Tuesday, 19 May 2015

आदि पर्व (23): भीष्म का जन्म

इक्ष्वाकु वंश में कभी महाभिष नाम का एक प्रतापी राजा हुआ था. अनेकअश्वमेध और राजसूय यज्ञ कर उस ने स्वर्ग में अपना स्थान बना लिया था.  एक दिन देव गण ब्रह्मा का पूजन कर रहे थे जब अन्य राजर्षियों के साथ महाभिष भी वहां उपस्थित था. पितामह ब्रह्मा की आराधना के लिए गंगा भी आई हुई थी. तभी हवा से गंगा के धवल वस्त्र कुछ हट गए और उसका शरीर अनावृत हो गया. देवताओं ने अपनी दृष्टि नीचे कर ली थी पर महाभिष धृष्टता पूर्वक देखता रहा. उसके इस अभद्र आचरण पर ब्रह्मा ने उसे शाप दिया "नीच, गंगा को देख कर तुम अपने आप को भूल बैठे थे इसलिए तुम पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच जन्म लोगे.  गंगा को भी पृथ्वी पर जाना है;  वह वहां तुम्हे तब तक यातना देती रहेगी जब तक तुम उस पर क्रुद्ध हो उसे शाप-मुक्त न कर दो."        

महाभिष ने पृथ्वी पर कुरुवंश के राजा प्रतीप के पुत्र के रूप में जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की. गंगा भी महाभिष को च्युत होते देख उसकी इच्छा करते हुए वहाँ से चल दी. मार्ग में उसे आठो वसु मिले जो दुखी मन से उसी पथ पर जा रहे थे. पूछने पर उन्हों ने बताया कि उनके एक क्षम्य, गौण अपराध पर वसिष्ठ ने क्रोध में आ उन्हें शाप दिया है.
"वसिष्ठ संध्या पूजन में लीन थे जब अज्ञानता वश, हम उन्हें देख नहीं पाये थे, हम उन्हें लांघ बैठे. आक्रोश में उन्होंने हमें मर्त्यलोक पर जन्म लेने का शाप दे दिया है. वसिष्ठ की बात तो कट नहीं सकती, आप से हे गंगे प्रार्थना है कि आप मानव देह धर कर हमें अपना पुत्र बना लें."

इस पर गंगा ने पूछा "आप लोगों ने किस के पुत्र के रूप में जन्म लेने की सोची है?"
"पुरू वंश के प्रतीप के होने वाले पुत्र शांतनु के, जो अपने समय का एक विश्व विख्यात राजा होगा"     
"यही मैंने भी सोचा था" गंगा ने कहा
"पर देवी, आप को अपने नवजात शिशुओं को जल में बहा देना होगा जिस से हम पृथ्वी पर समय बिताने के कष्ट से बच सकें"
"मैं ऐसा ही करुँगी" गंगा ने सहमति जताई "किन्तु शांतनु और मेरे विवाह से एक पुत्र तो बचना ही चाहिए"
इस पर वसुओं ने कहा "हम सब अपनी शक्तियों का आठवां भाग देंगे और उस से देवी आप को एक पूर्ण पुत्र मिल जाएगा जैसा आप चाहतीं  हैं. किन्तु आप के इस पुत्र को संतानहीन ही रहना पड़ेगा"  

गंगा के साथ पूरी व्यवस्था कर वसु अपने गंतव्य की ओर निकल गए.

उस समय पृथ्वी पर पुरूवंश के प्रतीप का राज था. एक बार प्रतीप गंगोत्री के निकट तप कर रहा था जब गंगा एक रूपसी नारी के भेष में उसके निकट जा उसकी गोद के दाहिने भाग में बैठ गयी. प्रतीप ने उस से पूछा कि वह कौन थी और क्या चाहती थी. गंगा ने कहा: "हे राजन, मैं तुम्हे चाहती हूँ, पति के रूप में; और स्वेच्छा से आती स्त्री को कभी मना नहीं करना चाहिए. मैं एक दिव्य स्त्री हूँ और मेरा सौंदर्य अतुलनीय है, मुझे स्वीकार कर लो."

"किन्तु सुंदरी, मैं कभी किसी अन्य स्त्री के निकट नहीं जाता. और तुम मेरी गोद के दाहिने भाग में बैठी हो. यह भाग पुत्री का रहता है, स्त्री गोद के बाएं भाग में बैठती है." राजा ने कहा" तुम दाहिने भाग में बैठ गयी हो इस लिए मैं कहूँगा तुम समय आने पर मेरे पुत्र से विवाह कर लेना. अपनी पुत्र-वधु के रूप में मैं तुम्हे स्वीकार करता हूँ."
"जैसी आप की इच्छा, राजन. मैं आप के पुत्र का वरण करुँगी किन्तु राजन, आप अपने पुत्र को निर्देश दे देंगे कि वह मेरे किसी व्यवहार की शुद्धता या उपयुक्तता पर कभी प्रश्न नहीं उठाएगा. और मेरा वचन है कि उसके साथ रह कर मैं उसे आनंदित रखूंगी और अपने गुणों और हमारे पुत्रों के चलते वह मरणोपरांत स्वर्ग को प्राप्त करेगा.  यह कह कर गंगा तत्काल अन्तर्धान हो गयी. और राजा अपने पुत्र के जन्म की प्रतीक्षा करने लगा जिस से वह उस दिव्य स्त्री को दिए अपने वचन पूरे कर पाये. प्रतीप के वार्धक्य में उसे पुत्र प्राप्त हुआ जिसे शांतनु नाम दिया गया.

शांतनु के युवा होने पर प्रतीप ने उस से कहा कि कुछ समय पहले एक दिव्य स्त्री मेरे पास तुम्हारी भलाई के लिए आई थी. यदि कभी एकांत में वह तुम से मिले और तुम से पुत्र प्रार्थना करे तो तुम उसे स्वीकार कर उस से विवाह कर लेना. और मेरा यह भी आदेश है कि उसके किसी कृत्य की उपयुक्तता या शुद्धता पर कोई प्रश्न उस से नहीं करना. यह सब कह कर शांतनु का राज्याभिषेक कर प्रतीप वानप्रस्थ हो गया.

एक दिन गंगा के किनारे विचरण करते हुए शांतनु को एक अत्यंत रूपवती कन्या मिली. दोनों एक दूसरे को कुछ देर तक देखते रह गए. शांतनु उस पर मोहित हो गया और उस ने पूछा "कौन हो तुम, सुंदरी? कोई देवी हो या किसी दानव की पुत्री हो? या गन्धर्व या कोई अप्सरा हो? चाहे यक्षी या नाग कन्या या कोई मानवी ही हो, मैं तुम से विवाह करना चाहता हूँ." 
सुंदरी ने अपने विषय में कुछ नहीं बोलते हुए राजा के परिणय प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए कहा "राजन, मैं तुम्हारी पत्नी अवश्य बनूँगी और तुम्हारी सारी आज्ञाओं का पालन करुँगी, किन्तु हे राजन, मैं कुछ भी करूँ - चाहे तुम्हे प्रिय लगे चाहे अप्रिय - तुम हस्तक्षेप नहीं करना और न ही पूछना कि मैं ऐसा कुछ भी क्यों कररही हूँ."
"और राजन, मैं तभी तक तुम्हारे साथ रहूंगी जब तक तुम मेरे साथ सहज और अनुकूल व्यवहार रखोगे; यदि तुमने कुद्ध स्वर में मुझ से कभी बातें की तो मैं तुम्हे त्याग दूंगी.  

शांतनु प्रेम में अभिभूत था. उसे सारे प्रतिबन्ध स्वीकार थे. विवाह कर वे साथ रहने लगे. शांतनु उसके रूप, व्यवहार, सेवा भाव, और उसकी उदारता से सदैव प्रसन्न रहता था.
कालान्तर में उनके आठ पुत्र हुए. सभी बच्चों के मुख मंडल दैवी आभा से चमकते रहते थे. पर गंगा बच्चों के जन्म लेते ही उन्हें जल में प्रवाहित कर देती थी, शांतनु को यह बताते हुए कि यह तुम्हारे भले के लिए कर रही हूँ. राजा इस से दुखी हो जाता था पर उसे अपने वचन याद थे और वह गंगा को खोना नहीं चाहता था. जब गंगा आठवें बच्चे को भी प्रवाहित करने जा रही थी तो शांतनु से नहीं रहा गया और उस ने मना किया

"मत मारो इसे. कौन हो तुम जो अपने जाए बच्चों को इस निर्ममता से मार देती हो?"
"तुम पुत्र चाहते हो?"गंगा ने पूछा "मैं इसे नहीं मारती, रखो इसे. पर हमारे बीच हुए अनुबंध से मेरा तुम्हारे साथ रहने का समय समाप्त हो गया और मैं अब जा रही हूँ. जान जाओ राजन कि मैं गंगा हूँ, महान ऋषि भी जिसकी पूजा करते हैं. कुछ देवों के निमित्त सिद्ध करने के लिए मैं तुम्हारे साथ इतने दिनों तक रही. वसुओं को वसिष्ठ के शाप के चलते पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ रहा था. पृथ्वी पर मात्र तुम उनके पिता बनने योग्य थे,  किन्तु उनकी माता बनने योग्य कोई स्त्री नहीं थी. इस लिए मानवी स्त्री का रूप धारण कर मैं तुम्हारी पत्नी बनी. वसुओं ने अनुरोध किया था कि जन्म के बाद मैं उन्हें शीघ्रातिशीघ्र पृथ्वी से मुक्त कर दूँ, इस पर भी कि हमारा एक पुत्र पूर्णायु भोगे. मेरे दिए इस पुत्र का नाम राजन, गंगादत्त रखना"

गंगा अब चली जाना चाहती थी पर शांतनु उसे रोकना चाहता था. उस ने गंगा से पूछा "वसुओं के किस दोष के चलते उन्हें यह शाप मिला था? और यदि गंगादत्त भी वसु है तो इस ने क्या अपराध किया था कि इसे लम्बे समय तक मर्त्य लोक पर रहना पडेगा?"  

गंगा ने पूरी कथा सुनाई. "कश्यप कीअनेक पत्नियों में दक्ष-पुत्री सुरभि भी एक है. सुरभि और दक्ष के नंदिनी नाम की एक पुत्री गो-रूप में है. नंदिनी साधारण गाय नहीं, कामधेनु है. वह किसी भी इच्छा को पूरी कर सकती है. वरुण के पुत्र वसिष्ठ मेरु पर्वत पर आश्रम बना कर रहते थे जहाँ उन्हों ने होम की सामग्रियों के लिए नंदिनी को मांग कर अपने आश्रम में रखा था. नंदिनी आश्रम में स्वच्छंद घूमती थी.

"एक दिन आठो वसु अपनी पत्नियों के साथ मेरु पर्वत के वनों में विहार कर रहे थे जब उन्होंने नंदिनी को देखा. नंदिनी में सभी मांगलिक चिह्न दीख रहे थे - बड़ी बड़ी आँखें, भरे पूरे थन, उत्तम सुडौल पूंछ, स्वस्थ खुर आदि. द्यौ (आठ वसुओं में से एक- अन्य नाम प्रभास) ने उसे दिखाते हुए कहा कि जो मनुष्य इसका दूध पी ले सहस्त्र वर्षों तक वह तरुण बना रह जाएगा. यह सुन  द्यौ कीपत्नी ने अपने स्वामी से कहा कि वह अपनी एक मानवी मित्र को नंदिनी देना चाहती है जिस से उस की मित्र पृथ्वी पर रह कर भी जरा, व्याधि आदि से सदा मुक्त रहे.   
"पत्नी की ऐसी बातें सुन, उसे प्रसन्न रखने के लिए द्यौ ने अन्य वसुओां की मदद से गाय चुरा ली. पत्नी की इच्छा पूरी करने की धुन में वह इस कार्य में निहित पाप को तो भूल ही गया था, वसिष्ठ जैसे तपस्वी ऋषि की शक्तियों को भी वह भूल बैठा था.

"दिन ढलने पर जब वसिष्ठ अपने आश्रम लौटे तो नंदिनी को नहीं पा कर उन्हों ने अपनी दिव्यदृष्टि से उसे खोजना आरम्भ किया. वे तुरंत जान गए कि द्यौ के नेतृत्व में वसुओं  ने उसे चुरा लिया है. उनका क्रोध जग गया. "वसुओं ने मेरी गाय चुराई है इस लिए उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेना पडेगा."  शाप दे कर वसिष्ठ ने अपना ध्यान जपादि कर्मों में लगा दिया. वसुओं को तब तक अपने शप्त हो जाने का संज्ञान हो चुका था और वे लम्बे कदम भरते हुए वसिष्ठ के आश्रम में क्षमा याचना के लिए पहुँच गए.

"वसिष्ठ को मनाने में वे सफल नहीं हुए. किन्तु वसिष्ठ ने इतनी छूट दी कि द्यौ को छोड़, क्यों कि द्यौ चोरी में अग्रणी था, शेष सातो वसु अपने जन्म के एक वर्ष के अंदर ही पृथ्वी से मुक्त हो जाएंगे. द्यौ को अपने अपराध के दंड स्वरुप पृथ्वी पर पूर्णायु भोगना पडेगा, वसिष्ठ ने कहा, वह वीर, धार्मिक और पितृ भक्त रहेगा किन्तु पृथ्वी पर वह स्त्री सान्निध्य के सुख से वंचित रहेगा और पृथ्वी पर उसके कोई संतान नहीं होगी.

"वसिष्ठ के आश्रम से वसु मेरे पास आये.और उन्होंने मुझ से प्रार्थना की कि मैं पृथ्वी पर उनकी माँ बनूँ, साथ ही यह वचन भी लिया कि उनके जन्म के तुरंत बाद मैं उन्हें जल में बहा दूँ. हे राजन, मैं ने वही किया और उन्हें उनके पार्थिव जीवन से मुक्ति दिला दी. यह आठवां बालक स्वयं द्यौ है, जिसे पृथ्वी पर पूर्णायु भोगना है."

ऐसा कह देवी गंगा अपने बालक को साथ ले विलुप्त हो गयी. शांतनु का वह पुत्र गांगेय, देवव्रत और बाद में भीष्म कहलाया और हर कला में अपने पिता से कही अधिक निपुण निकला.  

अपनी पत्नी के विलुप्त हो जाने के बाद शांतनु बहुत भारी मन से हस्तिनापुर लौटा. वैशम्पायन कहता है  “मैं अब तुम्हे राजन, भरत वंश के उस प्रतापी राजा शान्तनु के गुणों और उस की भाग्यलक्ष्मी की कथा सुनाऊंगा – वही महाभारत है."

Monday, 18 May 2015

आदि पर्व (22): पुरु वंश परिचय

आदि पर्व के संभव पर्व में शकुंतला और ययाति के उपाख्यानों के बाद एक संभव पर्व आया है (संभव पर्व के अंदर एक संभव पर्व) जिस में जनमेजय के अनुरोध पर वैशम्पायन ने उस के वंश का परिचय दिया है. जनमेजय के कहने पर वैशम्पायन ने दो बार वंश परिचय दिये हैं. दोनो में बहुत अंतर हैं. यहाँ बस दूसरा वंश परिचय दिया जा रहा है. पहले में दो घटनायें हैं जो अप्रत्याशित होने के चलते कदाचित् महत्वपूर्ण हैं.
पहला तो यह कि दुष्यंत पुत्र भरत की तीन पत्नियाँ थीं जिन से उसके नौ पुत्र हुए थे. भरत ने उनमें से किसी को अपने पुत्र होने के योज्ञ नहीं समझा. यह देख तीनो माताओं ने अपने सभी पुत्रों का वध कर दिया था. भरत ने तब एक यज्ञ आयोजित किया जिसके बाद भरद्वाज की कृपा से उसे एक पुत्र हुआ था.
और दूसरा यह कि ऋक्ष के पुत्र संवरण के राज्यकाल में अनावृष्टि हुई थी, अकाल से प्रजा त्रस्त थी और पांचालों ने आक्रमण कर भरत वंशियों को पराजित कर दिया था. भारत उन से बचने के लिए सिंधु देश के वनों में भाग गये थे जहाँ उनके एक सहस्त्र वर्ष मुँह छुपाए रहने के बाद वशिष्ठ उनसे मिलने आया था. भारत कुमारों ने वशिष्ठ से अपने पुरोहित बनने की प्रार्थना की. वशिष्ठ मान गया और तब उसने अपने मंत्र बल से भरत-वंशी राजा को वृषभ के श्रंग या ऐरावत के दाँतों की तरह बली बना कर सभी क्षत्रियों के अधिष्ठाता के रूप में स्थापित कर दिया.
दूसरे वंश परिचय में इनकी चर्चा तो नहीं ही है, ऋक्ष के पुत्र (और उत्तराधिकारी) का नाम भी संवरण नहीं बल्कि मतिनार बताया गया है. प्रस्तुत हैदूसरा वंश परिचय.     

   
जन्मेजय के पूछने पर वैशम्पायन ने उस केपूर्वजों के नाम गिनाए.  वैशम्पायन  कह रहा है:

दक्ष की पुत्री अदिति के पुत्र विवस्वत का पुत्र वैवस्वत मनु था. मनु के पुत्र हा का पुत्र था पुरुरवा जिसे जन्मेजय के राजवंश का आदि पुरूष कहते हैं. पुरुरवा का पुत्र आयु, उसका पुत्र नहुष और नहुष का पुत्र ययाति हुआ था. ययाति के अपनी दो पत्नियों से पाँच पुत्र हुए थे: यदु,  तुर्वसु,  द्रह्यु, अनु और पुरु. यदु के वंशज यादव हुए और पुरु के पौरव. पुरु का पुत्र जनमेजय (प्रथम) हुआ, जिसने वानप्रस्थ होने के पहले तीन आश्वमेध यज्ञ और एक विश्वजीत यज्ञ किया था.

जनमेजय का पुत्र  प्रचिन्वन था, जिस ने पूर्व दिशा के सारे राज्यों को जीत कर अपना साम्राज्य उन क्षेत्रों तक फैलाया था जहाँ सूर्य का उदय होता है. प्रचिन्वन ने एक यादव राजपुत्री से विवाह किया था,  उन का पुत्र संयाति हुआ. संयाति का पुत्र अहँपाति हुआ जिस का पुत्र सार्वभौम था. सार्वभौम ने सुनंदा नाम की एक कैकेय राजपुत्री का अपहरण कर उसे अपनी पत्नी बनाया था. उनका पुत्र  जयत्सेन था. जयत्सेन ने एक विदर्भ राजकुमारी से विवाह किया था. उनके पुत्र अराचीन ने भी एक वैदर्भी से विवाह किया और उस का पुत्र हुआ महाभौम, जिस का पुत्र अयुतनायी कहलाया. यह नाम उस के एक यज्ञ कराने के चलते पड़ा था जिस यज्ञ में एक अयुत (दस सहस्त्र) पुरुषों की वसा का उपयोग हुआ था.  

अयुतनायी का पुत्र अक्रोधन हुआ जिस का पुत्र देवातीथि था. देवातीथि की पत्नी विदेह की मर्यादा थी. उनका पुत्र हुआ अरिहन, जिस का पुत्र ऋच था. ऋच का पुत्र ऋक्ष था जिस ने तत्क्षक की पुत्री ज्वाला से विवाह कर मतिनार को उत्पन्न किया. मतिनार ने सरस्वती के किनारे बारह वर्षों तक एक यज्ञ किया था. यज्ञ की समाप्ति पर सरस्वती (नदी) ने प्रकट हो उसे  अपना पति चुना. उनका पुत्र तंसु हुआ. तंसु का पुत्र इलिन. इलिन के पाँच पुत्रों में दुष्यंत ज्येष्ठ था. दुष्यंत और विश्वामित्र-पुत्री शकुंतला का पुत्र भरत हुआ, जिसके नाम पर, राजन, तुम भारत कहलाते हो.

भरत का पुत्र भुमन्यु था, जिसका पुत्र सुहोत्र हुआ. सुहोत्र ने इक्ष्वाकु वंश की सुवर्णा से विवाह कर हस्ति को उत्पन्न किया जिस ने यह नगरी, हस्तिनापुर, बसाई. हस्ति का पुत्र विकण्ठन था जिस का पुत्र अजमीढ हुआ. अजमीढ को चार पत्नियों से चौबीस सौ पुत्र हुए थे. उनमें संवरण ने इस राजवंश को आगे बढ़ाया.

संवरण का पुत्र पुरु और पुरु का पुत्र विडूरथ हुआ, उस के पुत्र अरुग्वान का पुत्र परीक्षित (प्रथम) था. परीक्षित के पुत्र भीमसेन का पुत्र पर्याश्रव हुआ. पर्याश्रव का पुत्र प्रतीप था. प्रतीप ने शिवि की पुत्री सुनंदा से तीन पुत्र उत्पन्न किए देवापि, शान्तनु और  बाह्लीक. अपनी बाल्यावस्था में ही देवापि के  वानप्रस्थ हो जाने के चलते (1) शान्तनु राजा बना.  कहा जाता है कि इस राजा के स्पर्श मात्र से वृद्धों को वर्णनातीत आनंद मिलता था साथ ही उन्हे पुनर्यौवन भी प्राप्त हो जाता था.

शांतनु ने गंगा से विवाह कर देवव्रत को उत्पन्न किया था जो बाद में भीष्म कहलाया. अपने पिता शांतनु की इच्छा पूरी करने के लिए भीष्म ने उसका विवाह सत्यवती, अन्य नाम गंधकली, से करवाया. अपने कौमार्य काल में सत्यवती ने पराशर के पुत्र द्वैपायन को जन्म दिया था. शांतनु और सत्यवती के दो पुत्र हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य. वयस्क होने के पहले ही गन्धर्वों के हाथों चित्रांगद मारा गया था और विचित्रवीर्य राजा बना. विचित्रवीर्य ने काशी नरेश की दो पुत्रियों, अंबिकाऔर अंबालिका से विवाह किया किंतु वह पुत्रहीन था जब उसकी मृत्यु हो गयी. दुष्यंत के वंश को चलाने के लिए सत्यवती ने अपने पहले पुत्र द्वैपायन का स्मरण किया. 

स्मरण मात्र से द्वैपायन प्रकट हुआ और अपनी माता की इच्छा जान उस ने अंबिका से धृतराष्ट्र, अंबालिका से पांडु और एक दासी से विदुर उत्पन्न किए. द्वैपायन के वरदान से ही धृतराष्ट्र और गांधारी को सौ पुत्र हुए. उन सौ पुत्रों में चार विशेष जाने जाते हैं: दुर्योधन, दुःशासन, विकर्ण और चित्रसेन. पांडु की दो पत्नियाँ थीं – कुंतीऔर माद्री. एक दिन आखेट में पांडु ने काम क्रीड़ा रत एक मृग को अपने तीरों से मार दिया था. पर मरने वाला कोई मृग नहीं एक ऋषि था. मरणासन्न ऋषि ने पांडु को शाप दिया "मेरी इच्छा पूरी होने के पहले तुम ने मुझे मार दिया इस लिए तुम भी अपनी इच्छा पूरी होने के महले इसी तरह मर जाओगे". ऋषि का शाप सुन पांडु भय से पीला पड़ गया और उस ने अपनी पत्नियों के निकट जाना छोड़ दिया.

अपनी पत्नियों के साथ पांडु वन में तपस्वियों की तरह रहता था जब उसे अपने परलोक की चिंता होने लगी. सन्तानहीन व्यक्तियों के लिये मृत्योपरांत कोइ उच्च लोक नहीं हैं यह सोच कर उस ने कुंती से संतान उत्पन्न करने का अनुरोध किया. कुंती को अपनी कौमार्यावस्था में ही दुर्वासा ऋषि से एक मंत्र मिला था जिस मंत्र से वह किसी देवता का आह्वान कर सकती थी. उस मंत्र से बुला कर उस ने धर्मराज से युधिष्ठिर, पवन देव से भीम और देवेन्द्र से अर्जुन उत्पन्न किए. पांडु के कहने पर उस ने वह मंत्र माद्री को भी दिया जिस से अश्विनिकुमारों को बुला कर माद्री ने जुड़वा, नकुल और सहदेव को उत्पन्न किए.

एक दिन वन में पुष्पों और आभूषणों से सुसज्जित माद्री को देख पांडु से नहीं रहा गया और अपनी कामेच्छा पूरी करने के उद्देश्य से वह उसके निकट चला गया. किंतु माद्री का स्पर्श करते ही ऋषि के शाप से उसकी मृत्यु हो गयी. दुखी माद्री ने अपने यमजों को कुंती को सौंप कर अपने पति की चिता पर आत्मदाह कर लिया. पांडु की मृत्यु के कुछ समय बाद उस के पाँचो पुत्रों और कुंती को वन के कुछ तपस्वी हस्तिनापुर में भीष्म और विदुर के पास ले चले. उनका परिचय कराने के बाद वे तपस्वी अचानक विलुप्त हो गये और वहाँ पुष्प वृष्टि होने लगी साथ ही दिव्य वाद्यों की ध्वनियाँ भी सुनाई देने लगीं. यह सब देख, सुन भीष्म ने पाँचो पांडवों को अपने पास रखा और उनके पिता के लिए मृत्योपारांत किए जाने वाले शास्त्रोक्त कर्म कराए.     

दुर्योधन हस्तिनापुर में पांडवों को देख कर बहुत जलता था और उन्हे वहाँ से भगाने के हर संभव उपाय खोजता रहता था. पर विधाता के लिखे के आगे दुर्योधन की एक नहीं चली. फिर धृतराष्ट्र ने उन्हे छल से वर्णावत भेजा,जहाँ उन्हे जला मारने का प्रयास किया गया था पर विदुर से जानकारी मिल जाने के चलते वे बच गये और वहाँ से निकल कर, हिडिंब को मारते हुए वे एकचक्र नाम के गाँव गये जहाँ उन्होने बक राक्षस का वध किया. एकचक्र से वे पांचाल गये और द्रौपदी को जीत कर वापस हस्तिनापुर लौटे.  

वहाँ वे कुछ दिन शांति से रहे. वहीं उनके पुत्रों के जन्म हुए - युधिष्ठिर का प्रतिविन्ध्य, भीम का सुतसोम,अर्जुन का श्रुतकीर्ति, नकुल का शतानीक और सहदेव का श्रुतकर्मण. ये सभी द्रौपदी के पुत्र थे. इनके अतिरिक्त युधिष्ठिर ने गोवासन की पुत्री देवकी को एक स्वयंवर में जीता था जिस से उसे एक पुत्र हुआ यौधेय. भीमसेन ने काशी नरेश की पुत्री बलंधारा से विवाह कर एक पुत्र सर्वग उत्पन्न किया था. अर्जुन द्वारका की सुभद्रा को बलात हर कर हस्तिनापुर लाया था. उन का पुत्र हुआ अभिमन्यु.  नकुल ने चेदि नरेश की कन्या करेणुमति से विवाह किया था. उसके पुत्र का नाम था निरमित्र और सहदेव ने एक स्वयंवर में मद्र की विजया को जीता था जिस से उसका पुत्र हुआ था सुहोत्र. इन पुत्रों के जन्म के पहले भीमसेन के हिडिंबा से एक पुत्र हुआ था घटोत्कच.  पांडवों के यही ग्यारह पुत्र हुए थे (2), जिनमें अभिमन्यु ने राजवंश चलाया.

उस ने विराट की पुत्री उत्तरा से विवाह किया था. उत्तरा ने एक मृत बालक परीक्षित को जन्म दिया था जिसे वासुदेव की बात मानते हुए कुंती ने अपनी गोद में रखा. अश्वत्थामा के शस्त्र से दग्ध हो यह बालक छह मासमें पैदा हुआ था पर वासुदेव ने इसे पुनर्जीवित कर पूर्ण गर्भ से उत्पन्न बालक के सदृश सुदृढ़ बना दिया था. और परीक्षित ने मद्रावती से विवाह किया जो, राजन, तुम्हारी माता है. और जनमेजय तुम ने वपुष्टमा से विवाह कर दो पुत्र उत्पन्न किए हैं शतानीक और शंकुकर्ण. शतानीक ने विदेह राजपुत्री से विवाह कर एक पुत्र उत्पन्न किया है अश्वमेधदत्त.

राजन, पुरु और पांडवों के वंशजों का परिचय समाप्त हुआ.   व्रती ब्राह्मणों  और प्रजा की रक्षा करने वाले क्षत्रियों को इसे सुनना चाहिए. वैश्यों को इसे ध्यान से सुनना चाहिए और शूद्रों को, जिनका काम बाकी तीनों की सेवा करना है,  इसे भक्ति के साथ सुनना चाहिए.


(1) देवापि के विषय में आदि पर्व के संभव पर्व में एक जगह बताया गया है कि वह बाल्यावस्था में वानप्रस्थ हो गया था, दूसरी जगह बताया गया है कि उस ने अपने भाइयों के लिए सिंहासन त्याग दिया था. किंतु उद्योग पर्व (बोरी अध्याय 147) में बताया गया है कि वह एक चर्म रोग से ग्रस्त था और उस का एक ही हाथ काम कर पाता था. यद्यपि वह प्रजा में,  ब्राह्मणों मेंअत्यंत लोकप्रिय था किंतु राजा को पूर्ण पुरुष होना चाहिए यह विचार कर ब्राह्मणोंने उसे के राज्याभिषेक पर आपत्ति की थी और विवश हो कर उस के पिता प्रतीप को मानना पड़ा था. शांतनु भाइयों में कनिष्ठ था. वह राजा इस लिए बन पाया क्यों कि बीच वाले भाई बाह्लीक ने अपने ननिहाल में रहने का निश्चय कर लिया था.

(2) यहाँ अर्जुन के दो पुत्रों के नाम नहीं गिनाए गये हैं - उलूपी से इरवान और चित्रांगदा से वभ्रुवाहन

आदि पर्व (21): ययाति उपाख्यान (6)

अपने कनिष्ठ और सब से प्रिय पुत्र पुरू को गंगा-यमुना के मध्य भाग का राज दे कर, और अन्य पुत्रों को दूर दराज भेज कर, ययाति वन में संन्यासी का जीवन व्यतीत करने लगा.  कंद, मूल, फल आदि खा कर और अपनी इन्द्रियों और विचारों को पूर्णतया अपने नियंत्रण में रख कर राजा ने अपने यज्ञादि से देवताओं और पितरों को सदैव प्रसन्न रखा. इस तरह उस ने एक सहस्त्र वर्ष बिताये.और उस के बाद एक वर्ष का उस ने मौन व्रत रखा और उस के बाद एक वर्ष की उस ने कठोर तपश्चर्या की. इस पूरे वर्ष वह चारो और लपलपाती आग के बीच, भगवान की स्तुति करते  खड़ा रहा. और इस के बाद छः मास वह सिर्फ वायु पर जीते हुए एक पैर पर खड़ा रहा. इस तरह तप करते हुए, समय आने पर, राजा ययाति अपने सत्कर्मों से स्वर्ग गया.

स्वर्ग में ययाति देवों, साध्यों, मरुतगण और वसुओं का प्रिय आराध्य रहा. देवलोक से राजा ययाति यदा कदा ब्रह्मलोक भी चला जाया करता था. बहुत लम्बे काल तक वह इस तरह स्वर्गलोक और ब्रह्मलोक में विचरण करता रहा.  एक दिन इंद्र के साथ ययाति घूम रहा था जब इंद्र ने उस से पूछा

"जब पुरू ने तुम्हारी जरावस्था ले ली तब तुम ने क्या कहा था राजन? "
"मैं ने उस से कहा कि गंगा और यमुना के मध्य का भू भाग, जो पृथ्वी का सही अर्थ में केंद्रीय भाग है, तुम्हारा रहेगा. और दूर दराज के क्षेत्रों को मैंने अपने दूसरे पुत्रों में बाँट दिया" ययाति ने कहा "मैं ने उसे कुछ उपदेश भी दिए, यथा: जिनको क्रोध नहीं रहता वे क्रोधियों से श्रेष्ठतर होते हैं; जो क्षमा कर सकते हैं वे निष्ठुरों से और इसी तरह मनुष्य पशुओं सेऔर ज्ञानी अज्ञानियों से श्रेष्ठतर होते हैं.  
"कटु वचन से किसी को कष्ट मत दो, न ही अन्याय से कभी किसी को दबाने का प्रयास करो. यदि वाणी में मधुरता नहीं रहेगी तो समृद्धि पास नहीं फटकेगी. धार्मिक लोगों के अनुगामी बनो और दुष्टों का कुछ भी कहा अनसुना कर दो. तीनो लोकों में देवताओं के पूजन के लिए या मनुष्यों कोजीतने के लिए दया, मित्रता, दान और मधुर वाणी से बढ़ कर कुछ भी नहीं है. जो तुम्हारा सम्मान करें उनका तुम भी सम्मान करो और कभी किसी से कुछ मांगो नहीं"

यह सब सुन इंद्र ने ययाति से पूछा "तुम तो अपने कर्तव्य पालन कर वानप्रस्थ भी हुए थे और बहुत तप भी किया है तुम ने. तपश्चर्या में तुम अपने को किस के बराबर समझते हो?"

"तप में इंद्र" ययाति ने कहा "मैं किसी को - मनुष्य, देवता, गन्धर्व या महर्षिगण- किसी को भी अपने बराबर नहीं समझता हूँ"        

"राजन यह बोल कर तुम ने अपने से श्रेष्ठ तपस्वियों का निरादर किया है" इंद्र ने कहा "श्रेष्ठ ही नहीं अपने समकक्ष तपस्वियों का भी अनादर किया है. अब तुम्हारे संचित पुण्य का ह्रास हो गया है और तुम्हे अब पृथ्वी पर जाना पडेगा"

निर्विकार भाव से ययाति ने कहा "यदि मेरे पुण्य का ह्रास हो गया है तो निश्चित मुझे पृथ्वी पर जाना पडेगा; पर हे इंद्र कुछ ऐसा करो कि पृथ्वी पर मैं धार्मिक लोगों के बीच रहूँ."
   
"राजन तुम धार्मिक और बुद्धिमान लोगों के बीच ही रहोगे" इंद्र ने कहा "और इस अनुभव के बाद, राजन, अपने से श्रेष्ठ या अपने समकक्ष लोगों का अनादर शायद कभी नहीं करोगे"

ययाति स्वर्ग लोक से गिर पड़ा.

स्वर्ग लोक से गिरता ययाति एक दम से धरती पर नहीं आ गया था. देर तक वह आकाश में रुका रहा था . वहां रुके ययाति को देख भूमि पर खड़े अष्टक (जो ययाति का दौहित्र था पर दोनों इस बात से अभी अनभिज्ञ हैं) ने चकित हो उस से पूछा "कौन हो तुम? तुम्हारा प्रताप तो बस इंद्र, सूर्य या विष्णु सा लगता है पर वे क्यों गिरने लगे; तुम हो कौन?”
उस ने फिर कहा "मैं इस तरह तुम्हारा नाम पूछने की अशिष्टता नहीं करता. पर तुम तो कुछ बोल नहीं रहे हो. पर कोई चिंता मत करो. जैसे मात्र अग्नि को ताप प्रसारण की शक्ति है, जैसे मात्र पृथ्वी ही बीज में जीवन फूँक सकती है, जैसे अकेला सूर्य ही सब कुछ प्रकाशित कर सकता है, वैसे ही केवल अतिथि किसी धार्मिक और ज्ञानी व्यक्ति को आज्ञा दे सकता है. निश्चिंत रहो तुम. पर बताओ तो, तुम हो कौन?

ययाति ने कहा: “मैं ययाति हूँ, नहुष का पुत्र और पुरू का पिता. सिद्ध और ऋषियों का अनादर करने के चलते मुझे देवलोक से निष्कासित कर दिया गया है. मैं गिर रहा हूँ क्योंकि मेरे पुण्य का ह्रास हो रहा है.”

विश्वामित्र का पुत्र अष्टक अब जान गया कि वह अपने नाना के साथ है पर ययाति अभी तक नहीं जान पाया है कि वहअपने नाती से बातें कर रहा है. अष्टक ने अपने नाना से कुछ ज्ञान प्राप्त करने की सोची और पूछा "कौन अधिक पूजनीय है, वह जो ज्ञान, तप में श्रेष्ठ हो या वह जिस ने पहले जन्म लिया हो?" अष्टक ने पूछा.

ययाति ने इसका स्पष्ट उत्तरनहीं दिया "एक पाप से चार पुण्य मिट जाते हैं. मिथ्याभिमान हर व्यक्ति को नरक की ओर धकेलता है.  मैं ने भी कभी बहुत पुण्य अर्जित किये थे. पर वे सब मिट गए. मुझे देखते हुए, जो अपना भला चाहते हैं वे अवश्य अपने  मिथ्याभिमानको दबा कर रखें. ज्ञानी अंदर से विनम्र होते हैं. वे ज्ञान का भी अभिमान नहीं करते. प्रारब्ध को सर्वशक्तिमान जान कर,बुद्धिमान सदैव संतुष्ट और स्थिर रहते हैं. वे दुःख में दुखी नहीं होते, न ही सुख में आनंदित. यदि प्रारब्ध सर्वोच्च है तो शोक और आनंद दोनों अशोभनीय हैं. मैंने अपने आप को कभी भयभीत नहीं होने दिया न ही मैं कभी दुखी हुआ क्यों कि होगा वही जो विधाता चाहेगा.  कीट, पतंगे, घास, पत्थर सब को अपना कर्म भोग कर परमात्मा में मिल जाना है, इस स्थिति में क्षणिक या अनित्य दुःख या सुख पर शोक या आनंद में डूब जाना बुद्धिमानों का कामनहीं है."

अष्टक ने आकाश में रुके हुए ययाति से फिर पूछा "राजन आप किन किन लोकों में गए और कहाँ आपने कितना समयबिताया?"

ययाति ने कहा"अपनी तपश्चर्या से मैंने अनेक उच्च लोकों को प्राप्त किया जहाँ मैं एक सहस्त्र वर्षों तक रहा. उस के बाद एक सहस्त्र वर्ष मैंने इंद्रलोक से भी ऊपर एक लोक में बिताये. सहस्त्र वर्ष  मैंने विष्णु लोक में भी बितायेऔर दस लक्ष वर्ष मैंने नंदन वन में अप्सराओं के साथ क्रीड़ा में बिताये जब मेरे तपोबल क्षीण हो गए और मुझे नंदन से निकल कर भूलोक पर आना पड़ा . भूलोक के मार्ग में मैंने तुम्हारे यज्ञ की वेदी से उठती धूम्र शिखाओं को देखा और मैं इधर चला आया." 

"पर आप को नंदन छोड़ भूलोक पर क्यों आना पड़ा"  अष्टकने पूछा.
"जैसे मित्र और सगे सम्बन्धी किसी के धन समाप्त हो जाने पर उसे छोड़ देते हैं वैसे ही इंद्र और अन्य देव किसी के पुण्य शेष हो जाने पर उसे छोड़ देते हैं."

"पर" अष्टक ने पूछा "देव लोक में पुण्य का नाश कैसे हो सकता है?"
"जो अपने पुण्य की स्वयं चर्चा करता है, उस के पुण्य का नाश होता है"

अष्टक ने पूछा "कैसे कोई उन क्षेत्रों को जाता है जहाँ से भूलोक पर  नहीं लौटना पड़ता है - तप से या ज्ञान से? 
ययाति ने बताया कि स्वर्गलोक के सात द्वार हैं:  तप, परोपकार,चित्त-शान्ति, आत्म नियंत्रण, विनम्रता, सादगी और दयाशीलता. मिथ्याभिमान से ये सातो नष्ट हो जाते हैं. जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर अपने को बहुत ज्ञानी समझने लगता है और अपने ज्ञान से दूसरों की मान-मर्यादा नष्ट करने पर आमदा हो जाता है वह उच्च लोकों को कभी नहीं प्राप्त कर सखता है. अध्ययन, मौन, अग्नि के सामने पूजा और यज्ञादि - इन चार से भय दूर होते हैं. पर ये यदि मिथ्याभिमान के साथ हों तो भय दूर करने की जगह ये भय बढ़ाते हैं.  जो ज्ञानी व्यक्तिअपना आधार सनातन ब्रह्म में देखते हैं वे इहलोक और परलोक दोनों में पूर्णशांति पाते हैं.

अष्टक: "गृहस्थ, भिक्षु, ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ इन्हे पुण्य अर्जन के लिए क्या करनाचाहिए?"
"ब्रह्मचारी को" ययाति ने कहा "अध्ययन में समय तभी लगाना चाहिए जब गुरु का ऐसा आदेश हो. अन्यथा सदैव उसे गुरु की सेवा में रहना चाहिए. गुरु के सो जाने के बाद वह सोये और गुरु के जगने के पहले से जगा रहे. विनम्र रहे और अपनी भावनाओं पर पूरा नियंत्रण रखे तभी कोईब्रह्मचारी सफल हो पायेगा.   गृहस्थ को पुण्य कमाने के लिए न्यायपूर्ण ढंग से धन अर्जित कर दान यज्ञ आदि करना चाहिए. सच्चा भिक्षु अपने जीवन निर्वाह के लिए कोई उपयोगी काम कभी नहीं करता, उसे अपने मनोभाव और भावावेश पर पूर्ण नियंत्रण रहता है वह किसी एकजगह पर दो रात नहीं रुकता और किसी गृहस्थ के घर कभी नहीं शरण लेता. विद्वान को वानप्रस्थ तभी होना चाहिए जब उस ने अपनी कामनाओं पर विजय प्राप्त कर लिया हो."

अष्टक के पूछने पर कि मुनि कौन होते हैं ययाति ने बताया कि मुनि होने के लिए वन में जाना आवश्यक नहीं है. वह अपने जन्म, परिवार और ज्ञान पर कोई अभिमान नहीं करता, तुच्छ और अपर्याप्त वस्त्रों में भी वह राजसी परिधान का सुख पाता है, जीवन यापन के लिए जो कुछ खाने को मिले उस से वह संतुष्ट रहता है और नगर या गांव में  भी रह कर मौन रहता है. पर यदि ऐसा व्यक्ति वन में जा कर योग ध्यान कर सुख-दुःख, सम्मान-अवज्ञा,  के प्रति पूर्णतः निर्विकार हो जाए तो वह अचिन्त्य ब्रह्म में मिल जाता है. और यदि कोई ऐसा व्यक्ति मद्यपान या मांसाहार भी करता है तो वह ऐसा बिना किसी अपेक्षा के करता है और न ही इसमें उसे कोई आनंद मिलता है न हीउसके पुण्य में इस से कोई ह्रास होता है.

अष्टक का अगला प्रश्न था ज्ञानी और तपस्वी में कौन पहले ब्रह्म प्राप्तकरता है?
"ज्ञानी वेद अध्ययन से जान जाते हैं कि" ययाति ने कहा "जो कुछ भी संसार में दिख रहा है वह माया है, और वे परमात्मा को शीघ्र प्राप्त कर लेते हैं. योग और ध्यान मार्ग पर चलने वालों को इसे समझने में देर लगती है. इस तरह ज्ञान से मुक्ति पहले मिलती है. पर यदि किसी कारणसे योगी को एक जन्म में मुक्तिनहीं मिल पाती है तो अगले जन्म में उसे पूर्व जन्म के योग का लाभ मिलता है. ज्ञानी अनश्वर सत्य को जानते हुए, निष्काम भाव से सांसारिक सुखों में डूबे रह कर भी ह्रदय में सत्य से विचलित नहीं होते और मुक्ति केअधिकारी बनते हैं. जिन्हे यह ज्ञान नहीं मिला पाता हैं उन्हें भक्ति और यज्ञ आदि करने चाहिए. पर मुक्ति की अभिलाषा से किये धर्म कर्म से मुक्ति नहीं मिलती."

यह सब सुन कर अष्टक नेपूछा कि उसके लिए, अर्थात अष्टक के भोगने के लिए,देवलोक में कोई क्षेत्र हैं या नही.ययाति ने उसे विश्वास जिलाया कि उसके लिए देवलोक में उतने ही क्षेत्र हैं जितने भूलोक पर गायें औरअश्व हैं. यह सुन अष्टक की प्रतिक्रिया थी कि "यदि मेरे धर्म कर्म से, मेरे तपो बल से देवलोक में मेरे लिए क्षेत्र हैं तो वह सब मैं राजन आप को दे रहा हूँ और आपको देवलोक से गिरने की कोई आवश्यकता नहीं."
"पर दान तो कोई ब्राह्मण ही ले सकता है" ययाति ने कहा "मैं नहीं ले पाउँगा तुम्हारा यह दान. मैंने स्वयं बहुत कुछ दान में दिया है. मैं दान स्वीकार करने का कलंक नही ले सकता." 

ययाति का दूसरा दौहित्र प्रतर्दन भी वहीं था. उस ने भी पूछा कि उसके भोगने के लिए स्वर्ग में कोई क्षेत्र हैं या नहीं. ययाति के बताने पर कि प्रतर्दन के लिए भी असंख्य क्षेत्र हैं प्रतर्दन ने भी उन्हें ययाति को दे दिए. और कहा  "अब आप को और नीचे नहीं गिरना है"
पर ययाति ने फिर वहीं बात कही. कोई राजा दान नहीं ले सकता. और योग और तप से अर्जित पुण्य तो कभी नहीं.

ययाति के ऐसे कहने पर उसके तीसरे दौहित्र वसुमत ने और चौथे दौहित्र शिवि ने भी वैसा ही कहा.उन्होंने राजा को अपने पुण्य बेचने का भी प्रस्ताव दिया. वसुमत एक तिनके बदले अपने सारे पुण्य अपने नाना को दे देना चाहता था पर ययाति ने इसे अनुचित व्यापार कह इस प्रस्ताव को भी स्वीकार नहीं किया.

तब तक आकाश में पांच स्वर्ण मंडित रथ प्रकट हुए. ययाति के दौहित्रों ने उस से उन रथों के विषय में पूछा और यह सुन के ये रथ देवलोक को ले जाते हैं पांचो उन रथों पर आसीन हो देवलोक को प्रस्थान कर गए.

Friday, 8 May 2015

आदि पर्व (20): ययाति उपाख्यान (5)

वृद्ध और शक्तिहीन ययाति का अपने पुत्रों से गिड़गिड़ाते हुए उनकी तरुणाई मांगना सम्भवतः महाभारत के सर्वाधिक कारुणिक दृश्यों में गिना जाएगा. पर आगे बढ़ने के पहले आदि-पर्व में मिलता काल-निपात विचारणीय है. जब देवयानी और ययाति अशोक वन में टहल रहे थे तो शर्मिष्ठा के तीनो बच्चे इतने छोटे थे कि वे अपने पिता के घुटनों से लिपट गए थे. देवयानी वहां से, बिना किसी वाहन के, अपने पिता के घर की ओर चल दी थी और ययाति उसे मनाने के लिए उसके साथ चल रहा था. शुक्र के आश्रम से शापित ययाति तुरंत वापस अपनी राजधानी की ओर चल दिया था. कितना समय लगा होगा प्रतिष्ठानपुर से वृषपर्व के नगर जाने में और वहां से वापस आने में? वृषपर्व के नगर से असुर कन्याएं चित्ररथ के उपवन तक घूमते टहलते पहुँच जातीं थीं. और ययाति, रथ पर, अपनी राजधानी से आखेट के क्रम में वहाँ पहुँच जाता था. इस से लगता है कि रथ से प्रतिष्ठानपर से शुक्र का आश्रम अधिक से अधिक एक दिन की दूरी पर था. स्वस्थ व्यक्ति पैदल चलते हुए शायद एक मास ले और दुर्बल, जराक्रांत शायद एक या दो वर्ष. पर इन दो-ढाई वर्षों के बाद जब ययाति अपनी राजधानी पहुंचता है तो उस के शिशु वयस्क हो चुके मिलते हैं!

महल पहुँच कर जरा-जीर्ण ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को बुलाया. “शुक्र के अभिशाप से मैं समय से बहुत पहले जराक्रांत हो गया हूँ. मेरे बाल श्वेत हो गए हैं, शरीर पर झुर्रियां पड़ गयीं हैं, मेरे अंग शिथिल हो गए हैं, दृष्टि और श्रवण में भी दोष आ गए हैं; पर पुत्र, मन से मैं अभी भी युवा हूँ और वह सब करना चाहता हूँ जो एक नवयुवक करना चाहता है.
"मैं चाहता हूँ यदु, मेरे ज्येष्ठ पुत्र, तुम मेरी जरावस्था को ले कर अपना यौवन मुझे दे दो. कुछ समय तक यौवनं का सुख भोग कर मैं तुम्हारा यौवन लौटा अपनी जरता वापस ले लूंगा".

"पर वार्धक्य अपने साथ खाने पीने की अनंत असुविधाएं लाता है" यदु ने कहा "इस लिए राजन, मैं आप की जरावस्था नहीं ले सकता. जरता का अर्थ होता है सर पर श्वेत केश, मन में अवसाद, शरीर पर झुर्रियां, अंगों में दुर्बलता आदि आदि. आप के अनेक पुत्र हैं राजन. कुछ को आप बहुत अधिक मानते हैं किसी और से आप कहें कि वह आपकी जरता ले ले. 

"तुम मेरे पुत्र हो यदु, मेरे ज्येष्ठ पुत्र;  तुम्हारी शिराओं में मेरा ही रुधिर बहता है. किन्तु तुम मुझे कुछ दिनों के लिए भी अपना यौवन नहीं दे पा रहे हो" ययाति ने उसे शाप दिया "तुम्हारे पुत्र या उनके पुत्र कभी राजा नहीं बनेंगे. तुम्हारा वंश राज्य हीन होगा; कभी उस में कोई राजा नहीं बनेगा."

ययाति फिर अपने दूसरे पुत्र तुर्वसु की और मुड़ा. "मेरी दुर्बलता ले लो तुर्वसु और अपना यौवन दे दो मुझे जिस से मैं अभी कुछ समय और जीवन को भोग लूँ.  जब मैं भोग-विलास से संतुष्ट हो जाऊंगा तो मैं तुम्हारा यौवन लौटा कर अपना बुढ़ापा वापस ले लूंगा"

"पर मुझे बुढ़ापा असहनीय लगता है" तुर्वसु ने कहा "यह हर तरह की क्षुधा का नाश कर देता है और जब क्षुधा ही न रहेगी तो क्षुधा शांति का आनंद कैसे मिलेगा. यह सत्य है राजन कि माता-पिता की कृपा से ही पुत्र को जीवन मिलता है और इस लिए पुत्र अपने माता-पिता की जितनी भी सेवा कर सके वह कम ही है किन्तु अभी तो मैंने यौवन में प्रवेश ही किया है यह समय मेरे लिए यौवन को भोगने का है, उसे किसी को देने का नहीं." ययाति ने उसे भी शाप दिया. "तुम्हारा वंश, तुर्वसु, नष्ट हो जाएगा. तुम्हारे पुत्र अनार्यों के राजा बनेंगे".          

तुर्वसु को शाप दे कर ययाति ने शर्मिष्ठा के पुत्र द्रह्यु को बुलाया और उस से भी जवानी की भीख मांगी. पर द्रह्यु ने भी मना कर दिया "वृद्ध न तो हाथी, घोड़ों पर चढ़ सकते हैं न ही रथ पर और न ही स्त्रियों का संपर्क भोग सकते हैं. इस लिए राजन मैं आप का बुढ़ापा नहीं ले सकता." ययाति ने उसे भी शाप दिया "द्रह्यु तुम्हारी इच्छा कभी पूरी नहीं होगी, तुम ऐसे देश का राजा बनोगे जहाँ हाथी, घोड़े या रथ के जाने के लिए कोई मार्ग ही नहीं रहेगा. तुम्हारे राज्य जाने का एक मात्र वाहन नाव रहेगा."

ययाति ने अब अनु से याचना की पर अनु ने भी मना कर दिया "वृद्ध बच्चों की तरह खाते हैं और तो और वे समय पर होम भी नहीं कर पाते हैं; नहीं , मैं अभी वृद्ध बनना नहीं चाहता"  ययाति ने उसे भी शाप दिया. "तुम्हे शीघ्र जरावस्था का सामना करना पडेगा. तुम्हारे पुत्र अपने पूर्ण यौवन में काल कवलित होंगे और तुम इतने दुर्बल रहोगे कि होम / यज्ञ आदि कुछ भी नहीं कर सकोगे."

ययाति ने अब अपने कनिष्ठ पुत्र पुरू से उसका यौवन माँगा. और पुरू मान गया. "मैं आप की जरता और दुर्बलता स्वीकार करता हूँ राजन, आप मेरी युवावस्था ले लें और तब तक रखें जब तक आप चाहें." ययाति संतुष्ट हुआ और उस ने पुरू को वर दिया "तुम्हारे राज्य में प्रजा की सारी मनोकामनाएं सिद्ध होंगीं" और शुक्र का स्मरण करते हुए ययाति ने अपनी जरावस्था पुरू को दे दी और उस की युवावस्था ले ली.

ययाति को अपने पुत्र पुरू से उसका यौवन एक सहस्त्र वर्षों के लिए मिल गया था. पुनर्यौवन पा कर ययाति की पुरानी रुचियाँ  जो उसकी जीर्णावस्था में सुषुप्त पडी थीं फिर से जग गयीं.  जितना मन चाहे और जितना तन सह सके, उस ने अपने आप को आनन्द में डुबो  दिया. बस उस ने इस का ध्यान रखा कि सब कुछ काल / ऋतु के अनुकूल हो और कुछ भी धर्म के विरुद्ध न हो.

यज्ञादि से उस ने देवताओं को, श्राद्ध कर्म से पितरों को, और दान-धर्म से अपने राज्य के निर्धनों को प्रसन्न रखा. चारो वर्णों के साथ अपना व्यवहार उस ने उनके वर्ण-गुण के अनुकूल रखा - ब्राह्मणों को मन चाहा भोजन और सम्मान, वैश्यों को संरक्षण और शूद्रों के प्रति दया भाव.  इस के बाद जो मन आये करते हुए ययाति के एक सहस्त्र वर्ष आनन्द में कट गए.

वैसे तो शुक्र के अभिशाप से उसे छूट मिली थी शुक्र-दुहिता देवयानी के साथ रहने के लिए पर इस नए यौवन में उसे एक नयी नायिका मिल गयी थी -  विश्वाची(1), एक अप्सरा. विश्वाची के साथ ययाति कभी इंद्र के उपवनों में कभी कुबेर की अलकापुरी में और कभी मेरु पर्वत के शिखर पर क्रीड़ा-मग्न रहता था.    

और जब सहस्त्र वर्ष बीत गए तो राजा ययाति ने अपने पुत्र पुरू को बुलाया. "तुम्हारी उदारता के चलते पुरू, मैं ने जीवन के सभी सुखों को अपनी इच्छा भर और अपनी देह की शक्ति भर भोगा. पर भोग विलास से इच्छाएं कभी संतुष्ट नहीं होतीं, वे और प्रबल होतीं हैं जैसे अग्निकुंड में घी डालने से अग्नि-ज्वालायें अधिक प्रचंड हो जातीं हैं. यदि विश्व की सभी चीजें - धन, धान्य, पशु, स्वर्ण, रत्न, स्त्रियां आदि किसी एक व्यक्ति की संपत्ति हो जाएँ तब भी वह व्यक्ति संतुष्ट नहीं होगा.  एक ही मार्ग है - आस्वादन की क्षुधा पर विजय. सच्चा आनंद तो वही ले पाते हैं जिन्होंने सांसारिक वस्तुओं की चाह पर विजय पा लिया हो. सहस्त्र वर्षों से मेरा ह्रदय मेरे ऐच्छिक क्रिया-कलापों पर ही केंद्रित रहा है. फिर भी मेरी पिपासा बढती ही गयी, कभी घटने का नाम नहीं लिया. आज पुत्र मैं उसे उखाड़ फेंकता हूँ. आज के बाद मैं अपनी इच्छाओं को ह्रदय से निकल कर, अपने दिन वन में निर्दोष मृग शावकों के साथ बिताऊंगा.
"और हाँ पुरू, मैं तुम से बहुत खुश हूँ. तुम सदैव समृद्ध रहो, यह लो अपना यौवन और लौटा दो मुझे मेरा बुढ़ापा". 

ययाति फिर से जराक्रांत हो गया और पुरू ने अपनी खोयी जवानी वापस पा ली. ययाति ने पुरू को सिंहासन पर बिठाना चाहा पर उन की प्रजा ने इसका विरोध किया. चारो वर्णों के लोग, ब्राह्मणों के नेतृत्व में ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदु के पक्ष में खड़े हो गए. "देवयानी के ज्येष्ठ पुत्र यदु के अधिकार को छीन कर, राजन, आप पुरू को कैसे राजा बना सकते हैं? यदु के बाद देवयानी का ही पुत्र तुर्वसु है उसके बाद शर्मिष्ठा के दो पुत्र द्रह्यु और अनु हैं जो पुरू से बड़े हैं, वे सब पुरू से पहले राजा बनने के अधिकारी हैं. आप इस पर विचार करें."

ययाति ने कहा "सुने आप सब क्यों मैंने पुरू को राजा बनाने का निर्णय लिया है. फिर आप जो उचित समझें वह कहें. मेरे ज्येष्ठ पुत्र यदु ने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है. पंडितों का कहना है कि जो पुत्र पिता की अवज्ञा करे वह पुत्र नहीं है. जो पुत्र अपने माता-पिता की आज्ञा माने, जो उनका भला चाहे, वही सच्चे अर्थ में पुत्र होता है. पुरू से बड़े मेरे चारो पुत्रों ने मेरी अवज्ञा की है. मात्र पुरू ने मेरा पूरा सम्मान किया है, मेरे सारी बातें मानी है और इसीलिए मैं उसे, अपने कनिष्ठ पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनाता हूँ.  

“नगर वासियों यह भी ध्यान में रखो कि पुरू ने मेरा बुढ़ापा एक सहस्त्र वर्षों के लिए ले लिया था और शुक्र ने भी कहा है कि जो पुत्र मेरा बुढ़ापा ले कर अपना यौवन मुझे देगा वही मेरे बाद राजा बन सकेगा."     

लोगों ने माना कि यदि सर्वगुण सम्पन्न पुत्र अपने माता-पिता की भलाई के लिए काम करता है तो निश्चय ही उस की समृद्धि होनी चाहिए, चाहे वह सबसे छोटा पुत्र ही क्यों न हो. इस तरह ययाति ने पुरू को राजा बनाया और कुछ समय बाद उस ने वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश ले लिया.

यदु के पुत्र यादव कहलाये, तुर्वसु के पुत्र  यवण, द्रह्यु के पुत्र भोज और अनु के पुत्र म्लेच्छ कहलाये. पुरू के पुत्र पौरव हुए, जिस वंश में भरत, भीष्म, युधिष्ठिर आदि ने जन्म लिया.   





(1) शकुंतला ने जिन छः श्रेष्ठ अप्सराओं के नाम गिनाए थे, उनमें विश्वाची भी थी.
उर्वशी पूर्वचित्तिश्च सहजन्या च मेनका ।
विश्वाची च घृताची च षडेवाप्सरसां वराः ।।

Thursday, 30 April 2015

आदि पर्व (19): ययाति उपाख्यान (4)

विवाह के बाद ययाति देवयानी, शर्मिष्ठा और सहस्त्र दासियों के साथ इंद्र की अमरावती के समतुल्य अपनी राजधानी प्रतिष्ठान पुर पहुंचा. देवयानी को ययाति ने अपने महल के अन्तःपुर में रखा और शर्मिष्ठा के लिए अशोक वृक्षों के एक कृत्रिम वन के बीच एक भव्य भवन बनवा दिया. शर्मिष्ठा और उसके साथ आयीं सहस्त्र दासियों के लिए उचित व्यवस्था कर राजा ययाति अपना सारा समय अन्तःपुर में बिताने लगा. समय पर देवयानी ने एक पुत्र को जन्म दिया. राजा के पुत्र होने पर पूरे राज्य में उत्सव मनाये गए. शर्मिष्ठा बरबस अपने बारे में सोचने लगी. अभी तक मैंने पति नहीं चुना है, संतान पता नही कब होंगीं; क्या मेरा नारी जीवन व्यर्थ रह जाएगा? मन ही मन उस ने ययाति से संतान प्राप्ति की ठान ली.

इसी बीच एक दिन अशोक वन में उसे ययाति अकेला मिल गया. दोनों एक दूसरे को देख ठिठक गए. एकांत का लाभ उठाते हुए शर्मिष्ठा ने राजा से प्रणय याचना की: "मेरा नारीत्व व्यर्थ मत चले जाने दो राजन, मुझे पुत्र दो. मैं रूप, गुण और समस्त कलाओं से सम्पन्न हूँ और मैं एक राजा की पुत्री भी हूँ - हर दृष्टि से मैं तुम्हारे अनुकूल हूँ"

"मैं जानता हूँ शर्मिष्ठा, तुम स्वाभिमानी असुरों की राजकन्या हो" ययाति ने उत्तर दिया "तुम्हारा रूप निश्चित ही अनिंद्य है, तुम सभी शुभ लक्षणों से युक्त हो किन्तु शुक्र ने मुझे आदेश दिया है कि मैं तुम्हे अपने पास न आने दूँ.           
"यह कहा गया है राजन कि" शर्मिष्ठा ने कहा "इन पांच अवसरों पर मिथ्या वादन पातक नही है: परिहास में, स्त्री-संसर्ग के उपक्रम में, विवाह काल में, और उस समय जब प्राण संकट में हों या जब सब कुछ लुट रहा हो."    
""राजा अपनी प्रजा का आदर्श होता है. मिथ्यावादी राजा विनाश को आमंत्रित करता है. मुझे कितनी ही बड़ी हानि की आशंका क्यों न हो, मैं मिथ्या वचन कभी नहीं निकालुंगा."

पर शर्मिष्ठा आसानी से छोड़ने वाली नहीं थी. "दूसरी तरह से देखो राजन तो मित्र का विवाह भी अपना ही विवाह होता है और मित्र का पति भी अपना ही पति"
ययाति की नीयत डगमगाने लगी. उस ने एक युक्ति भी सोची जिसकी लंगोट से उसके सद्व्यववहार की मान मर्यादा भी बची रह जाए. "तुम क्या चाहती हो? खुल कर बोलो" उस ने कहा "मैं ने आज तक किसी याचक को निराश नहीं किया है"

शर्मिष्ठा ने कहा "स्त्री रूप में जन्म ले कर भी यदि मैं निस्संतान रह गयी तो मैं घोर पातक की भागी होउंगी. राजन मुझे उस पातक से बचाओ. मुझे एक माँ बनाओ जिस से मैं सर्वोत्कृष्ट धर्म का पालन कर सकूँ."
"और राजन, यह सर्व विदित है कि स्त्री, दास और पुत्र अपने लिए नहीं कमा सकते. वे जो कुछ भी अर्जित करते हैं वह उनके स्वामी / पिता का होता है. मैं देवयानी की दासी हूँ और आप देवयानी के स्वामी हैं. इस लिए राजन आप मेरे भी स्वामी हुए. मेरी कामना पूरी करें स्वामी"   

ययाति को तैयार करने में शर्मिष्ठा को बहत श्रम नहीं करना पड़ा. शीघ्र ही ययाति को उसके कथन में सच्चाई दीखने लगी और और उस ने शर्मिष्ठा को वही सम्मान दिया जिसे वह अब तक मात्र देवयानी को देता आ रहा था. कुछ समय साथ बिता कर वे एक दूसरे से स्नेहसिक्त विदाई ले अपने अपने स्थान को लौट गए. उचित समय पर शर्मिष्ठा ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसके मुख पर देवताओं सदृश चमक थी.  देर सबेर देवयानी को भी इस बालक के जन्म का पता चल ही गया. उसके ह्रदय में  भावनाओं का बवंडर घूमने लगा - ईर्ष्या, आश्चर्य, जुगुप्सा. भागी भागी वह शर्मिष्ठा के घर पहुँच पूछने लगी "अपनी इच्छाओं के वशीभूत हो तुमने यह कैसा पाप कर लिया?"
"पिछले वर्ष एक पवित्र आत्मा ऋषि यहाँ आये थे" शर्मिष्ठा ने कहा "वे वेदज्ञ थे और भक्तों को वरदान देने में भी सक्षम थे. मैं ने मातृत्व का धर्म पूरा करने के लिए उन्हें अपनी इच्छा बतायी और यह पुत्र उन्ही के आशीर्वाद का फल है"
"तुम कैसे सोच सकी कि मैं अपनी इच्छाओं में बह कर कुछ ऐसा कर बैठूंगी?" शर्मिष्ठा ने पूछा.

"तब तो ठीक है" देवयानी ने स्वीकार किया  "उस ब्राह्मण का नाम, गोत्र आदि कुछ याद है तुम्हे? पता चले तो मैं भी उस से मिलना चाहूंगी"
"अपने तपोबल से वे सूर्य की तरह देदीप्यमान थे और उन्हें देख कर मैंने उनके विषय में कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं समझी"

मन मसोस कर देवयानी ने स्वीकार किया कि ऐसे ब्राह्मण से यदि शर्मिष्ठा को पुत्र मिला है तो कुछ अन्यथा नहीं सोचना है. इस तरह बातें कर देवयानी अपने महल चली गयी.

देवयानी से ययाति के दो पुत्र हुए और "ऋषि" की अनुकम्पा से शर्मिष्ठा को तीन.  एक दिन ऐसा हुआ कि ययाति और देवयानी राजा के विशाल उपवन में विचरण कर रहे थे जब उन्हें दिव्य आभा वाले तीन बालक दिखे. बच्चे इतने सुन्दर थे कि जो देखे बस देखते ही रह जाए. देवयानी उन्हें देख ययाति से पूछ बैठी "देवताओं के बालकों की तरह दीखते ये बच्चे किस के हैं?"

ययाति सोच रहा था कि कैसे आगे बढ़ा जाए पर देवयानी ने राजा के उत्तर की प्रतीक्षा न कर बच्चों से पूछ डाला "किन के बच्चे हो तुम तीनो? तुम्हारे माता पिता कौन हैं?"

बच्चों ने ययाति की ओर इंगित किया और माता का नाम शर्मिष्ठा बताया.  यह कह बच्चे ययाति के निकट आ कर उसके घुटनों से लिपट गए. पर ययाति उन्हें देवयानी की उपस्थिति में दुलार नहीं पाया और दुखी मन बच्चे उसे छोड़ कर रोते हुए अपनी माता के पास चल दिए. राजा अपनी दोष-जन्य कायरता पर लज्जित था किन्तु इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि देवयानी के सामने उन्हें रोकने का प्रयास करे. देवयानी सब समझ गयी. पहला प्रहार उस ने अपने पति पर नहीं बल्कि अपनी सहेली और अब सौत पर किया.

"तुम शर्मिष्ठा मेरे ऊपर आश्रित हो, फिर भी मेरे ही ऊपर ऐसा अभिघात?"      
"प्रिय देवयानी, जो कुछ मैंने तुम्हे बताया था एक ऋषि के विषय में वह सब कुछ सत्य है. मैं ने सब कुछ सही और धर्माचरण के अनुकूल किया है. जब तुम ने राजा ययाति को अपना पति चुना था उसी समय मैं भी उसे अपना पति चुन लिया था. और मित्र, सच कहो तो मित्र का पति भी तो अपना ही पति है! तुम ब्राह्मण हो और मैं तुम्हारा सम्मान करती हूँ पर मैं उस से भी अधिक सम्मान इस राजर्षि का करती हूँ."

देवयानी यह सब सुन आग बबूला थी; अपने पति की ओर मुड़ उस ने कहा "तुमने, राजन, मेरे साथ घोर दुर्व्यवहार किया है" "मैं अब यहाँ नहीं रह सकती" ऐसा कहते रोती हुई देवयानी उठ कर अपने पिता के घर की दिशा में चल दी. ययाति घबड़ा गया. उसे मनाने के लिए मधुर बातें बोलते हुए उसके पीछे पीछे चलने लगा. पर देवयानी न मानी. अपने पिता के पास पहुँच कर उस ने घोषणा की "पाप के हाथों धर्म पिट गया. नीच उठ गए हैं और उच्च को गिरा दिया गया है. शर्मिष्ठा ने पुनः मुझे कष्ट पहुंचाया"

"इस राजा के" देवयानी बोलती रही "शर्मिष्ठा से तीन पुत्र हैं और मुझसे मात्र दो" और जोड़ दिया "राजा ययाति शास्त्रज्ञ माना जाता है पर, वह सत्य के पथ से विचलित रहा है"  

ययाति ने अपनी वासना के अभिभूत हो अतिचार किया था (और उसका भयानक फल भी उस ने पाया, जैसा हम देखेंगे). पर जिस चीज ने देवयानी को सबसे अधिक कष्ट पहुंचाया वह था शर्मिष्ठा को तीन पुत्र होना जब कि उसके मात्र दो थे. यहाँ भी वृषपर्व की पुत्री उस पर भारी पड़ी. शर्मिष्ठा एक राजा की पुत्री थी और यह संभव है कि राजा ययाति उसे अधिक ठीक से समझ पाता था और यह भी संभव है कि शर्मिष्ठा के लिए ययाति समकक्ष रहा हो.

यह सुन शुक्र ने ययाति को अदम्य जरा से आक्रान्त हो जाने का शाप दिया. ययाति ने अपनी सफाई दी - शर्मिष्ठा ने मुझ से पुत्र माँगा था - गर्भ धारण के लिए उपयुक्त काल में. वेद कहते हैं कि उस काल में यदि कोई काम पीड़िता किसी पुरुष से एकांत में आग्रह करे और वह पुरुष आगे न बढे तो वह भ्रूण हत्या के पाप का भागी होता है. और इसी कारण मैं शर्मिष्ठा के पास गया था.

"पर मैंने तुम्हे मना किया था उसके निकट जाने से. यदि शर्मिष्ठा ने ऐसी प्रार्थना की थी तो तुम्हारे लिये मुझसे आज्ञा लेना उचित रहता. पर चोरी छुपे आगे बढ़ तुम ने एक चोर का काम किया और तुम अभी से जराक्रांत हो जाओगे."

शुक्र के शाप से ययाति का यौवन तत्काल लुप्त हो गया. उसका शरीर जर्जर हो गया, उस के अंग शिथिल हो गए, उसकी दृष्टि क्षीण हो गयी और उसका तेजस्वी रूप न जाने कहाँ खो गया. ययाति ने शुक्र से प्रार्थना की "मैं अभी तक देवयानी से अघाया नहीं हूँ, अतः भार्गव मुझे कुछ और समय के लिए यौवन रहने दो जिसे मैं देवयानी के साथ बिता सकूँ."  
"मेरी बात तो कभी झूठ जाती नहीं है इस लिए जराक्रांत तो तुम्हे रहना ही पडेगा राजन, पर मैं यह छूट दे रहा हूँ कि तुम यदि कर सको तो अपनी जरावस्था को अपने किसी पुत्र की युवावस्था से बदल लो. तुम्हारा पुत्र जरा जीर्ण हो जाएगा और तुम तरुण"

ययाति व्यवहारिक था. उस ने शुक्र से कहा "भार्गव, कृपया ऐसा वर दो कि जो पुत्र मेरी जरावस्था ले कर अपना यौवन मुझे दे वही मेरे बाद राजा बने और उसके धर्म और प्रतिष्ठा की पताका सदा लहराती रहे"
शुक्र मान गया "राजन, जो पुत्र भी तुम्हे अपना यौवन देगा वही तुम्हारा उत्तराधिकारी बनेगा, वह पूर्णायु भोगेगा और उसे अनेक पुत्र होंगे.

वृषपर्व के नगर से ययाति और देवयानी वापस ययाति की राजधानी की और चले. ययाति चल नहीं पा रहा था. चलना तो दूर वह ठीक से खड़ा भी न हो पा रहा था. देवयानी के सहारे पर धीरे धीरे वह आगे बढ़ रहा था. और देवयानी? वह क्या सोच रही थी? वह चाहती थी शर्मिष्ठा को उसके किये का दंड मिले पर शर्मिष्ठा तो यथावत रह गयी और उसे ही अपने जीर्ण शीर्ण स्वामी को ढोते हुए चलना पड़ रहा था.

Wednesday, 29 April 2015

आदि पर्व (18): ययाति उपाख्यान (3)

कुछ समय बाद देवयानी चित्ररथ के उसी उपवन में विहार करने आई थी. उसकी सेवा में शर्मिष्ठा अपनी सहस्त्र दासियों के साथ थी. फूलों के मधु पी पी कर थकी देवयानी लेट कर शर्मिष्ठा से अपने पाँव दबवा रही थी जब मृग के आखेट में निकला ययाति पुनः उस उपवन में आया. दोनों सुंदरियों को देख वह चकित हो गया.

"कौन हो तुम दोनों? तुम्हारे पिता कौन हैं?" ययाति ने पूछा "ये सहस्त्र दासियाँ अवश्य तुम्हारी सेवा में हैं"
"मैं असुरों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी हूँ. तुम ने कभी मेरा हाथ धरा था." देवयानी ने कहा "और यह मेरी सेवा में लगी शर्मिष्ठा है, असुर राज वृषपर्व की पुत्री"     

ययाति ने पूछा "असुर राज की पुत्री तुम्हारी दासी  कैसे बनी हुई है?"

"सब कुछ प्रारब्ध की बात है, इन पर कुछ मत सोचो" देवयानी बोली "तुम अपने विषय में बताओ. वस्त्रों से तुम राज परिवार के लग रहे हो. तुम्हारी वाणी किसी वेदज्ञ की लग रही है. कौन हो तुम? क्या नाम है तुम्हारा? तुम्हारे पिता कौन हैं?"
"जब मैं ब्रह्मचर्य आश्रम में था तो मैंने समस्त वेदों का अध्ययन किया था" ययाति ने कहा "मैं ययाति हूँ, एक राजा का पुत्र और स्वयं एक राजा."
"तुम इधर क्यों आये हो राजन?" देवयानी ने पूछा.
"मैं आखेट में मृगों के पीछे था जब प्यास के चलते जल खोजते इधर चला आया. यदि मेरा यहाँ आना तुम्हे अच्छा नहीं लग रहा हो तो आदेश दो मैं तुरंत चला जाऊंगा"  

"नहीं राजन, अपनी सब दासियों के साथ मैं तुम्हारे आदेश की प्रतीक्षा कर रही हूँ" देवयानी ने बिना समय गंवाए कहा "तुम्हारी समृद्धि हो राजन, आओ मेरे सखा और स्वामी बनो."

“मैं तुम्हारे योज्ञ नहीं हूँ” ययाती ने कहा “तुम्हारे पिता शुक्र हैं, मुझ से बहुत ऊँचे. मृगलोचने, चारो वर्ण ब्रह्मा के शरीर से निकले हैं पर उनकी शुद्धता एक सामान नहीं है. मैं क्षत्रिय हूँ और ब्राह्मण कन्या से विवाह नहीं कर सकता"

पर देवयानी ययाति को इतनी आसानी से छोड़ने वाली नहीं थी. "पर ब्राह्मणों और क्षत्रियों में पहले भी सम्बन्ध स्थापित हो चुके हैं और भविष्य में भी होंगे. तुम एक राजर्षि के पुत्र हो, ययाति, मेरे इस हाथ को तुम्हारे पहले कभी किसी पुरुष ने नहीं धरा था. जब नहुष-पुत्र ने इसे एक बार धर लिया तो अब और कौन इसे धर सकता है. आओ राजन मेरे स्वामी बनो."

"बुद्धिमान मानते हैं कि क्रुद्ध विषधर सर्प से भी अधिक एक व्यक्ति को किसी ब्राह्मण से बच कर रहना चाहिए". ययाति ने कहा "सर्प तो एक बार में एक व्यक्ति को ही मार सकता है पर क्रुद्ध ब्राह्मण एक ही साथ पूरे नगर या पूरे राज्य को नष्ट कर सकता है. मैं ब्राह्मणों से बच कर रहूंगा और तुम से मैं तब तक विवाह नहीं कर सकता जब तक तुम्हारे पिता मेरे हाथों में तुम्हारा हाथ नहीं देते."

देवयानी ने तब एक दासी को शुक्र के पास भेजा. दासी ने सारी बात शुक्र को बतायी और शुक्र भी उपवन में आ गए. शुक्र को आया देख राजा ययाति ने ससम्मान उनकी पूजा-अर्चना की और हाथ जोड़ शुक्र के आदेश की प्रतीक्षा में खड़ा हो रहा. देवयानी ने अपने पिता को बताया कि किस प्रकार जब वह महा कष्ट में थी तो राजा ययाति ने उसके हाथ गहे थे और कहा "मेरी प्रार्थना है कि आप मुझे इस राजा के हाथों दान कर दें. मैं अन्य किसी ब्यक्ति से विवाह नहीं करुँगी"

"मेरी पुत्री ने तुम्हे चुन लिया है" शुक्र ने कहा "आओ नहुष-पुत्र, मैं उसे तुम्हे सौंप रहा हूँ, स्वीकार करो"
"पर विप्रवर, आप मुझे वर दें कि ऐसा करने से वर्ण संकर संतानोत्पत्ति का पाप मुझ पर नही आएगा" ययाति बहुत सतर्क हो चला है.
शुक्र ने उसे आश्वस्त किया "उस पाप से मैं तुम्हे मुक्त करता हूँ, निश्चिन्त रहो. देवयानी के साथ आनंदमय जीवन बिताओ. वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा देवयानी के साथ जायेगी. उस का सम्मान करना पर उसे अपने निकट मत बुलाना."

शुभ मुहूर्त में ययाति-देवयानी का विवाह संस्कार सभी शास्त्रोक्त कर्मों के साथ संपन्न हुआ.  देवयानी के साथ जब ययाति अपनी राजधानी लौटा तो उसके साथ एक सहस्त्र दासियाँ भी थी और शर्मिष्ठा भी.

Tuesday, 28 April 2015

आदि पर्व (17): ययाति उपाख्यान (2)

संजीवनी महाविद्या मिल जाने के बाद सुरों की मनः स्थिति बदल गयी. पहले वे असुरों के भय से छिपे फिरते थे अब उनके उत्साह ने आक्रामक रूप ले लिया था. कच के देवलोक पहुँचने के तुरंत बाद, इंद्र के नेतृत्व में वे असुरों से युद्ध करने निकल पड़े. मार्ग में गन्धर्व चित्ररथ का एक उपवन था जिस के सरोवर में असुर ललनाएँ जल क्रीड़ा कर रही थीं. इंद्र ने पवन का रूप धर किनारे रखे उन के वस्त्र आपस में मिला दिए. जब वे बाहर निकलीं तो मिले जुले वस्त्रों के ढेर से निकालते हुए जो जिसके हाथ आया उस ने वही पहन लिया. इसी क्रम में देवयानी के कपडे असुर राज वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा ने पहन लिए.

कुछ ही महीने हुए जब देवयानी ने कच के छल को पहचाना था. अब वह सब कुछ सशंकित दृष्टि से देखती थी. शर्मिष्ठा ने उसी के कपडे भला क्यों पहने? राजा की बेटी होने के चलते क्या वह असुरा अपने आप को ब्राह्मण के समतुल्य समझने लगी?

"शर्मिष्ठा, तुम ने मेरे वस्त्र कैसे पहन लिए?" देवयानी ने कहा "मैं तुम्हारे राज-गुरु की पुत्री हूँ, चलो, उतारो मेरे वस्त्र"
शर्मिष्ठा राजा की पुत्री थी और उसे इस तरह की बोली सुनने की आदत नहीं थी; बिफर पड़ी.

"तुम्हारे वस्त्र? तुम्हारा है ही क्या देवयानी? तुम्हारे चारण पिता मेरे पिता की स्तुति, वन्दना में लगे रहते हैं और मेरे पिता के दिए दान या भिक्षा से तुम्हारा घर चलता है. मैं असुर-राज की पुत्री हूँ. मेरे पिता भिक्षा देते हैं; तुम्हारे पिता भिक्षा स्वीकार करते हैं. तुम्हारे कपडे, कपडे ही क्यों, तुम्हारा सब कुछ मेरे पिता का दिया हुआ है."

क्रोध से देवयानी की आँखें लाल हो गयीं और वह शर्मिष्ठा की देह से अपने वस्त्र खींचने लगी. शर्मिष्ठा ने उसे धक्के दे कर निकट के एक सूखे कुँए में गिरा दिया. जब उसे लगा कि देवयानी बचेगी नहीं तब वह संतुष्ट मन से नगर की दिशा में चल दी.

शर्मिष्ठा के जाने के कुछ देर बाद, मृग के आखेट में निकला, चन्द्रवंश का प्रतापी राजा ययाति वहां पानी खोजते आया. ययाति नहुष का पुत्र था, पर ज्येष्ठ पुत्र नहीं. नहुष के ज्येष्ठ पुत्र यति ने अपना राज्याधिकार त्याग एक तपस्वी का जीवन अपना लिया था. चन्द्रवंश में कनीय पुत्रों के सिंहासन पर आसीन होने के उदाहरण बार बार आये हैं. प्रतीप का ज्येष्ठ पुत्र देवापि चर्म रोग से पीड़ित था जिस के चलते हस्तिनापुर के ब्राह्मणों ने उसका राज्याभिषेक न होने दिया और उसका अनुज शांतनु राजा बना था. धृतराष्ट्र के दृष्टि-हीन होने के चलते उसका अनुज पाण्डु राजा बना था (वैसे पाण्डु की अकाल मृत्यु के चलते धृतराष्ट्र बाद में राजा बन पाया था). ज्येष्ठ कौन्तेय कर्ण अवैध जन्म के कारण राजा नहीं बन सका. और जैसा हम देखेंगे ययाति का अपना ज्येष्ठ पुत्र भी राजा नहीं बन पाया.  

ययाति मृग के आखेट में निकला हुआ था जब उसे कुँए में गिरी देवयानी मिली थी. चन्द्रवंशियों के मृग के आखेट में भी संभवतः प्रच्छन्न भाव कामेच्छा के हैं - दुष्यंत को आखेट में शकुन्तला मिली थी, शांतनु को सत्यवती और पाण्डु का प्राणहारी शाप उसे मृग के आखेट में ही मिला था.

पानी खोजते जब ययाति ने कुँए में झांका तो बस देखता रह गया. पानी तो नहीं था पर अलौकिक रूपवती एक तरुणी थी कुँए में; उस के मुख पटल पर दिव्य आभा थी और उस के नख ऐसे चमक रहे थे जैसे वे परिष्कृत ताम्र पत्र के बने हों.
 "कौन हो तुम, श्यामे?" ययाति ने पूछा "तुम्हारे पिता कौन हैं और कैसे तुम इस कुंए में गिर गयी हो?" ययाति ने देवयानी को श्यामा कहा. ब्राह्मण सुता का श्यामा होना कुछ असामान्य लगता है. पर देवयानी की दोनों मातामह असुर कुल की थीं, संभवतः इसी लिए वह श्याम-वर्णा थी. (ध्यातव्य है कि बृहस्पति की एक पत्नी तारा भी श्याम-वर्णा ब्राह्मणी थी.)

"मैं आचार्य शुक्र की पुत्री हूँ, उसी शुक्र की जो युद्ध में मृत असुरों को पुनर्जीवित कर देते हैं." देवयानी ने कहा "तुम देखने से राज परिवार के लगते हो. लो मेरे दाहिने हाथ को पकड़ो और मुझे बाहर खींच निकालो".

ययाति ने देवयानी के हाथ पकड़ उसे ऊपर निकाल लिया. फिर उस के बारे में सोचते हुए अपनी राजधानी की ओर निकल पड़ा. देवयानी का सौंदर्य उस के ह्रदय में समा गया था. कुछ ही दिनों में वह फिर पानी खोजते हुए उसी जलाशय के निकट आया था, शायद अंदर से देवयानी को पुनः देखने की इच्छा उसे वहां धकेल लायी थी.

देवयानी ने कुँए से बाहर निकल कर अपनी दासी से शुक्र को कहलवाया कि वह वापस वृषपर्व के नगर में नहीं जायेगी. शुक्र भागे भागे आये, देवयानी ने उसे सारी बात बतायी - उनके कपडे हवा के चलते मिल गए थे, शर्मिष्ठा ने उसके कपड़े पहन लिए थे और टोकने पर कि गुरु-पुत्री के कपडे उस ने कैसे पहन लिए शर्मिष्ठा ने शुक्र को एक भाड़े का प्रशंसक बताया जो पैसों के बदले वृषपर्व की स्तुति करता है.
"और जब मैंने अपने वस्त्र छीनने का प्रयास किया तो उस ने उस कुँए में मुझे गिरा दिया" कुँए की तरफ हाथ बढ़ाते हुए देबयानी ने कहा, और रोते हुए पूछने लगी "क्या आप वास्तव में वृषपर्व की प्रशंसा कर के उस की दी हुई भिक्षा स्वीकार करते हैं?"

"नहीं देवयानी, तुम किसी भिक्षुक या किसी स्तुवत की पुत्री नहीं हो" शुक्र ने कहा "तुम्हारा पिता किसी की स्तुति नहीं करता, सभी उस की स्तुति करने वाले हैं - चाहे वृषपर्व हो, चाहे राजा ययाति चाहे इंद्र ही क्यों नहीं हो. मेरी शक्ति अचिन्त्य ब्रह्म से आती है और मैं बस उसी का स्तुवत हूँ"
“पर याद रखना देवयानी जो व्यक्ति दूसरों के कटु अप्रिय बातों को सह लेता है वह संसार जीत लेता है. जैसे सफल सारथी घोड़ों को हमेशा नियंत्रण में रखता है वैसे ही सफल व्यक्ति अपने क्रोध को हमेशा नियंत्रण में रखता है. अपने क्रोध को जीत लो तो सब कुछ जीत लोगी. जो अपने क्रोध को दबा सकता है और दूसरों के कटु वचनों को अनसुना कर सकता है वह निश्चय ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सिद्ध कर पाता है.”

"मैं क्रोध और क्षमा दोनों की शक्तियां जानती हूँ" शुक्र का प्रवचन सुन देवयानी बोल पड़ी "पर यदि कोई शिष्य अशिष्ट व्यवहार करे तो उसका भला चाहने वाले गुरु को कभी उसे क्षमा नहीं करना चाहिए. शर्मिष्ठा के निष्ठुर शब्दों से मेरा हृदय जल रहा है. मैं ऐसी जगह नहीं रह सकती जहाँ सद्व्यवहार और कुलीनता का कोई मूल्य नहीं है."  

यह सुन शुक्र भी रुष्ट हुआ और उस ने वृषपर्व से जा कहा "राजन, गरिष्ट भोजन की तरह पाप पचाए नहीं पचते. उनका फल भोगना ही पड़ता है. तुम्हारे अनुयायियों ने विद्वान और कुलीन ब्राह्मण कच की तीन बार ह्त्या की है और अब तुम्हारी पुत्री शर्मिष्ठा ने देवयानी के साथ कुव्यवहार किया है, वृषपर्व, मैं तुम्हारे राज्य को छोड़ना चाहता हूँ"

"हे भार्गव" हतप्रभ वृषपर्व ने कहा "यदि आप चले जाएंगे तो हम लोग यहाँ किसी प्रकार नही टिक पाएंगे और पूरे असुर समाज को पाताल में जा छुपना पडेगा."
"असुर समाज को जहाँ जाना पड़े, वहां जाए" शुक्र ने कहा "यदि देवयानी यहाँ नहीं रुक सकती तो मैं भी नहीं टिक सकता."  
"किन्तु भार्गव" वृषपर्व ने विनती की "जो कुछ भी असुरों का है वह आप को समर्पित है, वह आप ही का है. मैं भी आप की बात से बाहर नहीं हूँ. आप जो चाहते हैं आज्ञा दें, बस हमें छोड़ कर न जाएँ." 
"अगर यह सच है राजन तो जाओ और देवयानी को यहाँ रहने के लिए मना लो"

जब देवयानी ने यह सब सुना तो उस ने अपने रुकने की शर्त रखी "शर्मिष्ठा अपनी सहस्त्र दासियों के साथ सदैव मेरी सेवा में लगी रहे और विवाह के बाद मैं जहाँ भी जाऊं वहां भी शर्मिष्ठा मेरी सेवा में मेरे साथ रहे"

शुक्र के चले जाने से असुर समाज की दशा बहुत बुरी हो जाती. संजीवनी महाविद्या तो चली ही जाती, असुर राज में यज्ञ आदि भी न हो पाते. शर्मिष्ठा यह समझती थी. उस ने देवयानी की शर्तें सुनी तो अपने समाज को दुर्दशा से बचाने के लिए तत्काल, बिना एक भी क्षण गंवाए तैयार हो गयी. "मैं अपने  कुव्यवहार के चलते शुक्र को नहीं जाने दूंगी; यदि उन्हें रोकने के लिए मुझे देवयानी की दासी बननी पड़े तो वह भी सहर्ष स्वीकार है." और इस तरह अपनी एक सहस्त्र दासियों के साथ शर्मिष्ठा स्वयं देवयानी की सेवा में उपस्थित हुई.  "आज से मैं तुम्हारी दासी हूँ देवयानी, सदैव तुम्हारी आज्ञा की प्रतीक्षा करुँगी."

"किन्तु मैं तो तुम्हारे पिता के दिए दान-भिक्षा पर पलती हूँ, तुम्हारे पिता के स्तुवत की पुत्री हूँ, तुम कैसे मेरी दासी बन रही ही?"

"अपने समाज के सुख-समृद्धि के लिए हर व्यक्ति को सब कुछ करने के लिए तैयार रहना चाहिय" शर्मिष्ठा ने प्रसन्न मुख से कहा "जहाँ कही भी तुम्हारे पिता तुम्हे विवाह कर भेजेंगे, मैं सदैव तुम्हारी सेवा में रहूंगी"

और इस तरह असुर राज की पुत्री शर्मिष्ठा भृगु की पौत्री देवयानी की दासी बन गयी.