Wednesday, 8 April 2015

आदि पर्व (4): च्यवन का जन्म और अग्नि का शाप

उग्रश्रवा (सौति) नैमिष में शौनक के यज्ञ के लिए आए ब्राह्मणों को महाभारत की कथा सुना रहा है. आज शौनक स्वयं कथा सुनने आया है. शौनक एक भार्गव ब्राह्मण है और वह अपने आदि पुरुष भृगु से संबंधित कुछ सुनना चाहता है. उग्रश्रवा ने उसे भृगु के पुत्र च्यवन के जन्म की कथा सुनाई. उग्रश्रवा कह रहा है:

महान और पवित्र ऋषि भृगु को स्वयंभू ब्रह्मा ने वरुण के यज्ञ के अग्निहोत्र से उत्पन्न किया था. भृगु का पुत्र च्यवन हुआ और च्यवन का पुत्र था प्रमति. प्रमति का घृताची अप्सरा से पुत्र रुरू हुआ था. रुरू और उसकी पत्नी प्रमद्वरा का पुत्र वेदज्ञ शुनक था जिस के नाम से तुम शौनक जाने जाते हो.

प्राचीन काल में एक ब्राह्मण को पुलोमा नाम की एक रूपवती पुत्री थी. पुलोमा का रूप रंग, नाक-नक्श, अंग-सौष्ठव और उसका स्वभाव कुछ ऐसा था कि वह सबों का मन मोह लेती थी. संयोग से एक राक्षस ने उसे कभी देखा था और उस पर मोहित हो गया था. ब्राह्मण ने भी पुलोमा का वाग्दान (उस की सगाई) उस राक्षस से कर दी थी. राक्षस ने मन ही मन पुलोमा को अपनी पत्नी बनाने की ठान ली थी. पर इसके पहले कि वह अपनी इच्छा पूरी करने के लिए कोई कदम उठाये, ब्राह्मण ने पुलोमा का हाथ महर्षि भृगु के हाथों सौंप दिया.

भृगु और पुलोमा ब्रह्मावर्त के एक सघन वन में आश्रम बना कर रहने लगे. समय पर पुलोमा ने गर्भ धारण किया और आठवें मास में जब भृगु किसी काम से आश्रम से दूर निकला हुआ था, वही राक्षस घूमते हुए आश्रम आ पहुंचा. पुलोमा ने अतिथि का वन के फल-मूलों से सत्कार किया. पर राक्षस ने उसे पहचान लिया और उसकी आकांक्षा बलवती हो गयी. पुलोमा को बल पूर्वक पकड़ कर वह कहने लगा: "तुम्हारे पिता ने पहले तुम्हे मुझे देने की सोची थी, तुम्हारा वाग्दान कर दिया था मेरे हाथों. भृगु कहीं दूर भी नहीं दिखाई देता था तब. तुम नियमानुसार मेरी पत्नी हो. भृगु के साथ तुम्हारा विवाह अवैध है. आज मैं तुम्हे यहाँ से हर कर तुम्हारा वरण करूंगा और तुम मेरी वैध पत्नी बन जाओगी."

पुलोमा की आपत्ति पर राक्षस ने कहा: "अग्नि समस्त स्थानों पर सदैव विद्यमान रहते हैं, मैं तुम्हारे सामने उनसे पूछता हूँ" यह कह कर उस ने महर्षि के हवन कुण्ड से उठती ज्वाला से पूछा "हे अग्नि देव, आप सब जगह सब समय उपस्थित रहते हैं, आप ही कहें यह सुंदरी किसकी सही सहधर्मिणी है - मेरी या भृगु की. इस कामिनी के पिता ने इसका मेरे साथ वाग्दान कर दिया था और मैने इसे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था पर बाद में इस के पिता ने इसके हाथ पाखंडी भृगु को सौंप दिए. आप बतायें क्या यह न्यायपूर्ण है? क्या यह सही अर्थों में भृगु की वैध पत्नी कहला सकती है? आप देवताओं के मुख हैं अतः आप को बताना ही पड़ेगा. आज इसे अकेली पा कर मैने तय कर लिया है कि मैं इसे बलपूर्वक आश्रम से उठा ले जाऊँगा. मेरा हृदय कोप से जलने लगता है जब भी मैं सोचता हूँ कि जिस से मेरी सगाई हुई थी उस स्त्री को भृगु लिए फिरता है”

राक्षस बार बार अग्निदेव से पूछ रहा था पर अग्नि बोलने में हिचकिचा रहा था. राक्षस ने फिर पूछा “हे अग्निदेव, आप सब प्राणियों में हमेशा रहते हैं और उनके गुण- अवगुण सब कुछ देखते हैं. बस मेरे एक प्रश्न का आप उत्तर दें क्या भृगु ने मेरी मंगेतर को हथिया नहीं लिया है? आप की बात सुन कर मैं इसे इस आश्रम से ले जाऊँगा.”

अग्नि धर्मसंकट में पड़ गया था. वह असत्य नहीं बोलना चाहता था पर वह सत्य बोल कर ऋषि का क्रोध भी नहीं झेलना चाहता था. कुछ देर बाद उस ने धीमे स्वर में कहा “इस पुलोमा को पहले तुम ने ही चुना था राक्षस, पर तुम ने शुभ विवाह के पवित्र मंत्रों और क्रियाओं के साथ इसे नहीं पाया था. वरदान की चाह में इस के पिता ने इस के हाथ भृगु को सौंप दिए थे. यह तुम्हे नहीं दी गयी थी राक्षस, यह मेरे समक्ष वेदोक्त मंत्रों के साथ भृगु की पत्नी बनाई गयी थी. मैं कभी असत्य नहीं बोल सकता.”

अग्नि की बात सुन कर वहां से शीघ्र दूर निकल जाने के विचार से राक्षस ने एक वराह का रूप ले लिया और पुलोमा को ले तेजी से भाग चला. इस क्रम में हुए बल प्रयोग और उग्र व्यवहार के उत्पात से पुलोमा के गर्भ में स्थित बालक माँ के पेट से निकल भूमि पर गिर पड़ा. उस शिशु के देदीप्यमान मुख को देखते ही राक्षस वहीं जल कर भस्म हो गया. बालक समय के पहले गिर पड़ा था, इस च्युति के चलते उसका नाम च्यवन पड़ा.

दुख से व्यग्र  पुलोमा अपने शिशु को उठा कर रोते हुए चल दी.ब्रह्मा ने अपने पुत्र की निर्दोष पत्नी को रोते हुए देखा और स्वयं उसे शांत कराने आए. पुलोमा के आँसुओं से एक नदी उमड़ चली और वह नदी उस महान तपस्वी भृगु की पत्नी के चरण चिह्नों पर बहने लगी. जब पितामह ने इसे देखा तो उन्होने अपनी पुत्रवधू के चरण चिह्नों पर चलती उस नदी का नाम दिया वधूसरा. यह नदी अभी भी च्यवन के आश्रम से हो कर बहती है.

जब भृगु ने अपने पुत्र, पत्नी को देखा और सारी बात सुनी तो उस ने पूछा “किस ने राक्षस को तुम्हारे बारे में बताया? वह मेरी पत्नी को ले जाने की सोच भी नहीं सकता था?”
पुलोमा ने कहा “राक्षस को मेरी पहचान अग्नि देव ने की थी. अग्नि की बात सुनते ही वह मुझे ले कर भाग चला था; बस तुम्हारे पुत्र के प्रखर रूप ने मेरी रक्षा की, उसे देखते ही वह राक्षस जल कर भस्म हो गया”

यह सुन भृगु अग्नि पर बहुत कुपित हुआ और उस ने अग्नि को शाप दिया “तुम सब कुछ खाया करोगे”

शाप सुन कर अग्नि भी कुपित हुआ “यह कैसा दुस्साहस है ब्राह्मण? मैने क्या किया जो तुमने यह शाप मुझे दे दिया?कौन सा दोष तुम मेरे ऊपर लगा सकते हो?  मैने निष्पक्ष हो कर, जो सत्य था बस वही कहा है. साक्षी यदि पूछे जाने पर सच सच नहीं बताता है तो वह सात पीढ़ियों तक के अपने पूर्वजों और अपने वंशजों के पतन का कारण बनता है.  जो जानते हुए भी नहीं बताता है वह भी निष्कलंक नहीं रहता.

"मैं भी तुम्हे शाप दे सकता हूँ, किंतु मैं ब्राह्मणों को बहुत आदर भाव से देखता हूँ. मैं जानता हूँ कि जो मैं कहने जा रहा हूँ वह तुम्हे पता होगा फिर भी मुझे सुन लो. योग से मैं ने अपने आप को बहुत रूपों में विस्तृत कर लिया है और मैं भिन्न भिन्न रूप में भिन्न भिन्न जगहों पर रहता हूँ – गृहस्थ के घर में होम की अग्नि, यज्ञ के अग्निहोत्र, पवित्र क्रियाओं में (यथा विवाह) आदि. मुझ में वेदोक्त रीति से डाले गये घी से देव और पितृ संतुष्ट होते हैं. देव और पितृ दोनो जल हैं, देव और पितृयों का दर्श और पूर्णमास यज्ञों पर समान अधिकार होता है. इस तरह देव पितृ हैं और पितृ देव. वे वही खाते हैं जो मुझ में गिराया जाता है. मुझे इसीलिए देव और पितृ का मुख कहा जाता है. यदि मैं देव और पितृ का मुख हूँ तो मैं सब कुछ – शुद्ध और अशुद्ध भी – कैसे खा सकता हूँ?"

फिर कुछ सोच कर अग्नि सभी जगहों से हट गया – ब्राह्मणों के नित्य होम से, पवित्र क्रियाओं से और अन्य समारोहों से भी. बिना होम और वषट के, बिना स्वाधा और स्वाहा के सभी प्राणी अस्वस्थ हो गये. चिंतित ऋषि गण देवताओं के पास गये “अग्नि के बिना यज्ञ नहीं हो पा रहे हैं और तीनो लोकों के जीव संकट में पड़ गये हैं. जो उचित है वह बिना समय गँवाए किया जाए.” ऋषि और देव गण तब ब्रह्मा के पास गये. “देवताओं का भोजन पहले अग्नि ग्रहण करता है, वह कैसे सब कुछ खा सकता है?”

सब सुन कर पितामह ने अग्नि को बुलाया और उसे समझाया – तुम्ही सृष्टि को रचते हो, तुम्ही उस का पोषण करते हो और तुम्ही उसका नाश भी करते हो.  तुम्हारा आचरण ऐसा नहीं होना चाहिए  जिस से सभी यज्ञ, पूजन आदि समारोह बंद हो जायें. तुम यज्ञ के घी खाते हो, तुम्ही सदैव शुद्ध रहते हो; किस बात से तुम इतने रुष्ट हो गये हो?
तुम कभी ऐसे नहीं हो सकते कि तुम सब कुछ खाने लगो. तुम्हारे अधम अंशों में जो ज्वाला रहती है वह सब कुछ खा सकती है, तुम्हारा वह रूप जो जीवों के पेट में रहता है (जठराग्नि) वह सब कुछ खा सकता है पर जैसे सूर्य की किरणों के स्पर्श से सब कुछ शुद्ध हो जाता है वैसे ही तुम से दग्ध होने पर भी सब कुछ शुद्ध हो जाएगा. तुम अपनेआप में सर्वोच्च शक्ति हो. उसी शक्ति से तुम अपने को पवित्र रखते हुए ऋषि के शाप को सच कर दो और अपना, देवताओं और पितृयों के भोजन स्वीकार करो.

अग्नि ने पितामह की बात मान ली. घरों में होम होने लगे, ऋषियों के अग्निहोत्र प्रज्वलित हो उठे और देश समाज में यज्ञ फिर से होने लगे.

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