह वापस गंधमादन पर अपने पिता के पास जा पहुँचा.

मुँह में पीपल की डाल रहने के चलते अस्पष्ट शब्दों में उस ने कश्यप को अपनी समस्या बताई. पहली समस्या थी वालखिल्य ऋषियों की सुरक्षा की. कश्यप के अनुरोध पर वे स्वेच्छा से पीपल की डाल छोड़ हिमवत में तपस्या करने निकल गये. अब गरुड़ ने अपने पिता से किसी ऐसे निर्जन स्थान का पता पूछा जहाँ पीपल की उस विशाल डाल को गिराया जा सके.  कश्यप ने इस काम के लिए हिमालय की एक बर्फ़ीली घाटी उचित बताई और वहीं बैठ कर उस ने गरुड़ को अपना भोजन कर लेने को भी कहा.

अपनी क्षुधा शांत कर गरुड़ इंद्र-लोक के लिए निकलने वाला था जब वहाँ एक के बाद एकअशुभ लक्षण दिखने लगे. मेघ-हीनआकाश से बादलों के गरजने के शब्द आ रहे थे, देवताओं के गलों के पुष्प-हार कुम्हलाने लगे थे और कुछ देर बाद सभी देवताओं के शस्त्र, इंद्र का वज्र भी, अपने आप काँपने लगे थे. यह देख इंद्र बहुत चिंतित हुआ और देव-गुरु वृहस्पति से उस ने इनके कारण पूछे. वृहस्पति ने उसे वालखिल्य ऋषियों के शाप का स्मरण दिलाया और कहा कि ये अशुभ चिह्न बताते हैं कि कश्यप का पुत्र गरुड़ अब अमृत लेने के लिए इंद्रलोक आने की सोच रहा है. वृहस्पति की बात सुन इंद्र को अपने शाप की याद आई.

प्राचीन काल में इंद्र ने कभी कश्यप के एक यज्ञ की अग्नि के लिए एक पर्वत के भार के बराबर काष्ठ लाए थे. प्रजापति कश्यप संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहा था और अपने यज्ञ के लिए उस ने सभी देवताओं और ऋषियों से लकड़ी लाने का अनुरोध किया था. एक पूरा वन लाने के बाद इंद्र अपने पराक्रम पर प्रसन्न हो मुस्कुराते हुए चारो दिशाओं में देख रहा था जब उस ने वालखिल्य ऋषियों को पलाश के पत्ते के एक डंठल को लाते देखा. छहो ऋषि बहुत परिश्रम से उसे उठा पा रहे थे. यह देख इंद्र ठहाका मार कर हंस पड़ा. अपमानित हो ऋषियों ने इंद्र को शाप दिया था कि उस यज्ञ के फल-स्वरूप होने वाली कश्यप की सांतानों में से एक दूसरा इंद्र निकलेगा, जो जहाँ चाहे वहाँ जा सकेगा, जिसेअपरिमित शक्ति रहेगी और जो देवताओं के वर्तमान राजा के हृदय में भय उत्पन्न करदेगा. इंद्र यह सुन कर भयभीत हो प्रजापति कश्यप की शरण में गया था. कश्यप के मनाने पर वालखिल्य ऋषि मान गये और उन्होने कह दिया कि कश्यप का पुत्र पक्षियों का इंद्र बनेगा. कश्यप ने इंद्र को भी समझाया कि ब्राह्मणों का अपमान कभी नहीं करना चाहिए उनके शब्द वज्र से भी अधिक घातक हो सकते हैं.

वृहस्पति से गरुड़ के आने का उद्देश्य जान इंद्र ने अमृत कलश की रक्षा के लिए अनेक देवताओं को नियुक्त किया और स्वयं भी हाथ में वज्र ले कर गरुड़ की प्रतीक्षा में कलश की निकट खड़ा हो गया. पर गरुड़ के आनेपर उसे देख सभी देवता भयभीत हो, अपनी बुद्धि खो कर, एक दूसरे पर वार करने लगे. गरुड़ के पंखों से इतनी धूल उड़ी कि दिन में भी अंधकार छागया. वायु ने धूल हटाए और तब कहीं गरुड़ और देवताओं का युद्ध शुरू हुआ.गरुड़ देवताओं पर बहुत भारी पड़ा. उस के चंगुल और उसकी चोंच से आहत हो देवताओं, यक्षों,गंधर्वों और वसुओं के रक्त से रणभूमि लाल हो गयी.

देवताओं की सेना को तहस नहस कर गरुड़ अमृत कलश के पास पहुँचा. कलश के चारो ओर तीक्ष्ण धार का एक लौह चक्र अनवरत रूप से घूम रहा था और कलश तक पहुँच पाना असंभव लग रहा था. पर अति सूक्ष्म रूप धारण कर, उस चक्र के दाँतों के बीच से मार्ग बना कर, गरुड़ कलश के निकट पहुँच गया. वहाँअपने श्वासों से अग्नि की लपट निकालते दो भयावह सर्प कलश की रक्षा करते मिले.गरुड़ ने धूल उड़ा कर उन सर्पों को अपनी आँखें बंद करने पर बाध्य कर, अपने चंगुलों से उन्हे क्षत-विक्षत कर दिया; और तब वह अमृत कलश को ले कर लौह चक्र से बिना अवरुद्ध हुए सीधे ऊपर उठ कर निकल गया.  

गरुड़ ने कभी अमृत को चखने की चेष्टा भी नहीं की. आकाश में उसे विष्णु मिले, जो उस के इस आत्म त्याग से बहुत प्रसन्न थे. विष्णु ने गरुड़ को वर देना चाहा और गरुड़ ने दो वर माँगे: “प्रभु, मैं आप से भी ऊपर रहूं,और बिना अमृत पिए मैं व्याधि मुक्त और अमर रहूं.” विष्णु ने जब हंसते हुए दोनो वर दे दिए तो गरुड़ ने भी उन्हे वर देना चाहा. विष्णु ने उसे अपना वाहन बनाना चाहा और उसेअपने रथ के ध्वज-स्तंभ पर भी रखना चाहा “इस तरह तुम मेरे ऊपर भी रहोगे” हंसते हुए उन्होने कहा. उस दिन से विष्णु का एक नाम गरुड़ध्वज भी होगया.  

अमृत कलश ले कर वापस जाते हुए गरुड़ पर इंद्र ने वज्र से प्रहार किया था. वज्र का गरुड़ के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा किंतु दधीचि ऋषि का सम्मान करते हुए गरुड़ ने अपना एक पर गिराते हुए इंद्र से कहा “मैं ऋषि का सम्मान करता हूँ जिनकीअस्थियों से वज्र बना है, मैं वज्र का भी सम्मान करता हूँ देवेन्द्र, इसीलये वज्र के आघात का कोई अनुभव नहीं करने पर भी मैने अपना एक पर यहाँ गिरा दिया है.” उस रुपहले पर के चलते गरुड़ का एक नाम सुपर्ण भी पड़ गया.

गरुड़ की अपरिमित शक्ति देख इंद्र ने मैत्री-प्रस्ताव रखा और गरुड़ ने उसकी मित्रता स्वीकार कर ली. गरुड़ को मित्र बनाकर इंद्र ने बिना समय गँवाए अमृत वापस माँगा. “जिनके लिए तुम यह ले जा रहे हो वे इसे पीने के योज्ञ नहीं हैं” इंद्र ने कहा. “किंतु में उन्हे पिलाने नहीं जा रहाहूँ", गरुड़ ने कहा "मैं उन्हे बसअमृत कलश देने जा रहा हूँ. मेरे दे देने के बाद तुम उसे वहाँ से उठा लेना, मैं कोई अवरोध नहीं डालूँगा”

कद्रू के पुत्रों के पास पहुँच कर गरुड़ नेअमृत कलश रखने के लिए घास बिछवाए और उस पर कलश रख कर अपनी माता के मुक्त होने की पुष्टि माँगी. अमृत कलश देख सर्पों ने प्रसन्नता से विनता को उस के दासीत्व से मुक्त कर दिया. अमृत पान करने के पहले सर्प स्नान आदि कर अपने को पवित्र करने गये और उधर चुपके से आ कर इंद्र कलश उठा कर अपने लोक वापस ले गया. जब तक सर्प आते तब तक कलश जा चुका था. अमृत की एकाध बूँद पाने की इच्छा से सर्प घास की उस चटाइ को, जिस पर वह कलश रखा गया था, चाटने लगे . कुश चाटने से उनकी जिह्वायें फट गयीं जो आज भी फटी दिखतीं हैं; और अमृत कलश का आसन बनने के चलते कुश भी सदैव के लिए पवित्र माना जाने लगा.

माता को मुक्त करा कर सुपर्ण अपनी माँ के साथआनंद से रहने लगा.

“जो भी गरुड़ की इस पवित्र कथा को सुनता है या भद्र ब्राह्मणों के बीच इसे सुनाता है वह बहुत पुण्य अर्जित कर स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है.” सौति ने कहा.




 (1) वालखिल्य ऋषियोंकी संख्या छः है, सप्तर्षियों की तरह इनके अलग अलग नाम नहीं हैं; इन्हेबस इनके सामूहिक नाम “वालखिल्य ऋषि” से ही संबोधितकिया जाता है. कहा जाता है कि आकार में ये एक मनुष्य के अंगूठे के समतुल्य हैं. 

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