Friday, 24 April 2015

आदि पर्व (12): आदिवंशावतरण पर्व (1)

सौति कह रहा है:

जनमेजय के सर्प यज्ञ में भाग लेने कृष्ण द्वैपायन हस्तिनापुर आए.  ऋषि को अपने शिष्यों के साथ आए देख राजा जनमेजय बहुत हर्षित हो कर आगे आया और सदस्यों की सहमति से उन्हे स्वर्ण पीठ पर बिठा कर उस ने उनकी विधिवत पूजा की. ऋषि को जल, अर्घ्य, गौ इत्यादि दे कर राजा और सदस्यों ने उनसे कौरवों और पांडवों का वृतांत सुनाने का अनुरोध किया. “आप ने उन्हे अपनी आँखों से देख रखा है, क्या कारण था उनके वैमनस्य का जिसमें पूरा विश्व झुलस गया था?”  व्यास ने यह सुन अपने शिष्य वैशम्पायन को वह कथा सुनाने का निर्देश दिया.

अपने गुरु को साष्टांग प्रणाम कर वैशम्पायन ने यज्ञ सभा को संक्षेप में वह कथा सुना दी. इस संक्षिप्त पाठ से कोई संतुष्ट नहीं था. जनमेजय ने कहा “इसे सुन कर विस्तृत कथा सुनने के लिए मैं और भी अधिक उत्सुक हो उठा हूँ. धार्मिक पुरुषों ने उस युद्ध में अपने संबंधियों के वध किए हैं. किसी तुच्छ कारण से उन्होने वैसा नहीं किया होगा क्यूँकि आज भी उनकी प्रशंसा की जाती है. क्यों उन्हों ने अपने संबंधियों के वध किए? पांडव जैसे वीर कौरवों के अत्याचार क्यों सहते रहे?  भीम, जिसे दस सहस्त्र हाथियों का बल था, कैसे अपने प्रति किए गये अन्याय को चुप चाप सह सका? सती कृष्णा ने दुःशासन को अपनी कोप दृष्टि से जला क्यों नहीं दिया? चारो भाई क्यों युधिष्ठिर के पीछे हमेशा चले जब कि उनके अग्रज को द्यूत की लत लगी हुई थी? और युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा को, जिसे सब कर्तव्यों का ज्ञान था यह लत कैसे लग सकी?
 “हे ब्राह्मण, आप इतने विस्तार में इस कथा को सुनायें कि मैं अपने प्रश्नों के उत्तर पा सकूँ”

वैशम्पायन ने कहा “राजन, यह बहुत लंबी कथा है. इस में एक लाख श्लोक हैं, इस के सम्पूर्ण पाठ के लिए अलग से समय नियुक्त कीजिए. यह वेदों के समान पाप नाशक है. इसे को जय भी कहा जाता है और विजय के इच्छुक राजाओं को इसे अवश्य सुनना चाहिए. युवा राजा अपनी रानी के साथ इसे सुनें तो उन्हे पराक्रमी पुत्र प्राप्त होते हैं. इस में धर्म, अर्थ और मोक्ष के विज्ञान हैं. जो इसे सुनते हैं उनके पुत्र और अनुचर सदैव आज्ञाकारी रहते हैं. जो बिना छिद्रान्वेषण के भाव से इसे पढ़ता है उसे कोई व्याधि कभी नहीं सताती. कुरुओं की इस गाथा को जो भी पढ़ेगा उस के परिवार की वृद्धि होगी और समाज में वह सम्मान पाएगा.

“इस कृति में देवताओं और राजर्षियों की कथायें हैं, इस में निष्पाप केशव हैं, पवित्र द्विज हैं और महादेव भी हैं. इस में कार्तिकेय के जन्म का वर्णन है, इस में ब्राह्मण और गौ के महात्म्य हैं. भरत वंश के कुमारों के जन्म की इस कथा का नाम महाभारत है; जो इस व्युत्पत्ति को जनता है उस के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. व्यास ने इसे तीन वर्षों में पूरा किया था. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर जो कुछ इस में है वह कहीं और भी मिल सकता है किंतु जो इस में नहीं है वह और कहीं नहीं मिल सकता.”

यह सब बताने के बाद सौति राजा उपरिचर से अपनी कथा प्रारंभ करता है.

पौरव वंश के वसु नामक एक धार्मिक राजा की इंद्र से प्रगाढ़ मैत्री थी. इंद्र के निर्देश पर उस ने कभी चेदि राज्य जीता था. इंद्र ने उसे एक स्फटिक-विमान दिया जो कहीं भी जा सकता था. इस विमान में उड़ सकने के चलते उस का एक नाम उपरिचर भी पड़ा था. इंद्र ने उसे एक पुष्पमाला भी दी थी जिस के कमल पुष्प कभी नहीं कुम्हला सकते थे और जिसे पहनने वाले को युद्ध में कभी कोई चोट नहीं पहुँच सकती थी. यह सब देते हुए इंद्र ने उस से संपूर्ण पृथ्वी पर धर्म की रक्षा करने के लिए कहा था. वसु इंद्र की नियमित पूजा करता था और इंद्र उसका पूजन स्वीकार करने हंस के रूप में चेदि आता था. वसु देवेन्द्र की मित्रता,  देवेन्द्र की कृपादृष्टि से पूरे विश्व का सम्राट बन राज कर रहा था.  सम्राट वसु के पाँच पुत्र थे जिन्हे उस ने अपने साम्राज्य के विभिन्न प्रांतों के राजा बना दिए थे. ज्येष्ठ पुत्र  वृहद्रथ मगध का शासक बना था. यही वृहद्रथ एक अन्य नाम महारथ से भी जाना जाता है. वसु  के अन्य पुत्र थे प्रत्यग्रह, कुशाम्ब, मछिल्ल और यदु. कुशाम्ब का एक और नाम था मणिवाहन. वसु के पुत्रों ने अपने नामों पर राज्य और अपने राजवंश स्थापित किए, जिन वंशों ने बहुत दिनों तक पृथ्वी पर राज किए.

वसु की राजधानी के निकट एक नदी बहती थी शुक्तिमती. कभी कोलाहल नाम के एक सजीव पर्वत ने उस नदी का उल्लंघन कर उसे अपने पाश में बाँध लिया था. वसु ने अपने पदाघात से पर्वत में एक गहरा गड्ढा कर शुक्तिमती को मुक्त किया था. किंतु कोलाहल से मिलन के चलते शुक्तिमती को यमज संतानें, एक पुत्र और एक पुत्री हुईं. उस नदी ने अपनी संतानों को अपने तारक वसु को दे दिए. उस के बालक को बड़े होने पर वसु ने उसे अपना सेना नायक बनाया और उस की बालिका गिरिका के बड़ी होने पर वसु ने उस से विवाह कर लिया था. गिरिका अत्यंत रूपवती थी. एक दिन गिरिका के ऋतु काल में वसु उस के पास जाने ही वाला था जब उस के पितृ चेदि आ गये. पित्रियों ने उस से अपने भोजन (श्राद्ध) के लिए मृग के माँस की इच्छा व्यक्त की, और आखेट प्रेमी राजा मृग के संधान में वन निकल पड़ा.

आखेट में भी वसु गिरिका के रूप को याद करता रहा. वसंत ऋतु में वन बहुत रमणीय था और राजा का ध्यान रह रह कर गिरिका पर जा अटकता था. गिरिका की कामना में डूबा हुआ वसु फूलों से लदे एक अशोक वृक्ष के नीचे बैठे स्खलित हो गया. निकट के वृक्ष पर बैठे एक श्येन (बाज पक्षी) को उस ने अपने बीज दिए और उस से उन्हे गिरिका को दे आने के लिया कहा. रास्ते में एक दूसरे श्येन ने उस के चंगुल में माँस का टुकड़ा समझ कर उस से राजा के बीज छीनने चाहे. उनके मुठभेड़ में वसु के बीज नीचे बहती यमुना नदी में गिर पड़े. यमुना में उन दिनों अद्रिका नाम की एक अप्सरा किसी शाप वश मछली बन कर रह रही थी. जल में गिरते राजा के बीज को अद्रिका ने आगे बढ़ कर पी लिया. दस महीनों के बाद अद्रिका धीवरों के जाल में फँसी थी और जब उस का पेट चीरा गया था तो दो मानव शिशु मिले थे – एक बालक और एक बालिका. आश्चर्य चकित धीवर दोनो शिशुओं को ले कर अपने राजा उपरिचर के पास गये.  उपरिचर ने बालक शिशु को अपने पास रख लिया. इसी बालक ने बड़े होने पर मत्स्य राजवंश की स्थापना की. अपरिचर ने बालिका को धीवरों को दे दिया "यह तुम्हारी बेटी है".

इस तरह वह अप्सरा पुत्री धीवरों के मुखिया के घर पलने लगी. उस के दत्तक पिता ने उस का नाम सत्यवती रखा था. बड़ी हो कर वह अप्सरा समान रूपसी हुई, पर मछली के पेट से जन्म लेने के चलते उस की देह से हमेशा मछली की गंध आती रही.  सत्यवती यमुना पर नाव खे कर अपने पिता के हाथ बँटाती थी.  एक बार पराशर ऋषि अपने भ्रमण के क्रम में यमुना पार कर रहे थे जब उन्होने उस रूपसी को देखा. सत्यवती का रूप कुछ ऐसा था कि उस साधु के हृदय में भी इच्छा के बीज उग गये.

पराशर ने सत्यवती को अपनी इच्छा बताई. नदी के दोनो किनारों पर खड़े ऋषियों को दिखाते हुए सत्यवती ने पूछा “इन के सामने मैं आप की इच्छा कैसे पूरी कर सकती हूँ?” यह सुन कर पराशर ने अपने तपोबल से वहाँ गहरा कुहासा ला दिया जिस में हाथ को हाथ नहीं दिखे. ऋषि की शक्ति से वह लड़की चकित हो गयी और सलज्ज स्वर में उस ने प्रार्थना की “मैं एक कुमारी हूँ, मुनिवर, विवाह के पहले अपना कौमार्य नष्ट कर मैं जी नहीं सकूँगी”. 
“मेरी इच्छा पूरी करने के बाद भी”, ऋषि ने कहा “तुम्हारा कौमार्य भंग नहीं होगा. यही नहीं तुम जो चाहो वह मुझ से माँग सकती हो, मेरे वचन कभी विफल नहीं हुए हैं” 
यह सुन सत्यवती ने माँगा कि उसकी  देह से मछली की गंध नहीं बल्कि सदैव एक ललित, मधुर सुगंध निकले. ऋषि ने तत्काल ऐसा कर दिया. प्रसन्न हृदय से सत्यवती ने भी ऋषि की इच्छा पूरी की. पराशर अपने आश्रम चला गया और उस दिन से सत्यवती अपनी सुगंध के चलते गंधवती कहलाने लगी. उस की यह सुगंध एक योजन से मिलने लगती थी, जिस से उसका एक और नाम पड़ा योजनगंधा. 

उसी दिन यमुना के एक द्वीप पर सत्यवती ने पराशर के पुत्र को जन्म दिया. कृष्ण वर्ण का वह बालक द्वीप पर जन्म लेने के चलते कृष्ण द्वैपायन कहलाया. जन्म के तुरंत बाद, अपनी माता से अनुमति ले कर, वह तपस्या के लिए निकल गया. जाते जाते उस ने अपनी माता से कहा था “जब भी तुम्हे मेरी आवश्यकता होगी, तुम मुझे याद करना मैं चला आऊंगा”.  पुत्र जन्म के बाद सत्यवती का कौमार्य पुनर्स्थापित हो गया था(1).

अपनी माता का घर छोड़ द्वैपायन वेदाध्ययन में लग गया. हर युग के साथ धर्म गिरता है और धर्म के गिरने पर वेद ही रक्षा कर सकते हैं यह सब सोच उस ने वेद के सूक्तों का पुनर्संकलन कर वेद के चार भाग किए. इसे करने के बाद वह वेदव्यास के नाम से जाना गया. (व्यास का एक अर्थ संकलक होता है.) सुमंत, पैल, वैशम्पायन और शुक (जो उस का पुत्र था) व्यास के प्रमुख शिष्य थे. महाभारत रच कर अपने इन्हीं शिष्यों के द्वारा उस ने महाभारत को प्रसारित किया था.

वैशम्पायन ने तब कुछ प्रमुख चरित्रों के जन्मों के वृतांत दिए: शांतनु और गंगा के पुत्र के रूप में देवलोक के वसुओं के अंशों से भीष्म का जन्म हुआ. धर्मराज ने विदुर के रूप में हस्तिनापुर में जन्म लिया था. धर्म के जन्म की कथा भी वैशम्पायन ने सुनाई. कभी अणीमान्डव्य नाम का एक तेजस्वी वेदज्ञ ऋषि हुआ करता था. निर्दोष होते हुए भी चोरी के अभियोग में अणीमान्डव्य सूली पर मारा गया था. मृत्योपरांत उस ने धर्मराज से कहा “अपने बचपन में मैने एक टिड्डी को घास के तिनके से बीन्धा था; उस एक काम को छोड़ मैं ने अपने जीवन में कोई पाप कर्म नहीं किया है. मैं ने उस के सहस्त्रों गुणे तप किए होंगे. क्या मेरा तप मेरे उस पाप पर भारी नहीं पड़ता है?  ब्रह्म-हत्या किसी भी अन्य जीव की हत्या से अधिक जघन्य पाप है, इस लिए, धर्म तुम पापी हो और तुम मर्त्य लोक में शूद्र वर्ण में जन्म लोगे.” उसी शाप के चलते धर्म को विदुर के रूप में जन्म लेना पड़ा था.

कुंती ने अपनी कौमार्यावस्था में सूर्य के पुत्र कर्ण को जन्म दिया था, जिस की देह पर जन्म से ही स्वर्ण कवच और स्वर्ण कुंडल सजे हुए थे. भगवान विष्णु स्वयं, जो सृष्टि के अदृश्य कारक हैं, जो अक्षय हैं और जो परमात्मा हैं, जिनमें तीनों गुण स्थिर हैं, जो अदृश्य रूप में सर्वत्र व्याप्त हैं, जो अनंत हैं और जो वेदों के ओम् हैं, वे देवकी और वसुदेव के पुत्र श्री कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे. यदुवंशी सरदार सत्यक और ह्रिदिक के घरों में भगवान के दो कर्मठ सहयोगी क्रमशः सात्यकी और कृतवर्मा के जन्म हुए.

पात्र में रखे ऋषि भरद्वाज के बीज के विकसित होने से द्रोण (काष्ठ पात्र) का जन्म हुआ. नर्कल के कुंज में गिरे गौतम ऋषि के बीज से अश्वत्थामा की माता कृपी और कृपी के भाई कृपा के जन्म हुए. द्रोण के नाश के लिए यज्ञ की अग्नि से धनुष साथ लिए दृष्टद्युम्न का जन्म हुआ. उसी यज्ञ की वेदी से अपूर्व सुंदरी कृष्णा ने जन्म लिया. कोसल नरेश नग्नजित और गांधार नरेश सुबल के जन्म हुए. सुबल को एक पुत्र हुआ शकुनी जो देवताओं के शाप वश धर्म का शत्रु बना.  सुबल को एक पुत्री भी हुई गांधारी जो दुर्योधन की माता हुई. कृष्ण द्वैपायन से विचित्रवीर्य के क्षेत्र में धृतराष्ट्र और पांडु के जन्म हुए. द्वैपायन ने ही हस्तिनापुर राज प्रासाद की एक दासी से शूद्र किंतु ज्ञानी और निष्पाप विदुर को उत्पन्न किया था.

पांडु की दो पत्नियों से देवताओं के पाँच पुत्र हुए. ज्येष्ठ युधिष्ठिर धर्म का, भीम पवन का, अर्जुन इंद्र का और नकुल और सहदेव दोनो अश्विनी कुमारों के पुत्र थे. धृतराष्ट्र के एक सौ एक पुत्र हुए, एक सौ गांधारी से और एक पुत्र युयुत्सु एक वैश्य दासी से. वासुदेव की बहन सुभद्रा से अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने जन्म लिया. पांडवों के पाँच पुत्र उनकी सर्वनिष्ठ पत्नी पांचाली से भी हुए थे – युधिष्ठिर का पुत्र था प्रतिविन्ध्य, भीम का सुतसोम, अर्जुन का श्रुतकीर्ति, नकुल का शतानिक और सहदेव का श्रुतसेन. राक्षसी हिडिंबा से भीम का पुत्र घटोत्कच हुआ था. द्रुपद के एक पुत्री हुई थी शिखण्डिन जो बाद में स्थूण नाम के एक यक्ष की कृपा से पुरुष बन गया था.

“युद्ध में लड़ने वाले सभी योद्धाओं के नाम गिना पाना असंभव है”, वैशम्पायन ने कहा “किंतु सभी प्रमुख योद्धाओं के नाम मैने बता दिए हैं."

पर जनमेजय अभी भी संतुष्ट नहीं था. "मैं सबों के नाम सुनना चाहता हूँ”, उस ने कहा “और यह भी कि उनमें से कौन कौन महारथी थे”.

“जो तुम पूछ रहे हो राजन”, वैशम्पायन ने कहा “वह देवताओं के लिए भी रहस्य है. फिर भी, स्वयंभू का नमन कर मैं सुनाता हूँ. विश्व को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन करने के बाद जमदाग्नि के पुत्र महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले गये थे. जब कोई क्षत्रिय पुरुष नहीं बचा था तब क्षत्रिय स्त्रियों ने व्रती ब्राह्मणों से मिल कर पुत्र उत्पन्न किए थे. यह मेल बस पुत्र प्राप्ति के लिए था और इस में काम-भोग की लालसा कहीं नहीं थी.  इस तरह सहस्त्रों क्षत्रिय शिशुओं के जन्म हुए और वह जाति विलुप्त होने से बची.  समुद्र से घिरी इस विस्तृत पृथ्वी पर फिर से क्षत्रियों का शासन आया. धार्मिक राजाओं के प्रादुर्भाव से सभी वर्ण प्रसन्न रहते थे. राजा शुद्ध मन से, न्याय भाव से शासन करते थे. उनकी निष्ठा से प्रसन्न हो इंद्र समय पर समुचित वर्षा करता था, घर धन-धान्य से सम्पन रहते थे और मनुष्य दीर्घायु भोगते थे. क्षत्रियों ने अनेक यज्ञ किए और अतुल धन वितरित किए.

ब्राह्मण वेदों और उपनिषदों के अध्ययन में संलग्न रहने लगे. उस काल में किसी ब्राह्मण ने वेद का व्यापार नही किया, ना ही राजन, कभी शूद्र की उपस्थिति में किसी ने वेदोच्चारण ही किए. गौओं की संख्या बढ़ी क्यों कि कोई कभी बछड़े के हिस्से का दूध नहीं पीता था. सभी धर्म परायण थे और कुछ भी करते समय धर्म को ओझल नहीं होने देते थे.

इतने अच्छे समय में असुरों ने पृथ्वी पर जन्म लेने शुरू किए. सहस्त्रों असुरों ने मानवेतर योनियों में जन्म लिए – गाय, घोड़े, ऊँट, भैंस, हाथी, मृग, राक्षस आदि. अनेक ने मनुष्य योनि में, राज वंशों में जन्म लिए. असुर शक्तिवान थे उन्होने अपने शत्रुओं पर (क्षत्रिय राजाओं पर) विजय पाई और अपना आधिपत्य सुदृढ़ कर लिया. उनकी संख्या बढ़ती गयी और अपनी शक्ति के नशे में चूर रह कर वे चारो वर्णों पर तो अत्याचार करते ही थे, वेदज्ञ ऋषियों को भी सताते थे.

कुछ समय बाद असुरों के बढ़ते बोझ को झेलने में पृथ्वी भी असमर्थ हो गयी और पितामह ब्रह्मा से उस ने अपनी मुक्ति के उपाय खोजने को कहा. ब्रह्मा ने पृथ्वी को आश्वस्त किया “तुम्हारे बोझ को हल्का करने के लिए ( असुरों के नाश के लिए) मैं स्वर्ग से देवों को नियुक्त करूँगा”. पृथ्वी को विदा कर ब्रह्मा ने देवताओं को आदेश दिए कि वे मर्त्य लोक में अपनी शक्ति और अपने स्वाभाव के अनुकूल रूपों में जन्म ले कर असुरों से संघर्ष करें.  ऐसे ही आदेश पितामह ने गंधर्वों और अप्सराओं को भी दिए. 

पृथ्वी पर आने का निश्चय कर इंद्र के साथ सभी देवों ने नारायण से अवतरित होने की प्रार्थना की और उनकी प्रार्थना सुन हरि ने कहा “तथास्तु”.   





(1) पुत्र जन्म के बाद कौमार्य के पुनर्स्थापन की बात महाभारत में अनेक बार आई है. तीन अन्य स्त्रियाँ जिन्हे ऐसा वर मिला था: कुंती, द्रौपदी, और ययाति की पुत्री माधवी.

Wednesday, 22 April 2015

आदि पर्व (11): सर्प यज्ञ

उत्तंक की बात सुन कर जनमेजय ने अपने पिता की मृत्यु का पूरा वृतांत अपने सभासदों से सुना.  सभासदों ने जनमेजय को परीक्षित का जीवन चित्र सुनाया – जन्म से मृत्यु तक. अभिमन्यु पुत्र परीक्षित के जन्म के समय कुरु वंश एक महा-परीक्षा (महाभारत) भोग रहा था इसीलिए उसका नाम परीक्षित पड़ा था.   उसकी मृत्यु की कथा सुन कर जनमेजय क्रुद्ध भी था और चकित भी. “उस पीपल वृक्ष के जलने और फिर से कश्यप द्वारा उसे जीवित करने की बात आप कैसे जानते हैं?” उस ने पूछा; “यह न तो कश्यप ने किसी से कहा होगा और न ही तक्षक ने”

“एक ब्राह्मण का सेवक उस वृक्ष पर उस समय चढ़ कर यज्ञादि के लिए उस की सूखी टहनियाँ तोड़ रहा था. उस ने उनकी बातें सुनी थीं. तक्षक के विष से वृक्ष के साथ वह भी जल कर भस्म हो गया था और कश्यप के मंत्र से वृक्ष के साथ वह भी पुनर्जीवित हो गया था”; एक सभासद ने कहा.
सभासद की बात सुन कर राजा जनमेजय रो पड़ा. “राजा परीक्षित की मृत्यु उस ऋषि-पुत्र के शाप से अधिक उस दुष्ट तक्षक के चलते हुई. यदि तक्षक ने कश्यप को आने से नहीं रोका होता तो मेरे पिता जीवित रहते. और तक्षक ने उन्हे बस इस लिए रोका जिस से उसके विष के निरस्त होने की बात से उस की जगहंसाई नहीं हो. उस से प्रतिशोध ले कर मैं अपना, उस ब्राह्मण उत्तंक का और आप सबों का भी चित्त शांत करूँगा”
“तक्षक को दंड अब तुरंत मिलना चाहिए”, उस ने कहा “है कोई ऐसा उपाय आप की दृष्टि में जिस से तक्षक को उस के अपराध का उचित दंड दिया जा सके?”

मंत्री सहमत थे और राजा ने अपने पुरोहितों और रित्विकों(1) से तक्षक को अग्नि में भस्म करने के उपाय खोजने को कहा. मुख्य पुरोहित ने बताया कि पुराणों में इस के लिए सर्प यज्ञ का विधान है और कि जनमेजय ही इसे कर सकता था.  राजा ने यज्ञ की तैयारी शुरू करवा दी.

सर्प यज्ञ के विधान को जानने वाले रित्विकों के निर्देश में शिल्पियों ने यज्ञ स्थल को चुना और यज्ञ वेदी बनाने के लिए उस पर शास्त्रोक्त रीति से यथोचित भूमि माप कर वेदी बनाने में हाथ लगा दिए. वेदी को धन-धान्य से सुसज्जित कर, राजा को यजमान के स्थल पर स्थापित कर रित्विक वेदी के चारो तरफ अपने नियत स्थानों पर बैठने लगे.

पर वेदी का निर्माण कार्य पूरा होने के पहले सूत जाति के एक शिल्पी ने, जिसे वेदी के निर्माण से संबंधित शास्त्रों के विधान के ज्ञान थे और जिसे भवनों के आधार की तैय्यारी का भी पूरा ज्ञान था,  वेदी में दोष बताए थे. “यह भूमि उपयुक्त नहीं है, वह काल जब भूमि मापी जा रही थी उस कार्य के लिए उपयुक्त नहीं था और यह यज्ञ पूरा नहीं हो पाएगा”, उस ने कहा था और यह भी जोड़ दिया “यज्ञ किसी ब्राह्मण के हस्तक्षेप के चलते पूरा नहीं होगा”. यह सब सुन यज्ञ शुरू होने के पहले जनमेजय ने द्वारपालों को आदेश दे दिए थे कि वे बिना राजा की आज्ञा के किसी व्यक्ति को यज्ञ भूमि पर नहीं आने देंगे. 

यथोचित विधियों से यज्ञ आरंभ हुआ. पुजारी श्याम वस्त्रों में थे, धुएं से उनकी आँखें लाल थीं और वे सर्पों के लिए यमराज बने हुए थे. मंत्रोच्चारण के साथ वे यज्ञ की अग्नि में घी के होम दे रहे थे. हर होम के साथ पूरे विश्व में सभी सर्पों के हृदय भय से और अधिक काँपने  लगते थे.

पुरोहित और रित्विक सर्पों के नाम ले ले कर अग्नि में होम करते थे और वे सर्प चीत्कार करते हुए, दूर दूर से उड़ते हुए आ कर यज्ञ की अग्नि में गिर रहे थे.  श्वेत, कृष्ण, नील सभी रंगों के बाल, युवा और वृद्ध सर्प यज्ञ की अग्नि में जैसे बरस रहे थे. कई सर्प योजनों लंबे थे, कई अश्वों के रूप में थे, कुछ हाथी की सूंढ़ की तरह थे… भयावह, शक्तिशाली और विषैले;  सभी निरीह हो कर उस ज्वाला में अपने को अर्पित कर रहे थे.

शौनक के पूछने पर उग्रश्रवा ने सर्प यज्ञ के रित्विजों और सदस्यों के नाम बताए: च्यवन के वंश का चंडभार्गव उस यज्ञ का होता था, कुत्स उस यज्ञ का उद्गाता था जो वैदिक मंत्रों को पढ़ रहा था,  जैमिनी यज्ञ का ब्राह्मण था और श्रणगर्व एवं पिंगल अध्वार्यू थे. अपने पुत्र और शिष्यों के साथ व्यास, उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु, पर्वत, अत्रेय आदि अनेक वेदज्ञ ब्राह्मण उस यज्ञ के सदस्य थे.

अग्नि में गिरते सर्पों के देह की वसा की नदियाँ बहने लगीं थीं. जलते सर्पों के दुर्गंध से वहाँ साँस लेना कठिन हो गया था. अग्नि में गिरते सर्पों के चीत्कार के आगे कुछ सुन पाना भी कठिन हो गया था.

यज्ञ के शुरू होने के पहले, तक्षक भाग कर अपने प्राण बचाने के लिए इंद्रलोक चला गया था. इंद्र को उस ने सब कुछ बताया, अपनी भूल भी स्वीकार की और देवेन्द्र से अपनी रक्षा करने की गुहार लगाई. इंद्र ने उसे आश्वस्त किया कि वहाँ (इंद्रलोक में) यज्ञ से उसे कोई डर नहीं है. यह सुन तक्षक आनंद से अपने दिन काट रहा था.

इधर पृथ्वी पर सर्पराज वासुकी चिंता में डूबा हुआ था. सर्प उस यज्ञ की ज्वाला में गिरते जा रहे थे; उस का परिवार छोटा होता जा रहा था. अपनी बहन जरत्कारु से उस ने कहा “मेरी भुजायें काँप रहीं हैं और मेरी चेतना लुप्त होती जा रही है. अचेत हो कर मैं भी अब कभी उस ज्वाला में जा गिरूँगा. समय आ गया है जब हमें आस्तीक को इस यज्ञ को रोकने के लिए कहना चाहिए.”

सर्पिणी जरत्कारु ने अपने पुत्र आस्तीक को कद्रू के शाप की बात बताई और यह भी कि पितामह ब्रह्मा ने कह रखा है कि यायावर जरत्कारु और सर्पिणी जरत्कारु का पुत्र आस्तीक ही सर्पों को उस यज्ञ से मुक्त कर पाएगा. सब कुछ बता कर उस ने आस्तीक से कहा कि जो भी वह उचित समझे वह करे.  

सब सुन कर आस्तीक यज्ञ भूमि पर जाने के लिए तत्पर हुआ. जाने के पहले अपने मामा वासुकी से उस ने कहा “मैं हस्तिनापुर जा रहा हूँ, आप निश्चिंत हो जायें. मैं इस यज्ञ को अवश्य रुकवा दूँगा.” अपने मामा को आश्वस्त कर वह ब्राह्मण बालक जितना शीघ्र हो सके यज्ञ स्थल पर आया. द्वारपालों ने उसे रोका पर उन्हें अपने आशीष से प्रसन्न कर आस्तीक यज्ञ की वेदी की निकट तक पहुँच गया.
   
वहाँ पहुँच कर आस्तीक ने यज्ञ की प्रशंसा शुरू की “सोम, वरुण और प्रजापति ने भी कभी प्रयाग में यज्ञ किए थे पर आप का यज्ञ, भारत, किसी से कम नहीं है, सबों का कल्याण हो. शक्र ने भी एक सौ यज्ञ किए हैं किंतु आप का यह यज्ञ इंद्र के दस सहस्त्र यज्ञों के समतुल्य है. सबों का कल्याण हो. आप का यह यज्ञ, भारत, यम, हरिमेध या राजा रंतिदेव के यज्ञों के समान है. यह यज्ञ, माया या राजा शशविंदु या वैश्रवन के यज्ञ से कम नहीं है. आप का यज्ञ राजन, नृग, अजामिद या दशरथ नंदन के यज्ञों के समान है. सबों का कल्याण हो. यह यज्ञ देव-पुत्र राजा युधिष्ठिर के यज्ञ के समतुल्य है. आप का यह यज्ञ सत्यवती के पुत्र कृष्ण द्वैपायन के यज्ञ के समान है जिस में वे स्वयं आचार्य थे.”

यज्ञ की प्रशंसा करने के बाद आस्तीक रित्विकों की ओर उन्मुख हुआ. “ये रित्विक और सदस्य, जो आप के यज्ञ का सम्पादन कर रहे हैं वे तेज में इंद्र और सूर्य से कदाचित् कम नहीं हैं. उन्हें अब और कुछ जानने के लिए नहीं बचा है और उन्हे दान देने से आप अक्षय पुण्य के भागी बनेंगे. मेरा विश्वास है कि विश्व में कहीं कोई भी रित्विक आपके रित्विकों के तुल्य नहीं हैं. इन रित्विकों द्वारा अर्पित किए गये होम अग्नि के द्वारा सीधे देवताओं तक पहुँचते हैं.”

और रित्विकों की प्रशंसा के बाद वह सीधे राजा की प्रशंसा पर आया. “मर्त्य लोक का कोई राजा प्रजा के संरक्षण में आप के तुल्य नहीं है. आप का त्याग मुझे अचंभित कर देता है. निस्संदेह आप या तो वरुण हैं या धर्मराज. इस विश्व की रक्षा आप वैसे ही करते हैं जैसे वज्र धारण करने वाला इंद्र कर सकता है. राजाओं में आप नभग और दिलीप से कम नहीं हैं. पराक्रम में आप ययाति या मांधाता हैं, आप में वाल्मीकि या भीष्म सदृश शक्ति छिपि है. आप को अपने क्रोध पर वैसा ही नियन्त्रण है जैसा वशिष्ठ को हुआ करता था. आप की आभा नारायण के सदृश है और आप का न्याय यम के सदृश. श्री कृष्ण की तरह आप में सभी गुण भरे हुए हैं. आप का शस्त्र और शास्त्र ज्ञान जमदाग्नि पुत्र राम के समान है. भगीरथ की तरह आप बस अपनी एक दृष्टि से किसी को संत्रस्त कर सकते हैं.

इस तरह आस्तीक ने अपने वचन से जनमेजय, रित्विक और यज्ञ की अग्नि तीनो को प्रसन्न कर दिया. हर्षित हो राजा ने उसे कोई वर देना चाहा पर वह अभी यजमान था और उस ने सदस्यों से इस की अनुमति माँगी, “यह बालक बस देखने में बालक लगता है; ज्ञान और बुद्धि में यह किसी वयोवृद्ध से कम नही है. मैं इसे कोई वर देना चाहता हूँ, यदि आप ब्राह्मण गण मुझे ऐसा करने दें”

सदस्यों ने कहा “राजा को ब्राह्मणों को सम्मानित करना ही चाहिए, चाहे वे बालक ही क्यों न हों. इस बालक की  इच्छापूर्ती अवश्य होनी चाहिए पर अभी उस का समय नहीं है. पहले तक्षक को अग्नि में गिर जाने दें”.

फिर भी राजा ने आस्तीक से पूछ लिया “आप क्या चाहते हैं, जो भी चाहते हो मांगिए”. इस पर यज्ञ का होता अप्रसन्न हुआ “तक्षक अभी तक नहीं आया है”.  राजा का ध्यान भी यज्ञ पर आ गया “तक्षक को अग्नि में जलाने के लिए जो कुछ किया जा सकता है वह आप करें; तक्षक ही मेरा शत्रु है”. रित्विकों ने बताया क़ि अग्नि के अनुसार तक्षक अभी इंद्रलोक में छिपा हुआ है. राजा ने उस सूत लोहिताक्ष (शिल्पी, जिसे यज्ञ के विधान का पूरा ज्ञान था) से भी पूछा. उस ने भी वही कहा जो ब्राह्मण कह रहे थे “इंद्र ने उस से कहा है यहाँ तुम अग्नि से सुरक्षित रहोगे”.

राजा दुखी हुआ और उस ने रित्विकों से जो कुछ वे कर सकते थे करने के अनुरोध किए. रित्विक मंत्र पढ़ते हुए हवन करते रहे और कुछ देर में इंद्र यज्ञ स्थल पर दिखाई दिया. उस के साथ अनेक देव और अनेक अप्सरायें भी थीं. पर तक्षक कहीं नहीं दिख रहा था – वह इंद्र के वस्त्रों में छुपा हुआ था. राजा ने रित्विकों से कहा कि यदि तक्षक को इंद्र ने बचा रखा है तो वे इंद्र को भी हवन की अग्नि में गिराने के मंत्र पढ़ें. होताओं और रित्विकों ने वही किया. इंद्र डर कर तक्षक को अपने वस्त्र से निकाल फेंक यज्ञ स्थल से दूर भाग चला.
 
तक्षक को गिरते देख रित्विकों ने राजा को आस्तीक को वरदान देने की अनुमति दे दी “यज्ञ सुचारू रूप से चल रहा है, तक्षक भी अब दृष्टिगोचर हो गया है, अब आप चाहें तो इस ब्राह्मण बालक को वरदान दे सकते हैं”.

जनमेजय ने आस्तीक से कुछ भी माँगने को कहा. तक्षक उस समय आकाश से यज्ञ की अग्नि में गिरने ही वाला था जब आस्तीक ने राजा से यज्ञ रोक देने का अनुरोध किया. “यदि आप कुछ देना चाहते हैं तो इस यज्ञ को यहीं रोक दें जिस से और सर्पों की मृत्यु नहीं हो”.

जनमेजय सन्न रह गया. उस ने सोचा था ब्राह्मण बालक धन संपत्ति, भूमि, गौ आदि माँगेगा. उस की इस माँग पर उस से कुछ बोले नहीं बन रहा था. जब राजा के बार बार पूछने पर भी आस्तीक ने वही बात दुहाराई तो यज्ञ के सभी सदस्यों ने भी राजा को यज्ञ रोक कर ब्राह्मण को मुँह माँगे वर देने के अपने वचन सत्य रखने की सलाह दी.

और सर्प यज्ञ, जैसा उस सूत लोहिताक्ष ने कहा था, एक ब्राह्मण के हस्तक्षेप के चलते पूरा नहीं हो सका.

शौनक के पूछने पर सौति ने प्रमुख मृत सर्पों के नाम गिनाए और तक्षक के आकाश से तुरन्त नहीं गिर पड़ने का कारण भी बताया. जैसे ही इंद्र ने तक्षक को अपने वस्त्र से निकाल फेंका था, आस्तीक ने अपनी साधना और अपने तप के बल से उसे गिरने से रोक दिया था और तक्षक, जो भय से बेसुध हो गया था, वहीं रुका रहा जब तक यज्ञ का समापन नहीं हो गया.

शास्त्रोक्त विधान से यज्ञ का समापन किया गया. राजा जनमेजय ने सभी पुरोहितों, होताओं, रित्विकों और सदस्यों को प्रचुर दक्षिणा दी. लोहिताक्ष को भी राजा ने पर्याप्त धन दिया. आस्तीक भी अपने उद्देश्य की पूर्ति हो जाने से अत्यंत प्रसन्न हुआ. राजा अभी भी उस से प्रभावित था और उस ने उसे अपने होने वाले आश्वमेध यज्ञ में सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया. राजा का आमंत्रण स्वीकार कर आस्तीक अपनी माँ और अपने मामा के पास चला.
  
उनके हर्ष का पारावार नहीं था. सभी प्रमुख सर्प वासुकी के साथ बैठे थे. प्रसन्न चित्त से उन्होने भी आस्तीक को वर देने चाहे.  आस्तीक ने कहा “जो व्यक्ति, प्रातः या संध्या काल में प्रसन्न चित्त और ध्यान से मेरी इस पवित्र कथा को पढ़ेगा उसे आप से (सर्पों से) कोई भय नहीं रहना चाहिए”. तक्षक तुरंत तैयार हो गया. “जो भी आस्तीक का स्मरण करेगा उसे सर्पों से कोई भय नहीं रहेगा”

सौति ने तब कहा “प्रमति जब रुरू को यह कथा सुना रहा था तो मैने भी सुनी थी और जितना मैं जानता हूँ वह सब मैने आप लोगों को सुना दिया है.”







(1) यज्ञ कराने वाला यजमान कहलाता है. यजमान विशेषज्ञ ब्राह्मणों की सहायता से यज्ञ करा पाता है. तीन विशेषज्ञों के नाम ऋग्वेद के पहले सूक्त के पहले मंत्र में आए हैं: पुरोहित (जो यज्ञ कर्म को आगे बढ़ाता है), रित्विज्  (जो समयानुकूल यज्ञ का संपादन करता है) और होता (जो देवताओं का आह्वान करता है).  बहुधा बड़े यज्ञों के संपादन के लिए विशेषज्ञों का एक दल नियुक्त किया जाता है जिसे "यज्ञ संसद" भी कहते हैं. इन विशेषज्ञों में से एक यज्ञ का आचार्य बनाया जाता है. आचार्य को यज्ञ विधि का ज्ञान तो होना ही चाहिए, उसका अपना जीवन भी बहुत पवित्र होना चाहिए.  यज्ञ की उद्देश्यपूर्ति बहुधा उस के तपोबल पर निर्भर करती है. आचार्य का वयोवृद्ध होना आवश्यक नहीं है – दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ में महर्षि वशिष्ठ ने श्याश्रन्ग को आचार्य बनाया था. यज्ञ संसद के सदस्य यज्ञ के सदस्य कहलाते हैं.

यह भी कहा गया है कि जहाँ एक ही ब्राह्मण यज्ञ करा रहा है वह पुरोहित कहलाता है और जहाँ दो ब्राह्मण हों वहाँ एक रित्विक और एक पुरोहित कहलाता है. ध्यातव्य है कि रित्विक के साथ यजमान का कोई दीर्घ कालीन संबंध नहीं रहता – यह संबंध दक्षिणा के बदले यज्ञ संपादन तक सीमित रहता है.

Monday, 20 April 2015

आदि पर्व (10): परीक्षित की मृत्यु

कुरु वंश का परीक्षित अपने प्रपितामह पांडु के समान महाबाहु था – धनुर्धर, महान योद्धा और आखेट प्रेमी भी. एक दिन आखेट में एक मृग को अपने तीर से घायल कर परीक्षित उस का पीछा कर रहा था जब वह मृग आँखों से ओझल हो गया और उसके पीछे पीछे अपना घोड़ा दौड़ाते पांडु वन में रास्ता भूल कर एक मुनि के आश्रम में पहुँच गया. आखेट से थके माँदे  राजा ने मुनि को अपनी गोशाला में पाया. राजा ने कुछ दंभ भरे स्वर में कहा “हे ब्राह्मण, मैं अभिमन्यु का पुत्र राजा परीक्षित, एक बिंधे मृग का पीछा करते करते यहाँ आ पहुँचा हूँ. क्या आप ने ऐसा कोई मृग अभी इधर कहीं देखा है?”

मुनि निश्शब्द रहा क्योंकि यह उस के मौन व्रत का दिन था. आखेट की गर्मी में परीक्षित को मुनि की चुप्पी साधे रहना असह्य धृष्टता लगी और उस ने निकट पड़े एक मृत सर्प को अपने धनुष के एक छोर से उठाया और मुनि के कंधों पर डाल दिया.  मुनि ने उसे यह भी बिना किसी प्रतिवाद के करने दिया – और उस ने अभी भी एक शब्द नहीं कहा, न अच्छा न बुरा.  मुनि की निर्विकार मुद्रा देख कुछ ही क्षणों में राजा का क्रोध भी शांत हो गया. उसे अपने किए का बहुत दुख भी हुआ. पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था और मन मसोस कर वह अपनी राजधानी लौट गया. क्षमाशील मुनि जानता था कि परीक्षित एक न्यायप्रिय राजा था जो अपने वर्ण के शास्त्रोक्त कर्तव्यों से कभी नहीं मुकरता था. अपमानित होने पर भी राजा को शाप देने का विचार उस दयालु के हृदय में कभी नहीं आया.
   
उस मुनि का एक तेजस्वी पुत्र था शृंगी. अल्प्वयस्क शृंगी पिता के आश्रम से दूर एक गुरुकुल में वेदाध्ययन करता था और अपनी तपश्चर्य्या से उसे बहुत शक्तियाँ मिली हुईं थीं. उस दिन गुरु की आज्ञा से वह अपने पिता से मिलने उनके आश्रम आ रहा था.  रास्ते में उस के एक मित्र ने बताया कि राजा परीक्षित ने उसके पिता के कंधों पर आज एक मृत साँप रख दिया है. तरुण शृंगी अपनी प्रकृति से कुछ गर्म स्वभाव का था, पिता का यह अपमान सुन कर उस के क्रोध की सीमा नहीं रही. 

उस ने अपने मित्र से पूरी घटना की जानकारी ली और यह निश्चित कर कि उसके पिता ने परीक्षित को उन्हे अपमानित करने का कोई कारण नहीं दिया था शृंगी ने जल स्पर्श कर कहा “उस ब्राह्मण निंदक, कुरु-कुल कलंक पापी राजा को, मेरी वाग्शक्ति से प्रेरित हो, आज से सात रातों के अंदर महा-सर्प तक्षक यम के लोक पहुँचा देगा.”  इस तरह अपने पिता के पास पहुँचने के पहले ही शृंगी ने परीक्षित को शाप दे दिया था. आश्रम पहुँचने पर उस ने देखा कि उसका पिता अभी भी अपनी गोशाला में उसी मुद्रा में बैठा था और मृत साँप अभी भी उसके कंधों से लटक रहा था.

अपने पिता का यह रूप देख शृंगी रो पड़ा और उस ने उन्हे अपने शाप की बात बताई. “यह तुम ने अच्छा नहीं किया” मुनि ने सुन कर कहा “तपस्वियों को ऐसा व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए. हम उस राजा के राज्य में रहते हैं और वह हमें यथोचित संरक्षण देता है. हमारे जैसे व्यक्तियों को सदैव राजा को क्षमा करना चाहिए. यदि तुम धर्म का नाश करोगे तो धर्म निश्चय ही तुम्हारा नाश करेगा. यदि राजा अपने कर्तव्य नहीं निभाएगा तो हम अपने पूजन, तप आदि नहीं कर पाएँगे. तपस्वियों के पुण्य अर्जन कर पाने के पीछे धार्मिक राजाओं के हाथ रहते हैं.

"परीक्षित अपनी प्रजा की रक्षा वैसे ही करता है जैसे उसका प्रपितामह पांडु कभी करता था. याद रखो, राजा ही यज्ञों की रक्षा कर पता है, यज्ञों से ही वर्षा होती है और वर्षा से ही अन्न उत्पन्न होते हैं. मनु ने कहा है कि एक राजा दस वेदाध्यायी पुजारियों के समतुल्य होता है. वह धार्मिक राजा थका हुआ था, बुभुक्षित भी; उसे मेरे मौन व्रत का ज्ञान नहीं था और मैं कुछ बोल नहीं सकता था. यह बहुत अविवेकपूर्ण काम तुम ने किया है. तुम्हे परीक्षित को ऐसा शाप कभी नहीं देना चाहिए था." 

“यह अविवेकपूर्ण हो या अनुचित या धर्म विरुद्ध ही हो”, शृंगी ने कहा “पर मैने इसे कर दिया है और मेरे शब्द कभी व्यर्थ नहीं जा सकते.”

शृंगी का पिता जानता था कि शृंगी ने कभी परिहास में भी मिथ्या वादन नहीं किया था और उसका शाप अब टल नहीं सकता था. मुनि स्वभाव से शांतिप्रिय था और भरसक प्रयास करता था कि सबों का कल्याण हो. अगले दिन उस ने अपने एक शिष्य को परीक्षित के पास भेजा. शिष्य ने राजा को, उसके मंत्रियों के सामने, शाप की बात बताई.

“राजन, तुम ने ऋषि शामिक के कंधों पर एक मृत साँप रख छोड़ा था. ऋषि ने तो तुम्हे क्षमा कर दिया था पर ऋषि-पुत्र इसे नहीं सह पाया और उस ने शाप दिया है कि सात रातों के अंदर तक्षक के दंश से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी. ऋषि ने तुम्हे बचाने की बहुत चेष्टा की पर उस के पुत्र के वचन कभी असत्य नहीं हो सकते. ऋषि ने तुम्हे बता देने के लिए मुझे यहाँ भेजा है.”

इस कठोर शाप की सुन परीक्षित काँप गया और अपने धर्म-हीन कृत्य को याद कर बहुत दुखी हो गया. उस अभागे दिन ऋषि का मौन व्रत था. उनकी विशाल-हृदयता, क्षमा-शीलता को देख राजा और भी अधिक दुखी हो गया. वह धार्मिक राजा अपनी मृत्यु की सुन उतना दुखी नहीं था जितना वह ऋषि के प्रति अपने अपमानजनक व्यवहार को याद कर के था.  

ऋषि के शिष्य के चले जाने के बाद मंत्रियों के साथ मिल कर राजा इस संकट से निपटने के उपाय खोजने लगा. सब के विचार से आनन फानन में एक अकेले स्तंभ के ऊपर एक घर का निर्माण कराया गया. उसकी रक्षा के लिए सैनिक नियुक्त कर दिए गये और वहीं पर सर्प-दंश के उपचार / मन्त्रोपचार कर सकने वाले ब्राह्मणों के रहने की व्यवस्था कर दी गयी. और इस तरह स्तंभ के ऊपर बने उस घर में राजा शाप के अपने सात दिन काटने लगा.

सातवें दिन कश्यप राजा के आवास की दिशा में चला. उस ने तक्षक के दंश से राजा की मृत्यु के शाप की सुन ली थी और पितामह ब्रह्मा ने स्वयं उसे सर्प-दंश के उपचार के मंत्र सिखाए थे. “इस धार्मिक राजा के प्राण बचा पाने पर मैं बहुत धर्म और अर्थ, दोनो एक साथ अर्जित कर लूँगा” यही सोचते कश्यप हस्तिनापुर आ रहा था.  

तक्षक ने परीक्षित का उपचार करने के उद्देश्य से कश्यप को हस्तिनापुर आते देख लिया. एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धर कर तक्षक भी उसके साथ चलने लगा और कुछ देर में उस ने कश्यप से पूछा “इतने तेज कदमों से आप कहाँ जा रहे हैं?”
"तक्षक आज अपने विष से कुरु कुल के परीक्षित को दघ्द करने वाला है”, कश्यप ने कहा “मैं वहीं जा रहा हूँ जिस से मैं उस धर्म परायण राजा का जीवन बचा सकूँ.”
तब तक्षक ने अपना परिचय दिया “मैं ही वह तक्षक हूँ जो आज उस राजा को यम के लोक भेजेगा. आप लौट जाइए क्यों कि मेरे काटे का कोई उपचार नहीं है”.
“मैं जानता हूँ”, कश्यप ने मुस्कुराते हुए कहा “मैं राजा को तुम्हारे काटने के बाद भी बचा लूँगा”

“यदि आप ऐसा कर सकते हैं", तक्षक ने कहा “यदि आप वास्तव में मेरे काटे को पुनर्जीवित कर सकते हैं, तो इस पीपल वृक्ष को बचाईए. मैं इसे जलाने जा रहा हूँ”. यह कहते कहते तक्षक ने अपने विष-दंत उस वृक्ष में गाड़ दिए और देखते देखते पीपल का वह हरा भरा विशाल वृक्ष जल उठा और क्षणों बाद वहाँ बस काठ की तरह सूखा तना और सूखी सूखी शाखायें बचीं थीं. और अगले क्षण वह भी नहीं रहे, बस रख का एक ढेर था वहाँ!

“देखो तक्षक”, कश्यप ने कहा “अब मेरे ज्ञान की शक्ति भी देख लो”. कश्यप ने अपने मंत्र पढ़ने शुरू किए. एकाध क्षण में राख के उस ढेर से एक कोंपल निकली, उस में दो पत्ते लगे, वह अंकुर बढ़ने लगा और पीपल के विशाल तने का रूप ले लिया, तना से शाखायें फूटने लगीं  और वह पीपल का हरा भरा विशाल वृक्ष फिर उनके सामने खड़ा था.

“यह उचित नही है कि आप मेरे विष के प्रभाव को निरस्त करते चलें”, तक्षक ने कहा “आप ऋषि हैं, आप की संपदा तपोधन है; आप किस धन की आशा में राजा को बचाना चाहते हैं? जिस भी पारितोषिक की आपने आशा कर रखी होगी वह मैं आप को देता हूँ, आप हस्तिनापुर नहीं जायें”.
तक्षक ने फिर कहा “और यह भी स्मरण रहे कि राजा को मैं एक ब्राह्मण के शाप के चलते डसने जा रहा  हूँ. आप के मंत्र को बस मेरे विष के विरुद्ध ही नहीं,  एक सत्यवादी ब्राह्मण के वचन के विरुद्ध भी काम करना पड़ेगा.” 
कश्यप तब थोड़ी देर ध्यान मग्न हो कर बैठा और उसने योग शक्ति से देख लिया कि परीक्षित का जीवन काल बस इतना ही था और वह तक्षक से स्वर्ण आदि ले कर वापस लौट गया.

कश्यप को वापस लौटा कर तक्षक हस्तिनापुर पहुँचा और राजा के नये आवास को देख कर उस ने अपनी योजना बनाई. कुछ सर्पों को उस ने राजा के पास तपस्वियों के रूप में फल, कुश और जल आदि के साथ भेजा. राजा ने उनके ये उपहार स्वीकार किए और उनके लौटने के बाद अपने मंत्रियों को, जो उस नये घर में उस के साथ बैठे थे, तपस्वियों के दिए फल खाने के लिए आमंत्रित किया. अपने भाग्य और ऋषि-पुत्र के शाप के वशीभूत राजा ने वही फल उठाया जिस में तक्षक छिपा हुआ था. एक ग्रास काटने पर उस फल से एक छोटा कृमि निकलता दिखाई दिया. सूर्यास्त हो रहा था और परीक्षित अपने को अब सुरक्षित समझने लगा था. उस कृमि  को अपनी गर्दन पर रखते उस ने कहा “सूर्यास्त के बाद मेरा सर्प-दंश या सर्प-विष का संकट अब टल गया है. यह कृमि अब  तक्षक बन कर मुझे काट ले जिस से मेरे पाप-पूर्ण कृत्य का प्रायश्चित हो और ऋषि-पुत्र के वचन भी मिथ्या नहीं हों”
 
पर राजा की गर्दन पर आते ही अपने विशाल रूप में आ कर तक्षक ने राजा को अपने व्याल में बाँध लिया. तक्षक के विशाल रूप को देखते ही मंत्री गण भाग खड़े हुए. भागते भागते उन्हों ने तक्षक को आकाश मार्ग से निकलते देखा. सांझ के आधे अंधेरे आकाश में रुपहला तक्षक किसी विवाहिता की माँग में भरे सिंदूर की भाँति चमक रहा था. राजा का नया घर तक्षक के विष से धधक उठा था और उस की निर्जीव देह स्तंभ पर बने उस घर से किसी वज्र से मारे की तरह नीचे गिरी पड़ी थी.

पुरोहितों ने राजा की अंत्येष्टि की और सभी नागरिकों ने परीक्षित के पुत्र जनमेजय को, जो अभी वयस्क नहीं हुआ था, हस्तिनापुर का नया राजा बनाया. 

आदि पर्व (9): कद्रू के पुत्र

शौनक के पूछने पर सौति ने कद्रू के पुत्रों केनाम बताए. “सभी सर्पों का नाम गिनाना उबाऊ हो जाएगा”कहतेहुए उस ने बस प्रमुख सर्पों के नाम गिनाए.

“सर्पों में ज्येष्ठ शेष (अन्य नाम अनंत) था, उसके बाद वासुकी. उनके बाद हुए ऐरावत, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालीय, मणि, पूरण, पिंजरक, एलापत्र, वामन, नील, अनिल, कल्माष, शबल, आर्यक, आदि, शलपोतक, सुमनमुख, दधिमुख, विमलपिंडक, आप्त, कोटनक, शंख, वालशिख, निष्ठ्यूनक, हेमगुह, नहुष, पिंगल, वाहयकर्ण, हस्तिपद, मुदगरपिंडक, कंबल, अश्वतर, कालीयक

“वृत्त, सम्वर्तक, पद्मावती, श्रुति, शंखनक, स्फन्डक, क्षेमक, पिन्डारक, करवीर, पुष्पदन्ष्ट्र, बिल्वपान्डुक, मूषकाद, शंखशिर, पूर्णदन्ष्ट्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक, श्रीवह, वीरज, सुबाहु, शालिपिन्ड, हस्तिभद्र, पिठरक, कौरव, धृतराष्ट्र्, पुष्कर,शल्यक, कोणवासन, कुंजर, कुमुद, कुमुदाक्ष, तित्रि, हालिक, कर्कर, अकर्कर, कुंदोदार, महोदर.

“ये प्रमुख सर्पों के नाम हैं”, सौति ने कहा, “सबों के नाम नहीं गिनाए जा सकते. इनके पुत्र, पौत्र अब असंख्य हो गये हैं.”

(शेष, वासुकी और तक्षक के नाम कई कथाओं में आते हैं. कर्कोटक नल-दमयंती की कथा में आया है – उसी के विष की जलन ने नल के शरीर से कलि को निकलने पर बाध्य किया था. यमुना तट पर कालीय का मर्दन कर श्री कृष्ण ने उसे अमर कर दिया  है और युरोपियन मिथकों में वर्णित बसिलिस्क में कुछ को शायद वालशिख की झाँकी देखने को मिल सकती है.

सर्पों के नाम भिन्न भिन्न पाठों में अलग अलगहैं. ये नाम बोरी पाठ से लिए गये हैं.)

“तुम ने कहा था सौति, कि सर्प बहुत बलशाली होते थे” शौनक ने पूछा “कद्रू का शाप सुन कर उन्होने क्या किया?”

सौति ने कहा “ज्येष्ठ सर्प शेष ने अपनी माता को छोड़ कठोर तप करने शुरू किए. गंधमादन, बदरी, गोकर्ण, पुष्कर आदि पवित्र स्थलों पर जा कर, बस वायु पर जीवित रहते हुए उस ने अपना जीवन तपस्या में लगा दिया. उस की तपश्चर्या से प्रभावित हो पितामह ब्रह्मा ने उसे दर्शन दिया और पूछा “शेष, तुम अपने कठोर तप से सृष्टि के अन्य जीवों को भी अब कष्ट पहुँचा रहे हो. बताओ पुत्र, तुम चाहते क्या हो?”

“मेरे भाई बंधु दुष्ट प्रकृति के हैं. वे विनता को कष्ट देने में आनंद पाते हैं. विनता का पुत्र गरुड़ भी हमारा भाई ही है पर वे उस की शक्ति से जलते रहते हैं. मैं अपने भाइयों के साथ नहीं रहना चाहता. यदि आप प्रसन्न हैं प्रभु, तो मेरी यह इच्छा पूरी कर दीजिए”, शेष ने कहा, “तपस्या करने का मेरा एक मात्र उद्देश्य है इस जीवन को त्याग अपने भाइयों से दूर हो जाना”.

शेष की धार्मिक प्रवृत्ति से ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हुआ और उस ने उसे कोई वर देना चाहा. किंतु वर में शेष ने यही माँगा कि उसका हृदय सदैव धर्म और तपस्या में लगा रहे. उसके आत्म-त्याग और उसकी शांति-प्रियता से ब्रह्मा और अधिक प्रसन्न हुआ; और उस ने शेष को पृथ्वी का भार संभालने का दायित्व सौंप दिया. पृथ्वी ने शेष के जाने के लिए एक दरार दे दी और उस से चलते चलते नीचे जा कर शेष ने पृथ्वी को अपने फण पर उठा लिया. ब्रह्मा ने विनता के पुत्र सुपर्ण को भी शेष की सहायता में नियुक्त कर दिया.

ज्येष्ठ सर्प शेष के चले जाने पर वासुकी सर्पों का राजा बना. वासुकी को अपनी माता द्वारा दिए गये शाप की बहुत चिंता रहती थी और वहअन्य सर्पों के साथ मिल कर उस से बचने के उपाय खोजता रहता था. शाप को निरस्त करने के लिए उस ने ऐरावत और अन्य वरीय सर्पों की एक सभा बुलाई.

“तुम सब हमारे शाप के विषय को जानते हो”, वासुकी ने सभा को सम्बोधित किया. किसी भी तरह हमें इस शाप को निरस्त करना है. सभी शापोंसे बचने के उपचार होते हैं पर कहा जाता है कि अपनी माँ से मिले शाप का कोई प्रतिकार नहीं होता. यदि ऐसा है तो हमारा नाश अवश्यंभावी है. किंतु अंतिम क्षण तक हमें अपने बचाव की चेष्टा करनी है. तुम सभी बुद्धिमान और विवेकी प्राणी हो, आपस में सलाह कर हम अपनी मुक्ति का मार्ग उसी तरह खोज लेंगे जैसे देवताओं ने मिल कर कभी गुफा में छुपे अग्नि को खोज निकाला था”.

कद्रू के पुत्रों ने अपने अपने विचार सभा में रखे. कुछ के विचार से सर्पों को श्रेष्ठ ब्राह्मणों के रूप धारण कर यज्ञ को अनुचित बताते हुए इसे रुकवा देना चाहिए. कुछ का कहना था कि वरीय सर्प किसी तरह जनमेजय के प्रिय सलाहकार बन इस यज्ञ को नहीं होने दें. कुछ सर्प पुरोहित और रित्विजों को सर्प-दंश से मार कर उस यज्ञ को रोकना चाहते थे. कुछ का प्रस्ताव था कि उन सभी को डस कर मार दिया जाए जो सर्प-यज्ञ के विधान / कर्मकांड से भिज्ञ हों – ना रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी. पर ये प्रस्ताव धार्मिक सर्पों को स्वीकार्य नहीं थे क्यों कि इन में ब्राह्मणों को मारना पड़ता.

अब सभा कुछ उछ्रिंखल हो चली और एक से एक विलक्षण प्रस्ताव आने लगे – यज्ञ की खाद्य सामग्रियों को विष्ठा कर दूषित कर दिया जाए, रूप बदल कर राजा के रित्विज बन इतनी दक्षिणा माँगी जाए कि राजा दे ही नही सके और यज्ञ का आरंभ ही नहीं हो, इतने व्यक्तियों को डस कर मार दिया जाए कि संत्रस्त हो सब हमारी पूजा करने लगें, राजा जब भी जल क्रीड़ा के लिए जलाशय आदि में उतरे उसे पकड़ कर नागलोक में बंदी बना लिया जाए, राजा को डस कर यज्ञ की आशंका का समूल नाश कर दिया जाए...

यह सब बोल कर सभी सर्प उत्सुक दृष्टि से वासुकी को देखने लगे. किंतु वासुकी ने किसी प्रस्ताव को विचार करने योग्य नहीं समझा. “मुझे लगता है अपने पिता कश्यप की कृपा से ही अब हमारा उद्धार हो सकता है”, वासुकी ने कहा.

सब की बातें सुन कर एलापत्र ने अपनी बात कही “इस यज्ञ को रोकना संभव नहीं है. जनमेजय को उस के निश्चय से डिगाना भी संभव नहीं है. जो प्रारब्ध के मारे रहते हैं उनकी मुक्ति भी प्रारब्ध से ही आती है. जब वह शाप दिया जा रहा था उस समय मैं भय से अपनी माँ की गोद में दुबक गया था. और राजन (वासुकी), वहीं से मैं ने ब्रह्मा के वचन सुने थे. देवताओं के पूछने पर कि कद्रू के इस क्रूर शाप को उन्हों ने क्यों नहीं रोका, पितामह ने कहा था कि सर्पों की संख्या बहुत अधिक हो गयी है और वे अब निर्दोष को भी काटते चलते हैं. विश्व का कल्याण इसी में है कि सर्पों की संख्या घटे.

“ब्रह्मा ने यह भी कहा था कि जब समय आएगा तब जरत्कारु नाम के एक यायावर ऋषि का पुत्र इस यज्ञ को पूरा नहीं होने देगा. जरत्कारु का यह पुत्र उसी नाम की एक सर्पिणी से उत्पन्न होगा जो सर्प-राज वासुकी की बहन है”

उसी समय से वासुकी जरत्कारु की खोज में लग गया था. यायावर ऋषि से उसकी बहन के विवाह और उनके पुत्र आस्तीक के जन्म का विवरण आ चुका है. इस सभा के कुछ समय बाद समुद्र मंथन हुआ था जिस में वासुकी ने मथानी की रज्जु की भूमिका निभाई थी. मंथन के बाद उस ने देवताओं को अपने भय बताया था. देवताओं ने ब्रह्मा से उसे बचाने की प्रार्थना भी की थी. ब्रह्मा ने फिर वही कहा था "सर्पराज जानता है उसे क्या करना है, एलपात्र ने जो कुछ कहा है वह सत्य कहा है. यज्ञ में दुष्ट और नीच सर्पों का नाश होना है, श्रेष्ठ सर्प उस के प्रकोप से बच जाएँगे".

Saturday, 18 April 2015

आदि पर्व (8): गरुड़

नैमिषारण्य में सौति कथा सुना रहा है, शौनक और उस के यज्ञ में आए ब्राह्मण कथा सुन रहे हैं.

"विनता के दूसरे अंडे से गरुड़ का जन्म हुआ. गरुड़ जन्म से ही जैसा रूप चाहे वैसा रूप धर सकता था, जितना बड़ा या छोटा आकार चाहे वह प्राप्त कर सकता था और जहाँ भी उस का मन करे वहाँ जा पाने में समर्थ था. उस के पास शक्ति का अक्षय भंडार था. जब जैसी आवश्यकता हो तब वह उतना शक्तिमान बन सकता था. जन्म के तुरंत बाद उस ने एक अति विशाल रूप धारण किया और अपनी शक्ति से वह आकाश में एक विशाल अग्नि पुंज लगने लगा.

"उस के शरीर की ऊष्मा से देवता भी जलने लगे. उसे अग्नि का एक रूप समझ कर सभी देवों ने अग्नि से अपने रूप को तनिक सौम्य करने काआग्रह किया. अग्नि ने उन्हे गरुड़ के जन्म की बात बताई और यह भी कहा कि उस से भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं  है, कश्यप का यह सर्प-भक्षी पुत्र देवताओं का मित्र और दानवों का शत्रु है. अग्नि की बात सुन देवताओं ने गरुड़ की स्तुति कर उस से अपना रूप सौम्य रखने की प्रार्थना की. देवताओं की बातमान गरुड़ ने अपने आकार को छोटा और अपने तेज को मद्धिम कर दिया.

“सौम्य रूप में गरुड़ ने अपने भाई अरुण को अपने ऊपर रख समुद्र पार किया और पूर्व दिशा में अपनी माता के पास आया. सूर्योदय काल में गरुड़ ने अरुण को पूर्व दिशा में स्थापित कर दिया. उस दिन सूर्य ने पृथ्वी को जलाने की ठान रखी थी…”

शौनक ने फिर “सूर्य ने किस बात पर पृथ्वी को जला देने की ठान ली थी?”

सौति ने कहा “समुद्र मंथन के समय जब राहु को देवताओं की पंक्ति में बैठ अमृत पीने के प्रयास में सूर्य और चंद्रमा ने पहचान लिया था उस समय से राहु ने इन दोनो देवताओं से शत्रुता पाल रखी थी. जब भी उसे अवसर मिलता राहु सूर्य को ग्रस्त करने का प्रयास करता था. राहु के साथ होते रहते इस संघर्ष में सूर्य ने देखा अन्य देवता उस का साथ नहीं देते थे. “और मैने इस की पहचान देवताओं की रक्षा के लिए ही की थी” ऐसा सोच सूर्य देवताओं पर क्रुद्ध हो गया था और उस दिन उस ने सब कुछ जला देने का निश्चय कर लिया था.

“उस संध्या, सूर्य के अस्त होने के बाद, अस्ताचल से सूर्य का ताप संपूर्ण विश्व को तप्त करने लगा था. रात में भी ऐसी प्रचंड ऊष्णता से त्रस्त हो ऋषि गण देवताओं के पास गये. पर इसे दूर कर पाना देवताओं के वश में नहीं था और सभी पितामह ब्रह्मा के पास पहुँचे. “अभी तक सूर्य का उदय नहीं हुआ है फिर भी भीषण गर्मी है. सूर्योदय केबाद तीनो लोकों का आज जलना निश्चित लग रहा है; पितामह आप ही आज कुछ कर सकते  हैं" ऋषियों और देवताओं ने ब्रह्मा से कहा.

“सच है, सूर्य ने आज सब कुछ जला कर राख कर देने की ठान ली है” पितामह ने कहा “किंतु मैने उपाय कर रखा है. कश्यप का पुत्र अरुण आज से उस का सारथी बन उस के रथ पर उस के आगे बैठेगा और सूर्य के प्रचंड ताप को अपने शरीर से रोक पृथ्वी तक नहीं पहुँचने देगा.”और उस दिन से सूर्य का सारथी अरुण उसकी प्रखरता से विश्व की रक्षा करता आ रहा है. अस्तु; अब हम वापस अपनी कथा पर आते हैं" सौति ने कहा.

गरुड़ उड़ कर अपनी माँ के निकट पहुँचा जो अपनी बहन कद्रू की दासी बनी हुई थी. जिस दिन गरुड़ वहाँ पहुँचा उस दिन कद्रू ने विनता को आज्ञा दी थी कि वह कद्रू को उस के पुत्रों के साथ समुद्र के मध्य में बसे एक रमणीय द्वीप पर ले चले जहाँ नाग रहते थे. विनता ने कद्रू को अपनी पीठ पर बिठाया और गरुड़ से कहा कि वह भी कद्रू के पुत्रों को अपनी पीठ पर ले कर उस द्वीप की ओर चले.समुद्र के बीच बसा वह द्वीप पहले मकरों का नगरी थी अब वह नागों का देश था, वहाँ पहुँच कर कद्रू-पुत्र बहुत प्रसन्न हुए और वे गरुड़ को यह करो, वह करो आदि आज्ञा देने लगे. गरुड़ को यह सब कुछ विचित्र लगा और उस ने अपनी माँ से पूछा “ये सर्प मुझे किस अधिकार से आज्ञा देते हैं”. विनता से सब जानने के बाद गरुड़ ने सर्पों से पूछा कि कैसे वह अपनी माँ को उस के दसीत्व से मुक्त करा सकता है. सर्पों ने आपस में विचार कर उसे अमृत लाने को कहा "यदि तुम अमृत कलश ला दोगे तो तुम्हारी माता मुक्त हो जाएगी."

गरुड़ भूखा था, अमृत के लिए निकलने के पहले उस ने अपनी माँ से अपने लिए भोजन माँगा. उस की माँ ने उसे समुद्र के बीच बसे एक द्वीप के बारे में बताया जिस पर बस निषाद रहते थे. "वहाँ जा कर तुम जितने चाहो निषाद खा लो" विनता ने कहा "बस ध्यान रखना भूल से भी किसी ब्राह्मण को मत खा लेना. ब्राह्मणों की हत्या कभी नहीं करनी चाहिए, चाहे किसी ब्राह्मण में कितने भी दोष क्यों न भरे हों. क्रुद्ध ब्राह्मण सूर्य या अग्नि की तरह सब कुछ जला सकता है.”

"पर ब्राह्मण होते कैसे हैं?" गरुड़ ने पूछा "उनके आचार व्यवहार कैसे होते हैं? मैं उन्हे कैसे पहचान पाऊंगा?"

"जो तुम्हारे मुख में घुसने पर मछली के काँटे की तरह तुम्हे कष्ट दे या जो जलते हुए कोयले की तरह तुम्हे जलाए, समझना वही ब्राह्मण है", विनता ने कहा "क्रोध में भी तुम कभी किसी ब्राह्मण का वध नहीं करना"

माँ की बातें सुनकर गरुड़ ने अपने पंख फैलाए औरआकाश चूमने लगा. निषादों के द्वीप पर जा कर गरुड़ ने सैकड़ों निषादों को निगल लिया. अचानक पेट में आग समान जलन होने पर वह समझ गया कि शायद कोई ब्राह्मण आ गया है. उस ब्राह्मण को अपने पेट से निकल आने की गरुड़ ने प्रार्थना की, और वह ब्राह्मण अपनी निषाद पत्नी के साथ निकल आया. क्षुधा शांत कर गरुड़ अमृत लेने निकल पड़ा. फिर कुछ सोच कर वह अपने पिता कश्यप ऋषि के निकट गया.

कश्यप ने उसके हाल चाल पूछे. “हम सब - माता, अरुण और मैं – कुशल से हैं” गरुड़ ने कहा “बस मुझे हमेशा भूख लगी रहती है और समझ में नहीं आता मैं क्या खाऊँ और क्या नहीं खाऊँ. माँ नेमुझे निषादों को खाने की अनुमति दी थी और मैं ने सहस्त्रों निषाद निगल लिए हैं किंतु अभी भी मेरी क्षुधा पूरी शांत नहीं हुई है.”

कश्यप यह सुन कर थोड़ी देर शांत रहा फिर उस ने एक कथा सुनाई. यहीं बहुत पहले कभी विभावसु और सुप्रितीक नाम के दो ब्राह्मण बंधु रहते थे. पिता की मृत्यु पर अनुज सुप्रितीक ने पैत्रिक संपत्ति का बँटवारा करना चाहा. विभावसु ऐसा नहीं चाहता था. इस बात पर दोनो में अनबन हुई और दोनो ने एक दूसरो को शाप दिए. शाप वश विभावसु एक हाथी बन गया और सुप्रितीक एक कछुआ. निकट स्थित एक जलाशय को दिखाते हुए कश्यप ने बताया इसी में वह हाथी और वह कछुआ पूरे दिन लड़ते रहते हैं. दोनो विशालकाय हैं - योजनों लंबे, "उन्हे खा कर तुम्हारी क्षुधा अवश्य शांत होगी. अमृत लेने के लिए निकलने के पहले तुम उन्हे खा लो."

पिता की बात मान गरुड़ उस जलाशय के ऊपर उड़ा.जैसा कश्यप ने कहा था गरुड़ को एक विशालकाय हाथी और एक उतना ही बड़ा कछुआ आपस में लड़ते दिखे. गरुड़, विशाल रूप धर कर अपने एक चंगुल में हाथी और दूसरे में कछुए को उठा कर उड़ चला. बहुत ऊपर जा कर वह भोजन करने के लिए कोई उचित स्थान खोज रहा था जब एक विस्तृत पीपल वृक्ष ने उसे योजनों लंबी अपनी एक शाखा पर बैठ कर खाना खाने को आमंत्रित किया. किंतु गरुड़ उस डाल पर बैठा ही था कि उसके,हाथी के और कछुए के मिले जुले भार से वह शाखा चरमरा उठी. तभी गरुड़ ने यह भी देखा कि उस डाल से वालखिल्य ऋषि (1) उल्टे लटक कर अपने ध्यान-तप आदि में डूबे हुए हैं. शाखा गिरने से ये ब्राह्मण नहीं बचेंगे यह सोचते हुए गरुड़ ने पीपल की टूटती हुई उस डाल को अपनी चोंच से उठाया और फिर खाने के लिए जगह खोजने उड़ चला. उस के इस पराक्रम से चकित हो वालखिल्य ऋषियों ने ही उसे गरुड़ नाम दिया था जिस का अर्थ है जो बहुत अधिक भार को ढोते हुए उड़ सके. जब उसे बैठने के लिए कोई उपयुक्त स्थान नहीं मिला तो वह वापस गंधमादन पर अपने पिता के पास जा पहुँचा.

मुँह में पीपल की डाल रहने के चलते अस्पष्ट शब्दों में उस ने कश्यप को अपनी समस्या बताई. पहली समस्या थी वालखिल्य ऋषियों की सुरक्षा की. कश्यप के अनुरोध पर वे स्वेच्छा से पीपल की डाल छोड़ हिमवत में तपस्या करने निकल गये. अब गरुड़ ने अपने पिता से किसी ऐसे निर्जन स्थान का पता पूछा जहाँ पीपल की उस विशाल डाल को गिराया जा सके.  कश्यप ने इस काम के लिए हिमालय की एक बर्फ़ीली घाटी उचित बताई और वहीं बैठ कर उस ने गरुड़ को अपना भोजन कर लेने को भी कहा.

अपनी क्षुधा शांत कर गरुड़ इंद्र-लोक के लिए निकलने वाला था जब वहाँ एक के बाद एकअशुभ लक्षण दिखने लगे. मेघ-हीनआकाश से बादलों के गरजने के शब्द आ रहे थे, देवताओं के गलों के पुष्प-हार कुम्हलाने लगे थे और कुछ देर बाद सभी देवताओं के शस्त्र, इंद्र का वज्र भी, अपने आप काँपने लगे थे. यह देख इंद्र बहुत चिंतित हुआ और देव-गुरु वृहस्पति से उस ने इनके कारण पूछे. वृहस्पति ने उसे वालखिल्य ऋषियों के शाप का स्मरण दिलाया और कहा कि ये अशुभ चिह्न बताते हैं कि कश्यप का पुत्र गरुड़ अब अमृत लेने के लिए इंद्रलोक आने की सोच रहा है. वृहस्पति की बात सुन इंद्र को अपने शाप की याद आई.

प्राचीन काल में इंद्र ने कभी कश्यप के एक यज्ञ की अग्नि के लिए एक पर्वत के भार के बराबर काष्ठ लाए थे. प्रजापति कश्यप संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहा था और अपने यज्ञ के लिए उस ने सभी देवताओं और ऋषियों से लकड़ी लाने का अनुरोध किया था. एक पूरा वन लाने के बाद इंद्र अपने पराक्रम पर प्रसन्न हो मुस्कुराते हुए चारो दिशाओं में देख रहा था जब उस ने वालखिल्य ऋषियों को पलाश के पत्ते के एक डंठल को लाते देखा. छहो ऋषि बहुत परिश्रम से उसे उठा पा रहे थे. यह देख इंद्र ठहाका मार कर हंस पड़ा. अपमानित हो ऋषियों ने इंद्र को शाप दिया था कि उस यज्ञ के फल-स्वरूप होने वाली कश्यप की सांतानों में से एक दूसरा इंद्र निकलेगा, जो जहाँ चाहे वहाँ जा सकेगा, जिसेअपरिमित शक्ति रहेगी और जो देवताओं के वर्तमान राजा के हृदय में भय उत्पन्न करदेगा. इंद्र यह सुन कर भयभीत हो प्रजापति कश्यप की शरण में गया था. कश्यप के मनाने पर वालखिल्य ऋषि मान गये और उन्होने कह दिया कि कश्यप का पुत्र पक्षियों का इंद्र बनेगा. कश्यप ने इंद्र को भी समझाया कि ब्राह्मणों का अपमान कभी नहीं करना चाहिए उनके शब्द वज्र से भी अधिक घातक हो सकते हैं.

वृहस्पति से गरुड़ के आने का उद्देश्य जान इंद्र ने अमृत कलश की रक्षा के लिए अनेक देवताओं को नियुक्त किया और स्वयं भी हाथ में वज्र ले कर गरुड़ की प्रतीक्षा में कलश की निकट खड़ा हो गया. पर गरुड़ के आनेपर उसे देख सभी देवता भयभीत हो, अपनी बुद्धि खो कर, एक दूसरे पर वार करने लगे. गरुड़ के पंखों से इतनी धूल उड़ी कि दिन में भी अंधकार छागया. वायु ने धूल हटाए और तब कहीं गरुड़ और देवताओं का युद्ध शुरू हुआ.गरुड़ देवताओं पर बहुत भारी पड़ा. उस के चंगुल और उसकी चोंच से आहत हो देवताओं, यक्षों,गंधर्वों और वसुओं के रक्त से रणभूमि लाल हो गयी.

देवताओं की सेना को तहस नहस कर गरुड़ अमृत कलश के पास पहुँचा. कलश के चारो ओर तीक्ष्ण धार का एक लौह चक्र अनवरत रूप से घूम रहा था और कलश तक पहुँच पाना असंभव लग रहा था. पर अति सूक्ष्म रूप धारण कर, उस चक्र के दाँतों के बीच से मार्ग बना कर, गरुड़ कलश के निकट पहुँच गया. वहाँअपने श्वासों से अग्नि की लपट निकालते दो भयावह सर्प कलश की रक्षा करते मिले.गरुड़ ने धूल उड़ा कर उन सर्पों को अपनी आँखें बंद करने पर बाध्य कर, अपने चंगुलों से उन्हे क्षत-विक्षत कर दिया; और तब वह अमृत कलश को ले कर लौह चक्र से बिना अवरुद्ध हुए सीधे ऊपर उठ कर निकल गया.  

गरुड़ ने कभी अमृत को चखने की चेष्टा भी नहीं की. आकाश में उसे विष्णु मिले, जो उस के इस आत्म त्याग से बहुत प्रसन्न थे. विष्णु ने गरुड़ को वर देना चाहा और गरुड़ ने दो वर माँगे: “प्रभु, मैं आप से भी ऊपर रहूं,और बिना अमृत पिए मैं व्याधि मुक्त और अमर रहूं.” विष्णु ने जब हंसते हुए दोनो वर दे दिए तो गरुड़ ने भी उन्हे वर देना चाहा. विष्णु ने उसे अपना वाहन बनाना चाहा और उसेअपने रथ के ध्वज-स्तंभ पर भी रखना चाहा “इस तरह तुम मेरे ऊपर भी रहोगे” हंसते हुए उन्होने कहा. उस दिन से विष्णु का एक नाम गरुड़ध्वज भी होगया.  

अमृत कलश ले कर वापस जाते हुए गरुड़ पर इंद्र ने वज्र से प्रहार किया था. वज्र का गरुड़ के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा किंतु दधीचि ऋषि का सम्मान करते हुए गरुड़ ने अपना एक पर गिराते हुए इंद्र से कहा “मैं ऋषि का सम्मान करता हूँ जिनकीअस्थियों से वज्र बना है, मैं वज्र का भी सम्मान करता हूँ देवेन्द्र, इसीलये वज्र के आघात का कोई अनुभव नहीं करने पर भी मैने अपना एक पर यहाँ गिरा दिया है.” उस रुपहले पर के चलते गरुड़ का एक नाम सुपर्ण भी पड़ गया.

गरुड़ की अपरिमित शक्ति देख इंद्र ने मैत्री-प्रस्ताव रखा और गरुड़ ने उसकी मित्रता स्वीकार कर ली. गरुड़ को मित्र बनाकर इंद्र ने बिना समय गँवाए अमृत वापस माँगा. “जिनके लिए तुम यह ले जा रहे हो वे इसे पीने के योज्ञ नहीं हैं” इंद्र ने कहा. “किंतु में उन्हे पिलाने नहीं जा रहाहूँ", गरुड़ ने कहा "मैं उन्हे बसअमृत कलश देने जा रहा हूँ. मेरे दे देने के बाद तुम उसे वहाँ से उठा लेना, मैं कोई अवरोध नहीं डालूँगा”

कद्रू के पुत्रों के पास पहुँच कर गरुड़ नेअमृत कलश रखने के लिए घास बिछवाए और उस पर कलश रख कर अपनी माता के मुक्त होने की पुष्टि माँगी. अमृत कलश देख सर्पों ने प्रसन्नता से विनता को उस के दासीत्व से मुक्त कर दिया. अमृत पान करने के पहले सर्प स्नान आदि कर अपने को पवित्र करने गये और उधर चुपके से आ कर इंद्र कलश उठा कर अपने लोक वापस ले गया. जब तक सर्प आते तब तक कलश जा चुका था. अमृत की एकाध बूँद पाने की इच्छा से सर्प घास की उस चटाइ को, जिस पर वह कलश रखा गया था, चाटने लगे . कुश चाटने से उनकी जिह्वायें फट गयीं जो आज भी फटी दिखतीं हैं; और अमृत कलश का आसन बनने के चलते कुश भी सदैव के लिए पवित्र माना जाने लगा.

माता को मुक्त करा कर सुपर्ण अपनी माँ के साथआनंद से रहने लगा.

“जो भी गरुड़ की इस पवित्र कथा को सुनता है या भद्र ब्राह्मणों के बीच इसे सुनाता है वह बहुत पुण्य अर्जित कर स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है.” सौति ने कहा.




 (1) वालखिल्य ऋषियोंकी संख्या छः है, सप्तर्षियों की तरह इनके अलग अलग नाम नहीं हैं; इन्हेबस इनके सामूहिक नाम “वालखिल्य ऋषि” से ही संबोधितकिया जाता है. कहा जाता है कि आकार में ये एक मनुष्य के अंगूठे के समतुल्य हैं. 

Thursday, 16 April 2015

आदि पर्व (7): कद्रू का शाप और समुद्र मंथन

“वर्षों बाद पांडवों के वंश के एक राजा जनमेजय ने, सर्पों के विनाश के लिए, सर्प-यज्ञ आयोजित किया था. आस्तीक ने अपने ममेरे भाई-बहनों और अपने मातुलों को उस यज्ञ की अग्नि में जलने से बचाया था. “इसी आस्तीक और उस सर्प-यज्ञ की कथा” उग्रश्रवा ने कहा “मैं सुनाने जा रहा हूँ. सर्प यज्ञ के अनेक कारण थे, यथा जनमेजय के पिता का सर्प दंश से मरना, ब्राह्मण उत्तंक का सर्प-राज तक्षक से वैमनस्य आदि. एक महत्वपूर्ण कारण था सर्पों की माता कद्रू का अपने पुत्रों को शाप, वह प्रसंग कुछ इस प्रकार है: 

“प्रजापति की दो रूपवती पुत्रियाँ, कद्रू और विनता, कश्यप ऋषि की पत्नियाँ थीं. उनसे प्रसन्न हो जब कश्यप ने उन्हे वर देना चाहा तो कद्रू ने पुत्र रूप में एक सहस्त्र साँप माँगे और विनता ने बस दो पुत्र लेकिन ऐसे जो कद्रू के सहस्त्र पुत्रों पर अकेले भारी पड़ें. कश्यप दोनो को तथास्तु कह तपस्या करने वन चला गया और दोनो बहनें अपने अपने वरदान से प्रफुल्लित हो अपने पुत्रों की प्रतीक्षा करने लगीं.

“बहुत दिनों बाद कद्रू ने एक सहस्त्र और विनता ने दो अंडे दिए. उनकी दासियों ने अंडों को समशीतोष्ण पात्रों में संभाल कर रख उनकी देख भाल करने लगीं. पाँच सौ वर्षों के बाद कद्रू के अंडों को फोड़ कर सहस्त्र सर्प निकले पर विनता के अंडे जैसे थे वैसे ही रहे. कद्रू की संतानों को बढ़ते देख विनता से रहा नहीं गया और उस ने एक अंडे को फोड़ डाला. अंडे से एक अर्ध विकसित पक्षी निकला. वह अपनी माता की आकुलता से बहुत दुखी और क्रुद्ध था. उसके शरीर के अधोभाग के किसी अंग का विकास नहीं हुआ था. “यह तुम ने अच्छा नहीं किया माँ” उस ने कहा “दूसरे अंडे को भी इस तरह मत फोड़ बैठना. तुम ने समय से पहले मेरे अंडे को फोड़ दिया था इस लिए तुम्हे कुछ समय के लिए दासी बनना पड़ेगा. यदि तुम और पाँच सौ वर्ष धैर्य से रहो तो दूसरे अंडे से जो तुम्हारा ख्याति-मान पुत्र निकलेगा वह तुम्हे तुम्हारी दासता से मुक्त कराएगा.” वह पक्षी समय आने पर सूर्य के रथ का सारथी बना. कहा जाता है कि प्रातः काल में, जब सूर्य का रूप प्रखर नहीं रहता, उसे देखा जा सकता है.      

“पाँच सौ वर्ष बीतने पर विनता के दूसरे अंडे को फोड़ कर सर्प-भक्षी गरुड़ निकला. बाहर निकलते ही वह विनता को छोड़ अपने लिए भोजन खोजने उड़ चला. उसी समय दोनो बहनों ने समुद्र मंथन से निकले उस महान दिव्य अश्व उच्चैश्रवा को अपनी दिशा में आते देखा.  उच्चैश्रवा समुद्र मंथन से निकला था और उस अश्व-रत्न की देवता भी पूजा करते थे”

यहाँ शौनक से नहीं रहा गया और वह पूछ बैठा “समुद्र मंथन क्यों हुआ था? कैसे हुआ था? और वह दिव्य अश्व-रत्न उच्चैश्रवा उस मंथन से कैसे निकला था?”

सौति ने कहा “उत्तर दिशा में मेरु नाम का एक गगनचुंबी पर्वत है. उस के वक्ष पर भयानक जन्तु रहते हैं और बस निष्पाप मनुष्य ही उस पर जाने की सोच सकते हैं. मनोरम नदियों, जलाशयों से भरा और भाँति भाँति की जड़ी बूटियों से सुशोभित वह पर्वत देवताओं और गंधर्वों का क्रीड़ा स्थल रहा है. एक बार उस पर्वत के शिखर पर देवताओं की एक सभा लगी थी. उन्होने अमरत्व पाने के लिए कठोर तप किए थे और अब अमृत की खोज में थे. सभा को अमृत के लिए चिंतित देख नारायण ने देवताओं को समुद्र मंथन कर अमृत निकालने को कहा.

“समुद्र मंथन के लिए देवताओं ने मन्दार पर्वत को मथानी बनाने की सोची. मन्दार ग्यारह योजन ऊँचा था और इतना ही मिट्टी के नीचे भी गया हुआ था. देवता उसे उखाड़ नहीं पा रहे थे. वे विष्णु और ब्रह्मा की शरण में गये. विष्णु ने इस काम के लिए महा शक्तिमान सर्प अनंत को नियुक्त किया. अनंत द्वारा मन्दार के उखाड़ लिए जाने पर, सागर से मंथन की अनुमति ले कर, कूर्म-राज से मथानी का आधार बनने का अनुरोध किया गया. कूर्म-राज भी तैयार हो गया.

और इस तरह मन्दार को मथानी, कूर्म-राज को आधार और वासुकी को मथानी की रज्जु बना कर समुद्र के मंथन की तैय्यारी पूरी हुई. सुर और असुर मिल कर मंथन करने जा रहे थे. वासुकी को मुख की दिशा में असुरों ने और पूंछ की दिशा में सुरों ने पकड़ा और वह भीषण मंथन शुरू हो गया.

मंथन शुरू होते ही समुद्र के गर्भ से महाघोष के साथ प्रलयंकारी मेघ निकलने लगे. पर्वत के नीचे अनेक जलचर मारे गये और पर्वत के ऊपर वृक्ष उखड़ने लगे. टूटे वृक्षों के घर्षण से रह रह कर अग्नि प्रज्वलित हो जाती थी और वह पहाड़ तड़ित से चमकता कोई विशाल मेघ समूह लगने लगा. 

बहुत देर तक मंथन के बाद सागर से चंद्रमा निकला, उसके पीछे श्वेत वसन में लक्ष्मी निकली, फिर सोम और उसके बाद श्वेत वर्ण का वह अश्व, और कौस्तुभ मणि जो नारायण के वक्ष की शोभा बना है. लक्ष्मी, सोम और अश्व देवताओं के पक्ष में आ गये थे. उनके बाद अमृत कलश लिए हुए श्वेत वसन में धन्वंतरी निकला. उसे देख कर असुरों ने अपना दावा ठोंका “यह हमारा है”. तब तक विशाल गजराज ऐरावत निकला जिस के दो जोड़े दाँत निकले हुए थे. इंद्र ने उसे अपना वाहन बना लिया. मंथन अभी चल रहा था. ऐरावत के बाद समुद्र के गर्भ से कराल कालकूट विष ऊपर आया. उस के उग्र, कटु गंध से संसार के सभी जीव जड़ होने लगे. विश्व को उस के धुएँ और अग्नि-ज्वाला में धधकते देख ब्रह्मा ने शिव से सृष्टि की रक्षा करने की प्रार्थना की.  शिव ने उसे घोंट कर अपने कंठ में रोक लिया, उसी कराल विष के प्रभाव से शिव का कंठ श्याम वर्ण का हो गया और शिव उस दिन से नीलकंठ कहलाने लगे.     

उधर असुर चिंतित हो कर सुरों से लक्ष्मी और अमृत छीनने की योजना बनाने लगे. नारायण ने सब समझ कर अपनी माया शक्ति से एक मोहिनी का रूप लिया और असुरों से परिहास करने लगे. दानवों ने उस मोहिनी के रूप और नखड़े के आगे अब कुछ भूल कर अमृत कलश उस के हाथों में रख दिया. नारायण ने मोहिनी रूप में ही देवताओं को पंक्ति में बिठा कर उन्हे अमृत पिलाना शुरू कर दिया. अमृत पीने की भागा दौड़ी में राहु नाम का एक दानव भी देव भेष धर कर देवताओं की पंक्ति में अमृत पीने के लिए बैठ गया था. अमृत उस के गले से नीचे उतरा भी नहीं था जब उसे सूर्य और चंद्रमा ने पहचान लिया और नारायण ने अपने चक्र से उस की गर्दन काट दी. राहु का विशाल मस्तक चीत्कार करता आकाश में उड़ गया और उस दिन से राहु के मस्तक की सूर्य और चद्रमा से भीषण शत्रुता चली आ रही है. आज भी अवसर पा कर राहु का वह विशाल मुख सूर्य या चंद्रमा को ग्रस्त कर सूर्य या चंद्र के ग्रहण की स्थिति कर देता है.

देवताओं को अमृत पिला कर नारायण अपना मोहिनी रूप त्याग दानवों पर भयानक शस्त्रों से प्रहार करने लगे और सागर तट पर देव-दानवों के बीच घोर युद्ध छिड़ गया. दोनो पक्षों से तीरों और भालों की वर्षा की जाने लगी पर अमृत पीने के बाद देव भारी पड़ रहे थे; साथ ही नारायण का सुदर्शन चक्र भी दानवों को सहस्त्रों की संख्या में मार रहा था. अपनेआप को पूर्ण रूपेण नष्ट होते देख बचे खुचे दानव भाग कर पाताल में चुप गये.

दानवों पर विजय प्राप्त करने के बाद देवताओं ने मन्दार पर्वत की विधिवत पूजा कर उसे वापस उसके अपने आधार पर रख दिया और अमृत कलश को सुरक्षित रखने के लिए नारायण को दे कर उत्साह से विजय घोष करते हुए वे देव-लोक को चले गये.

सौति ने कहा “इस तरह वह अश्व उच्चैश्रवा समुद्र-मंथन से निकला था, जिसे कद्रू और विनता अपनी दिशा में आते देख रहीं थीं.

उसे देख कद्रू ने विनता से उस अश्व की पूंछ का रंग पूछा था. विनता के श्वेत कहने पर कद्रू ने पूंछ को कृष्ण वर्ण का बताया, और दोनो में शर्त लगी – जिसके वचन असत्य सिद्ध होंगे उसे दूसरी की दासी बन कर रहना पड़ेगा. शर्त लगा कर, अगले दिन सत्यापन करना तय कर वे अपने  अपने घरों को  चली गयीं.

शर्त जीतने के लिए उस रात कद्रू ने अपने पुत्रों को (सहस्त्र सर्पों को) आदेश दिया कि वे काले रोएँ का रूप बना कर उस घोड़े की पूंछ पर सट जायें जिस से उसे विनता की दासी नहीं बनना पड़े. पर सर्पों ने ऐसा करने से मना कर दिया. उनके मना करने पर क्रुद्ध कद्रू ने उन्हे जनमेजय के सर्प-यज्ञ में जल कर भस्म हो जाने का शाप दे दिया. कद्रू के इस क्रूर शाप को पितामह ब्रह्मा ने भी सुना और उस ने देवताओं से भी इस की चर्चा की. पर सबों का मत था क़ि सर्पों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही थी और वे हर किसी निर्दोष को डस लेते थे इस लिए इस शाप से विश्व का कल्याण ही होगा. ऐसा सोच ब्रह्मा ने शाप को निरस्त नहीं किया. 
ब्रह्मा तब कद्रू के पति कश्यप से मिला, जो वन में तपस्या कर रहा था. “तुम्हारी पत्नी कद्रू ने तुम्हारे पुत्रों को नष्ट हो जाने का शाप दे दिया है.  तुम दुखी मत होना. उनका उस यज्ञ में जलना बहुत पहले से लिखा हुआ था."  कश्यप को सांत्वना दे कर और सर्पदंश के विष को काटने का ज्ञान भी उसे दे कर ब्रह्मा अपने लोक चला गया.  

रात में कुछ नागों ने मिल कर अपनी माता को जिताने के लिए काले रोएँ बन कर उस घोड़े की पूंछ पर चिपक जाने का निश्चय किया.  उन्हे चिंता थी कि शर्त हार जाने पर  कद्रू सभी सर्पों के नष्ट हो जाने का शाप दे सकती थी और यह भी आशा थी कि जीत जाने पर प्रसन्न हो शायद वह सबों को शाप-मुक्त कर दे. 
  
अगले दिन प्रातः काल दोनो बहनें उच्चैश्रवा को निकट से देख कर अपनी अपनी बातों के सत्यापन करने चलीं. घोड़ा समुद्र के पार था. दक्ष की दोनो पुत्रियाँ ने वायु मार्ग से समुद्र को उस के मनोहर, और कभी कभी भयावह, दृश्यों को देखते हुए पार किया. उस पार पहुँच कर उन्होने पाया कि उस अश्व-रत्न के अंग प्रत्यंग चाँदनी के समान शीतल श्वेत वर्ण के थे किंतु उस की पूंछ काली थी.  विनता शर्त हार गयी और दुखी मन से उसे कद्रू की दासी बनना पड़ा.

Wednesday, 15 April 2015

आदि पर्व (6): आस्तीक का जन्म

महाभारत का पहला सार्वजनिक पाठ जनमेजय के सर्प-यज्ञ में व्यास के शिष्य वैशम्पायन ने किया था. आदि पर्व के प्रारंभ में विभिन्न कथाओं के माध्यम से इस सर्प यज्ञ की पृष्ठभूमि तैयार की गयी है. सर्प यज्ञ में अनेक सर्प मारे जाते हैं पर अनेक बच भी जाते हैं. सर्पों के मरने के पीछे उनकी माता कद्रू का शाप और एक ब्राह्मण उत्तंक का रोष है और उनके बचाए जाने के पीछे एक ब्राह्मण बालक आस्तीक  के प्रयास हैं. आस्तीक एक यायावर ऋषि का पुत्र था पर उसकी माता सर्पिणी थी.  

आदि पर्व के प्रारम्भ में एक लघु कथा में सर्पिणी-पुत्र ब्राह्मण सोमश्रवा का जनमेजय के पुरोहित बनने .का प्रसंग है.  पहली प्रमुख कथा में उत्तंक का सर्प राज तक्षक से रुष्ट होने का वृतांत है. इसी उत्तंक ने जनमेजय को सर्प यज्ञ आयोजित करने के लिए प्रेरित किया था. यह उल्लेखनीय है कि जनमेजय के पिता की मृत्यु एक ऋषि के शाप वश सर्पदंश से हुई थी. पर जनमेजय ने इस के चलते सर्पों के नाश के लिए तुरंत किसी यज्ञ की नहीं सोची थी. उस के हृदय में सर्प यज्ञ की इच्छा उत्तंक ने ही जगाई थी.

उत्तंक की कथा के बाद भृगु के वंश का वर्णन आ चुका है. भृगु के पुत्र च्यवन के पौत्र रुरू की होने वाली पत्नी को एक सर्प ने डस लिया था जिसके बाद रुरू सभी सर्पों को मारने लगा था. एक वृद्ध डुन्डुभ सर्प ने उसे जनमेजय के सर्प-यज्ञ का वृतांत सुनने को प्रेरित किया था.

आस्तीक पर्व में सर्पों और उनके सौतेले भाई गरुड़ के जन्मों की कहानियाँ हैं. सर्पों की माता कद्रू ने अपने पुत्रों की सहायता से अपनी बहन (और अपनी सौतन) गरुड़ की माता विनता को छल कर अपनी दासी बनाने के क्रम में अपनी आज्ञा नहीं मानने वाले अपने पुत्रों (सर्पों) को जनमेजय के सर्प-यज्ञ में भस्म हो जाने का शाप दिया था. इस में उच्चैश्रवा घोड़े की एक भूमिका रही है. यह घोड़ा समुद्र मंथन से निकला था, इस सन्दर्भ से इस पर्व में समुद्र मंथन का वृतांत भी आया है.

आस्तीक पर्व में जनमेजय के पिता परीक्षित की मृत्यु की भी कथा है. परीक्षित की मृत्यु एक साँप (तक्षक) के डसने से हुई थी और वह सर्प दंश एक ऋषिपुत्र के शाप वश हुआ था. परीक्षित की मृत्यु के बाद उस के ज्येष्ठ पुत्र जनमेजय का अल्पावस्था में राज्याभिषेक, जनमेजय का काशी नरेश की पुत्री से विवाह आदि अन्य कथायें भी इस पर्व में हैं.

एक प्रमुख कथा आस्तीक के जन्म की भी है, जो यायावर ऋषियों की परंपरा के एक ऋषि के वासुकी की बहन के साथ हुए विवाह से उत्पन्न हुआ था.         

सभी कथायें नैमिषारण्य में उग्रश्रवा सुना रहा है. सुनने वालों में शौनक और उसके यज्ञ में आए अन्य ब्राह्मण हैं. शौनक के पूछने पर उग्रश्रवा जनमेजय के सर्प यज्ञ की कथा सुना रहा है. "इस कथा को व्यास ने लिपिबद्ध किया है, पहली बार मैने इसे अपने पिता लोमहर्षण, जो व्यास के शिष्य  थे, से सुनी थी. यह जितनी जनमेजय की कथा है उतनी ही उस ब्राह्मण आस्तीक की भी है. मैं उस पाप-नाशक कथा का संपूर्ण पाठ करता हूँ, ध्यान से सुनें”

आस्तीक का पिता जरत्कारु ब्रह्मचारी था - अल्पाहारी, उर्ध्वरेता और यायावर. यायावर अर्थात वह कहीं आश्रम बना कर नहीं रहता था. जरत्कारु अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप एक तीर्थ स्थल से दूसरे तीर्थ स्थल को जाते हुए जहाँ सांझ ढलती उसी जगह को एक रात के लिए अपना घर समझ लेता था. उसे कोई सांसारिक इच्छा नहीं थी. मात्र वायु पर जीवित रहते हुए, पवित्र तीर्थों में स्नान करते हुए वह बहुत प्रसन्न रहता था. एक बार तीर्थ यात्रा के क्रम में जरत्कारु ने कुछ ब्राह्मणों को एक गड्ढे में उल्टे लटके देखा था. ये ब्राह्मण और कोई नहीं उसके पूर्वज थे. उनके वंश में श्राद्ध आदि नहीं होते रहने से उन्हे भोजन नहीं मिला था और वे बहुत दुर्बल हो गये थे. पृथ्वी पर एक छिद्र में किसी वृक्ष की एक जड़ से वे लटके हुए थे; और उस जड़ को भी एक मोटा चूहा काटे जा रहा था. जरत्कारु ने उनसे  पूछा “आप कौन हैं? और क्या आप जानते हैं कि जिस रज्जु से आप लटके हुए हैं उसे एक चूहा काट खाए जा रहा है.  उसके कटने में देर नही है और तब आप मुँह के बल इस गड्ढे में गिर पड़ेंगे”.
“मुझ से आप का यह संकट देखा नहीं जा रहा है”, जरत्कारु ने कहा “आप को बचाने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ; यदि अपने जीवन में अर्जित पुण्य का आधा भाग, या मेरा पूरा का पूरा पुण्य भी दे देने से आप बच जायें तो मैं वह करने को तैयार हूँ. 

उसे सुन उन ब्राह्मणों ने कहा “तुम हमें बचाना चाहते हो, यह सुन बहुत अच्छा लगा. किंतु तुम अपने तप से हमारी रक्षा नहीं कर सकते. हम ने भी बहुत तप कर रखे हैं और उनके फल भी अर्जित किए हैं. पर हमारा वंश संतानहीन हो गया है जिस के चलते हम अब गिरे जा रहे हैं.
“हम यायावर ऋषि रहे हैं. पुत्रहीन हो जाने के चलते हम पवित्र लोकों से गिर पड़े हैं और गिरते जा रहे हैं. जैसा तुम ने देखा, अब उस वृक्ष का बस एक जड़ बचा है जिस से हम लटके हुए हैं. वह हमारे वंश का एक मात्र पुत्र है जरत्कारु. उस ने वेद वेदांगों के अध्ययन किए हैं  और अब वह तीर्थाटन और  तपश्चर्या में लगा रहता है. उसे तप के फल की भी कोई चाह नहीं है, उसके न कोई पत्नी है, ना पुत्र और ना ही कोई अन्य संबंधी. उसी के चलते हम इस गड्ढे में लटके पड़े हैं. अब हमारी चेतना भी धीरे धीरे लुप्त हो रही है. कुछ दिनों में हम स्वयं जड हो जाएँगे.
“यदि तुम्हे कभी जरत्कारु मिल जाए तो उसे तुम विवाह करने के लिए प्रेरित करना. उसे बताना उस के पितृ मुँह के बल गड्ढे में लटके हुए हैं, और अब बस उसी के सहारे वे बचे हैं; और यह भी कि यदि उस ने विवाह नहीं किया तो उस के पितृयों को गिरने से कोई नहीं रोक सकता.
“और ओ ब्राह्मण, वृक्ष का यह जड़ जो तुम देख रहे हो यह हमारा वंश है और वह चूहा और कोई नहीं काल है. काल अनवरत रूप से जरत्कारु को तप आदि में उलझाए रख रहा है और उसी क्रम में हमारा यह एक मात्र संबल भी छूटा जा रहा है.”

यह सब सुन दुखी जरत्कारु ने अपना परिचय दिया “मैं ही वह दुर्मति जरत्कारु हूँ;  आप मेरे ही पितृ हैं. मैं ऊर्ध्वरेतस हो इस शरीर को परलोक में ले जाना चाहता था और इसी लिए मैं ने कभी विवाह, पत्नी, पुत्र आदि के विषय में सोचा ही नहीं.  किंतु आप को इस तरह लटके देख मैने अभी निश्चय किया है कि मैं ब्रह्मचर्य का त्याग कर आप जो चाहते हैं वही करूँगा. मैं अवश्य विवाह करूँगा यदि मेरे ही नाम की कोई कन्या मुझे मिल जाए, और उस के भरण-पोषण का भार मेरे ऊपर नहीं रहे.  उस से जो पुत्र होगा वह आप को इस गड्ढे से मुक्त कर देगा.”

अपने पित्रों को आश्वासन दे कर जरत्कारु फिर तीर्थाटन पर निकल पड़ा. अब वह नवयुवक नहीं रहा था और उसे कहीं कोई पत्नी नहीं मिल रही थी. वन के एकांत में वह अपने पित्रों को याद कर कभी कभी फफक फफक कर रो उठता था.  “मैं पत्नी अवश्य खोजूँगा”, मंद स्वर में अपने आप को तीन बार यह कह कर वह पत्नी प्राप्त करने के लिए तीन बार प्रार्थना भी किया करता था.

कुछ सर्पों के मुँह से जरत्कारु की प्रार्थना और उस की पत्नी खोजने की बात सुन सर्पराज वासुकी अपनी बहन को आभूषणों से सुसज्जित कर मुनि के पास वन में ले गया और उस ने अपनी बहन को भिक्षा स्वरूप मुनि को अर्पित कर दिया. पर जरत्कारु ने तत्काल उसे स्वीकार नहीं किया. उस की अपनी शर्तें थीं. उस ने उस कन्या के नाम पूछे और वासुकी को स्पष्ट कह दिया कि वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण नहीं करेगा.

“हे द्विजोत्तम”, वासुकी ने कहा “मेरी इस बहन का नाम भी जरत्कारु है; और मैं आजीवन इसका पोषण करूँगा. आप के ऊपर यह कभी बोझ नहीं बनेगी. इसे मैने आप ही के लिए पाल पोस कर बड़ा किया है”
यह सुन जरत्कारु ने पुनः स्पष्ट किया “मैं इसे पत्नी के रूप में तभी स्वीकार कर सकता हूँ यदि इसके संभरण या इसके संरक्षण का कोई दायित्व मेरे ऊपर नहीं रहे. और याद रखना, यदि कभी यह मेरी इच्छा के प्रतिकूल कुछ भी करेगी तो मैं इसे छोड़ कर निकल जाऊँगा.”

वासुकी सब शर्तें मानने के लिए तैयार था. उस ने सुना था कि कभी ब्रह्मा ने कह रखा था कि जरत्कारु एक सर्पिणी से विवाह करेगा और उस विवाह से उत्पन्न पुत्र सर्पों की प्रजाति को जनमेजय के सर्प यज्ञ में नष्ट होने से बचा लेगा. अपनी बहन को जरात्कारू से ब्याह कर वासुकी अपनी और अपने परिवार की प्राण-रक्षा निश्चित कर रहा था.

मुनि विवाह के लिए तैयार हो गया और शास्त्रोक्त रीति से दोनो जरत्कारु का शुभ विवाह सम्पन हुआ. विवाह के बाद मुनि ने अपनी सर्पिणी पत्नी से फिर कहा “जो मेरी रूचि के अनुकूल नहीं हो वैसा तुम कभी कुछ नहीं कहोगी या करोगी. यदि तुम ने ऐसा किया तो उस के बाद मैं तुम्हारे साथ कभी नहीं रहूँगा.”
   
सर्पिणी ने अपनी आँखें झुका कर सब बातें सुनी और मृगी की कातरता और श्वान की जागरूकता के साथ अपने पति की सेवा में लग गयी. समय आने पर उस ने गर्भ धारण किया और उन्ही दिनों एक बार जब मुनि अपनी पत्नी की गोद में सिर रख कर सो रहा था तो सर्पिणी ने सूर्य को अस्ताचल की दिशा में जाते देखा. सूर्यास्त का काल निकट आते देखे वह बहुत चिंतित हो गयी. यह मुनि के संध्या पूजन का काल था और मुनि निश्चिंत हो सो रहा था.

“क्या करूँ मैं?”, वह सोचने लगी “मुनि अपने कर्मकांड के प्रति बहुत नियमित रहते हैं और संध्या पूजन का छूट जाना उन्हे बहुत अखरेगा; किंतु सोए व्यक्ति को नहीं जगाना चाहिए और सोए पति को तो कभी नहीं”. यही सब सोचते, डरते डरते उस ने मुनि को जगा दिया. जगने पर मुनि बहुत रुष्ट हुआ. क्रोध से काँपते हुए उस ने अपनी पत्नी से कहा “तुम ने मेरा घोर तिरस्कार किया है. कैसे तुम ने यह सोच लिया कि बिना मेरी पूजा स्वीकार किए सूर्यदेव कभी अस्त हो सकते हैं? मैं अब यहाँ एक दिन भी नहीं रुकुंगा”. यह कहते कहते, अपनी रोती पत्नी को छोड़,  मुनि अपने पुराने पथों पर फिर निकल गया. जाते जाते उस ने अपनी पत्नी से कहा कि उसके गर्भ में जो शिशु है वह अग्नि के समान तेजस्वी ब्राह्मण होगा जिसे समय आने पर सभी वेद-वेदांगों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाएगा.

पति के जाने के बाद जरत्कारु भागी भागी अपने भाई वासुकी के पास गयी. मुनि के चले जाने की सुन कर वह भी अपनी बहन से कम दुखी नहीं हुआ. मुनि के रहने से वह आने वाले सर्प-यज्ञ से अपने को सुरक्षित समझता था, वह सुरक्षा कवच उसे अब भग्न दिखाई दे रहा था.

“तुम जानती हो बहन” वासुकी ने कहा “मुनि से तुम्हारे विवाह का उद्देश्य था मुनि-पुत्र का हमारे कुल में जन्म लेना, जो पितामह ब्रह्मा ने कह रखा है, हमे सर्प-यज्ञ से बचा पाएगा.” पर वह पूर्णतः निराश नहीं हुआ था “मेरा हृदय कहता है कि तुम्हारा यह विवाह व्यर्थ नहीं जाएगा. मेरा यह तुम से पूछना वैसे तो अनुचित है किंतु विषय की गंभीरता देखते हुए शायद यह क्षम्य हो. उस तपस्वी मुनि ने तुम्हारे साथ क्या क्या किया, मुझे सब बताओ”.

उसका अभिप्राय समझ कर जरत्कारु ने उसे मुनि के अंतिम वचन बताए. अग्नि के समान तेजस्वी पुत्र की बात सुन वासुकी प्रसन्न हो गया. सर्पराज ने अब अपनी बहन को और भी अधिक सम्मान देना शुरू कर दिया. उचित समय पर जरत्कारु ने अपने देव-तुल्य पुत्र आस्तीक को जन्म दिया.  वासुकी ने आस्तीक को भृगु के पुत्र च्यवन के आश्रम में वेद-वेदांगों के अध्ययन के लिए भेजा. बाल्यावस्था में भी आस्तीक अपनी प्रखर बुद्धि और तपश्चर्य्या के लिए विख्यात हो गया था. अपनी माँ के घर रहते हुए अपने ममेरे भाइयों और अपने मातुलों से उसकी बहुत घनिष्ठता भी हो गयी थी.