Wednesday, 8 April 2015

आदि पर्व (2): पर्वसंग्रह पर्व

ऋषियों के अनुरोध पर सौति ने समंतपंचक का विस्तृत वर्णन सुनाया.

त्रेता और द्वापर युगों के बीच जमदाग्नि के पुत्र राम ने अत्याचार दूर करने के लिए पृथ्वी को बार बार क्षत्रिय विहीन कर उनके रक्त से समंतपंचक में पाँच सरोवर भर कर अपने पितरों का तर्पण किया था. पितरों ने प्रसन्न हो राम को जब वर देना चाहा तो राम ने पहले तो क्षत्रिय महा-संहार के पाप से मुक्ति माँगी और साथ में यह भी माँगा कि ये पाँच सरोवर विख्यात तीर्थों में गिने जायें. तब से समंतपंचक का क्षेत्र बहुत पवित्र माना जाता है.

द्वापर और कलि युग के बीच इसी पवित्र क्षेत्र में कौरवों और पांडवों की सेनाओं के बीच हुए युद्ध में अठारह अक्षौहिणी सैनिक मारे गये थे.  

“अक्षौहिणी क्या होता है?” ब्राह्मणों ने पूछा.

सौति ने कहा “एक रथ, एक हाथी, पाँच पैदल सैनिक और तीन अश्व मिल कर एक पत्ति होते हैं. तीन पत्ति मिल कर एक सेना-मुख; तीन सेना-मुख मिल कर एक गुल्म; तीन गुल्म मिल कर एक गण; तीन गण मिल कर एक वाहिनी; तीन वाहिनी मिल कर एक पृतन, तीन पृतन मिल कर एक चमु; तीन चमु मिल कर एक अन्किनि और दस अन्किनि मिल कर एक अक्षौहिणी सेना होती है. एक अक्षौहिणी में इक्कीस सहस्त्र आठ सौ सत्तर रथ और इतने ही हाथी होते हैं; पैदल सैनिकों की संख्या एक सौ नौ सहस्त्र तीन सौ पच्चास, और पैंसठ सहस्त्र छः सौ दस घोड़े होते हैं.


“कौरवों की ओर से भीष्म दस दिन, द्रोण पाँच दिन, कर्ण दो दिन, और शल्य आधे दिन तक लड़े थे. और आधे दिन भीम और दुर्योधन लड़े थे. उस अंतिम दिन की समाप्ति पर अश्वत्थामा और कृपा ने युधिष्ठिर की सोई हुई सेना को नष्ट कर दिया था.

“महाभारत अठारह खंडों में विभाजित है, ये खंड पर्व कहलाते हैं. प्रत्येक पर्व के अंदर भी अनेक पर्व हैं. अठारह (महा) पर्वों में व्यास ने तीन सौ पर्व रचे हैं. जिस प्रकार किसी अच्छे कुल के स्वामी के चारो ओर भ्रित्य नाचते रहते हैं उसी प्रकार कवि-गण इस महाभारत को संजोते रहते हैं." 

सौति ने महाभारत के भिन्न भिन्न पर्वों की रूपरेखा ऋषियों को दी. पहला पर्व आदि पर्व है. इस में सभी प्रमुख चरित्रों के जन्म, विवाह, उनकी वंशावली आदि की कथायें हैं. सत्यवती, व्यास, भीष्म, धृतराष्ट्र, पांडु, कौरव, पांडव, द्रौपदी, दृष्टद्युम्न, द्रोण, कृपा, कृपी आदि कुछ प्रमुख चरित्र हैं जिनके जन्मोँ के वृतांत दिए गये हैं. गरुड़, सर्प, भरत, ययाती के पुत्र, च्यवन, घटोत्कच आदि अन्य चरित्र हैं जिनके जन्मोँ की कथायें इस पर्व में हैं. इस पर्व में कुछ महत्वपूर्ण विवाह की  भी कथायें आईं हैं, यथा विचित्रवीर्य का काशी नरेश की पुत्रियों के साथ विवाह, धृतराष्ट्र और पांडु के विवाह, भीम का हिडिंबा के साथ, पांडवों का द्रौपदी के साथ, अर्जुन का ऊलूपी, चित्रान्गदा और सुभद्रा के साथ.

आदि पर्व की अन्य कथाओं में हैं जनमेजय का सर्प यज्ञ, अग्नि का शाप और उसकी शाप मुक्ति, समुद्र मंथन, गरुड़ और सर्पों के कृत्य, परीक्षित का शाप और सर्प दंश से उस की मृत्यु, पांडु की मृत्यु, दुर्योधन के षड्यंत्र, द्रुपद की द्रोण के प्रति उदासीनता, हस्तिनापुर में द्रोण, कर्ण और अर्जुन की प्रतिस्पर्धा, द्रुपद का बंदी बनाया जाना, लाक्षागृह दहन, पांडवों का निर्वासन, हिडिंब का वध, असुर वक का वध, अर्जुन का गंधर्व से युद्ध, तपती की कथा, धौम्य का पांडवों का पुरोहित बनना, पांडवों की पुनः प्रतिष्ठा, इंद्रप्रस्थ का निर्माण, तिलोत्तमा की कथा, अर्जुन का प्रवास, खांडव वन दहन, अग्नि से गान्डीव प्राप्त करना और असुर वास्तुविद् माया से मिलन.  

दूसरा महा पर्व सभा पर्व है. नाम के अनुरूप इस पर्व में इंद्र, यम, कुबेर, वरुण और ब्रह्मा के सभागृहों के वर्णन हैं. इस पर्व में युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करने की सोचता है, इस के लिए श्रीकृष्ण की सहायता से भीम द्वारा मगध में जरासंध का वध, असुर माया द्वारा प्राण रक्षा के बदले पांडवों के महल का निर्माण, राजसूय यज्ञ के लिए विश्व विजय, यज्ञ में शिशुपाल का उद्दंड व्यवहार, उसके जन्म की कथा, श्रीकृष्ण के चक्र द्वारा उस की मृत्यु, दुर्योधन का जलाशय में गिरना और उस का उपहास, चौपड़, पांडवों का सब कुछ हारना, द्रौपदी का चीर हरण और पांडवों का वनवास स्वीकारना इस पर्व की मुख्य घटनायें हैं.

तीसरा पर्व वन पर्व है. इसमें पांडवों का बारह वर्षों के वनवास का वर्णन है. युधिष्ठिर द्वारा सूर्य से अक्षय पात्र प्राप्त करना, विदुर का निष्कासन, उसका पुनः हस्तिनापुर बुलाया जाना, मैत्रेय का शाप,  किर्मीर वध, द्रौपदी और भीम का युधिष्ठिर से विवाद, युधिष्ठिर (और फिर अर्जुन) को प्रतिस्मृति विद्या, अर्जुन का दिव्यास्त्रों के लिए हिमालय और फिर इंद्र लोक गमन, उर्वशी का शाप, नल दमयंती की कथा, युधिष्ठिर का वृहदाश्व से अक्ष-हृदय सीखना, लोमश ऋषि का इंद्र लोक से आगमन, लोमश के साथ तीर्थ यात्रा ये सब इस पर्व की कुछ प्रमुख घटनायें हैं. अगस्त्य और लोपामुद्रा का प्रसंग, रिष्यशृंग और अंग की गणिका का प्रसंग, जमदाग्नि पुत्र राम का दशरथ पुत्र राम से मिलन, सुकन्या और च्यवन का विवाह, अश्विनी कुमारों द्वारा च्यवन को चिर यौवन देना, राजा सोमक का अपने एक मात्र पुत्र की बलि का वृतांत, गंधमादन की यात्रा, भीम का अपने भाई हनुमान से मिलना,  अष्टावक्र और वरुण पुत्र बंदी का शास्त्रार्थ,  राजा शिवि की अग्नि और इंद्र द्वारा परीक्षा, जटासुर का वध, यक्षों से युद्ध, कुबेर से मिलन. नहुष और युधिष्ठिर का संवाद, द्रौपदी का हरण, जयद्रथ की तपस्या, सावित्री-सत्यवान की कथा और श्री राम की कथा इस पर्व के अन्य महत्वपूर्ण प्रसंग हैं. इसी पर्व में कर्ण के जन्म का भी वर्णन है और इंद्र द्वारा उसके कवच-कुंडल के माँगने का भी.

अगला महा पर्व विराट पर्व है. इस में पांडव विराट के देश में जाने के पहले एक श्मशान के शमी वृक्ष पर अपने शस्त्र छुपाते हैं. इस के मुख्य प्रसंग हैं कीचक का भीम द्वारा वध, दुर्योधन द्वारा गुप्तचरों की नियुक्ति, त्रिगर्तोँ द्वारा विराट के गोधन पर आधिपत्य, विराट का बंदी बनाया जाना, भीम द्वारा उसे छुड़ाना, विराट के गोधन पर कौरवों का आधिपत्य, अर्जुन द्वारा पुनः उन्हे छुड़ाना और  विराट की पुत्री उत्तरा का अर्जुन द्वारा अपनी पुत्रवधू के रूप में स्वीकारना. 

पाँचवाँ महा पर्व उद्योग पर्व है. अवश्यंभावी युद्ध में सहयोग के लिए दुर्योधन और अर्जुन एक साथ श्रीकृष्ण के पास पहुँचते हैं. श्री कृष्ण ने कहा कि एक पक्ष से वे अकेले निःशस्त्र रहेंगे और दूसरे पक्ष में उनकी एक अक्षौहिणी सेना रहेगी. दुर्योधन ने सेना माँगी और इस तरह श्रीकृष्ण का  पांडवों के साथ युद्ध में आना सुनिश्चित हो गया. इसी पर्व में मद्र देश के राजा का कौरवों के साथ जा मिलने का वृतांत भी है. इस में श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव ले कर हस्तिनापुर जाने का भी उल्लेख है, जिसे दुर्योधन ने ठुकरा दिया था. इस पर्व में वर्णित अन्य प्रमुख कथायें हैं मातुली का अपनी पुत्री के लिए वर खोजना, गालव की गुरु दक्षिणा की कथा, विडुल पुत्र की साधना की कथा और अंबा की कथा. इस में श्री कृष्ण द्वारा कर्ण को समझाने का भी वर्णन है, दोनो पक्षों के रथी, अतिरथी और महारथियोँ के भी विस्तृत वर्णन हैं और अंत में कौरव सैनिकों का कुरुक्षेत्र में आगमन और युद्ध के एक दिन पहले दुर्योधन द्वारा अपने दूत के भेजने का वर्णन है.

भीष्म पर्व में संजय ने सेना की व्यूह रचना का वर्णन किया है. इस में श्रीकृष्ण ने अर्जुन के विषाद को मोक्ष के दर्शन से दूर किया है. इस में युद्ध के पहले दस दिनों का वर्णन है. भीष्म के पराक्रम को देख, युद्ध में अस्त्र नहीं उठाने का संकल्प ले कर भी श्री कृष्ण का अपने चाबुक के साथ लड़ाई में कूद पड़ने का भी वर्णन इस पर्व में है.  इस पर्व के अंत में शिखण्डी को सामने रख कर अर्जुन द्वारा भीष्म को मारने का वृतांत आया है.

अगला पर्व द्रोण पर्व है. इस में पाँच दिनों की लड़ाई का वर्णन है. द्रोण ने युधिष्ठिर को पकड़ने की योजना बनाई थी. इस योजना में सन्सप्तकोँ ने अर्जुन को युद्ध भूमि से दूर भगा लिया था और युधिष्ठिर तो हाथ नहीं आया पर कौरव महारथियों ने मिल कर अल्पवयस्क अभिमन्यु का वध किया था. अभिमन्यु की मृत्यु के बाद अर्जुन ने सात अक्षौहिणी सेना का नाश किया और अंत में जयद्रथ का भी जिस की अभिमन्यु को मारने में मुख्य भूमिका थी.  बचे सन्सप्तकोँ का भीम और सात्यकी ने नाश किया था. इस पर्व में अलम्बुश, श्रुतायु, जलसंध,  शोमदत्त, विराट, द्रुपद, घटोत्कच और अन्य वीरों की मृत्यु के वर्णन हैं. इस में अश्वत्थामा ने अपने पिता की मृत्यु पर नारायण अस्त्र का प्रयोग किया है.

इस के बाद कर्ण पर्व आता है. इस में मद्र-राज शल्य कर्ण का सारथी बना है. त्रिपुर असुर के पराभव की कथा, युद्ध के लिए चलते कर्ण और शल्य के कटु वचन, हंस और कौव्वे का वृतांत, पांड्य और दंडसेन की मृत्यु, युधिष्ठिर और अर्जुन का एक दूसरे पर कोप, श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को शांत करना इस पर्व की कुछ प्रमुख घटनायें हैं. इसी पर्व में भीम ने दुःशासन को मार कर उसका रक्त पीया है. पर्व के अंत में अर्जुन के हाथों कर्ण की मृत्यु का वर्णन है.

अगला पर्व शाल्य पर्व है. इस में मद्र-राज कौरव सेना का सेनापति है, जो युधिष्ठिर के हाथों मारा जाता है. इसी में सहदेव के हाथों शकुनी के मारे जाने का भी वर्णन है. अपनी सेना के तहस नहस हो जाने पर दुर्योधन एक जलाशय में जा छिपता है पर भीम के व्याध उसके छुपने की जगह पांडवों को बता देते हैं. अंत में दुर्योधन को निकलना पड़ता है और भीम के साथ उसका एकल युद्ध होता है जिस में उसकी जाँघ की हड्डी टूट जाती है. 

अगले पर्व सौप्तिक पर्व में कृतवर्मा, कृपा और अश्वत्थामा ने युद्ध भूमि पर घायल गिरे दुर्योधन से मिलने के बाद सोई हुई पांडव सेना पर आक्रमण कर द्रौपदी के पाँचो पुत्र और पांचाल सेना का नाश कर दिया है. अश्वत्थामा के वध के लिए द्रौपदी ने भोजन त्याग कर प्राण देने की शपथ ले ली. भीम और अर्जुन अश्वत्थामा के पीछे चले. पांडवों के नाश के लिए अश्वत्थामा ने दिव्यास्त्र भी चलाए पर अर्जुन और श्रीकृष्ण ने उसे रोक लिया. अश्वत्थामा पकड़ा गया, उस का मणि पांडवों ने छीन कर द्रौपदी को दिया, जिसे द्रौपदी ने युधिष्ठिर को दे कर भोजन नहीं लेने का अपना प्रण छोड़ दिया.

इस के बाद बहुत ही कारुणिक स्त्री पर्व आता है. इस में पुत्र क्षोभ से पीड़ित धृतराष्ट्र द्वारा भीम समझ कर एक लौह मूर्ति के टुकड़े कर देने का वृतांत आया है. विदुर ने धृतराष्ट्र को समझाया है और उस के बाद युद्ध में मृत वीरों की पत्नियों के विलाप का चित्रण है. श्री कृष्ण ने गांधारी को शांत करने के प्रयास किए हैं और युधिष्ठिर ने युद्ध में मृत सभी राजाओं की अंत्येष्टि की है. स्त्री पर्व हृदय विदारक है और आँखों में आँसू ला देता है.

बारहवां पर्व शांति पर्व है. इस में भीष्म ने अपनी शर शैय्या से राजा के धर्म और कर्तव्य बताए हैं.

तेरहवें अनुशासन पर्व में भीष्म के प्रवचन सुन युधिष्ठिर ने अपने आप को संयत किया है. इस में धर्म और अर्थ के नियमों का विस्तार से वर्णन किया गया है; इस में सत्य धर्म और दान धर्म की भी चर्चा है. ब्राह्मणों और गौओं की महत्ता बताई गयी है और देश-काल के सन्दर्भ में बदलते कर्तव्य समझाए गये हैं.

चौदहवाँ पर्व अश्व्मेधिका है. इस में सम्वर्त और मरुत्त की कथा है. इस में परीक्षित के जन्म का भी वृतांत है, जिसे अश्वत्थामा ने अपने दिव्यास्त्र से दग्ध कर दिया था. यज्ञ के अश्व के लिए अर्जुन की विभिन्न कुमारों से लड़ाइयों के भी वर्णन हैं, इन्ही लड़ाइयों में चित्रांगदा के पुत्र वब्रुवाहन और अर्जुन के युद्ध का भी वर्णन है. इसी पर्व में नेवले की कथा है जो यज्ञ भूमि पर लोट कर अपने को सुनहला कर लेना चाहता था.

अगला पर्व अश्रमवास पर्व है. इस में धृतराष्ट्र और गांधारी वानप्रस्थ होते हैं. पृथा भी उनके साथ चली जाती है. वन में व्यास की सहायता से धृतराष्ट्र अपने मृत पुत्र, पौत्रों से मिल पाता है. इस में धृतराष्ट्र अपने क्षोभ से मुक्त होता है और धर्मात्मा विदुर और संजय उच्च स्थान प्राप्त करते हैं. इस में युधिष्ठिर नारद से वृष्णि वंश के नष्ट होने की सूचना भी पाता है.

अगले पर्व मौशल पर्व में वृष्णि वंश के विनाश का वर्णन है. ब्राह्मण के शाप वश और मद्यपान से अपनी मति खो कर वृष्णि कुमारों ने सागर तट पर एक दूसरे का वध कर दिया था. बलराम और श्री कृष्ण के भी समय आ गये थे और वे भी अपने वंश के लिए कुछ नहीं कर पाए. अर्जुन अपने मामा वसुदेव की अंत्येष्टि में द्वारका जाता है और वहाँ सागर तट पर वृष्णि वीरों को मृत देख बहुत दुखी हो कर लौटता है. वृष्णि स्त्रियों और बच्चों के साथ वापस लौटते समय मार्ग में उसे एक  भयानक आपदा मिलती है और उस का गान्डीव भी निष्फल हो जाता है. 

महाप्रस्थानिका पर्व में पाँचो भाई और द्रौपदी राज्यभार से विलग हो देश भ्रमण करते हुए हिमालय को प्रस्थान करते हैं. मार्ग में उन्हे अग्नि मिलता है जिसे अर्जुन उस का गान्डीव लौटा देता है. हिमालय पर द्रौपदी और उसके चारो भाई चलते चलते गिरते जाते हैं पर युधिष्ठिर बस आगे बढ़ता रहता है

अंतिम पर्व स्वर्गारोहण पर्व है जिस में युधिष्ठिर एक दिव्य रथ पर स्वर्ग जाता है.

सौति कहता है “जो चारो वेद और सभी वेदांग जानते हैं पर महाभारत नहीं जानते उन्हें ज्ञानी नहीं कहा जा सकता”

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