सौति कह रहा है:
जनमेजय के सर्प यज्ञ में भाग लेने कृष्ण द्वैपायन हस्तिनापुर आए. ऋषि को अपने शिष्यों के साथ आए देख राजा जनमेजय बहुत हर्षित हो कर आगे आया और सदस्यों की सहमति से उन्हे स्वर्ण पीठ पर बिठा कर उस ने उनकी विधिवत पूजा की. ऋषि को जल, अर्घ्य, गौ इत्यादि दे कर राजा और सदस्यों ने उनसे कौरवों और पांडवों का वृतांत सुनाने का अनुरोध किया. “आप ने उन्हे अपनी आँखों से देख रखा है, क्या कारण था उनके वैमनस्य का जिसमें पूरा विश्व झुलस गया था?” व्यास ने यह सुन अपने शिष्य वैशम्पायन को वह कथा सुनाने का निर्देश दिया.
अपने गुरु को साष्टांग प्रणाम कर वैशम्पायन ने यज्ञ सभा को संक्षेप में वह कथा सुना दी. इस संक्षिप्त पाठ से कोई संतुष्ट नहीं था. जनमेजय ने कहा “इसे सुन कर विस्तृत कथा सुनने के लिए मैं और भी अधिक उत्सुक हो उठा हूँ. धार्मिक पुरुषों ने उस युद्ध में अपने संबंधियों के वध किए हैं. किसी तुच्छ कारण से उन्होने वैसा नहीं किया होगा क्यूँकि आज भी उनकी प्रशंसा की जाती है. क्यों उन्हों ने अपने संबंधियों के वध किए? पांडव जैसे वीर कौरवों के अत्याचार क्यों सहते रहे? भीम, जिसे दस सहस्त्र हाथियों का बल था, कैसे अपने प्रति किए गये अन्याय को चुप चाप सह सका? सती कृष्णा ने दुःशासन को अपनी कोप दृष्टि से जला क्यों नहीं दिया? चारो भाई क्यों युधिष्ठिर के पीछे हमेशा चले जब कि उनके अग्रज को द्यूत की लत लगी हुई थी? और युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा को, जिसे सब कर्तव्यों का ज्ञान था यह लत कैसे लग सकी?
“हे ब्राह्मण, आप इतने विस्तार में इस कथा को सुनायें कि मैं अपने प्रश्नों के उत्तर पा सकूँ”
वैशम्पायन ने कहा “राजन, यह बहुत लंबी कथा है. इस में एक लाख श्लोक हैं, इस के सम्पूर्ण पाठ के लिए अलग से समय नियुक्त कीजिए. यह वेदों के समान पाप नाशक है. इसे को जय भी कहा जाता है और विजय के इच्छुक राजाओं को इसे अवश्य सुनना चाहिए. युवा राजा अपनी रानी के साथ इसे सुनें तो उन्हे पराक्रमी पुत्र प्राप्त होते हैं. इस में धर्म, अर्थ और मोक्ष के विज्ञान हैं. जो इसे सुनते हैं उनके पुत्र और अनुचर सदैव आज्ञाकारी रहते हैं. जो बिना छिद्रान्वेषण के भाव से इसे पढ़ता है उसे कोई व्याधि कभी नहीं सताती. कुरुओं की इस गाथा को जो भी पढ़ेगा उस के परिवार की वृद्धि होगी और समाज में वह सम्मान पाएगा.
“इस कृति में देवताओं और राजर्षियों की कथायें हैं, इस में निष्पाप केशव हैं, पवित्र द्विज हैं और महादेव भी हैं. इस में कार्तिकेय के जन्म का वर्णन है, इस में ब्राह्मण और गौ के महात्म्य हैं. भरत वंश के कुमारों के जन्म की इस कथा का नाम महाभारत है; जो इस व्युत्पत्ति को जनता है उस के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. व्यास ने इसे तीन वर्षों में पूरा किया था. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर जो कुछ इस में है वह कहीं और भी मिल सकता है किंतु जो इस में नहीं है वह और कहीं नहीं मिल सकता.”
यह सब बताने के बाद सौति राजा उपरिचर से अपनी कथा प्रारंभ करता है.
पौरव वंश के वसु नामक एक धार्मिक राजा की इंद्र से प्रगाढ़ मैत्री थी. इंद्र के निर्देश पर उस ने कभी चेदि राज्य जीता था. इंद्र ने उसे एक स्फटिक-विमान दिया जो कहीं भी जा सकता था. इस विमान में उड़ सकने के चलते उस का एक नाम उपरिचर भी पड़ा था. इंद्र ने उसे एक पुष्पमाला भी दी थी जिस के कमल पुष्प कभी नहीं कुम्हला सकते थे और जिसे पहनने वाले को युद्ध में कभी कोई चोट नहीं पहुँच सकती थी. यह सब देते हुए इंद्र ने उस से संपूर्ण पृथ्वी पर धर्म की रक्षा करने के लिए कहा था. वसु इंद्र की नियमित पूजा करता था और इंद्र उसका पूजन स्वीकार करने हंस के रूप में चेदि आता था. वसु देवेन्द्र की मित्रता, देवेन्द्र की कृपादृष्टि से पूरे विश्व का सम्राट बन राज कर रहा था. सम्राट वसु के पाँच पुत्र थे जिन्हे उस ने अपने साम्राज्य के विभिन्न प्रांतों के राजा बना दिए थे. ज्येष्ठ पुत्र वृहद्रथ मगध का शासक बना था. यही वृहद्रथ एक अन्य नाम महारथ से भी जाना जाता है. वसु के अन्य पुत्र थे प्रत्यग्रह, कुशाम्ब, मछिल्ल और यदु. कुशाम्ब का एक और नाम था मणिवाहन. वसु के पुत्रों ने अपने नामों पर राज्य और अपने राजवंश स्थापित किए, जिन वंशों ने बहुत दिनों तक पृथ्वी पर राज किए.
वसु की राजधानी के निकट एक नदी बहती थी शुक्तिमती. कभी कोलाहल नाम के एक सजीव पर्वत ने उस नदी का उल्लंघन कर उसे अपने पाश में बाँध लिया था. वसु ने अपने पदाघात से पर्वत में एक गहरा गड्ढा कर शुक्तिमती को मुक्त किया था. किंतु कोलाहल से मिलन के चलते शुक्तिमती को यमज संतानें, एक पुत्र और एक पुत्री हुईं. उस नदी ने अपनी संतानों को अपने तारक वसु को दे दिए. उस के बालक को बड़े होने पर वसु ने उसे अपना सेना नायक बनाया और उस की बालिका गिरिका के बड़ी होने पर वसु ने उस से विवाह कर लिया था. गिरिका अत्यंत रूपवती थी. एक दिन गिरिका के ऋतु काल में वसु उस के पास जाने ही वाला था जब उस के पितृ चेदि आ गये. पित्रियों ने उस से अपने भोजन (श्राद्ध) के लिए मृग के माँस की इच्छा व्यक्त की, और आखेट प्रेमी राजा मृग के संधान में वन निकल पड़ा.
आखेट में भी वसु गिरिका के रूप को याद करता रहा. वसंत ऋतु में वन बहुत रमणीय था और राजा का ध्यान रह रह कर गिरिका पर जा अटकता था. गिरिका की कामना में डूबा हुआ वसु फूलों से लदे एक अशोक वृक्ष के नीचे बैठे स्खलित हो गया. निकट के वृक्ष पर बैठे एक श्येन (बाज पक्षी) को उस ने अपने बीज दिए और उस से उन्हे गिरिका को दे आने के लिया कहा. रास्ते में एक दूसरे श्येन ने उस के चंगुल में माँस का टुकड़ा समझ कर उस से राजा के बीज छीनने चाहे. उनके मुठभेड़ में वसु के बीज नीचे बहती यमुना नदी में गिर पड़े. यमुना में उन दिनों अद्रिका नाम की एक अप्सरा किसी शाप वश मछली बन कर रह रही थी. जल में गिरते राजा के बीज को अद्रिका ने आगे बढ़ कर पी लिया. दस महीनों के बाद अद्रिका धीवरों के जाल में फँसी थी और जब उस का पेट चीरा गया था तो दो मानव शिशु मिले थे – एक बालक और एक बालिका. आश्चर्य चकित धीवर दोनो शिशुओं को ले कर अपने राजा उपरिचर के पास गये. उपरिचर ने बालक शिशु को अपने पास रख लिया. इसी बालक ने बड़े होने पर मत्स्य राजवंश की स्थापना की. अपरिचर ने बालिका को धीवरों को दे दिया "यह तुम्हारी बेटी है".
इस तरह वह अप्सरा पुत्री धीवरों के मुखिया के घर पलने लगी. उस के दत्तक पिता ने उस का नाम सत्यवती रखा था. बड़ी हो कर वह अप्सरा समान रूपसी हुई, पर मछली के पेट से जन्म लेने के चलते उस की देह से हमेशा मछली की गंध आती रही. सत्यवती यमुना पर नाव खे कर अपने पिता के हाथ बँटाती थी. एक बार पराशर ऋषि अपने भ्रमण के क्रम में यमुना पार कर रहे थे जब उन्होने उस रूपसी को देखा. सत्यवती का रूप कुछ ऐसा था कि उस साधु के हृदय में भी इच्छा के बीज उग गये.
पराशर ने सत्यवती को अपनी इच्छा बताई. नदी के दोनो किनारों पर खड़े ऋषियों को दिखाते हुए सत्यवती ने पूछा “इन के सामने मैं आप की इच्छा कैसे पूरी कर सकती हूँ?” यह सुन कर पराशर ने अपने तपोबल से वहाँ गहरा कुहासा ला दिया जिस में हाथ को हाथ नहीं दिखे. ऋषि की शक्ति से वह लड़की चकित हो गयी और सलज्ज स्वर में उस ने प्रार्थना की “मैं एक कुमारी हूँ, मुनिवर, विवाह के पहले अपना कौमार्य नष्ट कर मैं जी नहीं सकूँगी”.
“मेरी इच्छा पूरी करने के बाद भी”, ऋषि ने कहा “तुम्हारा कौमार्य भंग नहीं होगा. यही नहीं तुम जो चाहो वह मुझ से माँग सकती हो, मेरे वचन कभी विफल नहीं हुए हैं”
यह सुन सत्यवती ने माँगा कि उसकी देह से मछली की गंध नहीं बल्कि सदैव एक ललित, मधुर सुगंध निकले. ऋषि ने तत्काल ऐसा कर दिया. प्रसन्न हृदय से सत्यवती ने भी ऋषि की इच्छा पूरी की. पराशर अपने आश्रम चला गया और उस दिन से सत्यवती अपनी सुगंध के चलते गंधवती कहलाने लगी. उस की यह सुगंध एक योजन से मिलने लगती थी, जिस से उसका एक और नाम पड़ा योजनगंधा.
उसी दिन यमुना के एक द्वीप पर सत्यवती ने पराशर के पुत्र को जन्म दिया. कृष्ण वर्ण का वह बालक द्वीप पर जन्म लेने के चलते कृष्ण द्वैपायन कहलाया. जन्म के तुरंत बाद, अपनी माता से अनुमति ले कर, वह तपस्या के लिए निकल गया. जाते जाते उस ने अपनी माता से कहा था “जब भी तुम्हे मेरी आवश्यकता होगी, तुम मुझे याद करना मैं चला आऊंगा”. पुत्र जन्म के बाद सत्यवती का कौमार्य पुनर्स्थापित हो गया था(1).
अपनी माता का घर छोड़ द्वैपायन वेदाध्ययन में लग गया. हर युग के साथ धर्म गिरता है और धर्म के गिरने पर वेद ही रक्षा कर सकते हैं यह सब सोच उस ने वेद के सूक्तों का पुनर्संकलन कर वेद के चार भाग किए. इसे करने के बाद वह वेदव्यास के नाम से जाना गया. (व्यास का एक अर्थ संकलक होता है.) सुमंत, पैल, वैशम्पायन और शुक (जो उस का पुत्र था) व्यास के प्रमुख शिष्य थे. महाभारत रच कर अपने इन्हीं शिष्यों के द्वारा उस ने महाभारत को प्रसारित किया था.
वैशम्पायन ने तब कुछ प्रमुख चरित्रों के जन्मों के वृतांत दिए: शांतनु और गंगा के पुत्र के रूप में देवलोक के वसुओं के अंशों से भीष्म का जन्म हुआ. धर्मराज ने विदुर के रूप में हस्तिनापुर में जन्म लिया था. धर्म के जन्म की कथा भी वैशम्पायन ने सुनाई. कभी अणीमान्डव्य नाम का एक तेजस्वी वेदज्ञ ऋषि हुआ करता था. निर्दोष होते हुए भी चोरी के अभियोग में अणीमान्डव्य सूली पर मारा गया था. मृत्योपरांत उस ने धर्मराज से कहा “अपने बचपन में मैने एक टिड्डी को घास के तिनके से बीन्धा था; उस एक काम को छोड़ मैं ने अपने जीवन में कोई पाप कर्म नहीं किया है. मैं ने उस के सहस्त्रों गुणे तप किए होंगे. क्या मेरा तप मेरे उस पाप पर भारी नहीं पड़ता है? ब्रह्म-हत्या किसी भी अन्य जीव की हत्या से अधिक जघन्य पाप है, इस लिए, धर्म तुम पापी हो और तुम मर्त्य लोक में शूद्र वर्ण में जन्म लोगे.” उसी शाप के चलते धर्म को विदुर के रूप में जन्म लेना पड़ा था.
कुंती ने अपनी कौमार्यावस्था में सूर्य के पुत्र कर्ण को जन्म दिया था, जिस की देह पर जन्म से ही स्वर्ण कवच और स्वर्ण कुंडल सजे हुए थे. भगवान विष्णु स्वयं, जो सृष्टि के अदृश्य कारक हैं, जो अक्षय हैं और जो परमात्मा हैं, जिनमें तीनों गुण स्थिर हैं, जो अदृश्य रूप में सर्वत्र व्याप्त हैं, जो अनंत हैं और जो वेदों के ओम् हैं, वे देवकी और वसुदेव के पुत्र श्री कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे. यदुवंशी सरदार सत्यक और ह्रिदिक के घरों में भगवान के दो कर्मठ सहयोगी क्रमशः सात्यकी और कृतवर्मा के जन्म हुए.
पात्र में रखे ऋषि भरद्वाज के बीज के विकसित होने से द्रोण (काष्ठ पात्र) का जन्म हुआ. नर्कल के कुंज में गिरे गौतम ऋषि के बीज से अश्वत्थामा की माता कृपी और कृपी के भाई कृपा के जन्म हुए. द्रोण के नाश के लिए यज्ञ की अग्नि से धनुष साथ लिए दृष्टद्युम्न का जन्म हुआ. उसी यज्ञ की वेदी से अपूर्व सुंदरी कृष्णा ने जन्म लिया. कोसल नरेश नग्नजित और गांधार नरेश सुबल के जन्म हुए. सुबल को एक पुत्र हुआ शकुनी जो देवताओं के शाप वश धर्म का शत्रु बना. सुबल को एक पुत्री भी हुई गांधारी जो दुर्योधन की माता हुई. कृष्ण द्वैपायन से विचित्रवीर्य के क्षेत्र में धृतराष्ट्र और पांडु के जन्म हुए. द्वैपायन ने ही हस्तिनापुर राज प्रासाद की एक दासी से शूद्र किंतु ज्ञानी और निष्पाप विदुर को उत्पन्न किया था.
पांडु की दो पत्नियों से देवताओं के पाँच पुत्र हुए. ज्येष्ठ युधिष्ठिर धर्म का, भीम पवन का, अर्जुन इंद्र का और नकुल और सहदेव दोनो अश्विनी कुमारों के पुत्र थे. धृतराष्ट्र के एक सौ एक पुत्र हुए, एक सौ गांधारी से और एक पुत्र युयुत्सु एक वैश्य दासी से. वासुदेव की बहन सुभद्रा से अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने जन्म लिया. पांडवों के पाँच पुत्र उनकी सर्वनिष्ठ पत्नी पांचाली से भी हुए थे – युधिष्ठिर का पुत्र था प्रतिविन्ध्य, भीम का सुतसोम, अर्जुन का श्रुतकीर्ति, नकुल का शतानिक और सहदेव का श्रुतसेन. राक्षसी हिडिंबा से भीम का पुत्र घटोत्कच हुआ था. द्रुपद के एक पुत्री हुई थी शिखण्डिन जो बाद में स्थूण नाम के एक यक्ष की कृपा से पुरुष बन गया था.
“युद्ध में लड़ने वाले सभी योद्धाओं के नाम गिना पाना असंभव है”, वैशम्पायन ने कहा “किंतु सभी प्रमुख योद्धाओं के नाम मैने बता दिए हैं."
पर जनमेजय अभी भी संतुष्ट नहीं था. "मैं सबों के नाम सुनना चाहता हूँ”, उस ने कहा “और यह भी कि उनमें से कौन कौन महारथी थे”.
“जो तुम पूछ रहे हो राजन”, वैशम्पायन ने कहा “वह देवताओं के लिए भी रहस्य है. फिर भी, स्वयंभू का नमन कर मैं सुनाता हूँ. विश्व को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन करने के बाद जमदाग्नि के पुत्र महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले गये थे. जब कोई क्षत्रिय पुरुष नहीं बचा था तब क्षत्रिय स्त्रियों ने व्रती ब्राह्मणों से मिल कर पुत्र उत्पन्न किए थे. यह मेल बस पुत्र प्राप्ति के लिए था और इस में काम-भोग की लालसा कहीं नहीं थी. इस तरह सहस्त्रों क्षत्रिय शिशुओं के जन्म हुए और वह जाति विलुप्त होने से बची. समुद्र से घिरी इस विस्तृत पृथ्वी पर फिर से क्षत्रियों का शासन आया. धार्मिक राजाओं के प्रादुर्भाव से सभी वर्ण प्रसन्न रहते थे. राजा शुद्ध मन से, न्याय भाव से शासन करते थे. उनकी निष्ठा से प्रसन्न हो इंद्र समय पर समुचित वर्षा करता था, घर धन-धान्य से सम्पन रहते थे और मनुष्य दीर्घायु भोगते थे. क्षत्रियों ने अनेक यज्ञ किए और अतुल धन वितरित किए.
ब्राह्मण वेदों और उपनिषदों के अध्ययन में संलग्न रहने लगे. उस काल में किसी ब्राह्मण ने वेद का व्यापार नही किया, ना ही राजन, कभी शूद्र की उपस्थिति में किसी ने वेदोच्चारण ही किए. गौओं की संख्या बढ़ी क्यों कि कोई कभी बछड़े के हिस्से का दूध नहीं पीता था. सभी धर्म परायण थे और कुछ भी करते समय धर्म को ओझल नहीं होने देते थे.
इतने अच्छे समय में असुरों ने पृथ्वी पर जन्म लेने शुरू किए. सहस्त्रों असुरों ने मानवेतर योनियों में जन्म लिए – गाय, घोड़े, ऊँट, भैंस, हाथी, मृग, राक्षस आदि. अनेक ने मनुष्य योनि में, राज वंशों में जन्म लिए. असुर शक्तिवान थे उन्होने अपने शत्रुओं पर (क्षत्रिय राजाओं पर) विजय पाई और अपना आधिपत्य सुदृढ़ कर लिया. उनकी संख्या बढ़ती गयी और अपनी शक्ति के नशे में चूर रह कर वे चारो वर्णों पर तो अत्याचार करते ही थे, वेदज्ञ ऋषियों को भी सताते थे.
कुछ समय बाद असुरों के बढ़ते बोझ को झेलने में पृथ्वी भी असमर्थ हो गयी और पितामह ब्रह्मा से उस ने अपनी मुक्ति के उपाय खोजने को कहा. ब्रह्मा ने पृथ्वी को आश्वस्त किया “तुम्हारे बोझ को हल्का करने के लिए ( असुरों के नाश के लिए) मैं स्वर्ग से देवों को नियुक्त करूँगा”. पृथ्वी को विदा कर ब्रह्मा ने देवताओं को आदेश दिए कि वे मर्त्य लोक में अपनी शक्ति और अपने स्वाभाव के अनुकूल रूपों में जन्म ले कर असुरों से संघर्ष करें. ऐसे ही आदेश पितामह ने गंधर्वों और अप्सराओं को भी दिए.
पृथ्वी पर आने का निश्चय कर इंद्र के साथ सभी देवों ने नारायण से अवतरित होने की प्रार्थना की और उनकी प्रार्थना सुन हरि ने कहा “तथास्तु”.
(1) पुत्र जन्म के बाद कौमार्य के पुनर्स्थापन की बात महाभारत में अनेक बार आई है. तीन अन्य स्त्रियाँ जिन्हे ऐसा वर मिला था: कुंती, द्रौपदी, और ययाति की पुत्री माधवी.
जनमेजय के सर्प यज्ञ में भाग लेने कृष्ण द्वैपायन हस्तिनापुर आए. ऋषि को अपने शिष्यों के साथ आए देख राजा जनमेजय बहुत हर्षित हो कर आगे आया और सदस्यों की सहमति से उन्हे स्वर्ण पीठ पर बिठा कर उस ने उनकी विधिवत पूजा की. ऋषि को जल, अर्घ्य, गौ इत्यादि दे कर राजा और सदस्यों ने उनसे कौरवों और पांडवों का वृतांत सुनाने का अनुरोध किया. “आप ने उन्हे अपनी आँखों से देख रखा है, क्या कारण था उनके वैमनस्य का जिसमें पूरा विश्व झुलस गया था?” व्यास ने यह सुन अपने शिष्य वैशम्पायन को वह कथा सुनाने का निर्देश दिया.
अपने गुरु को साष्टांग प्रणाम कर वैशम्पायन ने यज्ञ सभा को संक्षेप में वह कथा सुना दी. इस संक्षिप्त पाठ से कोई संतुष्ट नहीं था. जनमेजय ने कहा “इसे सुन कर विस्तृत कथा सुनने के लिए मैं और भी अधिक उत्सुक हो उठा हूँ. धार्मिक पुरुषों ने उस युद्ध में अपने संबंधियों के वध किए हैं. किसी तुच्छ कारण से उन्होने वैसा नहीं किया होगा क्यूँकि आज भी उनकी प्रशंसा की जाती है. क्यों उन्हों ने अपने संबंधियों के वध किए? पांडव जैसे वीर कौरवों के अत्याचार क्यों सहते रहे? भीम, जिसे दस सहस्त्र हाथियों का बल था, कैसे अपने प्रति किए गये अन्याय को चुप चाप सह सका? सती कृष्णा ने दुःशासन को अपनी कोप दृष्टि से जला क्यों नहीं दिया? चारो भाई क्यों युधिष्ठिर के पीछे हमेशा चले जब कि उनके अग्रज को द्यूत की लत लगी हुई थी? और युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा को, जिसे सब कर्तव्यों का ज्ञान था यह लत कैसे लग सकी?
“हे ब्राह्मण, आप इतने विस्तार में इस कथा को सुनायें कि मैं अपने प्रश्नों के उत्तर पा सकूँ”
वैशम्पायन ने कहा “राजन, यह बहुत लंबी कथा है. इस में एक लाख श्लोक हैं, इस के सम्पूर्ण पाठ के लिए अलग से समय नियुक्त कीजिए. यह वेदों के समान पाप नाशक है. इसे को जय भी कहा जाता है और विजय के इच्छुक राजाओं को इसे अवश्य सुनना चाहिए. युवा राजा अपनी रानी के साथ इसे सुनें तो उन्हे पराक्रमी पुत्र प्राप्त होते हैं. इस में धर्म, अर्थ और मोक्ष के विज्ञान हैं. जो इसे सुनते हैं उनके पुत्र और अनुचर सदैव आज्ञाकारी रहते हैं. जो बिना छिद्रान्वेषण के भाव से इसे पढ़ता है उसे कोई व्याधि कभी नहीं सताती. कुरुओं की इस गाथा को जो भी पढ़ेगा उस के परिवार की वृद्धि होगी और समाज में वह सम्मान पाएगा.
“इस कृति में देवताओं और राजर्षियों की कथायें हैं, इस में निष्पाप केशव हैं, पवित्र द्विज हैं और महादेव भी हैं. इस में कार्तिकेय के जन्म का वर्णन है, इस में ब्राह्मण और गौ के महात्म्य हैं. भरत वंश के कुमारों के जन्म की इस कथा का नाम महाभारत है; जो इस व्युत्पत्ति को जनता है उस के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. व्यास ने इसे तीन वर्षों में पूरा किया था. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर जो कुछ इस में है वह कहीं और भी मिल सकता है किंतु जो इस में नहीं है वह और कहीं नहीं मिल सकता.”
यह सब बताने के बाद सौति राजा उपरिचर से अपनी कथा प्रारंभ करता है.
पौरव वंश के वसु नामक एक धार्मिक राजा की इंद्र से प्रगाढ़ मैत्री थी. इंद्र के निर्देश पर उस ने कभी चेदि राज्य जीता था. इंद्र ने उसे एक स्फटिक-विमान दिया जो कहीं भी जा सकता था. इस विमान में उड़ सकने के चलते उस का एक नाम उपरिचर भी पड़ा था. इंद्र ने उसे एक पुष्पमाला भी दी थी जिस के कमल पुष्प कभी नहीं कुम्हला सकते थे और जिसे पहनने वाले को युद्ध में कभी कोई चोट नहीं पहुँच सकती थी. यह सब देते हुए इंद्र ने उस से संपूर्ण पृथ्वी पर धर्म की रक्षा करने के लिए कहा था. वसु इंद्र की नियमित पूजा करता था और इंद्र उसका पूजन स्वीकार करने हंस के रूप में चेदि आता था. वसु देवेन्द्र की मित्रता, देवेन्द्र की कृपादृष्टि से पूरे विश्व का सम्राट बन राज कर रहा था. सम्राट वसु के पाँच पुत्र थे जिन्हे उस ने अपने साम्राज्य के विभिन्न प्रांतों के राजा बना दिए थे. ज्येष्ठ पुत्र वृहद्रथ मगध का शासक बना था. यही वृहद्रथ एक अन्य नाम महारथ से भी जाना जाता है. वसु के अन्य पुत्र थे प्रत्यग्रह, कुशाम्ब, मछिल्ल और यदु. कुशाम्ब का एक और नाम था मणिवाहन. वसु के पुत्रों ने अपने नामों पर राज्य और अपने राजवंश स्थापित किए, जिन वंशों ने बहुत दिनों तक पृथ्वी पर राज किए.
वसु की राजधानी के निकट एक नदी बहती थी शुक्तिमती. कभी कोलाहल नाम के एक सजीव पर्वत ने उस नदी का उल्लंघन कर उसे अपने पाश में बाँध लिया था. वसु ने अपने पदाघात से पर्वत में एक गहरा गड्ढा कर शुक्तिमती को मुक्त किया था. किंतु कोलाहल से मिलन के चलते शुक्तिमती को यमज संतानें, एक पुत्र और एक पुत्री हुईं. उस नदी ने अपनी संतानों को अपने तारक वसु को दे दिए. उस के बालक को बड़े होने पर वसु ने उसे अपना सेना नायक बनाया और उस की बालिका गिरिका के बड़ी होने पर वसु ने उस से विवाह कर लिया था. गिरिका अत्यंत रूपवती थी. एक दिन गिरिका के ऋतु काल में वसु उस के पास जाने ही वाला था जब उस के पितृ चेदि आ गये. पित्रियों ने उस से अपने भोजन (श्राद्ध) के लिए मृग के माँस की इच्छा व्यक्त की, और आखेट प्रेमी राजा मृग के संधान में वन निकल पड़ा.
आखेट में भी वसु गिरिका के रूप को याद करता रहा. वसंत ऋतु में वन बहुत रमणीय था और राजा का ध्यान रह रह कर गिरिका पर जा अटकता था. गिरिका की कामना में डूबा हुआ वसु फूलों से लदे एक अशोक वृक्ष के नीचे बैठे स्खलित हो गया. निकट के वृक्ष पर बैठे एक श्येन (बाज पक्षी) को उस ने अपने बीज दिए और उस से उन्हे गिरिका को दे आने के लिया कहा. रास्ते में एक दूसरे श्येन ने उस के चंगुल में माँस का टुकड़ा समझ कर उस से राजा के बीज छीनने चाहे. उनके मुठभेड़ में वसु के बीज नीचे बहती यमुना नदी में गिर पड़े. यमुना में उन दिनों अद्रिका नाम की एक अप्सरा किसी शाप वश मछली बन कर रह रही थी. जल में गिरते राजा के बीज को अद्रिका ने आगे बढ़ कर पी लिया. दस महीनों के बाद अद्रिका धीवरों के जाल में फँसी थी और जब उस का पेट चीरा गया था तो दो मानव शिशु मिले थे – एक बालक और एक बालिका. आश्चर्य चकित धीवर दोनो शिशुओं को ले कर अपने राजा उपरिचर के पास गये. उपरिचर ने बालक शिशु को अपने पास रख लिया. इसी बालक ने बड़े होने पर मत्स्य राजवंश की स्थापना की. अपरिचर ने बालिका को धीवरों को दे दिया "यह तुम्हारी बेटी है".
इस तरह वह अप्सरा पुत्री धीवरों के मुखिया के घर पलने लगी. उस के दत्तक पिता ने उस का नाम सत्यवती रखा था. बड़ी हो कर वह अप्सरा समान रूपसी हुई, पर मछली के पेट से जन्म लेने के चलते उस की देह से हमेशा मछली की गंध आती रही. सत्यवती यमुना पर नाव खे कर अपने पिता के हाथ बँटाती थी. एक बार पराशर ऋषि अपने भ्रमण के क्रम में यमुना पार कर रहे थे जब उन्होने उस रूपसी को देखा. सत्यवती का रूप कुछ ऐसा था कि उस साधु के हृदय में भी इच्छा के बीज उग गये.
पराशर ने सत्यवती को अपनी इच्छा बताई. नदी के दोनो किनारों पर खड़े ऋषियों को दिखाते हुए सत्यवती ने पूछा “इन के सामने मैं आप की इच्छा कैसे पूरी कर सकती हूँ?” यह सुन कर पराशर ने अपने तपोबल से वहाँ गहरा कुहासा ला दिया जिस में हाथ को हाथ नहीं दिखे. ऋषि की शक्ति से वह लड़की चकित हो गयी और सलज्ज स्वर में उस ने प्रार्थना की “मैं एक कुमारी हूँ, मुनिवर, विवाह के पहले अपना कौमार्य नष्ट कर मैं जी नहीं सकूँगी”.
“मेरी इच्छा पूरी करने के बाद भी”, ऋषि ने कहा “तुम्हारा कौमार्य भंग नहीं होगा. यही नहीं तुम जो चाहो वह मुझ से माँग सकती हो, मेरे वचन कभी विफल नहीं हुए हैं”
यह सुन सत्यवती ने माँगा कि उसकी देह से मछली की गंध नहीं बल्कि सदैव एक ललित, मधुर सुगंध निकले. ऋषि ने तत्काल ऐसा कर दिया. प्रसन्न हृदय से सत्यवती ने भी ऋषि की इच्छा पूरी की. पराशर अपने आश्रम चला गया और उस दिन से सत्यवती अपनी सुगंध के चलते गंधवती कहलाने लगी. उस की यह सुगंध एक योजन से मिलने लगती थी, जिस से उसका एक और नाम पड़ा योजनगंधा.
उसी दिन यमुना के एक द्वीप पर सत्यवती ने पराशर के पुत्र को जन्म दिया. कृष्ण वर्ण का वह बालक द्वीप पर जन्म लेने के चलते कृष्ण द्वैपायन कहलाया. जन्म के तुरंत बाद, अपनी माता से अनुमति ले कर, वह तपस्या के लिए निकल गया. जाते जाते उस ने अपनी माता से कहा था “जब भी तुम्हे मेरी आवश्यकता होगी, तुम मुझे याद करना मैं चला आऊंगा”. पुत्र जन्म के बाद सत्यवती का कौमार्य पुनर्स्थापित हो गया था(1).
अपनी माता का घर छोड़ द्वैपायन वेदाध्ययन में लग गया. हर युग के साथ धर्म गिरता है और धर्म के गिरने पर वेद ही रक्षा कर सकते हैं यह सब सोच उस ने वेद के सूक्तों का पुनर्संकलन कर वेद के चार भाग किए. इसे करने के बाद वह वेदव्यास के नाम से जाना गया. (व्यास का एक अर्थ संकलक होता है.) सुमंत, पैल, वैशम्पायन और शुक (जो उस का पुत्र था) व्यास के प्रमुख शिष्य थे. महाभारत रच कर अपने इन्हीं शिष्यों के द्वारा उस ने महाभारत को प्रसारित किया था.
वैशम्पायन ने तब कुछ प्रमुख चरित्रों के जन्मों के वृतांत दिए: शांतनु और गंगा के पुत्र के रूप में देवलोक के वसुओं के अंशों से भीष्म का जन्म हुआ. धर्मराज ने विदुर के रूप में हस्तिनापुर में जन्म लिया था. धर्म के जन्म की कथा भी वैशम्पायन ने सुनाई. कभी अणीमान्डव्य नाम का एक तेजस्वी वेदज्ञ ऋषि हुआ करता था. निर्दोष होते हुए भी चोरी के अभियोग में अणीमान्डव्य सूली पर मारा गया था. मृत्योपरांत उस ने धर्मराज से कहा “अपने बचपन में मैने एक टिड्डी को घास के तिनके से बीन्धा था; उस एक काम को छोड़ मैं ने अपने जीवन में कोई पाप कर्म नहीं किया है. मैं ने उस के सहस्त्रों गुणे तप किए होंगे. क्या मेरा तप मेरे उस पाप पर भारी नहीं पड़ता है? ब्रह्म-हत्या किसी भी अन्य जीव की हत्या से अधिक जघन्य पाप है, इस लिए, धर्म तुम पापी हो और तुम मर्त्य लोक में शूद्र वर्ण में जन्म लोगे.” उसी शाप के चलते धर्म को विदुर के रूप में जन्म लेना पड़ा था.
कुंती ने अपनी कौमार्यावस्था में सूर्य के पुत्र कर्ण को जन्म दिया था, जिस की देह पर जन्म से ही स्वर्ण कवच और स्वर्ण कुंडल सजे हुए थे. भगवान विष्णु स्वयं, जो सृष्टि के अदृश्य कारक हैं, जो अक्षय हैं और जो परमात्मा हैं, जिनमें तीनों गुण स्थिर हैं, जो अदृश्य रूप में सर्वत्र व्याप्त हैं, जो अनंत हैं और जो वेदों के ओम् हैं, वे देवकी और वसुदेव के पुत्र श्री कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे. यदुवंशी सरदार सत्यक और ह्रिदिक के घरों में भगवान के दो कर्मठ सहयोगी क्रमशः सात्यकी और कृतवर्मा के जन्म हुए.
पात्र में रखे ऋषि भरद्वाज के बीज के विकसित होने से द्रोण (काष्ठ पात्र) का जन्म हुआ. नर्कल के कुंज में गिरे गौतम ऋषि के बीज से अश्वत्थामा की माता कृपी और कृपी के भाई कृपा के जन्म हुए. द्रोण के नाश के लिए यज्ञ की अग्नि से धनुष साथ लिए दृष्टद्युम्न का जन्म हुआ. उसी यज्ञ की वेदी से अपूर्व सुंदरी कृष्णा ने जन्म लिया. कोसल नरेश नग्नजित और गांधार नरेश सुबल के जन्म हुए. सुबल को एक पुत्र हुआ शकुनी जो देवताओं के शाप वश धर्म का शत्रु बना. सुबल को एक पुत्री भी हुई गांधारी जो दुर्योधन की माता हुई. कृष्ण द्वैपायन से विचित्रवीर्य के क्षेत्र में धृतराष्ट्र और पांडु के जन्म हुए. द्वैपायन ने ही हस्तिनापुर राज प्रासाद की एक दासी से शूद्र किंतु ज्ञानी और निष्पाप विदुर को उत्पन्न किया था.
पांडु की दो पत्नियों से देवताओं के पाँच पुत्र हुए. ज्येष्ठ युधिष्ठिर धर्म का, भीम पवन का, अर्जुन इंद्र का और नकुल और सहदेव दोनो अश्विनी कुमारों के पुत्र थे. धृतराष्ट्र के एक सौ एक पुत्र हुए, एक सौ गांधारी से और एक पुत्र युयुत्सु एक वैश्य दासी से. वासुदेव की बहन सुभद्रा से अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने जन्म लिया. पांडवों के पाँच पुत्र उनकी सर्वनिष्ठ पत्नी पांचाली से भी हुए थे – युधिष्ठिर का पुत्र था प्रतिविन्ध्य, भीम का सुतसोम, अर्जुन का श्रुतकीर्ति, नकुल का शतानिक और सहदेव का श्रुतसेन. राक्षसी हिडिंबा से भीम का पुत्र घटोत्कच हुआ था. द्रुपद के एक पुत्री हुई थी शिखण्डिन जो बाद में स्थूण नाम के एक यक्ष की कृपा से पुरुष बन गया था.
“युद्ध में लड़ने वाले सभी योद्धाओं के नाम गिना पाना असंभव है”, वैशम्पायन ने कहा “किंतु सभी प्रमुख योद्धाओं के नाम मैने बता दिए हैं."
पर जनमेजय अभी भी संतुष्ट नहीं था. "मैं सबों के नाम सुनना चाहता हूँ”, उस ने कहा “और यह भी कि उनमें से कौन कौन महारथी थे”.
“जो तुम पूछ रहे हो राजन”, वैशम्पायन ने कहा “वह देवताओं के लिए भी रहस्य है. फिर भी, स्वयंभू का नमन कर मैं सुनाता हूँ. विश्व को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन करने के बाद जमदाग्नि के पुत्र महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले गये थे. जब कोई क्षत्रिय पुरुष नहीं बचा था तब क्षत्रिय स्त्रियों ने व्रती ब्राह्मणों से मिल कर पुत्र उत्पन्न किए थे. यह मेल बस पुत्र प्राप्ति के लिए था और इस में काम-भोग की लालसा कहीं नहीं थी. इस तरह सहस्त्रों क्षत्रिय शिशुओं के जन्म हुए और वह जाति विलुप्त होने से बची. समुद्र से घिरी इस विस्तृत पृथ्वी पर फिर से क्षत्रियों का शासन आया. धार्मिक राजाओं के प्रादुर्भाव से सभी वर्ण प्रसन्न रहते थे. राजा शुद्ध मन से, न्याय भाव से शासन करते थे. उनकी निष्ठा से प्रसन्न हो इंद्र समय पर समुचित वर्षा करता था, घर धन-धान्य से सम्पन रहते थे और मनुष्य दीर्घायु भोगते थे. क्षत्रियों ने अनेक यज्ञ किए और अतुल धन वितरित किए.
ब्राह्मण वेदों और उपनिषदों के अध्ययन में संलग्न रहने लगे. उस काल में किसी ब्राह्मण ने वेद का व्यापार नही किया, ना ही राजन, कभी शूद्र की उपस्थिति में किसी ने वेदोच्चारण ही किए. गौओं की संख्या बढ़ी क्यों कि कोई कभी बछड़े के हिस्से का दूध नहीं पीता था. सभी धर्म परायण थे और कुछ भी करते समय धर्म को ओझल नहीं होने देते थे.
इतने अच्छे समय में असुरों ने पृथ्वी पर जन्म लेने शुरू किए. सहस्त्रों असुरों ने मानवेतर योनियों में जन्म लिए – गाय, घोड़े, ऊँट, भैंस, हाथी, मृग, राक्षस आदि. अनेक ने मनुष्य योनि में, राज वंशों में जन्म लिए. असुर शक्तिवान थे उन्होने अपने शत्रुओं पर (क्षत्रिय राजाओं पर) विजय पाई और अपना आधिपत्य सुदृढ़ कर लिया. उनकी संख्या बढ़ती गयी और अपनी शक्ति के नशे में चूर रह कर वे चारो वर्णों पर तो अत्याचार करते ही थे, वेदज्ञ ऋषियों को भी सताते थे.
कुछ समय बाद असुरों के बढ़ते बोझ को झेलने में पृथ्वी भी असमर्थ हो गयी और पितामह ब्रह्मा से उस ने अपनी मुक्ति के उपाय खोजने को कहा. ब्रह्मा ने पृथ्वी को आश्वस्त किया “तुम्हारे बोझ को हल्का करने के लिए ( असुरों के नाश के लिए) मैं स्वर्ग से देवों को नियुक्त करूँगा”. पृथ्वी को विदा कर ब्रह्मा ने देवताओं को आदेश दिए कि वे मर्त्य लोक में अपनी शक्ति और अपने स्वाभाव के अनुकूल रूपों में जन्म ले कर असुरों से संघर्ष करें. ऐसे ही आदेश पितामह ने गंधर्वों और अप्सराओं को भी दिए.
पृथ्वी पर आने का निश्चय कर इंद्र के साथ सभी देवों ने नारायण से अवतरित होने की प्रार्थना की और उनकी प्रार्थना सुन हरि ने कहा “तथास्तु”.
(1) पुत्र जन्म के बाद कौमार्य के पुनर्स्थापन की बात महाभारत में अनेक बार आई है. तीन अन्य स्त्रियाँ जिन्हे ऐसा वर मिला था: कुंती, द्रौपदी, और ययाति की पुत्री माधवी.
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