Wednesday, 8 April 2015

आदि पर्व (3): उत्तंक और रानी के कर्णफूल

परीक्षित का पुत्र जनमेजय अपने भाइयों के साथ कुरुक्षेत्र में एक यज्ञ कर रहा था जब उस के भाइयों ने देव-शुनि सरमा (1) के एक पुत्र को मार कर भगा दिया था. रोता हुआ वह श्वान अपनी माता के पास गया. उस का पुत्र निर्दोष था – उस ने यज्ञ  सामग्रियों की ओर देखा तक नहीं था, यह जान सरमा क्रुद्ध हुई और यज्ञ भूमि पर जा कर उस ने जनमेजय पर अकस्मात विपदा आने का शाप दे दिया. यज्ञ समाप्त होने पर हस्तिनापुर आ कर जनमेजय ने एक पुरोहित की खोज शुरू की जो सरमा के शाप को काट सके.

आखेट पर निकले  जनमेजय ने एक दिन श्रुतश्रवा नाम के एक ऋषि का आश्रम देखा. ऋषि का पुत्र सोमश्रवा भी वहाँ तपस्या करता था. राजा ने ऋषि से उस के पुत्र को अपना पुरोहित बनाने की अनुमति माँगी. सोमश्रवा, ऋषि ने बताया, एक सर्प-पुत्र है जिस की मा ने ऋषि के प्राण धारी द्रव कभी पी लिए थे. वह बालक राजा को महादेव के विरुद्ध किए गये उल्लंघनों को छोड़ सब कुछ से मुक्त कराने में सक्षम था पर ऋषि ने यह भी कहा कि किसी ब्राह्मण के माँगने पर सोमश्रवा उसे कुछ भी दे देता है. जनमेजय को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी और वह ऋषि-पुत्र सोमश्रवा को साथ ले कर हस्तिनापुर लौटा. वापस आते ही जनमेजय को युद्ध के लिए तक्षशिला जाना पड़ गया. अभियान पर जाने के पहले उस ने अपने भाइयों को नये पुरोहित सोमश्रवा के विषय में सब कुछ बता दिया था.  
 
जनमेजय का आध्यात्मिक गुरु (उपाध्याय) वेद नाम का एक ब्राह्मण हुआ करता था जो एक और राजा पौष्य का भी गुरु था. उत्तंक की शिक्षा समाप्त होने पर जब गुरु ने उसे जहाँ इच्छा हो जाने को कहा तो उत्तंक ने दक्षिणा में कुछ देने की इच्छा व्यक्त की. वेद ने मना किया पर उतन्क के बार बार आग्रह करने पर उस ने उसे अपनी पत्नी के पास भेजा “जाओ जो वे चाहें वही दक्षिणा में दे देना”. वेद की पत्नी ने दक्षिणा की सुन राजा पौष्य की रानी के कर्ण फूल माँगे और कहा “आज से चौथा दिन एक शुभ तिथि है, यदि तुम ला पाए तो मैं उन्हे उसी दिन पहनूँगी”.  

उत्तंक अपने गुरुधाम से निकल कर पौष्य के घर जा रहा था जब रास्ते में उसे एक अति विशाल वृषभ के ऊपर बैठा एक विशाल अमानवीय पुरुष मिला. उस ने उत्तंक से उस वृषभ का गोबर खाने को कहा. उत्तंक को हिचकिचाते देख उस ने कहा कि उस के गुरु वेद ने भी यह खा रखा है. यह सुन उत्तंक ने भी थोड़ा खा लिया और पौष्य के घर पहुँच कर उस ने अपनी दक्षिणा के लिए उसकी रानी के कर्णफूल माँगे. जब रानी ने दक्षिणा के लिए कर्णफूल देने की बात सुनी तो यह सोच कि उत्तंक से अधिक उत्तम कोई दान–पात्र नहीं हो सकता, उस ने तत्काल अपने फूल उतार कर दे दिए, पर बताया कि तक्षक की आँखें इन कर्णफूलों पर बहुत दिनों से गड़ी हैं इस लिए उत्तंक उन्हे बहुत संभाल कर ले जाए.

वापस जाने के पहले उत्तंक राजा के आग्रह पर भोजन करने बैठ गया था. पर खाना ठंढा था और उस में उसे एक बाल भी गिरा हुआ मिला. अशुद्ध खाने को छोड़, राजा को दृष्टिहीन होने का शाप देते हुए, उत्तंक उठ खड़ा हुआ. शाप सुन पौष्य बहुत रुष्ट हुआ और उस ने उत्तंक को सन्तानहीन रहने का शाप दे दिया. जब उत्तंक ने पौष्य को ठंढा और बाल मिला अपना खाना दिखाया तो पौष्य लज्जित हो क्षमा माँगने लगा. उत्तंक ने अपने शाप की प्रखरता कम करते हुए कहा कि राजा को दृष्टिहीन तो होना ही पड़ेगा पर उस की दृष्टि शीघ्र वापस आ जाएगी. और जब उस ने पौष्य से भी शाप वापस लेने को कहा तो पौष्य ने अपनी असमर्थता जताई. “ब्राह्मणों का हृदय कोमल होता है” उस ने कहा “क्षत्रियों का नहीं, मैं अपना शाप वापस नही ले पा रहा हूँ”. पर झूठी बात पर दिया गया शाप निष्फल ही रहेगा यह कहते उत्तंक वहाँ से चल पड़ा.

रास्ते में उसे रह रह कर एक नग्न भिखारी दीखता था. एक जलाशय के निकट जब वह अपने सामान रख जल पीने रुका था तो वह भिखारी दौड़ता हुआ आया और कर्णफूल ले कर भाग चला. उत्तंक ने उसका पीछा किया पर जैसे ही वह उसे पकड़ पाता वह  भिखारी अपने असली रूप में – सर्प के रूप में – आ कर एक बड़े से बिल में घुस नागलोक चला गया. उत्तंक अपनी छड़ी से बिल को बड़ा करने के असफल प्रयास कर रहा था जब इंद्र ने उस पर तरस खा कर उस की छड़ी में वज्र स्थापित कर दिया. तब वज्र से अपना मार्ग प्रशस्त कर उत्तंक भी नाग लोक में घुस गया.

अंदर में नागों के भव्य महल थे, बड़े बड़े उपवन थे और वह पूरा क्षेत्र बहुत समृद्ध दिख रहा था. उत्तंक ने सर्पों की स्तुति में श्लोक पढ़े और तक्षक से वे कर्णफूल माँगने की पुकार लगाई. पर जब लाख प्रार्थना, स्तुति से भी कर्णफूल नहीं मिले तो उत्तंक चिंतित हो गया और इधर उधर देखने लगा. एक करघे पर श्वेत और श्याम धागों से वस्त्र बुनती उसे दो स्त्रियाँ मिलीं. एक चक्र भी दिखा जिस में बारह आरे थे और जिसे छः बालक मिल कर चला रहे थे. निकट ही एक पुरुष एक दर्शनीय अश्व के साथ खड़ा था. यह सब देख वह इंद्र की स्तुति में एक मंत्र पढ़ने लगा जिस के विचार कुछ इस प्रकार थे:

“इस काल चक्र को छः रितुएँ चला रहीं हैं, ये स्त्रियाँ अनवरत श्वेत श्याम वस्त्र बुनती प्रकृति का क्रम चला रहीं हैं; इस तरह नाना प्रकार के जीवों का  विविध विश्वोँ में अस्तित्व आ रहा है. जगत के रक्षक, वज्रधारी, वृत्रहंता पुरन्दर, जो कृष्ण वस्त्र धारण कर सत्य और असत्य की पहचान करते हैं, मैं आप का नमन करता हूँ.”  

यह सुन घोड़े के साथ खड़े मनुष्य ने कहा “मैं तुम से प्रसन्न हूँ, बोलो तुम्हे क्या चाहिए?”
“साँपों को मेरे अधीन कर दें” उत्तंक ने कहा
उस मनुष्य ने कहा “इस अश्व के अपान में फूंको” और उत्तंक ने वैसा ही किया. फूँकते ही घोड़े के प्रत्येक छिद्र से अग्नि की ज्वाला निकलने लगी और लगा कि वह पूरा नाग क्षेत्र जल कर भस्म हो जाएगा. तुरंत चकित और भयभीत तक्षक दौड़ता हुआ आया और उत्तंक को कर्णफूल लौटा गया. 
कर्णफूल ले कर उत्तंक चिंतित हो सोचने लगा, “आज ही गुरु-पत्नी ने इन्हे पहनने की सोची थी, अब क्या होगा…” वह सोच ही रहा था कि उस मनुष्य ने कहा “इस घोड़े पर चढ़ जाओ उत्तंक, यह तुम्हे गुरुधाम पहुँचा देगा.”
समय पर कर्णफूल दे कर, अपनी गुरु-पत्नी के आशीष पा कर उत्तंक अपने गुरु के पास अपनी जिज्ञासा शांत करने पहुँचा.

वेद ने बताया “वह विशाल वृषभ ऐरावत था और उस पर बैठा  विशाल पुरुष कोई और नही इंद्र था. इंद्र मेरा मित्र है और उस ने तुम्हे वह गोबर खिलाया जो अमृत था और जिस के चलते तुम नाग लोक से जीवित वापस आ पाए हो. इंद्र ने ही अपने वज्र से नागलोक में तुम्हारे जाने का मार्ग बना दिया था. वस्त्र बुनने वाली दो स्त्रियाँ धाता और विधाता थीं. श्वेत और श्याम धागे दिन और रात बताते हैं. घोड़ा अग्नि था और घोड़े के साथ खड़ा पुरुष पर्जन्य था – गरजते बादलोँ का मूर्त रूप.
“जाओ उत्तंक तुमने दक्षिणा भी दे ही दी, अब जहाँ जाना चाहो जाओ”

गुरु के आशीष ले उत्तंक हस्तिनापुर की दिशामें निकल चला, उसक हृदय अभी भी जल रहा था. वह बस तक्षक से प्रतिशोध लेने की सोच पा रहा था. हस्तिनापुर पहुँच कर उत्तंक राजा जनमेजय की सभा में गया जो कुछ ही दिन हुए तक्षशिला के सफल अभियान से लौटा था. विजयी सम्राट को सभासद चारो तरफ से घेरे हुए थे.

उत्तंक ने दृढ़ किंतु मधर शब्दों में राजा का अभिवादन किया; और उसके कल्याण की कामना करते कहा “राजन, आप कैसे अपना समय इस तरह के विनोद में बिता पा रहे हैं जब कुछ आवश्यक काम आपके ध्यान से उतरे हुए हैं?”
जनमेजय ने भी उत्तंक का अभिवादन करते पूछा “आप का क्या अभिप्राय है विप्र? मैं अपनी प्रजा का पूर्ण रूप से ध्यान रखता हूँ. आप क्या चाहते हैं बतायें मैं अवश्य उसे पूरा करूँगा.”

“राजन, यह काम मेरा नहीं है, मेरा अपना कोई अभिप्राय यहाँ नहीं है, यह आप का काम है. आप के पिता के प्राण, राजन, तक्षक ने लिए थे. और जब उनकी चिकित्सा के लिए राज वैद्य कश्यप आ रहा था तो तक्षक ने उसे भी भगा दिया था. पिता की मृत्यु का प्रतिकार आप का कर्तव्य है. आप का यह कर्तव्य बनता है की आप तक्षक और उस के साथ समस्त सर्पों का नाश करने के लिए सर्प यज्ञ कराने की सोचें.  
“अपनी शक्ति के मद में चूर नीच तक्षक ने अकारण आप के पिता को डसा था. सर्प यज्ञ आयोजित करने के लिए आप को तत्काल आज्ञा देनी चाहिए. उस नीच ने कभी मेरे एक कार्य में भी बाधा डाली थी जब मैं अपने गुरु के कार्य से बाहर जा रहा था.”

उत्तंक की बातें सुन राजा क्रोध से लाल हो गया. उत्तंक के सामने ही उस ने मंत्रियों से अपने पिता की मृत्यु पर पूछ ताछ की. पूरा वृतांत वही था जो उत्तंक ने सुनाया था. राजा शोक और क्रोध से विह्वल हो उठा.







 (1) देव शुनि सरमा एक दैवी कुतिया है. ऋग्वेद में एक दैत्य द्वारा चुराई गयी गायों को खोजने में उस ने इंद्र की सहायता की थी. तैत्त्तिरीय ब्राह्मण में उसे "श्वान रूप में देवी" भी कहा गया है. सरमा को सभी कुत्तों की जननी भी मानते हैं (जैसे सुरभि को सभी गाय/ बैल की माता मानते हैं) और इसी से कुत्ते के लिए संस्कृत शब्द सारमेय: की व्युत्पत्ति है जिस का शाब्दिक अर्थ है सरमा की संतान. विशेष तौर पर सरमा को यम के दो कुत्तों की माता माना जाता है.

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