Friday, 24 April 2015

आदि पर्व (13): आदिवंशावतरण पर्व (2)

जनमेजय के अनुरोध पर वैशम्पायन ने महाभारत के सभी प्रमुख चरित्रों के जन्म, पूर्व-जन्म, और उनके वंशवृक्ष बताए. जैसा स्वाभाविक है सभी वंशों का आरंभ सृष्टिकर्ता पितामह ब्रह्मा से होता है. पितामह के छः मानस पुत्र थे मरीचि,  अत्रि,  अंगिरस,  पुलत्स्य,  पुलह और क्रतु. इनके अतिरिक्त एक स्थाणु भी था. पितामह के वक्ष से भृगु निकला था.  ब्रह्मा के दाहिने पैर के अंगूठे से दक्ष और बाँये पैर के अंगूठे से दक्षपत्नी उदित हुई थी. सृष्टि के समस्त जीव, जन्तुओं को ब्रह्मा ने इन्ही के द्वारा रचा है. 
दक्ष और दक्षपत्नी के कोई पुत्र नहीं थे. उन्हे पच्चास रूपवती लड़कियाँ हुईं थीं. दक्ष ने उन्हे अपनी “पुत्रिका” बनाया था, जिस से उनके पुत्र उनके पतियों और दक्ष, दोनो के रहें.

मरीचि का पुत्र कश्यप था जिस ने दक्ष की तेरह पुत्रियों से विवाह किए थे. ये तेरह थे अदिति, दिति,  दनु, काला, अनायु, सिन्हिका, मुनि, क्रोधा, प्रावा, अरिष्टा,  विनता,  कपिला और कद्रू. कश्यप की अनगिनत संतानें हुईं. प्रायः सभी प्रमुख सुर, असुर, गंधर्व, अप्सरायें और सर्प कश्यप की संतान हैं. (कश्यप की इतनी मानव संतान भी हैं कि किसी को यदि अपने गोत्र का नाम ज्ञात नहीं हो तो वह अपने को कश्यप गोत्र का बता सकता है.)    

अदिति के पुत्र आदित्य कहलाए, दिति के पुत्र दैत्य और दनु के पुत्र दानव कहलाए. काला, अनायु, सिन्हिका, और क्रोधा के पुत्र, दैत्यों और दानवों के साथ मिल कर सामूहिक नाम असुर से जाने जाते हैं.
मुनि के पुत्र गंधर्व हुए, प्राधा (या प्रावा) ने गंधर्वों और अप्सराओं को जन्म दिए और कद्रू के पुत्र सर्प हुए;  विनता के पुत्र सुरों के मित्र हैं. कपिला ने ब्राह्मणों और गौओं को जन्म दिए और कद्रू ने सर्पों को. (अरिष्टा की संतानों के नाम नहीं बताए गये हैं.)
अदिति से बारह आदित्य हुए, जो जगत के स्वामी हैं: धातृ, मित्र, अर्यमान, शक्र, वरुण, आंश, भग, विवस्वत, उषा, सविता, त्वष्टृ और विष्णु. इन में विष्णु जो कनिष्ठ हैं वही गुण और धर्म में सबों से श्रेष्ठ हैं. 
दिति को एक पुत्र हुआ था हिरण्यकशिपु, जिस के पाँच पुत्र हुए थे प्रहलाद, संह्राद, अनुह्राद, शिबी और बाष्कल.  ज्येष्ठ पुत्र प्रहलाद के तीन पुत्र हुए विरोचन, कुंभ और निकुम्भ. विरोचन का पुत्र महाप्रतापी बलि हुआ और बलि का पुत्र बाण नाम का महासुर हुआ.  बाण रुद्र का भक्त था और वह महाकाल के नाम से भी जाना जाता है. 
दनु के चालीस पुत्र हुए. उनमें ज्येष्ठ विप्रचित्ति था अन्य प्रमुख दानव थे नमुचि, पौलोम, आसिलोम, केशी, दुर्जय, अयःशिर, अश्वशिर, अयःशंकु, गगनमूर्धा, वेगवात, केटुमत, स्वरभानु, अश्व, अश्वपति, वृषपर्व, अजक, अश्वग्रीव, सूक्ष्म, टुहुण्ड, एकपाद, एकचक्र, विरूपाक्ष, महोदर, निचन्द्र, निकुम्भ, कुपथ, कपथ, शरभ, शलभ, सूर्य, चंद्रमा (सूर्य और चंद्रमा जो देव हैं वे दनु के पुत्र नहीं हैं), एकाक्ष, अमृतप, प्रलंब, नरक, वातापी, शत्रुतपन, शठ, गविश्ठ, वानायू, और दीर्घजिह्वा. (चालीस पुत्र बताने के बाद, बंगाल और बोरी दोनो पाठों में ये बयालीस पुत्रों के नाम गिनाए गये हैं.)
सिन्हिका के पुत्र हुए राहु (जो अभी भी सूर्य और चंद्रमा को सताता है), सुचन्द्र, चन्द्रहन्त्रि, और चन्द्रविमर्दन.
क्रूर (क्रोधा) को उसी के समान दुष्ट असंख्य संतान हुईं.
अनायु के चार महासुर पुत्र हुए विक्षर, बाल, वीर और वृत्र.
काल के यम के समान हुए अनेक पुत्रों में प्रमुख थे विनाशन, क्रोध, क्रोधहन्त्रि, और क्रोधशत्रु.
विनता के पुत्र थे तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, गरुड़, अरुण, आरुणी और वारुणी.
कद्रू के सहस्त्र पुत्रों में प्रमुख थे शेष या अनंत, वासुकी, तक्षक, कुमार, और कुलिका
दक्ष पुत्री मुनि के सोलह पुत्र हुए भीमसेन, उग्रसेन, सुपर्ण, वरुण, गोपति,धृतराष्ट्र, सूर्यावर्चस, सत्यवाचस, अर्कपर्ण, प्रयुत, भीम, चित्ररथ, कलिशिर, पर्जन्य, कली, और नारद. ये देव या गंधर्व हैं.
प्राधा की पुत्रियाँ थीं अनावद्या, मनुवशा, मनुनामप्रिया, अनुपा, सुभगा और भासी. उसके गंधर्व पुत्र थे सिद्ध, पूर्ण, बर्हिं, पूर्णाश, ब्रह्मचारी, रतिगुण, सुपर्ण, विश्ववसु, भानु, सुचंद्र, अतिवाहु, हहा, हुहू और तुंबुरू. प्राधा ने अनेक अप्सराओं को भी जन्म दिए थे:  अलम्बुस, मिश्रकेशी, विद्युत्पर्णा, तुलानघा, अरुणा, रक्षिता, रंभा, मनोरमा, असिता, सुबाहु, सुव्रता, सुप्रिया और सुभुजा.
कपिला ने गौ, ब्राह्मण, गंधर्व और अप्सराओं को जन्म दिए थे.
स्थाणु के ग्यारह पुत्र हुए थे: मृगव्याध, सर्प (शर्व), निर्ऋति, अजैकपात, अहिर्बुन्ध्य, पिनाकी, दहन, ईश्वर, कपाली, स्थाणु, भार्ग (भव). ये रुद्र कहलाते हैं. (बंगाल और बोरी पाठों में कुछेक नाम भिन्न हैं, ऐसी स्थिति में कोष्ठ में बोरी पाठ के नाम हैं. ध्यातव्य है कि ग्यारह रुद्रों के नाम वाल्मीकि रामायण, भागवत, अग्नि पुराण आदि में भी दिए गये हैं जो महाभारत में दिए गये नामों से भिन्न हैं.)  

ये तो हुए मरीचि-पुत्र कश्यप और स्थाणु की संतानें. अन्य ऋषियों (जो ब्रह्मा के मानस पुत्र थे) के पुत्रों के वर्णन इस प्रकार हैं: 
अंगिरस के पुत्र हैं वृहस्पति, अथत्य, और सम्वर्त; अत्रि के अनेक पुत्र हुए जो सभी वेद वेदांगों में पारंगत थे. पुलस्त्य के पुत्र राक्षस, वानर, किन्नर(1) और यक्ष हैं. पुलह के पुत्र शलभ (पतंगे, उड़ने वाले कीड़े), सिंह, किम्पुरुष(2), बाघ, भालू और भेड़िए बताए गये हैं. (बोरी पाठ में शलभ, भालू और भेड़िए नहीं हैं पर मृगों को पुलह के पुत्र कहा गया है.) क्रतु के पवित्र पुत्र सूर्य के सहचर (वालिखिल्य ऋषि) हैं 

दक्ष की दस पुत्रियाँ धर्म से व्याही गयीं थीं,  सत्ताईस चंद्रमा से और जैसा कहा जा चुका है तेरह कश्यप से. धर्म की पत्नियाँ हैं: कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा और मति. सोम (चंद्रमा) की सत्ताईस पत्नियाँ काल-निर्णय में लगी हुईं हैं. वे नक्षत्र हैं और योगिनी भी; वे तीनो लोकों के पथ प्रशस्त करती हैं. 

ब्रह्मा का एक पुत्र मनु भी था. मनु के पुत्र का नाम प्रजापति था, प्रजापति के आठ पुत्र देवलोक में वसु हैं. उनके नाम हैं धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास. इन में धर और ध्रुव की माता धूम्रा थी, चंद्रमा और अनिल की श्वसा, अह की माता रता थी, अनल की शाँडिल्या और प्रत्यूष एवं प्रभास की माता प्रभाता थी.

धर के दो पुत्र हैं, द्रविण और हुतहव्यवह. ध्रुव का पुत्र काल है त्रिलोक का नाशकर्ता. सोम का पुत्र वर्चस है. वर्चस और उसकी पुत्री मनोहरा के तीन पुत्र हैं, शिशिर, प्राण और रमण. अह के पुत्र हैं ज्योति, साम, शांत और मुनि. अग्नि का पुत्र कुमार है जो कार्तिकेय भी कहलाता है क्यों कि उसका पोषण कृत्तिका ने किया था. कुमार के बाद उसे तीन पुत्र और हुए, शाख, विशाख और नागमेश. अनिल की पत्नी शिवा है; शिवा और अनिल के दो पुत्र हैं पुरोजव और अविज्ञातगति. प्रत्यूष का पुत्र देवल नाम का ऋषि है जिस के दो पुत्र थे. वृहस्पति की बहन प्रभास की पत्नी थी. उसका पुत्र हुआ विश्वकर्मा, वास्तुविद् और महाशिल्पी, जिस ने सहस्त्रो आभूषण बनाए, दिव्य रथों का निर्माण किया और जिस की आज भी मनुष्य पूजा करते हैं.
धर्म का जन्म पितामह ब्रह्मा के दाहिने वक्ष से हुआ था. उस के तीन पुत्र हैं, साम, काम और हर्ष (शांति, इच्छा और आनंद). काम की पत्नी रति है, साम की प्राप्ति और हर्ष की नंदी. सवितुर की पत्नी त्वाष्ट्रि थी जिस ने वडवा (घोड़ी) के रूप में अश्विनी कुमारों को जन्म दिए.
भृगु का जन्म भी पितामह के वक्ष से हुआ था. भृगु के पुत्र शुक्र ने अपने तपोबल से अपने दो रूप किए थे. एक में वह ग्रह बन कर यात्रियों की रक्षा करता था और दूसरे में वह असुरों का गुरु था. उस के चार पुत्र भी असुरों के पुरोहित थे. उनमें दो प्रमुख थे  तष्टधर और अत्रि. भृगु को एक और पुत्र हुआ च्यवन जिस के जन्म से उस की माँ एक राक्षस के हाथों से मुक्त हो सकी थी.
मनु पुत्री आरुषि च्यवन की एक पत्नी थी जिस का पुत्र और्व हुआ, और्व का पुत्र रिचिक और रिचिक का पुत्र जमदाग्नि हुआ. जमदाग्नि के चार पुत्रों में कनिष्ठ पुत्र राम सब से श्रेष्ठ निकला. वह शस्त्र-विद्या में पारंगत था और उस ने अनेक बार सृष्टि को क्षत्रिय विहीन कर दिए थे.
ब्रह्मा के दो और पुत्र थे धातृ और विधातृ जो मनु के साथ रहे. शुक्र की पुत्री दिवि वरुण की ज्येष्ठा भार्या बनी. उस का पुत्र बल था और पुत्री सुरा (मदिरा).
जब भोजन की कमी से जीव एक दूसरे का भक्षण करने लगे तो अधर्म का जन्म हुआ. अधर्म सब प्राणियों का नाश करता है. उसकी पत्नी निरिति है, उनके पुत्र राक्षस हैं जो नैर्ऋत कहलाते हैं. मुक्य नैर्ऋत हैं भय, महाभय और मृत्यु.

ताम्रा की पाँच पुत्रियों से काक, शुक, हंस, श्येन आदि सभी पक्षियों के जन्म हुए और क्रोधा की नौ पुत्रियों से सभी पशुओं के, और वृक्षो के जन्म हुए. क्रोधा की पुत्री श्येनि अरुण की पत्नी थी. उनके पुत्र थे संपाती और जटायु.

जनमेजय के पूछने पर वैशम्पायन ने देव, दानव, राक्षस आदि के मनुष्य रूप में जन्म लेने के विवरण दिए.

असुर विप्रचित्ति ने मगध के राजा जरासंध के रूप में जन्म लिया था, हिरण्यकशिपु ने शिशुपाल के रूप में और प्रहलाद के अनुज संहलाद  ने शल्य के रूप में. राजा भगदत्त असुर विशाख का रूप था और केकेय वंश के राजाओं के रूप में पाँच महान असुरों ने जन्म लिए थे. राजा उग्रसेन (कन्स के पिता) के रूप में असुर स्वरभानु ने जन्म लिया था,  वृषपर्व राजा दीर्घप्रज्ञा के रूप में और वृषपर्व का अनुज अजक ने शाल्व नरेश के रूप में जन्म लिए थे.

सूक्ष्म पृथ्वी पर राजा वृहदरथ बना,  इशप राजा नग्नजित (सत्यभामा का पिता), शरभ ने राजर्षि पौरव के रूप में जन्म लिया,  दिति-पुत्र चंद्र ने कांबोजों के राजा चंद्रवर्मा के रूप में और दुर्जय ने विदर्भ के राजा रुक्मि (रुक्मिणी का भाई) के रूप में जन्म लिए थे. असुर कालनेमि ने पृथ्वी पर कन्स के रूप में जन्म लिया था. (यह सूची बहुत लंबी है मैंने बस उन्ही के विषय में लिखा है जो अपने असुर या मनुष्य रूप में विख्यात रहे हैं.)

भरद्वाज पुत्र द्रोण में वृहस्पति का अंश था, और उसके पुत्र अश्वत्थामा में महादेव, काम, यम, और क्रोध के अंश थे. वशिष्ठ के शाप से आठो वसुओं ने गंगा और शांतनु के पुत्रों के रूप में जन्म लिए थे. उनमें कनिष्ठ भीष्म था जिस ने जमदाग्नि पुत्र राम से युद्ध किया था.
कृपा रुद्रों के अंश से उत्पन्न हुआ था. शकुनी के रूप में द्वापर (युग) आया था और दुर्योधन के रूप में कलि. दुर्योधन के भाई के रूप में राक्षस आए थे.
वृष्णि वीर सात्यकि, नारयणी सेना का सेनापति कृतवर्मा, पांचाल नरेश द्रुपद और मत्स्य राज विराट, इन चारो में मारुतों के अंश थे.
अरिष्टा के पुत्र ने, जो हंस के नाम से कभी गंधर्व राज भी बना था, धृतराष्ट्र के रूप में जन्म लिया था और  विदुर में, जो धर्मराज था, अत्रि के अंश थे. 
सोम के पुत्र वर्चस ने अभिमन्यु के रूप में जन्म लिया था. जब ब्रह्मा के आदेश पर देव गण पृथ्वी पर जन्म ले रहे थे सोम अपने पुत्र को नहीं जाने देना चाहता था. जब उस ने सुना कि नारायण का मित्र नर भी अर्जुन के रूप में पृथ्वी पर जा रहा है और कि नारायण स्वयं अवतार ले रहे हैं तो उस ने वर्चस को जाने दिया पर इस शर्त पर कि जितना शीघ्र हो वह वापस चला आए. और यह भी कि उस का पुत्र एक ऐसे युद्ध में अपना पराक्रम दिखाए जिस में नर और नारायण उस के साथ नहीं रहें.
दृष्टद्युम्न में अग्नि के अंश थे और शिखण्डिन के रूप में एक राक्षस ने जन्म लिया था. द्रौपदी के पाँचो पुत्र विश्वदेव थे.
सूर्य-पुत्र कर्ण के जन्म का वृतांत बता कर वैशम्पायन ने कहा कि बलदेव में शेषनाग के अंश थे और प्र्द्युम्न में सनत कुमार के. श्री कृष  की सोलह सहस्त्र पत्नियों में अप्सराओं के अंश थे. नारायण को प्रसन्न रखने के लिए श्री के अंश रुक्मिणी में आए थे; इंद्राणी शची के अंश द्रौपदी में थे और सिद्धि और धृति पांडवों की माता कुंती और माद्री बन कर आईं थीं. सुबल-पुत्री गांधारी के रूप में मति आई थी.

यह सब सुना कर वैशम्पायन ने कहा “मैने राजन, सभी देव, गंधर्व, अप्सरा और राक्षासों के अंशों के अवतरण सुनायें हैं. अंशों के अवतरण की यह कथा धन, कीर्ति, संतान और दीर्घ जीवन देती है.”



(1) किन्नर का प्रयोग आज कल हिजड़ों के लिए किया जाता है. पुराणों में किन्नरों का वर्णन हय-ग्रीव (ऐसे मनुष्य जिनके गर्दन और मुँह घोड़े के हों) के रूप में किया गया है;  महाभारत में किन्नरों को आधा मनुष्य और आधा अश्व बताया गया है. (पाश्चात्य मिथकों के सेन्टौर से तुलना की जा सकती है). पुराणों और महाभारत के अनुसार किन्नरों का देश हिमालय में था और भारत के समतली मैदानों के व्यक्तियों के लिए वे आश्चर्यजनक जीव थे. वन-पर्व में पांडवों के किन्नरों के देश में जाने का वर्णन आया है. वर्तमान हिमाचल प्रदेश के किन्नौर को किन्नरों के इस पुरा-ऐतिहासिक देश से बहुधा जोड़ा गया है.

(2) किम्पुरुषों को आधा मनुष्य आधा सिंह, जिनके मुख सिंह के हो, बताया गया है. ये हिमालय के किसी अगम्य क्षेत्र में रहते थे. किम्पुरुषों के अनेक सन्दर्भ महाभारत में आए हैं. राजसूय यज्ञ के पहले (महाभारत के सभा पर्व के दिग्विजय पर्व में) अर्जुन ने उत्तर के देशों को जीतने के क्रम में किम्पुरुषों के देश को भी जीता था और एक किम्पुरुष गुरु द्रुम ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भाग भी लिया था. इसी द्रुम को रुक्मिणी के भाई, विदर्भ के राजा रुक्मि का गुरु भी बताया गया है.

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