Monday, 20 April 2015

आदि पर्व (10): परीक्षित की मृत्यु

कुरु वंश का परीक्षित अपने प्रपितामह पांडु के समान महाबाहु था – धनुर्धर, महान योद्धा और आखेट प्रेमी भी. एक दिन आखेट में एक मृग को अपने तीर से घायल कर परीक्षित उस का पीछा कर रहा था जब वह मृग आँखों से ओझल हो गया और उसके पीछे पीछे अपना घोड़ा दौड़ाते पांडु वन में रास्ता भूल कर एक मुनि के आश्रम में पहुँच गया. आखेट से थके माँदे  राजा ने मुनि को अपनी गोशाला में पाया. राजा ने कुछ दंभ भरे स्वर में कहा “हे ब्राह्मण, मैं अभिमन्यु का पुत्र राजा परीक्षित, एक बिंधे मृग का पीछा करते करते यहाँ आ पहुँचा हूँ. क्या आप ने ऐसा कोई मृग अभी इधर कहीं देखा है?”

मुनि निश्शब्द रहा क्योंकि यह उस के मौन व्रत का दिन था. आखेट की गर्मी में परीक्षित को मुनि की चुप्पी साधे रहना असह्य धृष्टता लगी और उस ने निकट पड़े एक मृत सर्प को अपने धनुष के एक छोर से उठाया और मुनि के कंधों पर डाल दिया.  मुनि ने उसे यह भी बिना किसी प्रतिवाद के करने दिया – और उस ने अभी भी एक शब्द नहीं कहा, न अच्छा न बुरा.  मुनि की निर्विकार मुद्रा देख कुछ ही क्षणों में राजा का क्रोध भी शांत हो गया. उसे अपने किए का बहुत दुख भी हुआ. पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था और मन मसोस कर वह अपनी राजधानी लौट गया. क्षमाशील मुनि जानता था कि परीक्षित एक न्यायप्रिय राजा था जो अपने वर्ण के शास्त्रोक्त कर्तव्यों से कभी नहीं मुकरता था. अपमानित होने पर भी राजा को शाप देने का विचार उस दयालु के हृदय में कभी नहीं आया.
   
उस मुनि का एक तेजस्वी पुत्र था शृंगी. अल्प्वयस्क शृंगी पिता के आश्रम से दूर एक गुरुकुल में वेदाध्ययन करता था और अपनी तपश्चर्य्या से उसे बहुत शक्तियाँ मिली हुईं थीं. उस दिन गुरु की आज्ञा से वह अपने पिता से मिलने उनके आश्रम आ रहा था.  रास्ते में उस के एक मित्र ने बताया कि राजा परीक्षित ने उसके पिता के कंधों पर आज एक मृत साँप रख दिया है. तरुण शृंगी अपनी प्रकृति से कुछ गर्म स्वभाव का था, पिता का यह अपमान सुन कर उस के क्रोध की सीमा नहीं रही. 

उस ने अपने मित्र से पूरी घटना की जानकारी ली और यह निश्चित कर कि उसके पिता ने परीक्षित को उन्हे अपमानित करने का कोई कारण नहीं दिया था शृंगी ने जल स्पर्श कर कहा “उस ब्राह्मण निंदक, कुरु-कुल कलंक पापी राजा को, मेरी वाग्शक्ति से प्रेरित हो, आज से सात रातों के अंदर महा-सर्प तक्षक यम के लोक पहुँचा देगा.”  इस तरह अपने पिता के पास पहुँचने के पहले ही शृंगी ने परीक्षित को शाप दे दिया था. आश्रम पहुँचने पर उस ने देखा कि उसका पिता अभी भी अपनी गोशाला में उसी मुद्रा में बैठा था और मृत साँप अभी भी उसके कंधों से लटक रहा था.

अपने पिता का यह रूप देख शृंगी रो पड़ा और उस ने उन्हे अपने शाप की बात बताई. “यह तुम ने अच्छा नहीं किया” मुनि ने सुन कर कहा “तपस्वियों को ऐसा व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए. हम उस राजा के राज्य में रहते हैं और वह हमें यथोचित संरक्षण देता है. हमारे जैसे व्यक्तियों को सदैव राजा को क्षमा करना चाहिए. यदि तुम धर्म का नाश करोगे तो धर्म निश्चय ही तुम्हारा नाश करेगा. यदि राजा अपने कर्तव्य नहीं निभाएगा तो हम अपने पूजन, तप आदि नहीं कर पाएँगे. तपस्वियों के पुण्य अर्जन कर पाने के पीछे धार्मिक राजाओं के हाथ रहते हैं.

"परीक्षित अपनी प्रजा की रक्षा वैसे ही करता है जैसे उसका प्रपितामह पांडु कभी करता था. याद रखो, राजा ही यज्ञों की रक्षा कर पता है, यज्ञों से ही वर्षा होती है और वर्षा से ही अन्न उत्पन्न होते हैं. मनु ने कहा है कि एक राजा दस वेदाध्यायी पुजारियों के समतुल्य होता है. वह धार्मिक राजा थका हुआ था, बुभुक्षित भी; उसे मेरे मौन व्रत का ज्ञान नहीं था और मैं कुछ बोल नहीं सकता था. यह बहुत अविवेकपूर्ण काम तुम ने किया है. तुम्हे परीक्षित को ऐसा शाप कभी नहीं देना चाहिए था." 

“यह अविवेकपूर्ण हो या अनुचित या धर्म विरुद्ध ही हो”, शृंगी ने कहा “पर मैने इसे कर दिया है और मेरे शब्द कभी व्यर्थ नहीं जा सकते.”

शृंगी का पिता जानता था कि शृंगी ने कभी परिहास में भी मिथ्या वादन नहीं किया था और उसका शाप अब टल नहीं सकता था. मुनि स्वभाव से शांतिप्रिय था और भरसक प्रयास करता था कि सबों का कल्याण हो. अगले दिन उस ने अपने एक शिष्य को परीक्षित के पास भेजा. शिष्य ने राजा को, उसके मंत्रियों के सामने, शाप की बात बताई.

“राजन, तुम ने ऋषि शामिक के कंधों पर एक मृत साँप रख छोड़ा था. ऋषि ने तो तुम्हे क्षमा कर दिया था पर ऋषि-पुत्र इसे नहीं सह पाया और उस ने शाप दिया है कि सात रातों के अंदर तक्षक के दंश से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी. ऋषि ने तुम्हे बचाने की बहुत चेष्टा की पर उस के पुत्र के वचन कभी असत्य नहीं हो सकते. ऋषि ने तुम्हे बता देने के लिए मुझे यहाँ भेजा है.”

इस कठोर शाप की सुन परीक्षित काँप गया और अपने धर्म-हीन कृत्य को याद कर बहुत दुखी हो गया. उस अभागे दिन ऋषि का मौन व्रत था. उनकी विशाल-हृदयता, क्षमा-शीलता को देख राजा और भी अधिक दुखी हो गया. वह धार्मिक राजा अपनी मृत्यु की सुन उतना दुखी नहीं था जितना वह ऋषि के प्रति अपने अपमानजनक व्यवहार को याद कर के था.  

ऋषि के शिष्य के चले जाने के बाद मंत्रियों के साथ मिल कर राजा इस संकट से निपटने के उपाय खोजने लगा. सब के विचार से आनन फानन में एक अकेले स्तंभ के ऊपर एक घर का निर्माण कराया गया. उसकी रक्षा के लिए सैनिक नियुक्त कर दिए गये और वहीं पर सर्प-दंश के उपचार / मन्त्रोपचार कर सकने वाले ब्राह्मणों के रहने की व्यवस्था कर दी गयी. और इस तरह स्तंभ के ऊपर बने उस घर में राजा शाप के अपने सात दिन काटने लगा.

सातवें दिन कश्यप राजा के आवास की दिशा में चला. उस ने तक्षक के दंश से राजा की मृत्यु के शाप की सुन ली थी और पितामह ब्रह्मा ने स्वयं उसे सर्प-दंश के उपचार के मंत्र सिखाए थे. “इस धार्मिक राजा के प्राण बचा पाने पर मैं बहुत धर्म और अर्थ, दोनो एक साथ अर्जित कर लूँगा” यही सोचते कश्यप हस्तिनापुर आ रहा था.  

तक्षक ने परीक्षित का उपचार करने के उद्देश्य से कश्यप को हस्तिनापुर आते देख लिया. एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धर कर तक्षक भी उसके साथ चलने लगा और कुछ देर में उस ने कश्यप से पूछा “इतने तेज कदमों से आप कहाँ जा रहे हैं?”
"तक्षक आज अपने विष से कुरु कुल के परीक्षित को दघ्द करने वाला है”, कश्यप ने कहा “मैं वहीं जा रहा हूँ जिस से मैं उस धर्म परायण राजा का जीवन बचा सकूँ.”
तब तक्षक ने अपना परिचय दिया “मैं ही वह तक्षक हूँ जो आज उस राजा को यम के लोक भेजेगा. आप लौट जाइए क्यों कि मेरे काटे का कोई उपचार नहीं है”.
“मैं जानता हूँ”, कश्यप ने मुस्कुराते हुए कहा “मैं राजा को तुम्हारे काटने के बाद भी बचा लूँगा”

“यदि आप ऐसा कर सकते हैं", तक्षक ने कहा “यदि आप वास्तव में मेरे काटे को पुनर्जीवित कर सकते हैं, तो इस पीपल वृक्ष को बचाईए. मैं इसे जलाने जा रहा हूँ”. यह कहते कहते तक्षक ने अपने विष-दंत उस वृक्ष में गाड़ दिए और देखते देखते पीपल का वह हरा भरा विशाल वृक्ष जल उठा और क्षणों बाद वहाँ बस काठ की तरह सूखा तना और सूखी सूखी शाखायें बचीं थीं. और अगले क्षण वह भी नहीं रहे, बस रख का एक ढेर था वहाँ!

“देखो तक्षक”, कश्यप ने कहा “अब मेरे ज्ञान की शक्ति भी देख लो”. कश्यप ने अपने मंत्र पढ़ने शुरू किए. एकाध क्षण में राख के उस ढेर से एक कोंपल निकली, उस में दो पत्ते लगे, वह अंकुर बढ़ने लगा और पीपल के विशाल तने का रूप ले लिया, तना से शाखायें फूटने लगीं  और वह पीपल का हरा भरा विशाल वृक्ष फिर उनके सामने खड़ा था.

“यह उचित नही है कि आप मेरे विष के प्रभाव को निरस्त करते चलें”, तक्षक ने कहा “आप ऋषि हैं, आप की संपदा तपोधन है; आप किस धन की आशा में राजा को बचाना चाहते हैं? जिस भी पारितोषिक की आपने आशा कर रखी होगी वह मैं आप को देता हूँ, आप हस्तिनापुर नहीं जायें”.
तक्षक ने फिर कहा “और यह भी स्मरण रहे कि राजा को मैं एक ब्राह्मण के शाप के चलते डसने जा रहा  हूँ. आप के मंत्र को बस मेरे विष के विरुद्ध ही नहीं,  एक सत्यवादी ब्राह्मण के वचन के विरुद्ध भी काम करना पड़ेगा.” 
कश्यप तब थोड़ी देर ध्यान मग्न हो कर बैठा और उसने योग शक्ति से देख लिया कि परीक्षित का जीवन काल बस इतना ही था और वह तक्षक से स्वर्ण आदि ले कर वापस लौट गया.

कश्यप को वापस लौटा कर तक्षक हस्तिनापुर पहुँचा और राजा के नये आवास को देख कर उस ने अपनी योजना बनाई. कुछ सर्पों को उस ने राजा के पास तपस्वियों के रूप में फल, कुश और जल आदि के साथ भेजा. राजा ने उनके ये उपहार स्वीकार किए और उनके लौटने के बाद अपने मंत्रियों को, जो उस नये घर में उस के साथ बैठे थे, तपस्वियों के दिए फल खाने के लिए आमंत्रित किया. अपने भाग्य और ऋषि-पुत्र के शाप के वशीभूत राजा ने वही फल उठाया जिस में तक्षक छिपा हुआ था. एक ग्रास काटने पर उस फल से एक छोटा कृमि निकलता दिखाई दिया. सूर्यास्त हो रहा था और परीक्षित अपने को अब सुरक्षित समझने लगा था. उस कृमि  को अपनी गर्दन पर रखते उस ने कहा “सूर्यास्त के बाद मेरा सर्प-दंश या सर्प-विष का संकट अब टल गया है. यह कृमि अब  तक्षक बन कर मुझे काट ले जिस से मेरे पाप-पूर्ण कृत्य का प्रायश्चित हो और ऋषि-पुत्र के वचन भी मिथ्या नहीं हों”
 
पर राजा की गर्दन पर आते ही अपने विशाल रूप में आ कर तक्षक ने राजा को अपने व्याल में बाँध लिया. तक्षक के विशाल रूप को देखते ही मंत्री गण भाग खड़े हुए. भागते भागते उन्हों ने तक्षक को आकाश मार्ग से निकलते देखा. सांझ के आधे अंधेरे आकाश में रुपहला तक्षक किसी विवाहिता की माँग में भरे सिंदूर की भाँति चमक रहा था. राजा का नया घर तक्षक के विष से धधक उठा था और उस की निर्जीव देह स्तंभ पर बने उस घर से किसी वज्र से मारे की तरह नीचे गिरी पड़ी थी.

पुरोहितों ने राजा की अंत्येष्टि की और सभी नागरिकों ने परीक्षित के पुत्र जनमेजय को, जो अभी वयस्क नहीं हुआ था, हस्तिनापुर का नया राजा बनाया. 

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