महाभारत का पहला सार्वजनिक पाठ जनमेजय के सर्प-यज्ञ में व्यास के शिष्य
वैशम्पायन ने किया था. आदि पर्व के प्रारंभ में विभिन्न कथाओं के माध्यम से
इस सर्प यज्ञ की पृष्ठभूमि तैयार की गयी है. सर्प यज्ञ में अनेक सर्प मारे
जाते हैं पर अनेक बच भी जाते हैं. सर्पों के मरने के पीछे उनकी माता कद्रू
का शाप और एक ब्राह्मण उत्तंक का रोष है और उनके बचाए जाने के पीछे एक
ब्राह्मण बालक आस्तीक के प्रयास हैं. आस्तीक एक यायावर ऋषि का पुत्र था पर
उसकी माता सर्पिणी थी.
आदि पर्व के प्रारम्भ में एक लघु
कथा में सर्पिणी-पुत्र ब्राह्मण सोमश्रवा का जनमेजय के पुरोहित बनने .का
प्रसंग है. पहली प्रमुख कथा में उत्तंक का सर्प राज तक्षक से रुष्ट होने
का वृतांत है. इसी उत्तंक ने जनमेजय को सर्प यज्ञ आयोजित करने के लिए
प्रेरित किया था. यह उल्लेखनीय है कि जनमेजय के पिता की मृत्यु एक ऋषि के
शाप वश सर्पदंश से हुई थी. पर जनमेजय ने इस के चलते सर्पों के नाश के लिए
तुरंत किसी यज्ञ की नहीं सोची थी. उस के हृदय में सर्प यज्ञ की इच्छा
उत्तंक ने ही जगाई थी.
उत्तंक की कथा के बाद भृगु के वंश का वर्णन आ
चुका है. भृगु के पुत्र च्यवन के पौत्र रुरू की होने वाली पत्नी को एक
सर्प ने डस लिया था जिसके बाद रुरू सभी सर्पों को मारने लगा था. एक वृद्ध
डुन्डुभ सर्प ने उसे जनमेजय के सर्प-यज्ञ का वृतांत सुनने को प्रेरित किया
था.
आस्तीक पर्व में सर्पों और उनके सौतेले भाई गरुड़ के जन्मों की
कहानियाँ हैं. सर्पों की माता कद्रू ने अपने पुत्रों की सहायता से अपनी बहन
(और अपनी सौतन) गरुड़ की माता विनता को छल कर अपनी दासी बनाने के क्रम में
अपनी आज्ञा नहीं मानने वाले अपने पुत्रों (सर्पों) को जनमेजय के सर्प-यज्ञ
में भस्म हो जाने का शाप दिया था. इस में उच्चैश्रवा घोड़े की एक भूमिका
रही है. यह घोड़ा समुद्र मंथन से निकला था, इस सन्दर्भ से इस पर्व में
समुद्र मंथन का वृतांत भी आया है.
आस्तीक पर्व में जनमेजय के पिता
परीक्षित की मृत्यु की भी कथा है. परीक्षित की मृत्यु एक साँप (तक्षक) के
डसने से हुई थी और वह सर्प दंश एक ऋषिपुत्र के शाप वश हुआ था. परीक्षित की
मृत्यु के बाद उस के ज्येष्ठ पुत्र जनमेजय का अल्पावस्था में राज्याभिषेक,
जनमेजय का काशी नरेश की पुत्री से विवाह आदि अन्य कथायें भी इस पर्व में
हैं.
एक प्रमुख कथा आस्तीक के जन्म की भी है, जो यायावर ऋषियों की
परंपरा के एक ऋषि के वासुकी की बहन के साथ हुए विवाह से उत्पन्न हुआ
था.
सभी कथायें नैमिषारण्य में उग्रश्रवा सुना रहा है.
सुनने वालों में शौनक और उसके यज्ञ में आए अन्य ब्राह्मण हैं. शौनक के
पूछने पर उग्रश्रवा जनमेजय के सर्प यज्ञ की कथा सुना रहा है. "इस कथा को
व्यास ने लिपिबद्ध किया है, पहली बार मैने इसे अपने पिता लोमहर्षण, जो
व्यास के शिष्य थे, से सुनी थी. यह जितनी जनमेजय की कथा है उतनी ही उस
ब्राह्मण आस्तीक की भी है. मैं उस पाप-नाशक कथा का संपूर्ण पाठ करता हूँ,
ध्यान से सुनें”
आस्तीक का पिता जरत्कारु ब्रह्मचारी था -
अल्पाहारी, उर्ध्वरेता और यायावर. यायावर अर्थात वह कहीं आश्रम बना कर नहीं
रहता था. जरत्कारु अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप एक तीर्थ स्थल से दूसरे तीर्थ
स्थल को जाते हुए जहाँ सांझ ढलती उसी जगह को एक रात के लिए अपना घर समझ
लेता था. उसे कोई सांसारिक इच्छा नहीं थी. मात्र वायु पर जीवित रहते हुए,
पवित्र तीर्थों में स्नान करते हुए वह बहुत प्रसन्न रहता था. एक बार तीर्थ
यात्रा के क्रम में जरत्कारु ने कुछ ब्राह्मणों को एक गड्ढे में उल्टे लटके
देखा था. ये ब्राह्मण और कोई नहीं उसके पूर्वज थे. उनके वंश में श्राद्ध
आदि नहीं होते रहने से उन्हे भोजन नहीं मिला था और वे बहुत दुर्बल हो गये
थे. पृथ्वी पर एक छिद्र में किसी वृक्ष की एक जड़ से वे लटके हुए थे; और उस
जड़ को भी एक मोटा चूहा काटे जा रहा था. जरत्कारु ने उनसे पूछा “आप कौन
हैं? और क्या आप जानते हैं कि जिस रज्जु से आप लटके हुए हैं उसे एक चूहा
काट खाए जा रहा है. उसके कटने में देर नही है और तब आप मुँह के बल इस
गड्ढे में गिर पड़ेंगे”.
“मुझ से आप का यह संकट देखा नहीं जा रहा है”,
जरत्कारु ने कहा “आप को बचाने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ; यदि अपने
जीवन में अर्जित पुण्य का आधा भाग, या मेरा पूरा का पूरा पुण्य भी दे देने
से आप बच जायें तो मैं वह करने को तैयार हूँ.
उसे सुन उन
ब्राह्मणों ने कहा “तुम हमें बचाना चाहते हो, यह सुन बहुत अच्छा लगा. किंतु
तुम अपने तप से हमारी रक्षा नहीं कर सकते. हम ने भी बहुत तप कर रखे हैं और
उनके फल भी अर्जित किए हैं. पर हमारा वंश संतानहीन हो गया है जिस के चलते
हम अब गिरे जा रहे हैं.
“हम यायावर ऋषि रहे हैं. पुत्रहीन हो जाने के
चलते हम पवित्र लोकों से गिर पड़े हैं और गिरते जा रहे हैं. जैसा तुम ने
देखा, अब उस वृक्ष का बस एक जड़ बचा है जिस से हम लटके हुए हैं. वह हमारे
वंश का एक मात्र पुत्र है जरत्कारु. उस ने वेद वेदांगों के अध्ययन किए हैं
और अब वह तीर्थाटन और तपश्चर्या में लगा रहता है. उसे तप के फल की भी कोई
चाह नहीं है, उसके न कोई पत्नी है, ना पुत्र और ना ही कोई अन्य संबंधी.
उसी के चलते हम इस गड्ढे में लटके पड़े हैं. अब हमारी चेतना भी धीरे धीरे
लुप्त हो रही है. कुछ दिनों में हम स्वयं जड हो जाएँगे.
“यदि तुम्हे कभी
जरत्कारु मिल जाए तो उसे तुम विवाह करने के लिए प्रेरित करना. उसे बताना
उस के पितृ मुँह के बल गड्ढे में लटके हुए हैं, और अब बस उसी के सहारे वे
बचे हैं; और यह भी कि यदि उस ने विवाह नहीं किया तो उस के पितृयों को गिरने
से कोई नहीं रोक सकता.
“और ओ ब्राह्मण, वृक्ष का यह जड़ जो तुम देख रहे
हो यह हमारा वंश है और वह चूहा और कोई नहीं काल है. काल अनवरत रूप से
जरत्कारु को तप आदि में उलझाए रख रहा है और उसी क्रम में हमारा यह एक मात्र
संबल भी छूटा जा रहा है.”
यह सब सुन दुखी जरत्कारु ने अपना परिचय
दिया “मैं ही वह दुर्मति जरत्कारु हूँ; आप मेरे ही पितृ हैं. मैं
ऊर्ध्वरेतस हो इस शरीर को परलोक में ले जाना चाहता था और इसी लिए मैं ने
कभी विवाह, पत्नी, पुत्र आदि के विषय में सोचा ही नहीं. किंतु आप को इस
तरह लटके देख मैने अभी निश्चय किया है कि मैं ब्रह्मचर्य का त्याग कर आप जो
चाहते हैं वही करूँगा. मैं अवश्य विवाह करूँगा यदि मेरे ही नाम की कोई
कन्या मुझे मिल जाए, और उस के भरण-पोषण का भार मेरे ऊपर नहीं रहे. उस से
जो पुत्र होगा वह आप को इस गड्ढे से मुक्त कर देगा.”
अपने पित्रों
को आश्वासन दे कर जरत्कारु फिर तीर्थाटन पर निकल पड़ा. अब वह नवयुवक नहीं
रहा था और उसे कहीं कोई पत्नी नहीं मिल रही थी. वन के एकांत में वह अपने
पित्रों को याद कर कभी कभी फफक फफक कर रो उठता था. “मैं पत्नी अवश्य
खोजूँगा”, मंद स्वर में अपने आप को तीन बार यह कह कर वह पत्नी प्राप्त करने
के लिए तीन बार प्रार्थना भी किया करता था.
कुछ सर्पों के मुँह से
जरत्कारु की प्रार्थना और उस की पत्नी खोजने की बात सुन सर्पराज वासुकी
अपनी बहन को आभूषणों से सुसज्जित कर मुनि के पास वन में ले गया और उस ने
अपनी बहन को भिक्षा स्वरूप मुनि को अर्पित कर दिया. पर जरत्कारु ने तत्काल
उसे स्वीकार नहीं किया. उस की अपनी शर्तें थीं. उस ने उस कन्या के नाम पूछे
और वासुकी को स्पष्ट कह दिया कि वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण नहीं करेगा.
“हे
द्विजोत्तम”, वासुकी ने कहा “मेरी इस बहन का नाम भी जरत्कारु है; और मैं
आजीवन इसका पोषण करूँगा. आप के ऊपर यह कभी बोझ नहीं बनेगी. इसे मैने आप ही
के लिए पाल पोस कर बड़ा किया है”
यह सुन जरत्कारु ने पुनः स्पष्ट किया
“मैं इसे पत्नी के रूप में तभी स्वीकार कर सकता हूँ यदि इसके संभरण या इसके
संरक्षण का कोई दायित्व मेरे ऊपर नहीं रहे. और याद रखना, यदि कभी यह मेरी
इच्छा के प्रतिकूल कुछ भी करेगी तो मैं इसे छोड़ कर निकल जाऊँगा.”
वासुकी
सब शर्तें मानने के लिए तैयार था. उस ने सुना था कि कभी ब्रह्मा ने कह रखा
था कि जरत्कारु एक सर्पिणी से विवाह करेगा और उस विवाह से उत्पन्न पुत्र
सर्पों की प्रजाति को जनमेजय के सर्प यज्ञ में नष्ट होने से बचा लेगा. अपनी
बहन को जरात्कारू से ब्याह कर वासुकी अपनी और अपने परिवार की प्राण-रक्षा
निश्चित कर रहा था.
मुनि विवाह के लिए तैयार हो गया और शास्त्रोक्त
रीति से दोनो जरत्कारु का शुभ विवाह सम्पन हुआ. विवाह के बाद मुनि ने अपनी
सर्पिणी पत्नी से फिर कहा “जो मेरी रूचि के अनुकूल नहीं हो वैसा तुम कभी
कुछ नहीं कहोगी या करोगी. यदि तुम ने ऐसा किया तो उस के बाद मैं तुम्हारे
साथ कभी नहीं रहूँगा.”
सर्पिणी ने अपनी आँखें झुका कर सब बातें
सुनी और मृगी की कातरता और श्वान की जागरूकता के साथ अपने पति की सेवा में
लग गयी. समय आने पर उस ने गर्भ धारण किया और उन्ही दिनों एक बार जब मुनि
अपनी पत्नी की गोद में सिर रख कर सो रहा था तो सर्पिणी ने सूर्य को अस्ताचल
की दिशा में जाते देखा. सूर्यास्त का काल निकट आते देखे वह बहुत चिंतित हो
गयी. यह मुनि के संध्या पूजन का काल था और मुनि निश्चिंत हो सो रहा था.
“क्या
करूँ मैं?”, वह सोचने लगी “मुनि अपने कर्मकांड के प्रति बहुत नियमित रहते
हैं और संध्या पूजन का छूट जाना उन्हे बहुत अखरेगा; किंतु सोए व्यक्ति को
नहीं जगाना चाहिए और सोए पति को तो कभी नहीं”. यही सब सोचते, डरते डरते उस
ने मुनि को जगा दिया. जगने पर मुनि बहुत रुष्ट हुआ. क्रोध से काँपते हुए उस
ने अपनी पत्नी से कहा “तुम ने मेरा घोर तिरस्कार किया है. कैसे तुम ने यह
सोच लिया कि बिना मेरी पूजा स्वीकार किए सूर्यदेव कभी अस्त हो सकते हैं?
मैं अब यहाँ एक दिन भी नहीं रुकुंगा”. यह कहते कहते, अपनी रोती पत्नी को
छोड़, मुनि अपने पुराने पथों पर फिर निकल गया. जाते जाते उस ने अपनी पत्नी
से कहा कि उसके गर्भ में जो शिशु है वह अग्नि के समान तेजस्वी ब्राह्मण
होगा जिसे समय आने पर सभी वेद-वेदांगों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाएगा.
पति
के जाने के बाद जरत्कारु भागी भागी अपने भाई वासुकी के पास गयी. मुनि के
चले जाने की सुन कर वह भी अपनी बहन से कम दुखी नहीं हुआ. मुनि के रहने से
वह आने वाले सर्प-यज्ञ से अपने को सुरक्षित समझता था, वह सुरक्षा कवच उसे
अब भग्न दिखाई दे रहा था.
“तुम जानती हो बहन” वासुकी ने कहा “मुनि
से तुम्हारे विवाह का उद्देश्य था मुनि-पुत्र का हमारे कुल में जन्म लेना,
जो पितामह ब्रह्मा ने कह रखा है, हमे सर्प-यज्ञ से बचा पाएगा.” पर वह
पूर्णतः निराश नहीं हुआ था “मेरा हृदय कहता है कि तुम्हारा यह विवाह व्यर्थ
नहीं जाएगा. मेरा यह तुम से पूछना वैसे तो अनुचित है किंतु विषय की
गंभीरता देखते हुए शायद यह क्षम्य हो. उस तपस्वी मुनि ने तुम्हारे साथ क्या
क्या किया, मुझे सब बताओ”.
उसका अभिप्राय समझ कर जरत्कारु ने उसे
मुनि के अंतिम वचन बताए. अग्नि के समान तेजस्वी पुत्र की बात सुन वासुकी
प्रसन्न हो गया. सर्पराज ने अब अपनी बहन को और भी अधिक सम्मान देना शुरू कर
दिया. उचित समय पर जरत्कारु ने अपने देव-तुल्य पुत्र आस्तीक को जन्म
दिया. वासुकी ने आस्तीक को भृगु के पुत्र च्यवन के आश्रम में वेद-वेदांगों
के अध्ययन के लिए भेजा. बाल्यावस्था में भी आस्तीक अपनी प्रखर बुद्धि और
तपश्चर्य्या के लिए विख्यात हो गया था. अपनी माँ के घर रहते हुए अपने ममेरे
भाइयों और अपने मातुलों से उसकी बहुत घनिष्ठता भी हो गयी थी.
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