Wednesday, 8 April 2015

आदि पर्व (1): अनुक्रमणिका पर्व

प्राचीन काल में उत्तर भारत में दो सर्वाधिक प्रमुख राजवंश हुए – सूर्य-वंश या इक्ष्वाकु-वंश जिस ने गोमती के किनारे अयोध्या से राज किया और चंद्र-पुत्र बुध और इला से जनित चंद्र-वंश या ऐल-वंश जिस ने पहले वर्तमान प्रयाग के निकट प्रतिष्ठानपुर से और बाद में वर्तमान दिल्ली के निकट हस्तिनापुर से राज किया. चंद्र-वंश के गृह युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित महाभारत धर्म, आचार नीति, राजनीति, खगोल शास्त्र, तीर्थ, चिकित्सा आदि विविध विषयों पर उस काल के संपूर्ण ज्ञान का सार छुपाए हुए है. महाभारत का रचयिता कृष्ण द्वैपायन (द्वीप पर जन्म लिया कृष्ण वर्ण का पुरुष) है जो वेदव्यास के नाम से भी जाना जाता है. व्यास महाभारत युद्ध में दोनो पक्षों के नेताओं का पितामह भी है. अपने पौत्रों  की मृत्यु हो जाने के बाद व्यास ने इसे लिखा और व्यास के पौत्र अर्जुन के प्रपौत्र जन्मेजय के सर्प यज्ञ में व्यास के शिष्य वैशम्पायन ने इसे पहली बार पढ़ा. वहाँ एक ब्राह्मण, उग्रश्रवा ने इसे वैशम्पायन के मुँह से सुना. उग्रश्रवा ही यह कथा हमें सुना रहा है. महाभारत कथा में अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो कई बार आए हैं - कभी कभी तो परस्पर विरोधी रूप में. व्यास की शैली भी थोड़ी खींचने वाली है. यथा संभव मूल का अनुसरण करते हुए जितना छोटा कर सका हूँ मैने कर दिया है. इस पर्व में धृतराष्ट्र का एक लंबा विलाप है जिसका स्थाई है - "मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही थी जब....." यह विलाप बहुत अधिक लंबा है - शायद कुछ अधिक ही काट दिया है मैने. अब श्री गणेश करता हूँ.

नैमिषारण्य में कभी शौनक कुलपति ने बारह वर्षों तक का एक यज्ञ किया था. अनेक ब्राह्मण उस यज्ञ में भाग लेते हुए बारह वर्षों से नैमिष में रह रहे थे.  एक दिन उग्रश्रवा नाम का एक ब्राह्मण (पिता लोमहर्षण, वंश नाम सौति), नैमिष पहुँचा.  नैमिष के ब्राह्मणों ने उग्रश्रवा का स्वागत किया और वन के बाहर क्या हो रहा है इस की जिज्ञासा प्रकट की.

“जन्मेजय के सर्प यज्ञ में वैशम्पायन ने कृष्ण द्वैपायन रचित महाभारत सुनाया था. उसे सुन कर मैं समंतपंचक (कुरुक्षेत्र का एक भाग) गया जहाँ कौरवों और पांडवों के बीच कभी युद्ध हुआ था और वहाँ से मैं आप के दर्शन करने नैमिष आ रहा हूँ.” उग्रश्रवा ने कहा.  
“हम भी व्यास का महाभारत सुनना चाहते हैं” नैमिष के ब्राह्मणों ने उस से कहा.

उग्रश्रवा ने इशान, ब्रह्मा और विष्णु को नमन कर आरंभ किया. “युगारंभ में, जब यह जगत अंधकार-मय था, सृष्टि के मौलिक, आदि कालीन स्रोत - एक महान डिंब का प्रादुर्भाव हुआ. सभी जीवों के बीजों के उस अक्षय भंडार (उस महान डिंब) को महाविद्य़ा कहा जाता है. महाविद्य़ा में ब्रह्म की सनातन ज्योति थी. इसी से  पितामह ब्रह्मा (पहले प्रजापति) निकले; उनके बाद इस से इक्कीस प्रजापति – मनु, वशिष्ठ, परमेष्ठी, दस प्रचेत, दक्ष और दक्ष के सात पुत्र - निकले.  इनके बाद महाविद्य़ा से विश्व-देव, आदित्य, वसु, अश्विनिकुमार, यक्ष, साध्य, पिशाच, गुहयक, पितृ निकले. इनके बाद उसी से ब्रह्मर्षि, राजर्षि, जल, पावक आदि पाँचो तत्व  और उनके बाद वर्ष, ऋतु, मास, पक्ष और दिन-रात भी महाविद्य़ा से ही उत्पन्न हुए.

ब्रह्मांड में जो कुछ भी स्थावर या जंगम जीव दिखते हैं, वे सब युगांत में नष्ट हो जाते हैं.  युगारंभ में फिर नये सिरे से वे आते हैं. बिना किसी आदि या अंत के यह काल चक्र चलता रहता है.
संक्षेप में तेंतीस सहस्त्र, तीन सौ, तेंतीस देवों की रचना हुई. दिव के पुत्र हुए वृहद्भानु, चक्षु, आत्मा विभावसु, सविता, रिचिका, अर्क, भानु, आशाव: और रवि. इन में विवस्वन ज्येष्ठ था और मह्य कनिष्ठ, जिस का पुत्र देव-व्रत था. उस के पुत्र सु-व्रत के तीन पुत्र थे दसज्योति, शतज्योति और सहस्त्रज्योति. इन तीनो की अनेक संतान हुईं.  इन्ही के वन्शों से कुरू, यदु, भरत, ययाति, इक्ष्वाकु और सभी राजर्षि आए हैं.

व्यास ने वेद, योग और विज्ञान धर्म का अध्ययन कर; अर्थ, काम और धर्म पर अन्य ग्रंथों के अध्ययन कर, सामाजिक व्यवहार के नियमों को समझ कर ज्ञान के इस महापुंज को दो रूपों में रखा है – संक्षिप्त और संपूर्ण. कुछ ब्राह्मण इस के संक्षिप्त रूप को पढ़ते हैं कुछ इस के संपूर्ण रूप का परायण करते हैं. कुछ इसे समझते हैं और समझा सकते हैं, कुछ इसे बस याद भर रख पाते हैं.

व्यास के अनुसार इस ग्रंथ में सब कुछ है - वेदों के रहस्य, उपनिषदों के कर्म-कांड, पुराणों में वर्णित भूत, वर्तमान और भविष्यत का इतिहास; क्षय, भय व्याधि की पहचान; चारो वर्णों के नियम; धार्मिक विद्यार्थी के कर्तव्य; सूर्य, चंद्र और ग्रहों-नक्षत्रों के आयाम; चारो युगों के काल, रिक्, साम और यजु: वेद; आध्यात्म; न्याय; रोग-व्याधि की चिकित्सा; दान और पाशुपत धर्म; पवित्र नदियों और अन्य तीर्थ स्थलों के वर्णन; वन, पर्वत, समुद्र आदि के वर्णन; युद्ध कला; विभिन्न राष्ट्र और उनके रीति-रिवाज … आदि सब कुछ. जिस तरह जीवन के अन्य तीन आश्रम मिल कर भी गृहस्थ आश्रम की बराबरी नहीं कर सकते उसी तरह अन्य काव्य / महाकाव्य मिल कर भी महाभारत की बराबरी नहीं कर सकते. यह महाकाव्य एक वृक्ष है और यह अनुक्रमणिका-पर्व उस का बीज. सौति (ऊग्रश्रवा) उस के पुष्पों और फलों का वर्णन करता है - विचित्रवीर्य की दो पत्नियों से (और एक दासी से), भीष्म के अनुरोध पर, व्यास ने धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर तीन पुत्र उत्पन्न किए थे. इन तीनो के महाप्रयाण के बाद ही व्यास ने भारत को रचा और जब जन्मेजय और सह्स्त्रोँ ब्राह्मणों ने इसे सुनाने का अनुरोध किया तब कहीं जा कर व्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को जन्मेजय के यज्ञ में इसे पढ़ने की अनुमति दी. 

अनेक राष्ट्रों पर विजय प्राप्त कर महाबाहु पांडु एक आश्रम में रहने लगा था. वहाँ उस ने आखेट में,  भूल से, मृग के रूप में एक ऋषि को मार दिया था. ऋषि के भयानक शाप के चलते पांडु को आजीवन अपनी पत्नियों से अलग रहना पड़ा और उस की पत्नियों ने वंश चलाने के लिए धर्म, पवन, इंद्र, और अश्विनी कुमार द्वय से पुत्र प्राप्त किए. पांडु के पुत्रों का बचपन आश्रम में बीता. पांडु के देहांत पर तपस्वी-गण पांडु-पुत्रों और उनकी माता कुंती को धृतराष्ट्र के पास ले गये.

पांडव हस्तिनापुर में रहने लगे. युधिष्ठिर की सत्यप्रियता, अर्जुन के साहस, यमजों के सेवा भाव और अपनो से बड़ों के प्रति कुंती के आदर भाव से पांडव हस्तिनापुर में बहुत लोकप्रिय हो गये थे. अर्जुन ने धनुर्विद्या में अपनी प्रवीणता से एक स्वयंवर में कृष्णा को जीता था, जो पाँचो भाइयों की सर्वनिष्ठ पत्नी बन गयी थी.
कुछ दिनों बाद सभी पड़ोसी राज्यों को जीत कर और सभी बड़े राजवंशों को दबा कर पांडव भारत के अग्रणी राजाओं में आ गये. श्री कृष्ण की सलाह और भीम और अर्जुन के बाहु-बल से पांडवों ने सभी शत्रु राजाओं को पराजित किया और युधिष्ठिर महान राजसूय यज्ञ सम्पन कर पाया. इस यज्ञ में दुर्योधन भी आया था. उस ने पांडवों की अकूत संपत्ति देखी – स्वर्ण, रत्न, गायें, अश्व, हाथी, बहुमूल्य वस्त्र आदि. पांडवों की समृद्धि देख वह ईर्ष्या से जल भुन गया. पांडवों का महल माया नाम के एक असुर वास्तुविद् का बनाया हुआ था. उस महल में भी दुर्योधन अपना रास्ता नहीं खोज पाने के चलते भीम के मुँह से उस ने उपहास पूर्ण मंतव्य भी सुने थे.

वापस अपने महल आ कर दुर्योधन ने चौपड़ की योजना बनाई. चौपड़ की सुन कर वासुदेव कुपित हुए और उन्हों ने दोनो पक्षों के बीच संभावित युद्ध को रोकने के कोई प्रयास नहीं किए.  विदुर, द्रोण, भीष्म और कृपा जैसे विचारवान पुरुषों के रहते हुए भी भारतवर्ष के क्षत्रियों का महासंहार हो कर रहा. महाभारत का कथानक यही युद्ध है.

पांडवों की विजय और अपने एक सौ पुत्रों की मृत्यु की सुन कर धृतराष्ट्र ने बड़ा कारुणिक विलाप किया: मैं युद्ध नहीं चाहता था, मैं ने अपने और पांडु पुत्रों को सदा एक समान समझा. मेरे पुत्र स्वेछाचारी थे और मेरी दृष्टिहीनता के चलते मेरी बात नहीं मानते थे. पांडु पुत्रों की धन संपदा देख और उनके महल में उपहास का पात्र बन कर मेरे पुत्र ने गांधार के राजा के साथ मिल कर छल से पांडवों का राज ले लिया.

जब मैं ने सुना कि अर्जुन ने भरी सभा में लक्ष्य भेद कर कृष्णा को जीत लिया था उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही.  जब अर्जुन सुभद्रा को बलात उठा ले भागा था और फिर भी उस के दोनो भाई – बलराम और श्री कृष्ण - अर्जुन के मित्र बन कर इंद्रप्रस्थ आए थे उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही.  और जब अर्जुन ने देवेन्द्र की वर्षा रोक खांडववन को अग्नि को समर्पित कर दिया था उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब मैने सुना कि विदुर की सहायता से पांडव और कुंती लाक्षा गृह से बच निकले थे उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब पांचाल वीर पांडवों के साथ हो गये थे उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब मैं ने जाना कि मगध के जरासंध को भीम ने अपने हाथों से मार डाला था उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब मैने उनके राजसूय यज्ञ की सुनी उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब मैने सुना कि एकवसना द्रौपदी को उस के ऋतु काल में सभा में घसीटा गया था उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही.  और जब मैने सुना कि वह नीच दुःशासन उस एक वस्त्र को भी उतारना चाहता है उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब शकुनी के हाथों जुए में अपना राज-पाट हारे युधिष्ठिर को उसके पराक्रमी अनुजों ने पहले के समान ही सम्मान दिए उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही.

जब मैने सुना कि स्नातक और अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मण युधिष्ठिर के साथ साथ वन चले गये हैं उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब मैने सुना कि किरात के रूप में त्रयम्बक को प्रसन्न कर अर्जुन ने पाशुपत शस्त्र प्राप्त कर लिया था उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही.  जब मैने सुना कि अर्जुन ने देवलोक जा कर  दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिए हैं उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही.  जब मैने सुना कि गंधर्वों द्वारा बंदी बनाए मेरे पुत्र को अर्जुन ने छुड़ाया उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब मैने सुना कि मेरे पक्ष के सभी प्रमुख योद्धाओं को, जब उन्हों ने  विराट के नगर पर आक्रमण  किया था, अर्जुन ने अकेले पराजित कर दिया था उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही.  जब मैने जाना कि माधव पांडवों का कल्याण चाहते हैं उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब मैने सुना कि जुए में सब कुछ हार कर भी और देश से बाहर निकाले जाने पर भी युधिष्ठिर ने सात अक्षौहिणी सेना एकत्रित कर ली थी उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब मैने सुना कि कर्ण और दुर्योधन को, जो श्रीकृष्ण को बंदी बनाना चाहते थे, श्रीकृष्ण ने अपना विश्व-रूप दिखाया उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब मैने सुना कि वासुदेव और भीष्म पांडवों को सलाह दे रहे थे और द्रोण उन्हें आशीष दे रहे थे उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब कर्ण ने भीष्म के साथ लड़ने से मना कर दिया उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब मैने सुना कि भीष्म ने, जो प्रति दिन दस सहस्त्र योद्धाओं को मार रहे थे, किसी पांडव का वध नहीं किया है उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब द्रोण ने किसी पांडव का वध नहीं किया उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब मैने सुना कि हमारे महारथियों ने, जो अर्जुन के सामने टिक नहीं पाते हैं, एक साथ मिल कर उस के पुत्र बालक अभिमन्यु का वध किया उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब अर्जुन ने सैंधव का वध कह कर कर दिखाया उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही. जब दुर्योधन को भीम ने श्रीकृष्ण की सलाह पर गदा युद्ध के नियमों के विरुद्ध वार कर मार गिराया उसी समय मुझे सफलता की कोई आशा नहीं रही.

गांधारी का कोई पुत्र या पौत्र जीवित नहीं रहा. पांडवों ने बिना किसी प्रतिद्वंद्वी का राज्य जीता है.  हाय, अट्ठारह अक्षौहिणी योद्धाओं में बस दस बचे हैं, तीन हमारे पक्ष के और सात पांडवों के.
इस तरह विलाप कर धृतराष्ट्र अपने प्राण त्यागना चाहता था. उस के सारथी संजय ने शांति से उसे सैकड़ों राजाओं के नाम गिनाए जो वीर थे, तरह तरह के दिव्यास्त्रों से सज्जित थे किंतु काल से अधिक बली नहीं थे. उनके कृत्य, उनका पराक्रम, उनकी उदारता, उनका सत्य, शुद्धता, कृपा आदि पर प्राचीन कवियों ने गाथायें लिखी हैं. उनमें सभी अच्छे गुण भरे पड़े हे फिर भी काल उन पर भारी पड़ा. 
“और आप के पुत्र, राजन”. संजय ने कहा “द्वेषपूर्ण थे, कुबुद्धि थे और लोभी थे. आप शास्त्रों के ज्ञाता हैं, बुद्धिमान भी और ज्ञानी भी. इस लिए अपने बच्चों के प्रति ये भाव आप को नहीं शोभते हैं. और प्रारब्ध से कौन लड़ सकता है? काल (समय) सृजन करता है और काल ही नाश भी करता है. आप जानते हैं कि भूत, वर्तमान और भविष्यत सब काल के खेल हैं, फिर आप इस तरह विलाप क्यों कर रहे हैं?

सौति कहता है “संजय के समझाने पर धृतराष्ट्र शांत हुआ. इसी विषय पर व्यास ने इस पवित्र उपनिषद् की रचना की. महाभारत का परायण अपने आप में एक धार्मिक कार्य है. जो इसके एक पद भी विश्वास के साथ पढ़ता है उस के सारे पाप धूल जाते हैं.

"कभी देवताओं ने वेदों को एक पलड़े पर और महाभारत को दूसरे पलड़े पर रख कर उन्हें तौला था. चारो वेदों और उनके रहस्यों से महाभारत भारी पड़ा था."

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