जनमेजय ने गांधारी के सौ
पुत्रों की सुन वैशम्पायन से पूछा था “कितने वर्षों में गांधारी ने अपने सौ
पुत्रों को जन्मा था? और धृतराष्ट्र अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ कैसा
व्यवहार करता था? उस की वह वैश्य पत्नी कौन थी जिस से उसे एक पुत्र हुआ था?
और पांडु के शापित होने के बाद उसे पुत्र कैसे हुए? अपने पूर्वजों के विषय
में जानने की मेरी इच्छा अभी समाप्त नहीं हुई है.कृपया यह सब आप मुझे
विस्तार से सुनायें”
वैशम्पायन कहता है:
एक बार गांधारी के सत्कार से प्रसन्न हो वेदव्यास ने उसे मन चाहा वर दिया. गांधारी ने एक सौ प्रतापी पुत्र मांगे और व्यास "ऐसा ही होगा" कह चल पड़े. कुछ समय पश्चात गांधारी ने गर्भ धारण किया. दो वर्षों तक गर्भ रखने के बाद भी उस ने कुछ नहीं जन्मा. इस बीच कुंती ने एक अत्यंत तेजस्वी बालक को जन्म दिया. कुंती के पुत्र की सुन गांधारी बहुत कुंठित हो चली थी और क्षोभ में उस ने अपने पेट पर बहुत जोर से प्रहार किया. इस आघात से उसका गर्भ गिर गया, दो वर्षों के बाद लौह कंदूक की तरह कठोर एक मांस पिंड निकला था उस के पेट से. दुखी गांधारी ने अपनी दासियों से उस पिंड को फेंक आने को कहा. पर तब तक व्यास वहां पहुँच गए. वे अपनी दिव्य दृष्टि से मांस पिंड के जनन को जान गए थे.
"यह क्या किया आप ने गांधारी?" व्यास ने दुःखी स्वर में पूछा
"मैं थक गयी थी अपना गर्भ ढोते ढोते" गांधारी ने सच सच बताया "और सुना कि कुंती ने सूर्य के सामान देदीप्यमान बालक को जन्म दिया है तो मैं अपने आप को रोक नहीं पायी"
"मेरी बात कभी झूठी नहीं होती, आपको धैर्य रखना चाहिए था" व्यास ने कहा फिर उन्होंने एक सौ घी से भरे घड़े मंगवाए और मांस पिंड पर शीतल जल का छिड़काव करवाया. जल छिड़कने के थोड़ी देर बाद वह मांस पिंड सौ भागों में बँट गया. व्यास घी से भरे हर घड़े में पिन्ड के एक भाग को डालने लगा. जिस समय व्यास यह कर रहा था उस समय गांधारी सोचने लगी “कृष्ण द्वैपायन की बात सच हो कर रहेगी और मुझे सौ पुत्र अवश्य होंगे किंतु कितना अच्छा होता यदि इन सौ पुत्रों के साथ मुझे एक पुत्री भी होती. पुत्री होने से महाराज धृतराष्ट्र मरणोपरांत उन क्षेत्रों में भी जा पाएँगे जहाँ बस वही जाते हैं जिनकी पुत्री के पुत्र हुए हों. और यदि मुझे पुत्री नहीं हुई तो मैं वह स्नेह कभी नहीं जान पाऊँगी जो किसी पुत्री की मां को अपने जामाता के लिए होता है. यदि मैने अपने जीवन में कुछ भी तप किए हों, कुछ भी दान धर्म किए हों तो प्रभु मुझे एक पुत्री भी दे दें”
तब तक व्यास ने, जो स्वयं हर घड़े में पिन्ड के एक एक भाग को रख रहा था, गांधारी से कहा “इन सौ घड़ों में तुम्हारे सौ पुत्र हैं. मेरी बात असत्य नहीं होगी. पर अभी उस पिंड का एक भाग बचा हुआ है. यही समय आने पर तुम्हे दौहित्र (पुत्री का पुत्र) देगा.” व्यास ने तब घी से भरा एक और घड़ा मँगवाया और उस घड़े में पिन्ड के अंतिम बचे भाग को रख कर घड़े को बंद करवा दिया. सभी घड़ों को अच्छी तरह बंद कर महल के किसी सुरक्षित भाग में रखवा दिया गया. घड़ों के ढक्कन दो वर्ष के पहले नहीं हटाने को कह व्यास अपने आश्रम की ओर निकल गए.
समय आने पर इन्ही घड़ों में से एक से दुर्योधन का जन्म हुआ. दुर्योधन और पाण्डु-पुत्र भीम के जन्म एक ही दिन हुए थे. जन्म लेते ही दुर्योधन गधे के सुर में रोने और रेंकने लगा था. उसे सुन गधे, गिद्ध,शृगालऔर कौव्वे भी, प्रत्युत्तर में मानो, जोर जोर से बोलने लगे थे. बहुत तेज हवा चलने लगी थी और कई स्थानो परआग भी लग गयी थी. इन अशुभ लक्षणों से धृतराष्ट्र भी डर गया था. उस ने भीष्म, विदुरऔर अनेक ज्ञानी ब्राह्मणों की एक सभा बुलवाई. यह मानते हुए कि युधिष्ठिर सब से बड़ा है और इस तरह राजा बनने का अधिकारी वही है, उस ने अपने पुत्र दुर्योधन के विषय में पूछा."क्या मेरा ज्येष्ठ पुत्र राजा बन सकता है? मैं मात्र यह जानना चाहता हूँ कि आप के विचार से सत्य और विधि सम्मत क्या होगा?"
धृतराष्ट्र की बात समाप्त होते ही शृगाल और गिद्ध फिर बोलने लगे. ब्राह्मणों नेकहा "इन अशुभ लक्षणों से तो यही लग रहा है कि दुर्योधन कुल का नाश करेगा. इस बालक को छोड़ देने में ही सब की भलाई है. राजन, यदि आप इसे छोड़ दें तो भी आप के निन्यानबे पुत्र बचे रहते हैं. यदि आप अपने राजवंश की वृद्धि चाहते हैं तो इस बालक का परित्याग करने की सोचें".
ब्राह्मणों और विदुर के ऐसे प्रवचन के बाद भी पुत्र प्रेम के चलते धृतराष्ट्र अपने ज्येष्ठ पुत्र का परित्याग नहीं कर पाये. एक सौ एक घड़ों से धृतराष्ट्र और गांधारी के एक सौ पुत्र और एक पुत्री हुई थी. इनकेअतिरिक्त गांधारी जब गर्भवती थी उस समय जो दासी धृतराष्ट्र की सेवा कर रही थी उससे भी धृतराष्ट्र को एक पुत्र हुआ था - युयुत्सु. इस दासी पुत्र को ले कर धृतराष्ट्र कि कुल संतान थीं एक सौ एक पुत्र और एक पुत्री.
वैशम्पायन ने तब जनमेजय के अनुरोध पर कौरवों केउनके जन्मके क्रम में नाम बताए: दुर्योधन, युयुत्सु, दुःशासन, दुःसह, दुःशल, जलसन्ध, सम, सह, विन्द, अनुविन्द, दुर्धर्ष, सुबाहु, दुष्प्रधर्षन, दुरमर्शन, दुर्मुख, दुश्कर्ण, कर्ण, विविंशति, विकर्ण, शल, सत्व, सुलोचन, चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चरुचित्र, शरासन, दुर्माद, दुष्प्रगाह, विवित्सु, विकाटानन, ऊर्णनाभ, सुनभ, नंद, उपनंदक, त्रबाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, अयोबाहु, महाबाहु, चित्रांग, चित्रकुंडल, भीमवेग, भीमबल, बलाकी, बलवर्धन, उग्रायुध, भीम, कर्ण, कनकायु, दृढयुध, दृढ़वर्मा, दृढ़क्षत्र, सोमकीर्ति, अनुदार, दृढ़संध, जरासंध, सत्यसंध, सद, सुवाक, उग्रश्रवा, अश्वसेन, सेनानी, दुष्पराजय, अपराजित, पंडितक, विशालक्ष, दुर्वार, दृढ़हस्त, सुहस्त, वातवेग, सुवर्चस, अदित्यकेतु, वाहवाशी, नागदंत, अग्रयायी, कवची, निषंग, पाश, दंडधर, धनुर्ग्रह, उग्र, भीमरथ, वीरबाहु, अलोलुप, अभ, रौद्रकर्मण, दृढ़रथ, अनदृश्य, कुंडभेदी, विरावी, दीर्घलोचन, प्रमथ, प्रमथि, दिर्घर, व्युढोरु, कनकध्वज, कुंडाशीऔर वीरज. (1)
इन एक सौ एक पुत्रों के अतिरिक्त धृतराष्ट्र कोएक पुत्री दुःशाला भी हुई थी. सब पुत्रों के योग्य स्त्रियों से विवाह हुए थे.दुःशाला का विवाह सिंधु प्रदेश के राजा जयद्रथ से हुआ था.
(1) नामों में भिन्न पाठों में बहुत अंतर हैं.
वैशम्पायन कहता है:
एक बार गांधारी के सत्कार से प्रसन्न हो वेदव्यास ने उसे मन चाहा वर दिया. गांधारी ने एक सौ प्रतापी पुत्र मांगे और व्यास "ऐसा ही होगा" कह चल पड़े. कुछ समय पश्चात गांधारी ने गर्भ धारण किया. दो वर्षों तक गर्भ रखने के बाद भी उस ने कुछ नहीं जन्मा. इस बीच कुंती ने एक अत्यंत तेजस्वी बालक को जन्म दिया. कुंती के पुत्र की सुन गांधारी बहुत कुंठित हो चली थी और क्षोभ में उस ने अपने पेट पर बहुत जोर से प्रहार किया. इस आघात से उसका गर्भ गिर गया, दो वर्षों के बाद लौह कंदूक की तरह कठोर एक मांस पिंड निकला था उस के पेट से. दुखी गांधारी ने अपनी दासियों से उस पिंड को फेंक आने को कहा. पर तब तक व्यास वहां पहुँच गए. वे अपनी दिव्य दृष्टि से मांस पिंड के जनन को जान गए थे.
"यह क्या किया आप ने गांधारी?" व्यास ने दुःखी स्वर में पूछा
"मैं थक गयी थी अपना गर्भ ढोते ढोते" गांधारी ने सच सच बताया "और सुना कि कुंती ने सूर्य के सामान देदीप्यमान बालक को जन्म दिया है तो मैं अपने आप को रोक नहीं पायी"
"मेरी बात कभी झूठी नहीं होती, आपको धैर्य रखना चाहिए था" व्यास ने कहा फिर उन्होंने एक सौ घी से भरे घड़े मंगवाए और मांस पिंड पर शीतल जल का छिड़काव करवाया. जल छिड़कने के थोड़ी देर बाद वह मांस पिंड सौ भागों में बँट गया. व्यास घी से भरे हर घड़े में पिन्ड के एक भाग को डालने लगा. जिस समय व्यास यह कर रहा था उस समय गांधारी सोचने लगी “कृष्ण द्वैपायन की बात सच हो कर रहेगी और मुझे सौ पुत्र अवश्य होंगे किंतु कितना अच्छा होता यदि इन सौ पुत्रों के साथ मुझे एक पुत्री भी होती. पुत्री होने से महाराज धृतराष्ट्र मरणोपरांत उन क्षेत्रों में भी जा पाएँगे जहाँ बस वही जाते हैं जिनकी पुत्री के पुत्र हुए हों. और यदि मुझे पुत्री नहीं हुई तो मैं वह स्नेह कभी नहीं जान पाऊँगी जो किसी पुत्री की मां को अपने जामाता के लिए होता है. यदि मैने अपने जीवन में कुछ भी तप किए हों, कुछ भी दान धर्म किए हों तो प्रभु मुझे एक पुत्री भी दे दें”
तब तक व्यास ने, जो स्वयं हर घड़े में पिन्ड के एक एक भाग को रख रहा था, गांधारी से कहा “इन सौ घड़ों में तुम्हारे सौ पुत्र हैं. मेरी बात असत्य नहीं होगी. पर अभी उस पिंड का एक भाग बचा हुआ है. यही समय आने पर तुम्हे दौहित्र (पुत्री का पुत्र) देगा.” व्यास ने तब घी से भरा एक और घड़ा मँगवाया और उस घड़े में पिन्ड के अंतिम बचे भाग को रख कर घड़े को बंद करवा दिया. सभी घड़ों को अच्छी तरह बंद कर महल के किसी सुरक्षित भाग में रखवा दिया गया. घड़ों के ढक्कन दो वर्ष के पहले नहीं हटाने को कह व्यास अपने आश्रम की ओर निकल गए.
समय आने पर इन्ही घड़ों में से एक से दुर्योधन का जन्म हुआ. दुर्योधन और पाण्डु-पुत्र भीम के जन्म एक ही दिन हुए थे. जन्म लेते ही दुर्योधन गधे के सुर में रोने और रेंकने लगा था. उसे सुन गधे, गिद्ध,शृगालऔर कौव्वे भी, प्रत्युत्तर में मानो, जोर जोर से बोलने लगे थे. बहुत तेज हवा चलने लगी थी और कई स्थानो परआग भी लग गयी थी. इन अशुभ लक्षणों से धृतराष्ट्र भी डर गया था. उस ने भीष्म, विदुरऔर अनेक ज्ञानी ब्राह्मणों की एक सभा बुलवाई. यह मानते हुए कि युधिष्ठिर सब से बड़ा है और इस तरह राजा बनने का अधिकारी वही है, उस ने अपने पुत्र दुर्योधन के विषय में पूछा."क्या मेरा ज्येष्ठ पुत्र राजा बन सकता है? मैं मात्र यह जानना चाहता हूँ कि आप के विचार से सत्य और विधि सम्मत क्या होगा?"
धृतराष्ट्र की बात समाप्त होते ही शृगाल और गिद्ध फिर बोलने लगे. ब्राह्मणों नेकहा "इन अशुभ लक्षणों से तो यही लग रहा है कि दुर्योधन कुल का नाश करेगा. इस बालक को छोड़ देने में ही सब की भलाई है. राजन, यदि आप इसे छोड़ दें तो भी आप के निन्यानबे पुत्र बचे रहते हैं. यदि आप अपने राजवंश की वृद्धि चाहते हैं तो इस बालक का परित्याग करने की सोचें".
ब्राह्मणों और विदुर के ऐसे प्रवचन के बाद भी पुत्र प्रेम के चलते धृतराष्ट्र अपने ज्येष्ठ पुत्र का परित्याग नहीं कर पाये. एक सौ एक घड़ों से धृतराष्ट्र और गांधारी के एक सौ पुत्र और एक पुत्री हुई थी. इनकेअतिरिक्त गांधारी जब गर्भवती थी उस समय जो दासी धृतराष्ट्र की सेवा कर रही थी उससे भी धृतराष्ट्र को एक पुत्र हुआ था - युयुत्सु. इस दासी पुत्र को ले कर धृतराष्ट्र कि कुल संतान थीं एक सौ एक पुत्र और एक पुत्री.
वैशम्पायन ने तब जनमेजय के अनुरोध पर कौरवों केउनके जन्मके क्रम में नाम बताए: दुर्योधन, युयुत्सु, दुःशासन, दुःसह, दुःशल, जलसन्ध, सम, सह, विन्द, अनुविन्द, दुर्धर्ष, सुबाहु, दुष्प्रधर्षन, दुरमर्शन, दुर्मुख, दुश्कर्ण, कर्ण, विविंशति, विकर्ण, शल, सत्व, सुलोचन, चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चरुचित्र, शरासन, दुर्माद, दुष्प्रगाह, विवित्सु, विकाटानन, ऊर्णनाभ, सुनभ, नंद, उपनंदक, त्रबाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, अयोबाहु, महाबाहु, चित्रांग, चित्रकुंडल, भीमवेग, भीमबल, बलाकी, बलवर्धन, उग्रायुध, भीम, कर्ण, कनकायु, दृढयुध, दृढ़वर्मा, दृढ़क्षत्र, सोमकीर्ति, अनुदार, दृढ़संध, जरासंध, सत्यसंध, सद, सुवाक, उग्रश्रवा, अश्वसेन, सेनानी, दुष्पराजय, अपराजित, पंडितक, विशालक्ष, दुर्वार, दृढ़हस्त, सुहस्त, वातवेग, सुवर्चस, अदित्यकेतु, वाहवाशी, नागदंत, अग्रयायी, कवची, निषंग, पाश, दंडधर, धनुर्ग्रह, उग्र, भीमरथ, वीरबाहु, अलोलुप, अभ, रौद्रकर्मण, दृढ़रथ, अनदृश्य, कुंडभेदी, विरावी, दीर्घलोचन, प्रमथ, प्रमथि, दिर्घर, व्युढोरु, कनकध्वज, कुंडाशीऔर वीरज. (1)
इन एक सौ एक पुत्रों के अतिरिक्त धृतराष्ट्र कोएक पुत्री दुःशाला भी हुई थी. सब पुत्रों के योग्य स्त्रियों से विवाह हुए थे.दुःशाला का विवाह सिंधु प्रदेश के राजा जयद्रथ से हुआ था.
(1) नामों में भिन्न पाठों में बहुत अंतर हैं.