उत्तंक की बात सुन कर जनमेजय ने अपने पिता की मृत्यु का पूरा वृतांत
अपने सभासदों से सुना. सभासदों ने जनमेजय को परीक्षित का जीवन चित्र
सुनाया – जन्म से मृत्यु तक. अभिमन्यु पुत्र परीक्षित के जन्म के समय कुरु
वंश एक महा-परीक्षा (महाभारत) भोग रहा था इसीलिए उसका नाम परीक्षित पड़ा
था. उसकी मृत्यु की कथा सुन कर जनमेजय क्रुद्ध भी था और चकित भी. “उस
पीपल वृक्ष के जलने और फिर से कश्यप द्वारा उसे जीवित करने की बात आप कैसे
जानते हैं?” उस ने पूछा; “यह न तो कश्यप ने किसी से कहा होगा और न ही तक्षक
ने”
“एक ब्राह्मण का सेवक उस वृक्ष पर उस समय चढ़ कर यज्ञादि के
लिए उस की सूखी टहनियाँ तोड़ रहा था. उस ने उनकी बातें सुनी थीं. तक्षक के
विष से वृक्ष के साथ वह भी जल कर भस्म हो गया था और कश्यप के मंत्र से
वृक्ष के साथ वह भी पुनर्जीवित हो गया था”; एक सभासद ने कहा.
सभासद की
बात सुन कर राजा जनमेजय रो पड़ा. “राजा परीक्षित की मृत्यु उस ऋषि-पुत्र के
शाप से अधिक उस दुष्ट तक्षक के चलते हुई. यदि तक्षक ने कश्यप को आने से
नहीं रोका होता तो मेरे पिता जीवित रहते. और तक्षक ने उन्हे बस इस लिए रोका
जिस से उसके विष के निरस्त होने की बात से उस की जगहंसाई नहीं हो. उस से
प्रतिशोध ले कर मैं अपना, उस ब्राह्मण उत्तंक का और आप सबों का भी चित्त
शांत करूँगा”
“तक्षक को दंड अब तुरंत मिलना चाहिए”, उस ने कहा “है कोई
ऐसा उपाय आप की दृष्टि में जिस से तक्षक को उस के अपराध का उचित दंड दिया
जा सके?”
मंत्री सहमत थे और राजा ने अपने पुरोहितों और
रित्विकों(1) से तक्षक को अग्नि में भस्म करने के उपाय खोजने को कहा. मुख्य
पुरोहित ने बताया कि पुराणों में इस के लिए सर्प यज्ञ का विधान है और कि
जनमेजय ही इसे कर सकता था. राजा ने यज्ञ की तैयारी शुरू करवा दी.
सर्प
यज्ञ के विधान को जानने वाले रित्विकों के निर्देश में शिल्पियों ने यज्ञ
स्थल को चुना और यज्ञ वेदी बनाने के लिए उस पर शास्त्रोक्त रीति से यथोचित
भूमि माप कर वेदी बनाने में हाथ लगा दिए. वेदी को धन-धान्य से सुसज्जित कर,
राजा को यजमान के स्थल पर स्थापित कर रित्विक वेदी के चारो तरफ अपने नियत
स्थानों पर बैठने लगे.
पर वेदी का निर्माण कार्य पूरा होने के पहले
सूत जाति के एक शिल्पी ने, जिसे वेदी के निर्माण से संबंधित शास्त्रों के
विधान के ज्ञान थे और जिसे भवनों के आधार की तैय्यारी का भी पूरा ज्ञान
था, वेदी में दोष बताए थे. “यह भूमि उपयुक्त नहीं है, वह काल जब भूमि मापी
जा रही थी उस कार्य के लिए उपयुक्त नहीं था और यह यज्ञ पूरा नहीं हो
पाएगा”, उस ने कहा था और यह भी जोड़ दिया “यज्ञ किसी ब्राह्मण के हस्तक्षेप
के चलते पूरा नहीं होगा”. यह सब सुन यज्ञ शुरू होने के पहले जनमेजय ने
द्वारपालों को आदेश दे दिए थे कि वे बिना राजा की आज्ञा के किसी व्यक्ति को
यज्ञ भूमि पर नहीं आने देंगे.
यथोचित विधियों से यज्ञ आरंभ हुआ.
पुजारी श्याम वस्त्रों में थे, धुएं से उनकी आँखें लाल थीं और वे सर्पों के
लिए यमराज बने हुए थे. मंत्रोच्चारण के साथ वे यज्ञ की अग्नि में घी के
होम दे रहे थे. हर होम के साथ पूरे विश्व में सभी सर्पों के हृदय भय से और
अधिक काँपने लगते थे.
पुरोहित और रित्विक सर्पों के नाम ले ले कर
अग्नि में होम करते थे और वे सर्प चीत्कार करते हुए, दूर दूर से उड़ते हुए आ
कर यज्ञ की अग्नि में गिर रहे थे. श्वेत, कृष्ण, नील सभी रंगों के बाल,
युवा और वृद्ध सर्प यज्ञ की अग्नि में जैसे बरस रहे थे. कई सर्प योजनों
लंबे थे, कई अश्वों के रूप में थे, कुछ हाथी की सूंढ़ की तरह थे… भयावह,
शक्तिशाली और विषैले; सभी निरीह हो कर उस ज्वाला में अपने को अर्पित कर
रहे थे.
शौनक के पूछने पर उग्रश्रवा ने सर्प यज्ञ के रित्विजों और
सदस्यों के नाम बताए: च्यवन के वंश का चंडभार्गव उस यज्ञ का होता था, कुत्स
उस यज्ञ का उद्गाता था जो वैदिक मंत्रों को पढ़ रहा था, जैमिनी यज्ञ का
ब्राह्मण था और श्रणगर्व एवं पिंगल अध्वार्यू थे. अपने पुत्र और शिष्यों के
साथ व्यास, उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु, पर्वत, अत्रेय आदि अनेक वेदज्ञ
ब्राह्मण उस यज्ञ के सदस्य थे.
अग्नि में गिरते सर्पों के देह की
वसा की नदियाँ बहने लगीं थीं. जलते सर्पों के दुर्गंध से वहाँ साँस लेना
कठिन हो गया था. अग्नि में गिरते सर्पों के चीत्कार के आगे कुछ सुन पाना भी
कठिन हो गया था.
यज्ञ के शुरू होने के पहले, तक्षक भाग कर अपने
प्राण बचाने के लिए इंद्रलोक चला गया था. इंद्र को उस ने सब कुछ बताया,
अपनी भूल भी स्वीकार की और देवेन्द्र से अपनी रक्षा करने की गुहार लगाई.
इंद्र ने उसे आश्वस्त किया कि वहाँ (इंद्रलोक में) यज्ञ से उसे कोई डर नहीं
है. यह सुन तक्षक आनंद से अपने दिन काट रहा था.
इधर पृथ्वी पर
सर्पराज वासुकी चिंता में डूबा हुआ था. सर्प उस यज्ञ की ज्वाला में गिरते
जा रहे थे; उस का परिवार छोटा होता जा रहा था. अपनी बहन जरत्कारु से उस ने
कहा “मेरी भुजायें काँप रहीं हैं और मेरी चेतना लुप्त होती जा रही है. अचेत
हो कर मैं भी अब कभी उस ज्वाला में जा गिरूँगा. समय आ गया है जब हमें
आस्तीक को इस यज्ञ को रोकने के लिए कहना चाहिए.”
सर्पिणी जरत्कारु
ने अपने पुत्र आस्तीक को कद्रू के शाप की बात बताई और यह भी कि पितामह
ब्रह्मा ने कह रखा है कि यायावर जरत्कारु और सर्पिणी जरत्कारु का पुत्र
आस्तीक ही सर्पों को उस यज्ञ से मुक्त कर पाएगा. सब कुछ बता कर उस ने
आस्तीक से कहा कि जो भी वह उचित समझे वह करे.
सब सुन कर आस्तीक
यज्ञ भूमि पर जाने के लिए तत्पर हुआ. जाने के पहले अपने मामा वासुकी से उस
ने कहा “मैं हस्तिनापुर जा रहा हूँ, आप निश्चिंत हो जायें. मैं इस यज्ञ को
अवश्य रुकवा दूँगा.” अपने मामा को आश्वस्त कर वह ब्राह्मण बालक जितना शीघ्र
हो सके यज्ञ स्थल पर आया. द्वारपालों ने उसे रोका पर उन्हें अपने आशीष से
प्रसन्न कर आस्तीक यज्ञ की वेदी की निकट तक पहुँच गया.
वहाँ
पहुँच कर आस्तीक ने यज्ञ की प्रशंसा शुरू की “सोम, वरुण और प्रजापति ने भी
कभी प्रयाग में यज्ञ किए थे पर आप का यज्ञ, भारत, किसी से कम नहीं है, सबों
का कल्याण हो. शक्र ने भी एक सौ यज्ञ किए हैं किंतु आप का यह यज्ञ इंद्र
के दस सहस्त्र यज्ञों के समतुल्य है. सबों का कल्याण हो. आप का यह यज्ञ,
भारत, यम, हरिमेध या राजा रंतिदेव के यज्ञों के समान है. यह यज्ञ, माया या
राजा शशविंदु या वैश्रवन के यज्ञ से कम नहीं है. आप का यज्ञ राजन, नृग,
अजामिद या दशरथ नंदन के यज्ञों के समान है. सबों का कल्याण हो. यह यज्ञ
देव-पुत्र राजा युधिष्ठिर के यज्ञ के समतुल्य है. आप का यह यज्ञ सत्यवती के
पुत्र कृष्ण द्वैपायन के यज्ञ के समान है जिस में वे स्वयं आचार्य थे.”
यज्ञ
की प्रशंसा करने के बाद आस्तीक रित्विकों की ओर उन्मुख हुआ. “ये रित्विक
और सदस्य, जो आप के यज्ञ का सम्पादन कर रहे हैं वे तेज में इंद्र और सूर्य
से कदाचित् कम नहीं हैं. उन्हें अब और कुछ जानने के लिए नहीं बचा है और
उन्हे दान देने से आप अक्षय पुण्य के भागी बनेंगे. मेरा विश्वास है कि
विश्व में कहीं कोई भी रित्विक आपके रित्विकों के तुल्य नहीं हैं. इन
रित्विकों द्वारा अर्पित किए गये होम अग्नि के द्वारा सीधे देवताओं तक
पहुँचते हैं.”
और रित्विकों की प्रशंसा के बाद वह सीधे राजा की
प्रशंसा पर आया. “मर्त्य लोक का कोई राजा प्रजा के संरक्षण में आप के तुल्य
नहीं है. आप का त्याग मुझे अचंभित कर देता है. निस्संदेह आप या तो वरुण
हैं या धर्मराज. इस विश्व की रक्षा आप वैसे ही करते हैं जैसे वज्र धारण
करने वाला इंद्र कर सकता है. राजाओं में आप नभग और दिलीप से कम नहीं हैं.
पराक्रम में आप ययाति या मांधाता हैं, आप में वाल्मीकि या भीष्म सदृश शक्ति
छिपि है. आप को अपने क्रोध पर वैसा ही नियन्त्रण है जैसा वशिष्ठ को हुआ
करता था. आप की आभा नारायण के सदृश है और आप का न्याय यम के सदृश. श्री
कृष्ण की तरह आप में सभी गुण भरे हुए हैं. आप का शस्त्र और शास्त्र ज्ञान
जमदाग्नि पुत्र राम के समान है. भगीरथ की तरह आप बस अपनी एक दृष्टि से किसी
को संत्रस्त कर सकते हैं.
इस तरह आस्तीक ने अपने वचन से जनमेजय,
रित्विक और यज्ञ की अग्नि तीनो को प्रसन्न कर दिया. हर्षित हो राजा ने उसे
कोई वर देना चाहा पर वह अभी यजमान था और उस ने सदस्यों से इस की अनुमति
माँगी, “यह बालक बस देखने में बालक लगता है; ज्ञान और बुद्धि में यह किसी
वयोवृद्ध से कम नही है. मैं इसे कोई वर देना चाहता हूँ, यदि आप ब्राह्मण गण
मुझे ऐसा करने दें”
सदस्यों ने कहा “राजा को ब्राह्मणों को
सम्मानित करना ही चाहिए, चाहे वे बालक ही क्यों न हों. इस बालक की
इच्छापूर्ती अवश्य होनी चाहिए पर अभी उस का समय नहीं है. पहले तक्षक को
अग्नि में गिर जाने दें”.
फिर भी राजा ने आस्तीक से पूछ लिया “आप
क्या चाहते हैं, जो भी चाहते हो मांगिए”. इस पर यज्ञ का होता अप्रसन्न हुआ
“तक्षक अभी तक नहीं आया है”. राजा का ध्यान भी यज्ञ पर आ गया “तक्षक को
अग्नि में जलाने के लिए जो कुछ किया जा सकता है वह आप करें; तक्षक ही मेरा
शत्रु है”. रित्विकों ने बताया क़ि अग्नि के अनुसार तक्षक अभी इंद्रलोक में
छिपा हुआ है. राजा ने उस सूत लोहिताक्ष (शिल्पी, जिसे यज्ञ के विधान का
पूरा ज्ञान था) से भी पूछा. उस ने भी वही कहा जो ब्राह्मण कह रहे थे “इंद्र
ने उस से कहा है यहाँ तुम अग्नि से सुरक्षित रहोगे”.
राजा दुखी हुआ
और उस ने रित्विकों से जो कुछ वे कर सकते थे करने के अनुरोध किए. रित्विक
मंत्र पढ़ते हुए हवन करते रहे और कुछ देर में इंद्र यज्ञ स्थल पर दिखाई
दिया. उस के साथ अनेक देव और अनेक अप्सरायें भी थीं. पर तक्षक कहीं नहीं
दिख रहा था – वह इंद्र के वस्त्रों में छुपा हुआ था. राजा ने रित्विकों से
कहा कि यदि तक्षक को इंद्र ने बचा रखा है तो वे इंद्र को भी हवन की अग्नि
में गिराने के मंत्र पढ़ें. होताओं और रित्विकों ने वही किया. इंद्र डर कर
तक्षक को अपने वस्त्र से निकाल फेंक यज्ञ स्थल से दूर भाग चला.
तक्षक
को गिरते देख रित्विकों ने राजा को आस्तीक को वरदान देने की अनुमति दे दी
“यज्ञ सुचारू रूप से चल रहा है, तक्षक भी अब दृष्टिगोचर हो गया है, अब आप
चाहें तो इस ब्राह्मण बालक को वरदान दे सकते हैं”.
जनमेजय ने आस्तीक
से कुछ भी माँगने को कहा. तक्षक उस समय आकाश से यज्ञ की अग्नि में गिरने
ही वाला था जब आस्तीक ने राजा से यज्ञ रोक देने का अनुरोध किया. “यदि आप
कुछ देना चाहते हैं तो इस यज्ञ को यहीं रोक दें जिस से और सर्पों की मृत्यु
नहीं हो”.
जनमेजय सन्न रह गया. उस ने सोचा था ब्राह्मण बालक धन
संपत्ति, भूमि, गौ आदि माँगेगा. उस की इस माँग पर उस से कुछ बोले नहीं बन
रहा था. जब राजा के बार बार पूछने पर भी आस्तीक ने वही बात दुहाराई तो यज्ञ
के सभी सदस्यों ने भी राजा को यज्ञ रोक कर ब्राह्मण को मुँह माँगे वर देने
के अपने वचन सत्य रखने की सलाह दी.
और सर्प यज्ञ, जैसा उस सूत लोहिताक्ष ने कहा था, एक ब्राह्मण के हस्तक्षेप के चलते पूरा नहीं हो सका.
शौनक
के पूछने पर सौति ने प्रमुख मृत सर्पों के नाम गिनाए और तक्षक के आकाश से
तुरन्त नहीं गिर पड़ने का कारण भी बताया. जैसे ही इंद्र ने तक्षक को अपने
वस्त्र से निकाल फेंका था, आस्तीक ने अपनी साधना और अपने तप के बल से उसे
गिरने से रोक दिया था और तक्षक, जो भय से बेसुध हो गया था, वहीं रुका रहा
जब तक यज्ञ का समापन नहीं हो गया.
शास्त्रोक्त विधान से यज्ञ का
समापन किया गया. राजा जनमेजय ने सभी पुरोहितों, होताओं, रित्विकों और
सदस्यों को प्रचुर दक्षिणा दी. लोहिताक्ष को भी राजा ने पर्याप्त धन दिया.
आस्तीक भी अपने उद्देश्य की पूर्ति हो जाने से अत्यंत प्रसन्न हुआ. राजा
अभी भी उस से प्रभावित था और उस ने उसे अपने होने वाले आश्वमेध यज्ञ में
सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया. राजा का आमंत्रण स्वीकार कर आस्तीक अपनी
माँ और अपने मामा के पास चला.
उनके हर्ष का पारावार नहीं था. सभी
प्रमुख सर्प वासुकी के साथ बैठे थे. प्रसन्न चित्त से उन्होने भी आस्तीक
को वर देने चाहे. आस्तीक ने कहा “जो व्यक्ति, प्रातः या संध्या काल में
प्रसन्न चित्त और ध्यान से मेरी इस पवित्र कथा को पढ़ेगा उसे आप से (सर्पों
से) कोई भय नहीं रहना चाहिए”. तक्षक तुरंत तैयार हो गया. “जो भी आस्तीक का
स्मरण करेगा उसे सर्पों से कोई भय नहीं रहेगा”
सौति ने तब कहा
“प्रमति जब रुरू को यह कथा सुना रहा था तो मैने भी सुनी थी और जितना मैं
जानता हूँ वह सब मैने आप लोगों को सुना दिया है.”
(1)
यज्ञ कराने वाला यजमान कहलाता है. यजमान विशेषज्ञ ब्राह्मणों की सहायता से
यज्ञ करा पाता है. तीन विशेषज्ञों के नाम ऋग्वेद के पहले सूक्त के पहले
मंत्र में आए हैं: पुरोहित (जो यज्ञ कर्म को आगे बढ़ाता है), रित्विज् (जो
समयानुकूल यज्ञ का संपादन करता है) और होता (जो देवताओं का आह्वान करता
है). बहुधा बड़े यज्ञों के संपादन के लिए विशेषज्ञों का एक दल नियुक्त
किया जाता है जिसे "यज्ञ संसद" भी कहते हैं. इन विशेषज्ञों में से एक यज्ञ
का आचार्य बनाया जाता है. आचार्य को यज्ञ विधि का ज्ञान तो होना ही चाहिए,
उसका अपना जीवन भी बहुत पवित्र होना चाहिए. यज्ञ की उद्देश्यपूर्ति बहुधा
उस के तपोबल पर निर्भर करती है. आचार्य का वयोवृद्ध होना आवश्यक नहीं है –
दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ में महर्षि वशिष्ठ ने श्याश्रन्ग को आचार्य बनाया
था. यज्ञ संसद के सदस्य यज्ञ के सदस्य कहलाते हैं.
यह भी कहा गया है
कि जहाँ एक ही ब्राह्मण यज्ञ करा रहा है वह पुरोहित कहलाता है और जहाँ दो
ब्राह्मण हों वहाँ एक रित्विक और एक पुरोहित कहलाता है. ध्यातव्य है कि
रित्विक के साथ यजमान का कोई दीर्घ कालीन संबंध नहीं रहता – यह संबंध
दक्षिणा के बदले यज्ञ संपादन तक सीमित रहता है.
यज्ञ कहा हुआ था
ReplyDeleteहस्तिनापुर
ReplyDeleteतक्षशिला में सर्प यज्ञ हुआ था।
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